नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना, रूस में बंदी या गुमनामी बाबा ही थें नेताजी! शूरवीर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। इन्द्र ज्योति राय।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के देशप्रेम सप्ताह के तत्वावधान में 'शूरवीर स्तंभ' में आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी की जयंती पर हम श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। उनके जीवन का त्याग और उनके महाप्रयाण से जुड़ी पहेली आज भी हर भारतीय के हृदय को उद्वेलित करती है। उनके मृत्यु से जुड़ी हुई विरोधाभास की तात्कालिकता और प्रासंगिक विमर्श पर चिंतन करते हुए, यह शोधपरक विश्लेषण स्तंभकार श्री इन्द्र ज्योति राय (अनुवाद अधिकारी, पूर्व रेलवे मालदा मंडल) की ओर से प्रस्तुत है।
सुभाष चंद्र बोस भारत माता के ऐसे सपूत थे जिन्होंने आजादी के लिए सीमित संसाधनों के बावजूद अपना तन-मन-धन और परिवार राष्ट्र पर न्योछावर कर दिया। भारत की आजादी के लिए न सिर्फ उन्होंने कई देशों की यात्राएं कीं, लोगों को संगठित किया, बल्कि राष्ट्रीय हित में गुमनामी का जीवन भी व्यतीत किया।
रहस्यमयी मौत और प्रमुख तीन सिद्धांत
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की रहस्यमयी मौत भारतीय इतिहास के सबसे बड़े अनसुलझे रहस्यों में से एक है, जिसमें मुख्य रूप से तीन सिद्धांत हैं:
ताइवान में विमान दुर्घटना में मृत्यु
सोवियत संघ में नजरबंदी।
"गुमनामी बाबा" के रूप में साधु वेश में गुमनाम जीवन जीना।
आधिकारिक तौर पर विमान दुर्घटना में मृत्यु बताई जाती है, लेकिन परिवार और समर्थकों के बीच आज भी कई अटकलें और साजिश के सिद्धांत जारी हैं। 18 अगस्त 1945 के बाद का सुभाषचन्द्र बोस का जीवन और मृत्यु आज तक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है। 18 अगस्त 1945 को उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। यह दुर्घटना जापान अधिकृत फोर्मोसा (वर्तमान ताइवान) में हुई थी।
आधिकारिक जापानी रिपोर्ट और विमान दुर्घटना का विवरण
17 अगस्त 1945 को ली गई तस्वीर नेताजी की आख़िरी ज्ञात हस्ताक्षरित तस्वीर मानी जाती है। इसके अगले ही दिन उनके निधन की खबर आई। वेबसाइट Bosefiles.info के अनुसार, जापानी भाषा में लिखी सात पन्नों की रिपोर्ट और अंग्रेजी में अनुवादित दस पन्नों की रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि नेताजी 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटना में मारे गए।
रिपोर्ट के मुख्य अंश:
उड़ान भरने के तुरंत बाद, जिस विमान में वह सवार थे, वह जमीन पर गिर गया। विमान के बाएं पंख के प्रोपेलर की एक पंखुड़ी अचानक टूट गई और इंजन गिर गया।"
लगभग दोपहर 3.00 बजे उन्हें ताइपे सेना अस्पताल की नानमोन शाखा में भर्ती कराया गया और लगभग शाम 7.00 बजे उनकी मृत्यु हो गई।
उनका पूरा शरीर जलने से बुरी तरह घायल हो गया था। शाम 7 बजे तक वह होश में थे और उन्होंने सहायक हबीबुर रहमान से बातचीत की, लेकिन अचानक उनकी चेतना चली गई।
मुखर्जी आयोग की जाॅंच और गहरे विरोधाभास
नेताजी की मृत्यु की जाॅंच के लिए गठित मुखर्जी आयोग ने ताइवान जाकर उस स्थान का निरीक्षण किया। आयोग को 1945 के श्मशान रजिस्टर (17 से 27 अगस्त) में 273 लोगों के अंतिम संस्कार का विवरण मिला, लेकिन इनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जनरल शिदेई, या पायलटों के नाम दर्ज नहीं पाए गए। इसी आधार पर मुखर्जी आयोग ने विमान दुर्घटना की कहानी पर संदेह व्यक्त किया। हालाँकि, भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया।
ताशकंद समझौता और लाल बहादुर शास्त्री जी का रहस्य
सन् 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रूस में मृत्यु से पहले क्या वे नेताजी से मिले थे? उनके बेटे सुनील शास्त्री के अनुसार, निधन से 40 मिनट पहले शास्त्री जी ने फोन पर जिक्र किया था कि भारत वापस आने पर वह देशवासियों को एक बड़ी खबर देंगे।
फोटो मैपिंग का साक्ष्य:
ब्रिटिश एक्सपर्ट नील मिलर ने फोटो मैपिंग के जरिए दावा किया है कि ताशकंद की तस्वीरों में शास्त्री जी के पीछे दिखने वाला व्यक्ति और सुभाष चंद्र बोस एक ही हैं। इसी तरह का एक फोटो नेहरूजी की अंत्येष्टि के समय का भी है, जिसमें दावा किया गया है कि शव के पास खड़ा व्यक्ति सुभाष चंद्र बोस ही हैं।
गाॅंधीजी का विश्वास और विजयलक्ष्मी पंडित का बयान
ताइवान हादसे की खबर के बाद महात्मा गाॅंधी ने परिजनों को पत्र लिखकर श्राद्धकर्म करने से मना किया था, जो संकेत देता है कि उन्हें उनके जीवित होने का पता था। इसी तरह 1948 में विजयलक्ष्मी पंडित ने मुंबई हवाई अड्डे पर घोषणा की थी कि वह रूस से एक अच्छी खबर लेकर आईं हैं, लेकिन कथित तौर पर नेहरूजी के दबाव में उन्होंने सच नहीं बताया।
गुमनामी बाबा और डीएनए म्यूटेशन का रहस्य
तीसरी थ्योरी यह है कि वह 'गुमनामी बाबा' के रूप में फैजाबाद में रहते थे। 1985 में उनके निधन के बाद उनके सामान से रोलेक्स घड़ी, अखबार, और नक्शे मिले। जनवरी 2021 में प्रकाशित 'गवर्नमेंट डजंट वांट यू टू नो दिस' किताब के अनुसार, आरटीआई से मिले दस्तावेजों का अध्ययन बताता है कि नेताजी के संबंधियों और गुमनामी बाबा के डीएनए म्यूटेशन में गहरा मेल है। यदि कुल 9 में से बाकी 5 म्यूटेशन का डेटा मिल जाता, तो यह सिद्ध हो जाता कि बाबा ही बोस थे।
मीमांसा का विश्लेषण
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की वह अंतिम विमान यात्रा केवल एक सफर नहीं, बल्कि रहस्यों और तार्किक जटिलताओं का एक ऐसा ताना-बाना है, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा को हमेशा के लिए एक प्रश्नचिन्ह पर लाकर खड़ा कर दिया। 15 अगस्त 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण ने नेताजी के सामने एक गंभीर संकट पैदा कर दिया था। वे जानते थे कि ब्रिटिश हुकूमत उन्हें युद्ध अपराधी के रूप में देखेगी, इसलिए एक कुशल रणनीतिकार की तरह उन्होंने सोवियत रूस जाने का निश्चय किया। उनका उद्देश्य था कि रूसी भूमि का उपयोग करके भारत की आजादी के संघर्ष को एक नया वैश्विक मंच दिया जाए।
इस ऐतिहासिक और जोखिम भरी यात्रा का सफर सिंगापुर से शुरू होकर बैंकॉक, साइगॉन और फिर वियतनाम के टूरन तक पहुँचा। 17 अगस्त 1945 को साइगॉन के हवाई अड्डे पर जब नेताजी पहुँचे, तो वहां उनके लिए एक विशेष चुनौती खड़ी थी। जापानी सेना का 'मित्सुबिशी Ki-21' बॉम्बर विमान पहले से ही सैन्य अधिकारियों और हथियारों से पूरी तरह लदा हुआ था। तार्किक दृष्टि से देखें तो यह विमान अपनी क्षमता से कहीं अधिक भारी था। संसाधनों की कमी के कारण नेताजी के साथ उनके केवल एक विश्वासपात्र साथी, कर्नल हबीबुर रहमान को ही जाने की अनुमति मिल सकी।
18 अगस्त 1945 की दोपहर, वह ऐतिहासिक दिन था जब यह विमान ईंधन भरने के बाद ताइपे (ताइवान) के मत्सुयामा हवाई अड्डे से मंचूरिया के लिए रवाना हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों और जापानी दस्तावेजों के अनुसार, जैसे ही विमान ने रनवे छोड़ा और हवा में करीब 20 मीटर की ऊँचाई पर पहुँचा, एक भयानक धमाका हुआ। विमान के बाएं इंजन का प्रोपेलर अलग हो गया और यह भारी-भरकम मशीन बेकाबू होकर जमीन पर गिर गई। विमान के दो टुकड़े होते ही उसमें भीषण आग लग गई। चूँकि नेताजी के कपड़े पेट्रोल से भीगे हुए थे, वे आग की लपटों के बीच से बाहर निकले, लेकिन तब तक उनका शरीर बुरी तरह झुलस चुका था। उन्हें तत्काल ताइपे के नानमोन सैन्य अस्पताल ले जाया गया, जहाँ शाम के समय उनकी मृत्यु की खबर आई।
यहीं से इतिहास में विरोधाभासों का जन्म होता है। तार्किक रूप से सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उस समय के जापानी सैन्य अस्पताल और श्मशान घाट के रिकॉर्ड में 'सुभाष चंद्र बोस' नाम का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसके बजाय, 'इचिरो ओकुरा' नामक एक जापानी सैनिक का मृत्यु प्रमाणपत्र और अंतिम संस्कार का विवरण दर्ज है। शोधकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि नेताजी की पहचान गुप्त रखने और उन्हें सुरक्षित रूप से रूस पहुँचाने के लिए जापानियों ने यह एक सोची-समझी 'कवर स्टोरी' तैयार की थी।
इस यात्रा के एकमात्र भारतीय चश्मदीद, कर्नल हबीबुर रहमान ने जीवनभर इस दुर्घटना की पुष्टि की, लेकिन उनके बयानों की विसंगतियों ने संदेह को हमेशा जीवित रखा। जहाँ शाहनवाज समिति और खोसला आयोग ने इस दुर्घटना को सच माना, वहीं जस्टिस मुखर्जी आयोग ने ताइवान सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड खंगालने के बाद यह कहकर सनसनी फैला दी कि 18 अगस्त 1945 को ताइपे की धरती पर कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी। यह यात्रा आज भी एक रहस्यमयी गद्य की तरह है, जिसके हर पन्ने पर ऐतिहासिक तथ्यों और तार्किक संदेहों के बीच एक निरंतर युद्ध जारी है।
उपसंहार
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अंत आज भी इतिहास का एक विवादित और रहस्यमय अध्याय बना हुआ है। नेताजी केवल एक नेता नहीं थे, वे आज़ादी के ऐसे सिपाही थे जिनकी कहानी आज भी करोड़ों भारतीयों को सोचने पर मजबूर करती है कि 'सुभाष तुम गए कहाॅं'।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
अस्वीकरण: इस स्तंभ (शूरवीर स्तंभ) में प्रस्तुत विचार और विश्लेषण लेखक/स्तंभकार के निजी शोध और अध्ययन पर आधारित हैं। लेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक दस्तावेजों, आयोगों की रिपोर्टों और प्रचलित शोधों से संकलित की गई है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' का उद्देश्य किसी भी ऐतिहासिक तथ्य की आधिकारिक पुष्टि करना नहीं, बल्कि विभिन्न उपलब्ध पहलुओं को पाठकों के समक्ष विमर्श हेतु प्रस्तुत करना है। विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए पाठकों से आग्रह है कि वे इसे केवल जानकारी और वैचारिक चिंतन के दृष्टिकोण से ग्रहण करें। किसी भी ऐतिहासिक घटना या व्यक्तित्व के प्रति सम्मान कम करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है।
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