नेताजी का मोहभंग और कांग्रेस का प्रकरण। शूरवीर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख
अडिग ज्वाला और इतिहास का पुनर्पाठ करते हुए वेब पत्रिका 'मीमांसा' शूरवीर स्तंभ संपादकीय आलेख में नेताजी के जीवन को खंगाल रही है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक संगठित विरोध भर नहीं था, बल्कि यह देश के भविष्य को लेकर दो भिन्न धाराओं गाॅंधीवादी अहिंसा और सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के बीच के वैचारिक संघर्ष की भी गाथा है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह आलेख, "अडिग ज्वाला: नेताजी सुभाष चंद्र बोस और निष्कासन की राजनीति", इसी विमर्श के उन अनछुए और विवादास्पद पहलुओं को उजागर करता है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के इतिहास में हाशिए पर रखा गया।
यह आलेख पाठकों को 1930 के दशक की उस राजनीतिक बिसात पर ले जाता है, जहाँ 'हरिपुरा' और 'त्रिपुरी' अधिवेशन मात्र सत्ता के केंद्र नहीं, बल्कि वैचारिक टकराव के रणक्षेत्र बन गए थे। लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित होने के बावजूद नेताजी को जिस 'प्रणालीगत अलगाव' और 'कांग्रेस षड्यंत्र' का सामना करना पड़ा, वह भारतीय राजनीति के उस 'सत्तावादी स्वरूप' को दर्शाता है जिसने समझौते के ऊपर सैन्य संघर्ष को चुनने वाले एक महानायक को अपनी ही पार्टी से बाहर कर दिया।
आलेख का केंद्रबिंदु केवल बोस का निष्कासन नहीं, बल्कि उनकी उस दूरगामी कूटनीति पर भी है, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध को 'ईश्वर प्रदत्त अवसर' मानकर 'आजाद हिंद फौज' के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया। न्यायमूर्ति पी.बी. चक्रवर्ती और लॉर्ड एटली के बीच का ऐतिहासिक संवाद इस लेख की आत्मा है, जो यह सोचने पर विवश करता है कि भारत की वास्तविक मुक्ति 'अहिंसक आंदोलनों' का परिणाम थी या भारतीय सेना के भीतर धधकती विद्रोह की वह ज्वाला, जिसके सूत्रधार नेताजी थे।
'मीमांसा' का यह प्रयास किसी की महत्ता को कम करना नहीं, बल्कि इतिहास के उन साक्ष्यों को स्वर देना है जो दशकों तक राजनीतिक विस्मृति की धूल में दबे रहे। आइए, तथ्यों की कसौटी पर इतिहास के इस महामंथन में उतरें।
अडिग ज्वाला: नेताजी सुभाष चंद्र बोस और निष्कासन की राजनीति
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अक्सर अहिंसक प्रतिरोध की एक सीधी रेखा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि, इस विमर्श की सतह के नीचे एक गहरा वैचारिक मतभेद छिपा है एक ऐसा "कांग्रेस षड्यंत्र" जिसने भारत के सबसे करिश्माई और प्रभावी नेताओं में से एक, सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें प्यार से 'नेताजी' कहा जाता है, को हाशिए पर धकेलने का काम किया।
नेताजी का संघर्ष केवल ब्रिटिश राज के खिलाफ नहीं था; यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की आत्मा के लिए एक लड़ाई थी और यह साबित करने का प्रयास था कि आजादी कभी दी नहीं जाती उसे छीनना पड़ता है।
वैचारिक दरार: वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ
1930 के दशक तक, कांग्रेस वैचारिक रूप से विभाजित हो चुकी थी। एक तरफ सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में और महात्मा गांधी के समर्थन वाला "ओल्ड गार्ड" (पुराना खेमा) था, जो क्रमिक और संवैधानिक दृष्टिकोण का पक्षधर था। दूसरी ओर बोस और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाला कट्टरपंथी वामपंथी धड़ा था, जो बिना किसी समझौते के "पूर्ण स्वराज" की मांग कर रहा था।
हरिपुरा की जीत (1938)
हरिपुरा अधिवेशन में बोस को निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया। उनका संबोधन दूरदर्शी था, जिसमें उन्होंने आजादी के बाद भारत के औद्योगिकीकरण के लिए एक 'राष्ट्रीय योजना समिति' का प्रस्ताव रखा एक ऐसा कदम जिसने गांधी के "ग्राम अर्थव्यवस्था" समर्थकों को असहज कर दिया। हालांकि यह सत्र सफल रहा, लेकिन आंतरिक घर्षण अपने चरम पर पहुंच रहा था।
त्रिपुरी संकट: "षड्यंत्र" का खुलासा
बोस के खिलाफ राजनीतिक घेराबंदी का सबसे स्पष्ट प्रमाण 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान मिला। इतिहासकारों द्वारा इस घटना को अक्सर उस क्षण के रूप में उद्धृत किया जाता है जब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेता को बाहर करने के लिए सक्रिय रूप से काम किया।
पुनः निर्वाचन: गांधी की इच्छा के विरुद्ध, बोस ने दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ा। गांधी ने पट्टाभि सीतारमैय्या को अपने उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया।
महात्मा की हार: चुनाव में बोस की जीत हुई। निराशा के एक दुर्लभ सार्वजनिक प्रदर्शन में गांधी ने कहा, "पट्टाभि की हार मेरी हार है।"
पंत प्रस्ताव: चुनाव के बाद, कांग्रेस के दक्षिणपंथी धड़े ने "पंत प्रस्ताव" पेश किया, जिसमें निर्देश दिया गया था कि अध्यक्ष को गांधी की इच्छा के अनुसार कार्य समिति की नियुक्ति करनी होगी। इसने प्रभावी रूप से बोस की शक्तियों को छीन लिया।
प्रणालीगत अलगाव: बोस को अपनी ही पार्टी के भीतर "असहयोग" का सामना करना पड़ा। कार्य समिति के सदस्यों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया, जिससे बोस बिना टीम के नेता बनकर रह गए।
इतिहासकार सुमित सरकार के अनुसार, यह कालखंड कांग्रेस आलाकमान के भीतर उस "सत्तावादी प्रवृत्ति" को उजागर करता है, जिसने लोकतांत्रिक जनादेश के ऊपर वैचारिक शुद्धता को प्राथमिकता दी।
फॉरवर्ड ब्लॉक और महाभिनिष्क्रमण (The Great Escape)
अप्रैल 1939 में इस्तीफा देने के लिए मजबूर होने के बाद, बोस ओझल नहीं हुए। उन्होंने कांग्रेस के भीतर कट्टरपंथी तत्वों को एकजुट करने के इरादे से 'ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक' का गठन किया। हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें तीन साल तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।
उग्रवाद की ओर झुकाव
जैसे ही द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, बोस ने इसे "ईश्वर द्वारा दिया गया अवसर" माना। जब कांग्रेस इस बात पर बहस कर रही थी कि ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन किया जाए या नहीं, बोस कलकत्ता में नजरबंद थे। 1941 में उनका "महाभिनिष्क्रमण" अफगानिस्तान के रास्ते सोवियत संघ और अंततः जर्मनी तक की यात्रा मुख्यधारा की राजनीति से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सैन्य हस्तक्षेप की ओर एक बड़ा बदलाव था।
आजाद हिंद फौज और आजादी का अंतिम प्रहार
सिंगापुर में आजाद हिंद फौज (INA) का गठन बोस के संघर्ष का शिखर था। धुरी शक्तियों (Axis Powers) से मदद मांगने के कारण, कांग्रेस के भीतर उनके विरोधियों और ब्रिटिश मीडिया ने उन्हें "फासीवादी" करार दिया।
हालांकि, ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि बोस का गठबंधन पूरी तरह से रणनीतिक था। उनका एकमात्र लक्ष्य भारत की मुक्ति थी। उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया:
"स्वतंत्रता की कीमत केवल रक्त से चुकाई जा सकती है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा!"
INA मुकदमों का प्रभाव
1945 में लाल किले में INA अधिकारियों (सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज) पर चले मुकदमों ने दशकों के विरोध प्रदर्शनों की तुलना में ब्रिटिश शासन को अधिक अस्थिर कर दिया। इन मुकदमों ने शाही भारतीय नौसेना में विद्रोह की लहर पैदा कर दी, जिससे अंग्रेजों को यह संकेत मिल गया कि वे अब साम्राज्य को थामे रखने के लिए भारतीय सैनिकों पर भरोसा नहीं कर सकते।
विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने युद्ध के दौरान बोस से दूरी बना ली थी, उसने नेताजी के लिए जनता के भारी समर्थन को देखते हुए INA अधिकारियों के बचाव में हाथ आगे बढ़ाया।
गुमशुदगी का रहस्य और स्मृति की राजनीति
आधिकारिक वृत्तांत कहता है कि 1945 में ताइहोकू में एक विमान दुर्घटना में बोस की मृत्यु हो गई। हालांकि, शाह नवाज समिति (1956), खोसला आयोग (1970) और मुखर्जी आयोग (1999) ने परस्पर विरोधी विचार दिए हैं। मुखर्जी आयोग ने सुझाव दिया कि दुर्घटना को केवल एक छलावा बनाया गया था ताकि सोवियत संघ में भागने की सुविधा मिल सके।
स्वतंत्रता के बाद भी "षड्यंत्र" जारी रहा। दशकों तक, स्कूली पाठ्यपुस्तकों में INA के योगदान को कम करके दिखाया गया और 1960 के दशक तक भारत सरकार द्वारा बोस परिवार की निगरानी की गई (जैसा कि 2015 में अवर्गीकृत IB फाइलों से पता चला)।
नेताजी की विरासत का पुनर्मूल्यांकन
नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक "विद्रोही" नेता नहीं थे; वे एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने एक धर्मनिरपेक्ष, औद्योगिक और अनुशासित भारत की कल्पना की थी। कांग्रेस के भीतर उनका हाशिए पर जाना उनके उस इनकार का परिणाम था जिसमें उन्होंने "फीकी" आजादी या सांप्रदायिक विभाजन को स्वीकार करने से मना कर दिया था।
इतिहास की किताबें अक्सर "नियति से मिलन" (Tryst with Destiny) पर जोर देती हैं, लेकिन उस व्यक्ति को याद करना महत्वपूर्ण है जिसका मानना था कि नियति को बलिदान की आग में गढ़ना पड़ता है। नेताजी का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता का मार्ग केवल नमक और चरखे से ही नहीं, बल्कि INA के जूतों की धमक और एक ऐसे नेता के अडिग विजन से भी बना था जो अपने समय की राजनीति के लिए बहुत विशाल था।
वैचारिक दृष्टिकोणों का तुलनात्मक विवरण
| विशेषता | गांधी/कांग्रेस दक्षिणपंथ | नेताजी/फॉरवर्ड ब्लॉक |
| पद्धति | अहिंसा | सशस्त्र संघर्ष |
| द्वितीय विश्व युद्ध पर रुख | अंग्रेजों को सशर्त समर्थन | अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए युद्ध का उपयोग |
| दृष्टिकोण | कृषि प्रधान, गांव आधारित | औद्योगिक, आधुनिक राज्य |
| कूटनीति | नैतिक अनुनय | अंतरराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन |
नेताजी सुभाष चंद्र बोस आज भी "देशभक्तों के देशभक्त" बने हुए हैं। सत्ता के हस्तांतरण के मुख्य नैरेटिव से उनका निष्कासन भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और विवादित अध्यायों में से एक है।
स्वतंत्रता का वास्तविक कारण: एटली-चक्रवर्ती संवाद का रहस्योद्घाटन
इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार की पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ बंगाल' के प्रकाशक को लिखे एक पत्र में, कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल के पूर्व कार्यवाहक राज्यपाल पी.बी. चक्रवर्ती ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना का खुलासा किया है। यह साक्ष्य इस बात पर मुहर लगाता है कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने के पीछे गांधीजी के आंदोलनों से कहीं अधिक खौफ नेताजी और उनकी आजाद हिंद फौज का था।
न्यायमूर्ति चक्रवर्ती लिखते हैं कि जब 1956 में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड क्लेमेंट एटली (जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के समय हस्तांतरण पर हस्ताक्षर किए थे) कलकत्ता आए, तो उन्होंने एटली से सीधा प्रश्न किया:
"चूंकि गाॅंधी का 'भारत छोड़ो' आंदोलन काफी समय पहले ही मंद पड़ चुका था और 1947 में ऐसी कोई नई मजबूरी वाली स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी, तो अंग्रेजों को इतनी जल्दबाजी में भारत क्यों छोड़ना पड़ा?"
एटली ने इसके उत्तर में कई कारण गिनाए, जिनमें सबसे प्रमुख था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरूप भारतीय थल सेना और नौसेना के जवानों के भीतर ब्रिटिश ताज (British Crown) के प्रति वफादारी का पूरी तरह खत्म हो जाना। जब न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने अंत में पूछा कि भारत छोड़ने के ब्रिटिश निर्णय पर गाॅंधीजी का कितना प्रभाव था, तो एटली के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आई और उन्होंने धीरे से कहा "न्यूनतम" (Minimal/बहुत कम!)।
इस ऐतिहासिक साक्ष्य का निष्कर्ष:
यह स्वीकारोक्ति स्पष्ट करती है कि 1946 का नौसेना विद्रोह (Naval Mutiny) और भारतीय सेना के भीतर धधकती विद्रोह की ज्वाला, जो नेताजी के आह्वान और INA के मुकदमों से उत्पन्न हुई थी, वही वह अंतिम कील थी जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत को बंद किया।
यह तथ्य उस राजनीतिक षड्यंत्र को बेनकाब करता है जिसने आजादी के बाद के दशकों में जानबूझकर नेताजी के योगदान को हाशिए पर रखा और सारा श्रेय केवल एक पक्ष को हस्तांतरित कर दिया। नेताजी का संघर्ष केवल ब्रिटिशों के खिलाफ नहीं, बल्कि उस विचारधारा के खिलाफ भी था जो भारत की शक्ति को पहचानने में विफल रही।
संपादकीय टिप्पणी : इतिहास का न्याय और 'मीमांसा' की वैचारिक तटस्थता
वेब पत्रिका 'मीमांसा' का मूल दर्शन किसी भी विषय के 'मंथन' और 'गहन विश्लेषण' पर आधारित है, जिसका उद्देश्य सत्य के उन परतों को उजागर करना है जो समय और परिस्थितियों के कारण विस्मृत कर दी गईं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य पर आधारित यह आलेख किसी भी प्रकार की राजनीतिक विद्वेष, व्यक्ति-पूजा या किसी ऐतिहासिक विभूति के कद को छोटा करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह इतिहास के उन वैकल्पिक और साक्ष्य-आधारित विमर्शों का संकलन है जिन्हें डॉ. आर.सी. मजूमदार, न्यायमूर्ति पी.बी. चक्रवर्ती और समकालीन शोधकर्ताओं ने वैश्विक पटल पर रखा है। 'मीमांसा' स्पष्ट करना चाहती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कोई एकल-आयामी घटना नहीं थी, बल्कि यह विभिन्न विचारधाराओं, संघर्षों और बलिदानों का एक जटिल संगम थी। हम महात्मा गांधी के नैतिक बल और कांग्रेस के जन-आंदोलनों की शक्ति का पूर्ण सम्मान करते हैं, किंतु साथ ही हम उस ऐतिहासिक शून्यता को भरने के भी पक्षधर हैं जो नेताजी और आजाद हिंद फौज के सैन्य प्रभाव को गौण करके निर्मित की गई है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली और न्यायमूर्ति चक्रवर्ती के बीच का संवाद कोई काल्पनिक वृत्तांत नहीं, बल्कि एक दस्तावेजी साक्ष्य है, जिसे अकादमिक जगत में स्थान मिलना अनिवार्य है। इतिहास निरंतर प्रवाहमान है और नवीन साक्ष्यों के प्रकाश में पुरानी धारणाओं का पुनर्मूल्यांकन करना एक जीवंत लोकतंत्र और उच्च शैक्षणिक चेतना का लक्षण है। यदि इस आलेख को संकीर्ण राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, तो यह उस 'मीमांसा' (तार्किक जाॅंच) की मूल भावना का अपमान होगा जिसका उद्देश्य केवल तथ्यों का निर्भीक प्रस्तुतीकरण है। हमारा मानना है कि नेताजी का संघर्ष और कांग्रेस के भीतर की वैचारिक खींचतान भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का हिस्सा है, न कि किसी के प्रति शत्रुता का। अतः, 'मीमांसा' इस पुनर्पाठ के माध्यम से केवल एक बौद्धिक सेतु का निर्माण कर रही है, जो पाठकों को उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर स्वयं का निर्णय लेने हेतु प्रेरित करती है। हम किसी भी ओछी राजनीति या तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली सोच का समर्थन नहीं करते और अपनी वैचारिक स्वतंत्रता तथा तार्किक शुचिता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
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यह आलेख किसी भी राजनीतिक दल या विशिष्ट विचारधारा का समर्थन या विरोध करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका मुख्य ध्येय नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संदर्भ में समय-समय पर सामने आए विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, शोधकर्ताओं (जैसे जनरल जीडी बक्शी, अनुज धर आदि) और आधिकारिक दस्तावेजों (जैसे न्यायमूर्ति पी.बी. चक्रवर्ती के संस्मरण) का एक निष्पक्ष पुनर्पाठ (Re-reading) और समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करना है।
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