शब्द यज्ञ: समय के सरोकार और साहित्य का नूतन विमर्श वसंत पंचमी के पावन पर्व पर वेब पत्रिका 'मीमांसा' का अभिनव शंखनाद। संपादकीय

नमोऽस्तु ते शारदे माँ...। ऋतुराज वसंत  का आगमन और ज्ञान की आराधना का पुण्य संकल्प लेकर आज हम आपके बीच उपस्थित हुए हैं।  वसंत पंचमी का दिन केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक नहीं है, बल्कि यह जड़ता को चैतन्य में बदलने वाली शक्ति सरस्वती की आराधना का पर्व है। आज जब प्रकृति पलाश के केसरिया रंगों से श्रृंगार कर रही है और अमराइयों में कोयल की कूक गूँज रही है, ऐसे ही मांगलिक क्षणों में वेब पत्रिका 'मीमांसा' अपने वैचारिक अनुष्ठान 'शब्द यज्ञ' का श्रीगणेश कर रही है।
यह मात्र एक स्तंभ नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की उस अक्षय निधि को खंगालने का संकल्प है, जो समय की धूल में कहीं ओझल हो रही है। संपादक अमन कुमार होली के दूरदर्शी विजन और युवा मेधा के प्रति उनकी संवेदनशीलता का परिणाम है कि आज हम सूचनाओं के इस महासागर में 'ज्ञान के मोती' चुनने का प्रयास कर रहे हैं।
शब्द यज्ञ: प्रासंगिकता और पुनर्पाठ की आवश्यकता
आज का युग सूचना विस्फोट (Information Explosion) का युग है। हमारे पास उँगलियों के पोरों पर दुनिया भर की जानकारी उपलब्ध है। यूट्यूब, ब्लॉग्स और सोशल मीडिया के दौर में 'कंटेंट' की कमी नहीं है, लेकिन जिस वस्तु का अभाव है, वह है—प्रमाणिकता, गहराई और शोधपरक दृष्टि। अक्सर विद्यार्थी और शोधार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC NET, JRF, असिस्टेंट प्रोफेसर) की तैयारी के दौरान सतही जानकारी के भँवर में फँस जाते हैं। 'शब्द यज्ञ' इसी भटकाव को रोकने का एक सेतु है। यहाँ हम साहित्य का केवल पाठ नहीं करेंगे, बल्कि उसका पुनर्पाठ (Re-reading) करेंगे।
गद्य और पद्य: बदलते युग के संदर्भ
हिंदी साहित्य का इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज बदला, साहित्य की विधाओं ने अपनी करवट बदली। 'मीमांसा' का यह स्तंभ गद्य की वैचारिकता और पद्य की संवेदना को एक धरातल पर लाने का प्रयास है।
 * पद्य खंड: आदिकाल की वीरगाथा से लेकर छायावाद की सूक्ष्मता और समकालीन कविताओं के यथार्थ तक, हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि निराला की 'राम की शक्ति पूजा' आज के संघर्षरत मनुष्य के लिए क्या संदेश देती है? या कबीर की साखियाँ आज के सांप्रदायिक दौर में कितनी अनिवार्य हैं?
 * गद्य खंड: उपन्यास, कहानी, निबंध और आलोचना के क्षेत्र में जो प्रतिमान स्थापित हुए हैं, उनका नवीन युग के संदर्भ में विवेचन आवश्यक है। प्रेमचंद के होरी का दुख आज के किसान के संकट से कैसे जुड़ता है, यह विमर्श 'शब्द यज्ञ' की आत्मा होगा।
सनातन प्रज्ञा और आधुनिक शोध का समन्वय
संपादक अमन कुमार होली ने जिस 'ऋषि-मुनि परंपरा' और 'सनातन ज्ञान' की बात की है, वह रूढ़िवादिता नहीं, बल्कि उस प्रज्ञा (Wisdom) का आह्वान है जो हमें सत्य और असत्य के बीच भेद करना सिखाती है। भारतीय साहित्य दर्शन हमेशा से समावेशी रहा है।
'शब्द यज्ञ' में हम स्थापित आचार्यों—जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, और रामविलास शर्मा—के तर्कों को आधार बनाकर नवीन शोधार्थियों के मौलिक विचारों को जगह देंगे। यह स्तंभ विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों और शोध प्रणालियों के बीच की खाई को पाटने का कार्य करेगा।
प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक जगत के लिए एक संबल
अक्सर उच्च शिक्षा की तैयारी कर रहे छात्र इस बात को लेकर असमंजस में रहते हैं कि किस आलोचक के मत को प्रामाणिक माना जाए। 'मीमांसा' का यह स्तंभ विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा:

असिस्टेंट प्रोफेसर व NET/JRF: यहाँ विषयों का विश्लेषण इस सूक्ष्मता से किया जाएगा कि वे सीधे तौर पर साक्षात्कार और लिखित परीक्षाओं के काम आ सकें।

विश्वविद्यालयी शोध: नवीन शोध के विषयों (Research Topics) के लिए एक नई दृष्टि प्रदान करना।

साहित्यिक शुचिता: बाजारीकरण के इस दौर में साहित्य की मर्यादा और भाषा की शुद्धता को बनाए रखना।

एक वैचारिक सत्संग का आमंत्रण
साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं है, वह 'लोकहित' का माध्यम है। 'मीमांसा' की यह पहल उन सभी साहित्य प्रेमियों, जिज्ञासुओं और सत्संगियों के लिए है जो शब्दों के पीछे छिपे अर्थों को खोजना चाहते हैं।

"शब्द ब्रह्म है, और इसका सही उपयोग ही समाज की चेतना को जाग्रत कर सकता है।"

हमारा यह प्रयास तभी सफल होगा जब देश भर के विभिन्न महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक और युवा शोधार्थी इस विमर्श का हिस्सा बनेंगे। हम केवल सूचनाएँ नहीं परोसेंगे, बल्कि हम संवाद करेंगे। हम आलोचना की उस परंपरा को जीवित करेंगे जहाँ असहमति के लिए भी सम्मान की जगह हो।

उपसंहार: संकल्प से सिद्धि की ओर
वसंत की यह बयार हमारे विचारों में भी नवीनता लाए। 'मीमांसा' का यह 'शब्द यज्ञ' केवल एक लेख श्रृंखला न रहकर एक वैचारिक आंदोलन बने, यही हमारी कामना है। संपादक अमन कुमार होली के नेतृत्व में यह पत्रिका हिंदी जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने की ओर अग्रसर है।

आइए, इस ज्ञान-यज्ञ में अपनी वैचारिक आहुति दें और हिंदी साहित्य के गौरव को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करें। आप सभी का इस साहित्यिक यात्रा में हार्दिक स्वागत है।
शुभमस्तु।

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