कालचिंतन के पुरोधा राजेन्द्र अवस्थी का पुण्य स्मरण । जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।अमन कुमार होली।


आज जब हम वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक के माध्यम से साहित्य और पत्रकारिता के देदीप्यमान नक्षत्र राजेन्द्र अवस्थी को स्मरण कर रहे हैं, तो मानस पटल पर एक ऐसे व्यक्तित्व की छवि उभरती है जिसने न केवल शब्दों को जिया, बल्कि समाज की धड़कनों को कागज़ पर उतारने का हुनर भी सिखाया। 25 जनवरी, 1930 को जबलपुर की माटी में जन्मे अवस्थी जी ने अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य और पत्रकारिता को जो विस्तार दिया, वह अद्वितीय है।

लेखक परिचय: एक बहुआयामी व्यक्तित्व
राजेन्द्र अवस्थी मात्र एक लेखक नहीं, बल्कि एक संस्था थे। 'नवभारत' से शुरू हुआ उनका सफर 'सारिका', 'नंदन' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से होता हुआ 'कादम्बिनी' के संपादन तक पहुँचा, जहाँ उन्होंने पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित किए। वह 'ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया' के अध्यक्ष के रूप में रचनाकारों की आवाज़ बने। उनके व्यक्तित्व में एक ओर जहाँ पत्रकार की पैनी दृष्टि थी, वहीं दूसरी ओर एक दार्शनिक की गहनता भी समाहित थी।

रचना कर्म: अनुभूतियों का विस्तार

अवस्थी जी का रचना संसार अत्यंत व्यापक है। उनके उपन्यासों और कहानियों में मिट्टी की सोंधी महक और आधुनिक समाज की विसंगतियों का सुंदर सामंजस्य मिलता है।

प्रमुख उपन्यास: 'सूरज किरण की छाँव', 'जंगल के फूल', 'जाने कितनी आँखें' और 'बीमार शहर' जैसे उपन्यासों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं के अनछुए पहलुओं को छुआ।

कहानी संग्रह: 'मकड़ी के जाले', 'दो जोड़ी आँखें' और 'दोस्तों की दुनिया' के माध्यम से उन्होंने रिश्तों की पेचीदगियों और सामाजिक ताने-बाने को बखूबी उकेरा।

यात्रा वृत्तांत: एक 'विश्वयात्री' के रूप में उन्होंने 'जंगल से शहर तक' की यात्रा में विभिन्न संस्कृतियों और समाजों का जीवंत चित्रण किया।

शैली और कला पक्ष: सौन्दर्यबोध और तार्किकता

राजेन्द्र अवस्थी की शैली में एक विशेष प्रकार का 'मैग्नेटिक आकर्षण' था। उनके कला पक्ष की सबसे बड़ी विशेषता थी गूढ़ विषयों को सहजता से प्रस्तुत करना।

विषय विविधता: उन्होंने तंत्र-मंत्र, रहस्य, और अध्यात्म जैसे विषयों को अंधविश्वास से हटाकर तार्किकता और गहन विश्लेषण के साथ पाठकों के सामने रखा।

कालचिंतन: 'कादम्बिनी' का उनका 'कालचिंतन' कॉलम केवल एक संपादकीय नहीं था, बल्कि वह पाठकों की दार्शनिक उलझनों का समाधान था। उसमें जीवन का अनुभव और विचारों की शुद्धता झलकती थी।

शिल्प पक्ष: भाषा की सरसता और प्रवाह

उनकी भाषा मृदु, प्रवाहपूर्ण और लयात्मक है। उन्होंने क्लिष्ट शब्दों के स्थान पर ऐसे शब्दों का चयन किया जो सीधे पाठक के हृदय में उतर जाते हैं। संवादों में संक्षिप्तता और भावों में तीव्रता उनके शिल्प की पहचान है। उनका गद्य काव्यमय प्रतीत होता है, जहाँ हर शब्द नपा-तुला और जाँचा-परखा हुआ है।

साहित्यिक पत्रकारिता और लेखन में योगदान

अवस्थी जी ने साहित्यिक पत्रकारिता को 'ड्राइंग रूम' से निकालकर जन-जन तक पहुँचाया। 'कादम्बिनी' को 'रीडर्स डाइजेस्ट' के समकक्ष खड़ा करना उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था। उन्होंने मृतप्राय होती पत्रिकाओं को अपनी मौलिक सोच और नवीन प्रयोगों से नवजीवन प्रदान किया। पत्रकारिता में उन्होंने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया और लेखकों की नई पीढ़ी को हमेशा प्रोत्साहित किया।

रचना का पुनर्पाठ क्यों जरूरी है?

आज के डिजिटल और सतही सूचनाओं के युग में राजेन्द्र अवस्थी की रचनाओं का पुनर्पाठ अनिवार्य है क्योंकि:

जड़ों की ओर वापसी: उनकी कृतियाँ हमें हमारी जड़ों, लोक-संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़ती हैं।

तार्किक चिंतन: वे हमें सिखाते हैं कि कैसे रहस्यमयी विषयों को भी विज्ञान और तर्क की कसौटी पर परखा जा सकता है।

संपादकीय गरिमा: आज की पत्रकारिता में जो भटकाव है, उसे सही दिशा दिखाने के लिए अवस्थी जी के संपादकीय और लेखनी एक प्रकाश स्तंभ की तरह हैं।

निष्कर्षतः, राजेन्द्र अवस्थी हिंदी साहित्य के वह 'सूरज' हैं जिसकी किरणों की छाँव में आज भी कई पीढ़ियाँ शब्द-साधना सीख रही हैं। उनकी जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

'मीमांसा' वेब पत्रिका के इस 'राजेन्द्र अवस्थी जयंती विशेषांक' में प्रकाशित समस्त विचार लेखकों के निजी विचार हैं। संपादक अथवा प्रबंधन का उन विचारों से पूर्णतः सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
तथ्यात्मक सटीकता: यद्यपि आलेखों की तैयारी में पूर्ण सावधानी बरती गई है और ऐतिहासिक तथ्यों (जैसे भारतकोश व अन्य संदर्भ) का मिलान किया गया है, फिर भी किसी भी तिथि, स्थान या घटना संबंधी त्रुटि के लिए पत्रिका उत्तरदायी नहीं होगी।
उद्देश्य: इस अंक का उद्देश्य स्वर्गीय राजेन्द्र अवस्थी जी के साहित्यिक और पत्रकारिता के अवदानों का स्मरण करना और उनका आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करना है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी जीवित/मृत व्यक्ति की छवि को धूमिल करना नहीं है।

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