रीतिकालीन कवियों में नारी उपमानों की मीमांसा: 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक

रीतिकालीन कवियों में नारी उपमानों की मीमांसा: 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक


भूमिका: सौंदर्य की अमर चित्रशाला

साहित्य और कला का संबंध देह और प्राण जैसा है। जिस प्रकार सामने प्रस्तुत इस चित्र में एक नारी का विग्रह अपनी संपूर्ण सात्विकता और श्रृंगारिक गरिमा के साथ जीवंत हो उठा है, ठीक वैसे ही हिंदी साहित्य का रीतिकाल नारी सौंदर्य के चित्रण की एक ऐसी अमर चित्रशाला है, जहाँ शब्दों के माध्यम से रूप का अभिषेक किया गया है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस 'वागेश्वरी स्तंभ' में आज हम चर्चा कर रहे हैं 'रीतिकालीन कवियों में नारी उपमानों की मीमांसा'।
रीतिकाल वह समय था जब कविता महलों के कंगूरों से उतरकर नायिका के नख-शिख वर्णन में रम गई थी। यह वह युग था जहाँ कवि की लेखनी चन्दन सी शीतल और शहद सी मीठी होकर नायिका के रूप-रंग को कागज़ पर उतारती थी। इस चित्र की भांति, जिसमें गौर वर्ण पर लाल सिंदूरी आभा और मयूर पंख का सान्निध्य है, रीतिकालीन कवियों ने भी उपमानों का एक ऐसा संसार रचा जो आज भी हमारी इंद्रियों को झंकृत कर देता है।

सौंदर्य का शास्त्रीय और सहज स्वरूप

रीतिकालीन कवियों बिहारी, मतिराम, देव और पद्माकर के लिए नारी केवल एक शरीर नहीं, बल्कि उपमानों का एक समुच्चय थी। इस चित्र को देखें, इसमें जो सौम्यता और आंखों की गहराई है, उसे बिहारी ने अपने दोहों में कुछ इस तरह पिरोया जैसे किसी ने सुराही से मीठी मदिरा ढाली हो।

रीतिकाल में नारी के अंगों की तुलना प्रकृति के श्रेष्ठतम अवयवों से की गई। यदि मुख की बात चली, तो वह केवल मुख नहीं रहा, वह 'शरद का पूर्ण चंद्र' बन गया। यदि नेत्रों की बात हुई, तो वे 'खंजन पक्षी', 'मृगछौने' या 'मीन' की चपलता ले आए।

 “कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
 भरे भौन में करत हैं नैननु ही सब बात॥”

बिहारी का यह दोहा सिद्ध करता है कि नारी की आंखों के उपमान केवल आकार तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे भावों के संप्रेषण का माध्यम थे।

मयूर पंख और कृष्णानुराग का प्रतीकवाद

प्रस्तुत चित्र में नायिका के हाथ में सुशोभित मयूर पंख केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि रीतिकालीन काव्य की आत्मा का प्रतीक है। रीतिकालीन श्रृंगार भक्ति के साथ घुला-मिला था। यहाँ नारी राधा का स्वरूप है, और मयूर पंख उस 'श्याम' की उपस्थिति का बोध कराता है, जिसके प्रेम में वह आकंठ डूबी है।
कवि देव ने जब सौंदर्य का वर्णन किया, तो उन्होंने प्रकृति के रंगों को नारी के आभामंडल में समाहित कर दिया। जिस प्रकार इस पेंटिंग में साड़ी का पीताभ और मांग का लाल रंग एक संतुलन पैदा कर रहा है, उसी प्रकार रीतिकालीन कवियों ने 'पीत वस्त्र' की तुलना 'धूप' से की:
 “सोहत ओढ़े पीत पटु, स्याम सलौने गात।
  मनौ नीलमणि सैल पर, आतपु परयो प्रभात॥”

नारी के सौंदर्य को चमकाने के लिए इन कवियों ने मणिकंचन संयोग का सहारा लिया। उपमान ऐसे दिए गए जो दृष्टि को बाधित न करें, बल्कि उसे विस्तार दें।

नख-शिख वर्णन: सूक्ष्मता का शिख

रीतिकाल की सबसे बड़ी विशेषता 'नख-शिख वर्णन' है। पैर के नाखून से लेकर सिर की चोटी तक, कवि ने हर अंग के लिए एक विशिष्ट उपमान गढ़ा।

नासिका: तिल के फूल (तिलपुष्प) या शुक (तोते) की चोंच के समान।
अधर (होंठ): बिंबाफल या प्रवाल (मूंगा) जैसे रक्तिम। ग्रीवा (गर्दन): शंख के समान सुडौल।
वाणी: कोयल की कूक या मिश्री की डली जैसी मीठी।

इस चित्र की नायिका के चेहरे पर जो मंद मुस्कान है, वह पद्माकर की पंक्तियों की याद दिलाती है, जहाँ वे कहते हैं कि नायिका के हँसने से मानो श्वेत फूल झड़ने लगते हैं। उपमानों का यह चयन केवल अलंकार प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह उस काल की सामंती संस्कृति और कलात्मक अभिरुचि का प्रतिबिंब था।

उपमानों में निहित सांस्कृतिक गरिमा

अक्सर रीतिकालीन काव्य पर आरोप लगता है कि वह केवल 'अश्लीलता' या 'देह' का काव्य है, लेकिन 'मीमांसा' के इस स्तंभ के माध्यम से हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि रीतिकालीन उपमानों में एक सांस्कृतिक गरिमा भी थी।
चित्र में नायिका ने जो आभूषण पहने हैं और जो ललाट पर तिलक है, वह उसे एक 'देवी' का स्वरूप देता है। कवियों ने भी नारी को 'लक्ष्मी' और 'गृहणी' के गौरव से अलंकृत किया। मतिराम के काव्य में जो सहजता है, वह इसी शालीन सौंदर्य की व्याख्या करती है। उनके उपमान ग्रामीण अंचलों की खुशबू लिए हुए हैं : जैसे सरसों के फूल सी पीली आभा या महुए सी मादकता।

शब्द-शिल्प और शहद सी मिठास

रीतिकालीन कविता की भाषा ब्रजभाषा है। ब्रजभाषा स्वयं में इतनी कोमल और मधुर है कि वह किसी भी कठोर भाव को शहद सा मीठा बना देती है। जब कवि उपमानों का प्रयोग करता है, तो शब्द एक संगीत पैदा करते हैं।

“अमिय हलाहल मद भरे, श्वेत श्याम रतनार।
जियत मरत झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत इक बार॥”

रसलीन की ये पंक्तियाँ नारी के नेत्रों को 'अमृत' (अमिय), 'विष' (हलाहल) और 'मदिरा' (मद) का संगम बताती हैं। ये तीन उपमान नारी के व्यक्तित्व के तीन आयामों को छूते हैं— सुखद, मारक और उन्मादक।

उपमानों की सार्थकता और आधुनिक दृष्टि

आज के युग में जब हम इन उपमानों को देखते हैं, तो पाते हैं कि रीतिकालीन कवियों ने नारी को केवल एक 'वस्तु' के रूप में नहीं, बल्कि 'सौंदर्य के केंद्र' के रूप में प्रतिष्ठित किया था।
प्रस्तुत चित्र में जो प्रकाश व्यवस्था (Lighting) है, वह रीतिकालीन कवियों की 'बिम्ब-योजना' जैसी ही है। जिस प्रकार प्रकाश चेहरे के खास हिस्सों को उभार रहा है, वैसे ही कवि उपमानों के माध्यम से नायिका के विशिष्ट गुणों को उभारते थे। यदि वह विरहिणी है, तो उसके लिए 'तपती दोपहरी' के उपमान हैं, और यदि वह अभिसारिका है, तो 'चाँदनी रात' के।

सोलह श्रृंगार: सौंदर्य का शास्त्रीय सोपान

भारतीय संस्कृति और रीतिकालीन साहित्य में नारी के सौंदर्य को पूर्णता प्रदान करने वाला आधार 'सोलह श्रृंगार' (16 श्रृंगार) ही है। आइए हम इस चित्र की जीवंतता के प्रकाश में उन सोलह प्रसाधनों की मीमांसा करें, जो एक साधारण स्त्री को साक्षात् 'वागेश्वरी' या 'लक्ष्मी' का रूप दे देते हैं।

रीतिकालीन कवियों ने माना है कि जिस प्रकार कविता अलंकारों के बिना प्रभावहीन है, उसी प्रकार नायिका का रूप बिना सोलह श्रृंगार के अधूरा है।


प्रस्तुत चित्र में हम देख सकते हैं कि किस प्रकार पारंपरिक प्रसाधनों ने चेहरे की आभा को द्विगुणित कर दिया है। सोलह श्रृंगार केवल सजने-धजने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिर से लेकर पैर तक की एक आध्यात्मिक और सौंदर्यपरक यात्रा है:

बिंदी (तिलक): चित्र में माथे पर सुशोभित लाल और श्वेत चंदन की कलात्मक बिंदी आज्ञा चक्र का प्रतीक है। रीतिकालीन कवि बिहारी ने इसे 'ग्रहों' के प्रभाव जैसा बताया है, जो देखने वाले की दृष्टि को बांध लेती है।
सिंदूर: सौभाग्य का प्रतीक और नारी के धैर्य की लालिमा।
मांग-टीका: माथे के बीचों-बीच लटकता यह आभूषण नारी के नियंत्रण और शालीनता को दर्शाता है।
काजल (अंजन): नयनों की चपलता बढ़ाने के लिए। कवियों ने इसे 'प्रेम की मदिरा' को सुरक्षित रखने वाला घेरा कहा है।
नथ (नथनी): जैसा कि चित्र में दिखाई दे रहा है, एक सूक्ष्म स्वर्ण सूत्र नासिका से कान तक जा रहा है, यह मर्यादा और सुहाग का सूचक है।
कर्णफूल (झुमके): कानों की शोभा बढ़ाने वाले ये आभूषण नायिका की चंचलता के साथ हिलते हुए किसी छंद की लय जैसे लगते हैं।
हार (कंठहार): गले का श्रृंगार, जो हृदय के समीप होता है। यह अक्सर मोतियों या स्वर्ण का होता है।
बाजूबंद: भुजाओं की सुंदरता उभारने के लिए।
कंगन या चूड़ियाँ: कलाइयों में खनकती चूड़ियाँ गृहस्थी के संगीत का मधुर स्वर हैं।
अंगूठी: उंगलियों की सुकुमारता को दर्शाने वाला रत्नजड़ित आभूषण।
मेखला (तगड़ी): कमर का आभूषण, जो नायिका की पतली कमर (कटी) के सौंदर्य को रीतिकालीन उपमानों (जैसे सिंहनी की कमर) के अनुरूप उभारता है।
 पायल: पैरों की गति में मधुर ध्वनि भरने वाला आभूषण।
बिछिया: पैरों की उंगलियों में पहना जाने वाला सुहाग का प्रतीक।
मेहंदी: हथेलियों और पैरों पर रची लालिमा, जो प्रेम के गहरे रंग को दर्शाती है।
इत्र (सुगंध): देह को पुष्पों की खुशबू से सराबोर करना।केश विन्यास (बेणी): बालों को संवारना। रीतिकालीन कवियों ने लंबी काली चोटी की तुलना 'काली नागिन' या 'अंधेरी रात' से की है।

रीतिकालीन काव्य में श्रृंगार का दर्शन

रीतिकालीन कवि केशवदास ने 'कविप्रिया' में श्रृंगार के इन भेदों का सूक्ष्म वर्णन किया है। इस चित्र में नायिका के हाथ में स्थित मयूर पंख सोलह श्रृंगार से इतर एक 'सात्विक श्रृंगार' की ओर संकेत करता है वह है 'कृष्ण-प्रेम'।
कवि पद्माकर कहते हैं कि जब नायिका ये सोलह श्रृंगार करके निकलती है, तो प्रकृति भी ठहर जाती है। चित्र में साड़ी का स्वर्ण जैसा रंग और लाल किनारी (बॉर्डर) उस 'अंबर' (वस्त्र) श्रृंगार को पुष्ट करते हैं, जिसे कवियों ने 'दामिनी' (बिजली) के समान चमकीला बताया है।

निष्कर्ष: शहद सी मीठी अभिव्यक्ति

सोलह श्रृंगार केवल देह का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक कला है जिसमें रंग, सुगंध, धातु और रत्न मिलकर एक 'काव्य' की रचना करते हैं। 'मीमांसा' के इस स्तंभ के माध्यम से हम यह अनुभव करते हैं कि चाहे वह तूलिका से बनी पेंटिंग हो या शब्दों से बुनी कविता, श्रृंगार हमेशा से नारी की गरिमा और उसकी सृजनात्मक शक्ति का उत्सव रहा है।

 वागेश्वरी का वरदान

'मीमांसा' पत्रिका के इस अंक का उद्देश्य उस सौंदर्य बोध को पुनर्जीवित करना है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गया है। रीतिकालीन कवियों ने नारी उपमानों के माध्यम से जो संसार रचा, वह शब्द और अर्थ का ऐसा विलास है जो कभी पुराना नहीं होता।
यह चित्र और रीतिकालीन कविता, दोनों ही हमें सिखाते हैं कि सौंदर्य केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि महसूस करने की कला है। शहद सी मीठी ब्रजभाषा और मयूर पंख सी कोमल कल्पनाओं के साथ, रीतिकालीन काव्य आज भी साहित्य प्रेमियों के कंठ का हार बना हुआ है।
नारी केवल सृष्टि की रचना नहीं, बल्कि स्वयं में एक संपूर्ण काव्य है, जिसके उपमान कभी समाप्त नहीं हो सकते। 'वागेश्वरी स्तंभ' की यह प्रस्तुति उन सभी अनाम और सनाम कवियों को नमन करती है, जिन्होंने शब्दों के माध्यम से नारी के इस शाश्वत रूप की मीमांसा की।

संपादकीय टिप्पणी: यह आलेख रीतिकालीन सौंदर्यशास्त्र और आधुनिक कलात्मक चित्रण के अंतर्संबंधों को उजागर करने का एक प्रयास है। हम आशा करते हैं कि 'मीमांसा' के पाठकों को यह भाषाई माधुर्य और वैचारिक गहराई पसंद आएगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

उद्देश्य: प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य केवल रीतिकालीन काव्य परंपरा, शास्त्रीय उपमानों और तत्कालीन सौंदर्यशास्त्र का शैक्षणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण करना है।
विषय-वस्तु: लेख में प्रयुक्त उपमान, चित्र और व्याख्याएँ मध्यकालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों पर आधारित हैं। 'मीमांसा' पत्रिका स्पष्ट करती है कि इन विवरणों का उद्देश्य किसी भी प्रकार की जड़ता, संकीर्णता या रूढ़िवादिता को बढ़ावा देना नहीं है। नारी सौंदर्य के चित्रण को विशुद्ध कलात्मक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लिया जाना चाहिए।
उत्तरदायित्व: इस स्तंभ में व्यक्त विचार रीतिकालीन काव्य रूढ़ियों की समीक्षा मात्र हैं। पत्रिका इसके किसी भी भाग की सामाजिक या आधिकारिक पुष्टि का दावा नहीं करती है। पाठकों से अपेक्षा है कि वे इसे केवल बौद्धिक और शोधपरक संदर्भ के रूप में ग्रहण करें।

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