आज जब हम गणतंत्र दिवस की इस पूर्व संध्या पर खड़े हैं, तो हिमालय की चोटियों से लेकर कन्याकुमारी के अथाह सागर तक एक ही स्वर गुंजायमान है 'जन-गण-मन'। यह केवल एक राष्ट्रगान की पंक्ति नहीं, बल्कि उस संकल्प की पुनरावृत्ति है जो हमने 26 जनवरी 1950 को स्वयं के साथ की थी। 'मीमांसा' के इस विशेष स्तंभ 'स्वदेश-स्वर' में आज हम उस लोकतंत्र के 77वें सोपान की चर्चा कर रहे हैं, जो विश्व के लिए एक कौतूहल है, एक शोध का विषय है और हम भारतीयों के लिए हमारी जीवन-साधना है।
विविधता का उत्सव: हमारी शक्ति, न कि दुर्बलता
अक्सर पश्चिमी विचारक इस बात पर आश्चर्य चकित रहते हैं कि इतनी भाषाई विविधता, सांस्कृतिक भिन्नता और वैचारिक मतभेदों वाला देश एक सूत्र में कैसे पिरोया हुआ है? भारत वह उपवन है जहाँ हज़ारों तरह के फूल अपनी सुगंध बिखेरते हैं। हमारी बोलियाँ बदलती हैं, हमारे पहनावे बदलते हैं, यहाँ तक कि हमारे आराध्य और पद्धतियाँ भी बदलती हैं, लेकिन 'भारतीयता' का जो अंतस है, वह अपरिवर्तित रहता है।
भाषाई माधुर्य: उत्तर की हिंदी, दक्षिण की तमिल, पूर्व की बांग्ला और पश्चिम की गुजराती ये भाषाएँ हमें बाँटती नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति के नए द्वार खोलती हैं। हमारे गणतंत्र ने इन सभी को अपनी गोद में स्थान दिया है।
सांस्कृतिक धरोहर: हमारी संस्कृति 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति' के सिद्धांत पर टिकी है। हम विसंगतियों में भी सामंजस्य खोज लेने वाले लोग हैं।
संविधान सभा: आधुनिक भारत की महान बौद्धिक प्रयोगशाला
भारतीय गणतंत्र की सफलता की नींव जिस कार्यकुशलता पर टिकी है, उसका श्रेय हमारी 'संविधान सभा' को जाता है। 9 दिसंबर 1946 को जब इस सभा की पहली बैठक हुई, तब भारत के सामने चुनौतियों का एक हिमालय खड़ा था। विभाजन की विभीषिका, सांप्रदायिक उन्माद और रियासतों के एकीकरण का प्रश्न इन सबके बीच एक ऐसा दस्तावेज़ तैयार करना जो सदियों की गुलामी के बाद एक नए भारत को दिशा दे सके, कोई साधारण कार्य नहीं था।
संविधान सभा की सबसे बड़ी कार्यकुशलता उसकी समावेशी दृष्टि (Inclusiveness) में थी। यद्यपि सभा के अधिकांश सदस्य एक ही दल से संबद्ध थे, लेकिन वैचारिक धरातल पर वहाँ विरोध के स्वर सबसे प्रखर थे।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, और के.एम. मुंशी जैसे दिग्गजों के बीच तीखी बहसें होती थीं, लेकिन उनका केंद्र व्यक्तिगत अहं नहीं, बल्कि राष्ट्रहित था। डॉ. अंबेडकर की 'प्रारूप समिति' ने दुनिया भर के संविधानों का मंथन किया, लेकिन उन्होंने 'नकल' करने के बजाय 'अनुकूलन' (Adaptation) को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत का संविधान केवल एक कानूनी ग्रंथ न बनकर एक 'जीवंत सामाजिक दस्तावेज़' बने।
सभा की कार्यकुशलता का एक अद्भुत प्रमाण 'सहमति का सिद्धांत' (Principle of Consensus) था। विवादास्पद विषयों जैसे राजभाषा, पृथक निर्वाचन मंडल, और मौलिक अधिकार पर मतदान के बजाय आम सहमति बनाने पर जोर दिया गया। घंटों तक चलने वाली बहसों में एक-एक शब्द पर मीमांसा की जाती थी। यह सभा की बौद्धिक प्रखरता ही थी कि लगभग तीन वर्षों (2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन) के भीतर उन्होंने एक ऐसा ढांचा तैयार कर दिया जिसने न केवल 500 से अधिक रियासतों को एक सूत्र में पिरोया, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी 'व्यस्क मताधिकार' के माध्यम से सत्ता का भागीदार बना दिया।
संविधान सभा ने केवल नियम नहीं बनाए, बल्कि 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) का बीज बोया। आज 77 वर्षों बाद भी यदि हमारा लोकतंत्र अडिग है, तो इसका कारण संविधान सभा की वह दूरदर्शिता है जिसने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच 'नियंत्रण और संतुलन' (Checks and Balances) की ऐसी व्यवस्था की कि कोई भी सत्ता निरंकुश न हो सके। उन मनीषियों की कार्यकुशलता का ही परिणाम है कि भारत का संविधान आज भी हमारी बदलती आकांक्षाओं को अपने भीतर समाहित करने में सक्षम है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के 77 सोपान: संघर्ष और उपलब्धि
सात दशकों की यह यात्रा कोई सरल मार्ग नहीं था। हमने युद्ध देखे, अकाल झेले, आंतरिक अशांति का सामना किया और कई बार हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न भी लगे। लेकिन भारतीय गणतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हर झंझावात के बाद यह और अधिक दृढ़ होकर उभरा है।
"लोकतंत्र केवल सरकार का एक रूप नहीं है; यह मूलतः साथ रहने का, सम्मिलित अनुभव का एक तरीका है।" - डॉ. बी.आर. अंबेडकर
आज जब हम 77वें वर्ष की दहलीज पर हैं, तो हमें गर्व होना चाहिए कि जहाँ हमारे पड़ोसी देश अक्सर राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहे, वहीं भारत ने मतपत्र (Ballot) की शक्ति को सर्वोपरि माना। वैचारिक भिन्नता हमारे यहाँ शत्रुता नहीं, बल्कि विमर्श का माध्यम बनती है। संसद से लेकर सड़क तक, जब तक विरोध के स्वर जीवित हैं, हमारा गणतंत्र जीवित है।
विसंगतियों के बीच विकास का पथ
यह सत्य है कि अभी भी गरीबी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार जैसी विसंगतियाँ हमारे मार्ग में बाधक हैं। सामाजिक असमानता की खाइयाँ पूरी तरह भरी नहीं गई हैं। परंतु, इन कमियों को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है। राष्ट्र की उत्तरोत्तर वृद्धि में आज का युवा, तकनीक, और डिजिटल क्रांति एक नई ऊर्जा भर रहे हैं। हम केवल एक 'बाजार' नहीं हैं, हम एक 'मेधा' (Intellect) हैं जो विश्व को दिशा दे रही है।
मीमांसा की भविष्य-दृष्टि: नव-गणतंत्र का अभ्युदय
'मीमांसा' का मानना है कि गणतंत्र केवल अतीत के गौरवगान का माध्यम नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का एक जीवंत संकल्प है। जब हम 77वें सोपान पर खड़े होकर आगामी दशकों की ओर निहारते हैं, तो हमें एक ऐसे 'नव-गणतंत्र' की आहट सुनाई देती है, जो अपनी जड़ों से जुड़ा है किंतु जिसकी शाखाएं अंतरिक्ष के विस्तार को छू रही हैं। आगामी समय में हमारी लोकतांत्रिक यात्रा केवल 'संख्याबल' (Majority) की औपचारिकता नहीं रहेगी, बल्कि वह 'सार्थक सहभागिता' (Meaningful Participation) के युग में प्रवेश करेगी। तकनीक और कृत्रिम मेधा (AI) के इस दौर में, लोकतंत्र के समक्ष सूचनाओं की सत्यता और निजता की सुरक्षा जैसी नवीन चुनौतियां होंगी, जिनसे निपटने के लिए हमें अपनी 'संवैधानिक नैतिकता' को और अधिक धारदार बनाना होगा।
भविष्य का भारत अपनी भाषाई अस्मिता को संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि नवाचार का उत्प्रेरक बनाएगा। 'मीमांसा' यह स्वप्न देखती है कि हमारी क्षेत्रीय भाषाएँ ज्ञान-विज्ञान और उच्च तकनीक की वाहक बनें, ताकि गाँव के अंतिम छोर पर बैठा युवा भी अपनी मातृभाषा में विश्व की सर्वश्रेष्ठ मेधा से संवाद कर सके। वैचारिक भिन्नता, जिसे अक्सर ध्रुवीकरण का नाम देकर डराने का प्रयास किया जाता है, भविष्य में हमारे विमर्श को और अधिक उर्वर बनाएगी। हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ 'असहमति' को देशद्रोह नहीं, बल्कि 'परिष्कार का उपकरण' माना जाएगा।
आगामी दशकों में भारत की वृद्धि दर केवल जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि 'सामाजिक न्याय के सूचकांक' से मापी जाएगी। विसंगतियों के कोहरे को चीरकर हमें उस अंत्योदय को सिद्ध करना है, जहाँ सत्ता के गलियारों में गूँजने वाली आवाज़ और हाशिए के समाज की सिसकी के बीच की दूरी समाप्त हो जाए। भविष्य का यह गणतंत्र 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए समावेशी विकास की नई परिभाषा गढ़ेगा। 'मीमांसा' की दृष्टि में, 21वीं सदी का यह उत्तरार्द्ध भारत के उस 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' का साक्षी होगा, जहाँ हम पश्चिम के अंधानुकरण के बजाय अपनी 'वसुधैव कुटुंबकम्' की वैचारिकी से वैश्विक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करेंगे।
राष्ट्र की यह उत्तरोत्तर वृद्धि किसी एक दल या विचारधारा की थाती नहीं, बल्कि 140 करोड़ स्वप्नों का सामूहिक पुरुषार्थ है। हमें एक ऐसी 'नागरिक संस्कृति' विकसित करनी होगी जहाँ अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाएं। भविष्य का भारत विसंगतियों से मुक्त होने के बजाय, उन विसंगतियों को समाधान में बदलने की कला में निपुण होगा। 'मीमांसा' संकल्पित है कि वह तार्किकता, शुचिता और समरसता के इन स्वरों को निरंतर मुखरित करती रहेगी, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जब हमारे गणतंत्र के शताब्दी वर्ष का उत्सव मनाएं, तो वे एक ऐसे राष्ट्र के उत्तराधिकारी हों जो न केवल समर्थ हो, बल्कि अत्यंत संवेदनशील और मानवीय भी हो।
उपसंहार: हमारा उत्तरदायित्व
अंत में, 'मीमांसा' के सुधी पाठकों से यही निवेदन है कि गणतंत्र केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन का क्षण है। राष्ट्र केवल मानचित्र पर खिंची लकीरों से नहीं बनता, वह नागरिकों के चरित्र से बनता है। यदि हम अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हैं, तो इस देश के लोकतंत्र को कोई आंच नहीं आ सकती।
आइए, इस पूर्व संध्या पर हम संकल्प लें कि हम अपनी विविधता को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी ढाल बनाएंगे। हम विसंगतियों पर प्रहार करेंगे और एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहाँ 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' केवल एक मंत्र न हो, बल्कि एक धरातलीय यथार्थ हो।
जय हिंद! जय गणतंत्र!
स्वदेश स्वर स्तंभ/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
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अस्वीकरण: इस आलेख (स्वदेश-स्वर: गणतंत्र के 77 सोपान) में व्यक्त किए गए विचार लेखक 'अमन कुमार होली' के व्यक्तिगत एवं शोधपरक विचार हैं। इन विचारों का उद्देश्य स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श को प्रोत्साहन देना और राष्ट्र की संवैधानिक यात्रा का अकादमिक विश्लेषण करना है। यह आवश्यक नहीं है कि 'मीमांसा' (वेब पत्रिका) का प्रबंधन या संपादकीय मंडल इन विचारों से पूर्णतः सहमत हो। आलेख में प्रयुक्त ऐतिहासिक संदर्भों और आंकड़ों की सटीकता का उत्तरदायित्व स्वयं लेखक का है। यह आलेख किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय या राजनीतिक विचारधारा की भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है।
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