आज ३० जनवरी है... काशी के उस 'सुंघनी साहु' परिवार की ड्योढ़ी पर आज भी शायद वही रसमय गूँज सुनाई देती होगी, जिसने कभी 'कलाधर' के पहले सवैये को सुना था। आज जब हम जयशंकर प्रसाद की जयंती मना रहे हैं, तो यह केवल एक कालजयी साहित्यकार का स्मरण नहीं है, बल्कि उस 'पितृ-पुरुष' की स्मृतियों का तर्पण है, जिसने अपने निजी आँसुओं को समूची मानवता के लिए 'करुणा की लहर' बना दिया।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' उस रस और रक्त की उत्तराधिकारिणी हैं, जिसकी रगों में 'कामायनी' का दर्शन और 'स्कंदगुप्त' का राष्ट्रप्रेम बहता है। कल्पना कीजिए, काशी की वह संकरी गली, जहाँ बाबू शिवरतन साहु की दानवीरता के किस्से हवाओं में तैरते थे वहाँ एक बालक अपनी नन्हीं उंगलियों से नियति के उस कठोर सत्य को लिख रहा था, जिसे आगे चलकर 'छायावाद' का हिमालय बनना था।
यह आलेख केवल शब्दों का ढाॅंचा नहीं, बल्कि उस हृदय की धड़कन है जिसने नौ वर्ष की आयु में ही माता-पिता के बिछोह का वज्रपात सहा। वह बालक, जिसने अपने घर के झरोखों से अपनों की अर्थियों को जाते देखा, जिसने क्षय रोग (टीबी) की भयावह परछाइयों को अपनी अर्धांगिनियों के ऑंचल में लिपटे देखा, उसने कभी समाज से कोई शिकायत नहीं की। उसने तो 'सुंघनी' की सुगंध की तरह चुपचाप अपनी पीड़ा को काव्य के इत्र में बदल दिया।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक में हम केवल एक रचनाकार को याद नहीं कर रहे, अपितु उस चेतना को नमन कर रहे हैं जिसने आधुनिक हिंदी साहित्य को 'सनातन' की दीप्ति और 'नवीन' का विन्यास दिया। 'मीमांसा' अपनी साहित्यिक शुचिता और समावेशी भाव के माध्यम से सदैव उन महाप्राण ऋषियों की प्रज्ञा का संवाहक रही है, जिन्होंने अपनी मेधा से शब्द को ब्रह्म बनाया। इसी परंपरा की एक जाज्वल्यमान कड़ी थें महाकवि जयशंकर प्रसाद। यह लेख एक श्रद्धांजलि है उस प्रज्ञावान के प्रति, जो चला गया ताकि हम 'आनंदवाद' की सुगंध में जी सकें। आइए, स्मृतियों के इस महासागर में डूबकर उस महामानव को नमन करें, जिसका नाम लेते ही आज भी काशी की मिट्टी महक उठती है।
सुंघनी साहु: वैभव से वैराग्य और प्रज्ञा की यात्रा
काशी की उस महान परंपरा में, जहाँ 'हर हर महादेव' का उद्घोष काशी नरेश के पश्चात बाबू देवीप्रसाद के लिए होता था, वहाँ 30 जनवरी 1889 को एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसे नियति ने हिंदी साहित्य का 'प्रसाद' बनने के लिए चुना था। 'सुंघनी साहु' परिवार का वह वैभव, दानशीलता की वह परंपरा और शिवरतन साहु की वह विरासत, प्रसाद जी के व्यक्तित्व में एक उदार गरिमा बनकर उभरी।
प्रसाद जी का जीवन केवल काव्य-सृजन नहीं था, वह एक तपस्या थी। अल्पायु में माता-पिता और बड़े भाई का बिछोह, तीन विवाहों की त्रासदी और घर में क्षय रोग (टीबी) का वह भयावह प्रवेश जिसने उनकी दो पत्नियों और अंततः स्वयं उन्हें भी निगल लिया इतना सब कुछ झेलने के बाद भी उनके स्वर में जो 'मृदुलता' और 'रसमयता' है, वह भारतीय मनीषा के स्थितप्रज्ञ स्वरूप का प्रमाण है। उनके काव्य गुरु का नाम सोहनलाल रसमय सिद्ध थें व संस्कृत का ज्ञान इन्होंने पंडित दीनबंधु ब्रह्मचारी जी से प्राप्त किया था।
छायावाद के आधार स्तंभ और भाषा के शिल्पी
प्रसाद जी मात्र एक कवि नहीं थे, वे छायावाद के प्राण थे। उन्होंने खड़ीबोली को वह कामनीय माधुर्य प्रदान किया, जो उससे पूर्व दुर्लभ था। उनकी काव्य-यात्रा 'कलाधर' उपनाम से ब्रजभाषा के सवैयों से आरंभ हुई, किंतु 'कामायनी' तक पहुँचते-पहुँचते वह एक कालजयी दर्शन बन गई।
प्रसाद जी की प्रमुख काव्य कृतियाँ और उनका विकास:
| चित्राधार | १९१८ | ब्रजभाषा और खड़ीबोली का संधि स्थल |
| झरना | १९१८ | छायावाद की प्रथम प्रयोगशाला |
| आँसू | १९२५ | व्यक्तिगत विरह का विश्व-करुणा में रूपांतरण |
| लहर | १९३५ | गाम्भीर्य और बुद्ध की करुणा का संगम |
| कामायनी | १९३६ | मानवता का मनोवैज्ञानिक महाकाव्य |
"दुख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात..." यह केवल कविता नहीं, प्रसाद जी का वह जीवन-दर्शन है जो उन्हें सनातन ऋषियों की ज्ञान परंपरा से जोड़ता है।
कथा और उपन्यास: यथार्थ का सूक्ष्म धरातल
प्रसाद जी के नाटकों की भव्यता के पीछे अक्सर उनके उपन्यासों और कहानियों की मारक क्षमता दब जाती है। किंतु 'कंकाल' में उन्होंने समाज की नग्नता को जिस साहस के साथ उघाड़ा, उसने प्रेमचंद जैसे यथार्थवादी रचनाकार को भी चकित कर दिया। 'तितली' में वे ग्रामीण सुधार और किसान की समस्याओं के साथ एक 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' की स्थापना करते हैं।
उनकी कहानियाँ, जैसे 'ममता', 'पुरस्कार' या 'आकाशदीप', केवल घटनाएँ नहीं हैं; वे मनुष्य के भीतर चलने वाले अंतर्द्वंद्व के मानचित्र हैं। 'मीमांसा' पत्रिका आज उसी सूक्ष्म दृष्टि को अपनी संपादकीय नीति का आधार मानती है।
ऋषित्व और प्रज्ञा का समागम
प्रसाद जी ने वेदों, उपनिषदों और इतिहास का केवल अध्ययन नहीं किया, उसे जिया। उनके नाटकों 'चंद्रगुप्त', 'स्कंदगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' में भारतीय राष्ट्रवाद की जो गूँज है, वह पराधीन भारत के लिए एक संजीवनी थी। उन्होंने इतिहास के गड़े मुर्दे नहीं उखाड़े, बल्कि अतीत के गौरवशाली स्वर्ण-पृष्ठों से वर्तमान के अंधकार को चीरने वाली मशालें तैयार कीं।
प्रसाद का काव्य-शिल्प: छायावाद के अन्य कवियों से भिन्नता
प्रसाद जी का काव्य-शिल्प केवल सौंदर्य का चित्रण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है। जहाँ छायावाद के अन्य स्तंभों निराला में विद्रोह की ओजस्विता है, पंत में प्रकृति की सुकुमारता है, और महादेवी में रहस्यमयी वेदना है; वहीं प्रसाद जी के यहाँ 'गांभीर्य' और 'ऐतिहासिक निरंतरता' का संगम है।
बिम्ब और प्रतीक: प्रसाद जी के प्रतीक 'कामायनी' की तरह मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक हैं। वे केवल उपमान नहीं चुनते, बल्कि श्रद्धा को 'हृदय' और इड़ा को 'बुद्धि' का रूप देकर एक पूर्ण जीवंत दर्शन रचते हैं।
भाषा का आभिजात्य: उनकी भाषा खड़ीबोली होने के बावजूद संस्कृत के तत्सम शब्दों से ऐसी अलंकृत है कि वह गद्य होते हुए भी संगीतमय हो जाती है।
दृष्टिकोण: अन्य छायावादी कवि जहाँ 'स्व' (Self) की पीड़ा से शुरू करते हैं, प्रसाद जी उस पीड़ा को 'विश्व-मंगल' की वेदी पर चढ़ा देते हैं। उनका 'आँसू' व्यक्तिगत विरह से शुरू होकर मानवता के कल्याण पर समाप्त होता है।
आज के यथार्थ में प्रसाद की प्रासंगिकता: इच्छा, ज्ञान और क्रिया का सामंजस्य
प्रसाद जी ने 'कामायनी' में आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या को पहचाना था विखंडन। आज का मनुष्य मानसिक अवसाद, अकेलेपन और दिशाहीनता का शिकार है। इसका कारण प्रसाद जी के शब्दों में है:
"ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की। एक दूसरे से न मिल सकें, यह विडंबना है जीवन की।"
आज जब हम आधुनिक यथार्थ को देखते हैं, जहाँ तकनीक और बुद्धि (इड़ा) का आधिक्य है, लेकिन हृदय (श्रद्धा) की संवेदनाएं लुप्त हो रही हैं, तब प्रसाद का 'आनंदवाद' ही एकमात्र मार्ग दिखता है। वे सिखाते हैं कि बुद्धि और हृदय का संतुलन ही सुख का आधार है। उनकी 'ममता' और 'आकाशदीप' जैसी कहानियाँ आज भी उस नैतिक शुचिता की याद दिलाती हैं, जिसकी कमी आज के भौतिकवादी युग में खटकती है।
राय कृष्णदास, जो काशी के एक प्रतिष्ठित कला मर्मज्ञ और 'भारत कला भवन' के संस्थापक थे, प्रेमचंद और प्रसाद दोनों के अत्यंत घनिष्ठ मित्र थे। उनके संस्मरणों के हवाले से इन दोनों दिग्गजों के संबंधों की कुछ अनकही परतें यहाँ स्पष्ट की जा रही हैं:.
दो विपरीत ध्रुवों का मिलन स्थल: 'भारती भंडार'
राय कृष्णदास के अनुसार, प्रेमचंद और प्रसाद के बीच का संबंध "सद्भावपूर्ण दूरी" और "पारस्परिक सम्मान" का था। बनारस में राय कृष्णदास का आवास और उनकी संस्थाएँ वह स्थान थीं जहाँ ये दोनों अक्सर मिलते थे।
विरोधाभासी व्यक्तित्व: राय कृष्णदास लिखते हैं कि जहाँ प्रेमचंद अत्यंत सीधे, सादे और ग्रामीण परिवेश के खुलेपन से युक्त थे, वहीं प्रसाद जी गंभीर, अंतर्मुखी और कलात्मक गरिमा से ओत-प्रोत थे।
राय कृष्णदास की भूमिका: उन्होंने इन दोनों के बीच एक 'सेतु' (Bridge) का कार्य किया। जब प्रेमचंद लखनऊ से बनारस आए, तो राय कृष्णदास ने ही उन्हें प्रसाद जी के साहित्यिक मंडल से परिचित कराया था।
वैचारिक मतभेद: 'यथार्थ' बनाम 'आदर्श'
राय कृष्णदास ने उल्लेख किया है कि साहित्य के उद्देश्य को लेकर दोनों में गहरी असहमति थी:
प्रसाद का दृष्टिकोण: प्रसाद जी इतिहास और दर्शन के माध्यम से 'आनंदवाद' की खोज करते थे। वे भाषा की संस्कृतनिष्ठता और शिल्प की भव्यता के पक्षधर थे।
प्रेमचंद का दृष्टिकोण: प्रेमचंद इसे "अतीत का मोह" मानते थे। वे वर्तमान की गरीबी, छुआछूत और किसान की व्यथा को प्रधानता देते थे।
राय कृष्णदास का संस्मरण: वे बताते हैं कि कई बार गोष्ठियों में दोनों के बीच तीखी बहस होती थी, लेकिन वह बहस कभी व्यक्तिगत द्वेष में नहीं बदली। राय कृष्णदास अक्सर मध्यस्थ बनकर वातावरण को हल्का करते थे।
हंस' पत्रिका और प्रसाद जी का सहयोग
जब प्रेमचंद ने 1930 में 'हंस' का प्रकाशन शुरू किया, तो राय कृष्णदास के माध्यम से ही जयशंकर प्रसाद से सहयोग मांगा गया।
प्रेमचंद जानते थे कि प्रसाद जी के बिना काशी का कोई भी साहित्यिक प्रयास अधूरा है।
राय कृष्णदास के हवाले से पता चलता है कि प्रसाद जी ने प्रेमचंद की आर्थिक तंगी और प्रेस की समस्याओं को देखते हुए हमेशा उनके प्रति सहानुभूति रखी। हालाँकि दोनों की शैलियाँ अलग थीं, लेकिन प्रसाद जी ने 'हंस' के लिए अपनी रचनाएँ देकर प्रेमचंद का मान बढ़ाया।
रामकृष्ण दास के अनुसार 'प्रतिस्पर्धा नहीं, पूरकता'
राय कृष्णदास ने इस बात का खंडन किया है कि उन दोनों के बीच कोई शत्रुता थी। उनके अनुसार:
"प्रेमचंद और प्रसाद एक ही रथ के दो पहिए थे। यदि प्रेमचंद 'धरती' थे, तो प्रसाद 'आकाश'। एक के बिना भारतीय साहित्य का यथार्थ अधूरा था, तो दूसरे के बिना उसका गौरवशाली अतीत।"
राय कृष्णदास ने एक रोचक प्रसंग सुनाया है कि कैसे प्रेमचंद अक्सर प्रसाद जी की ऐतिहासिक जानकारी का लोहा मानते थे, और प्रसाद जी प्रेमचंद की जनमानस को पकड़ने वाली 'जादुई पकड़' के कायल थे।
अंतिम समय की आत्मीयता
प्रेमचंद की मृत्यु (1936) और उसके अगले ही वर्ष प्रसाद की मृत्यु (1937) ने राय कृष्णदास को गहरा आघात पहुँचाया। राय कृष्णदास के अनुसार, प्रेमचंद की अंतिम बीमारी के समय प्रसाद जी उनके स्वास्थ्य को लेकर निरंतर चिंतित रहते थे। यह उस गहरी दोस्ती का प्रमाण था जो बाहरी मतभेदों के नीचे दबी हुई थी।
राय कृष्णदास के साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद और प्रसाद का संबंध "मतभेद के बावजूद मनभेद न होने" का उत्कृष्ट उदाहरण है। राय कृष्णदास ने इन दोनों के बीच उस कड़ी का काम किया जिसने छायावाद और यथार्थवाद को एक ही मेज पर बैठकर चाय पीने और साहित्य पर बहस करने का अवसर दिया।
उपसंहार: श्रद्धांजली की रसमय धार
आज 30 जनवरी की उनके जयंती की स्मृति में, जब 49 वर्ष की लघु आयु में हिंदी का यह सूर्य अस्त हुआ, 'मीमांसा' उन्हें अश्रुपूर्ण किंतु गर्वमयी श्रद्धांजलि अर्पित करती है। उनकी 'मृदुल' भाषा और 'करुणामय' दृष्टि आज भी भटके हुए समाज के लिए ध्रुवतारा है।
यह संकल्प लेते हैं कि हम उनके द्वारा रोपे गए ज्ञान-वृक्ष की सुरक्षा करेंगे। प्रसाद जी ने खड़ीबोली को जो शक्ति और सामर्थ्य दिया, वह आज भी हमारी ऊर्जा का स्रोत है। उनका साहित्य हमें सिखाता है कि कैसे 'विषाद' को 'प्रसाद' में बदला जाता है। मीमांसा प्रज्ञा के उस महामानव को कोटि-कोटि नमन करती है।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' संकल्प लेती है कि प्रसाद जी द्वारा प्रज्वलित साहित्यिक शुचिता की उस ज्योति को, जिसमें सनातन ऋषियों का ज्ञान और आधुनिक मेधा का सामंजस्य है, निरंतर प्रज्ज्वलित रखेगी। जयशंकर प्रसाद जी का कृतित्व उस 'लहर' की तरह है जो हमारे मानसिक तटों पर 'करुणा की नव अंगड़ाई' बनकर सदैव जीवित रहेगा
विनम्र श्रद्धांजलि!
सामग्री की प्रकृति: वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस 'जयंती विशेषांक' में प्रकाशित जयशंकर प्रसाद जी पर केंद्रित आलेख पूर्णतः साहित्यिक श्रद्धा, शोधपरक तथ्यों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्देश्य से लिखे गए हैं।
तथ्यात्मक संदर्भ: आलेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तिथियाँ, व्यक्तिगत जीवन के प्रसंग और उद्धरण विभिन्न स्थापित साहित्यिक स्रोतों (जैसे डॉ. राजेंद्रनारायण शर्मा, विनोदशंकर व्यास, राय कृष्णदास, रमेशचंद्र शाह आदि) पर आधारित हैं। संपादन मंडल ने तथ्यों की सटीकता सुनिश्चित करने का यथासंभव प्रयास किया है, तथापि किसी भी ऐतिहासिक भिन्नता के लिए शोधकर्ताओं को मूल ग्रंथों का संदर्भ लेने की सलाह दी जाती है।
व्यक्तिगत विचार: लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी विश्लेषण हैं, जो जयशंकर प्रसाद जी के प्रति सम्मान और साहित्यिक मीमांसा की दृष्टि से प्रस्तुत किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, परिवार या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु हिंदी के गौरव का यशोगान करना है।
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