सादगी के चितेरे, जनवाद के स्वर कथाकार स्वयं प्रकाश जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल अपनी रचनाओं से हीं नहीं, बल्कि अपनी उपस्थिति की ऊष्मा से भी पहचाने जाते हैं। स्वयं प्रकाश एक ऐसा ही नाम है। जब हम उन्हें याद करते हैं, तो केवल एक 'महान लेखक' को याद नहीं कर रहे होते, बल्कि उस मध्यमवर्गीय नैतिकता, उस कस्बाई संवेदनशीलता और उस अडिग मानवीय जिजीविषा को याद कर रहे होते हैं, जिसे उन्होंने अपनी कहानियों में साँस लेने लायक बनाया।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक में हम उन्हें मात्र श्रद्धांजलि अर्पित नहीं कर रहे, बल्कि उनके रचना-संसार के उस मानचित्र को फिर से समझने की कोशिश कर रहे हैं, जो आज के शोर-शराबे वाले दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।


जीवन-यात्रा: अनुभव की भट्टी में तपा व्यक्तित्व

स्वयं प्रकाश का जन्म 20 जनवरी, 1947 को इंदौर में हुआ। एक ऐसे वर्ष में जन्म लेना जब भारत अपनी स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था, उनके लेखन में भी एक नए भारत के निर्माण की आकांक्षा और उसके टूटने के दर्द को समाहित कर गया। उनकी शिक्षा और पेशेवर यात्रा विविधतापूर्ण रही। मैकेनिकल इंजीनियरिंग से लेकर भारतीय नौसेना और फिर 'हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड' तक का सफर उनके लेखन को एक अनूठा 'टेक्निकल' और 'लॉजिकल' आधार देता है।

वे केवल पुस्तकीय लेखक नहीं थे; उन्होंने जीवन को वर्कशॉप्स में, जहाजों पर और डाक-तार विभाग के रिपीटर स्टेशनों पर देखा था। यही कारण है कि उनके पात्र हवाई नहीं होते, वे हाड़-मांस के वैसे ही इंसान हैं जैसे आप और हम।

स्वयं प्रकाश: स्मृतियों और सृजन का संगम

स्वयं प्रकाश जी के साहित्यिक जीवन की शुरुआत उस मधुर बेला से हुई जब उनकी लेखनी से कविताएँ फूटती थीं। वे न केवल काव्य सृजन करते थे, बल्कि अपनी ओजस्वी आवाज़ में मंचों पर कविता पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध भी कर देते थे। उन दिनों उनके पिता का निवास अजमेर में था, और यही वह शहर था जिसने उनके भीतर के कथाकार को जगाया। यहाँ उन्हें प्रख्यात कथाशिल्पी रमेश उपाध्याय का सान्निध्य मिला, जिनकी प्रेरणा ने उनकी कलम को कविता के छंदों से मोड़कर कहानियों के यथार्थ की ओर अग्रसर किया। इसी वैचारिक यात्रा के फलस्वरूप, वर्ष 1969 में उनकी पहली कहानी का जन्म हुआ।

वैचारिक धरातल और प्रेरणा स्रोत

स्वयं प्रकाश जी का कथा-संसार विश्व साहित्य की महान विभूतियों के अनुभवों से सिंचित रहा है। उनके प्रिय साहित्यकारों की सूची काफी समृद्ध है, जिसमें: चेखव की बारीकी और मार्क ट्वेन का व्यंग्य। राजेन्द्र सिंह बेदी की मानवीय संवेदना। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, ब्रेख़्त, नाजिम हिकमत और जैक लंडन जैसे विचारकों की निर्भीकता। इन महान लेखकों के प्रभाव ने उनके लेखन को एक वैश्विक दृष्टि प्रदान की।

समकालीनता और जनवाद

जब उनका लेखन अपने पूरे निखार पर था, तब वे केवल अकेले नहीं चल रहे थे। वे एक ऐसी साहित्यिक धारा के संवाहक बने जिसने आम आदमी की आवाज़ को बुलंद किया। काशीनाथ सिंह, असग़र वजाहत, संजीव, पंकज बिष्ट, उदय प्रकाश और अरुण प्रकाश जैसे मूर्धन्य रचनाकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने जनवादी विचारधारा को धार दी। उनके इस सामूहिक प्रयास ने हिंदी कहानी को समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति से जोड़ने का एक नया शिल्प और संस्कार दिया।

रचना-कर्म: मध्यवर्ग का महाकाव्य

स्वयं प्रकाश मुख्यतः अपनी कहानियों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उन्होंने उपन्यास, निबंध और नाटकों के माध्यम से भी हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।
कहानी संग्रह: 'सूरज कब निकलेगा', 'आदमी जात का आदमी', और 'आयेंगे अच्छे दिन भी' जैसे संग्रहों ने हिंदी कहानी को साठोत्तरी पीढ़ी के बाद एक नया जनवादी मोड़ दिया।

उपन्यास: 'बीच में विनय' और 'ईंधन' जैसे उपन्यासों में उन्होंने कस्बे के साम्यवादी आंदोलनों और भूमंडलीकरण के प्रभावों का जो विश्लेषण किया, वह ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है।

शिल्प और भाव पक्ष: सादगी में छिपी गहराई

स्वयं प्रकाश की कला का सबसे बड़ा गुण उनकी सहजता है। वे पाठकों से संवाद करते हैं, उपदेश नहीं देते।

भाव पक्ष : उनके लेखन के केंद्र में मध्यवर्ग है। वह मध्यवर्ग जो सुविधाओं की लालसा में अपनी रीढ़ खो रहा है, लेकिन जिसके भीतर कहीं न कहीं अभी भी विवेक की एक लौ जल रही है। उनकी कहानियों में सांप्रदायिक सद्भाव, जातिगत भेदभाव के विरुद्ध स्वर और एक समतामूलक समाज की तड़प स्पष्ट दिखाई देती है। 'नेताजी का चश्मा' जैसी कहानी देशभक्ति के शोर को दरकिनार कर एक सामान्य 'चश्मे वाले' के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण के छोटे-छोटे प्रयासों की महत्ता समझा जाती है।

शिल्प पक्ष : उनका शिल्प 'बिना शोर का शिल्प' है। वे जटिल विंबों या क्लिष्ट प्रतीकों के पीछे नहीं भागते। उनकी कहानियों में किस्सागोई का वह पुराना रस है जो प्रेमचंद और बेदी की याद दिलाता है। उन्होंने भाषा को 'डिक्शनरी' से निकाल कर 'चौपालों' और 'कार्यालयों' की भाषा बनाया। उनकी कहानियों का ढांचा अत्यंत सुगठित होता है, जहाँ अंत अक्सर एक नैतिक प्रश्न या एक नई चेतना के साथ होता है।

भाषा शैली: मृदुलता और व्यंग्य का अनूठा संगम

स्वयं प्रकाश की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उनका व्यंग्य (Irony) है। उनका व्यंग्य कड़वा नहीं, बल्कि एक 'डॉक्टर की सुई' की तरह है जो चुभती तो है पर इलाज के लिए। वे अपनी भाषा में उर्दू के सहज शब्दों, मालवी और राजस्थानी पुट का ऐसा प्रयोग करते हैं कि पाठक को लगता है जैसे कोई बड़ा भाई पास बैठकर कहानी सुना रहा हो। इसीलिए उन्हें 'पाठक वत्सल' लेखक कहा जाता है।

वर्तमान समय में प्रासंगिकता और पुनर्पाठ का महत्त्व

आज के दौर में, जब समाज ध्रुवीकरण, संकुचित राष्ट्रवाद और उपभोक्तावाद की चपेट में है, स्वयं प्रकाश का पुनर्पाठ अनिवार्य हो जाता है। उनकी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि:

सांप्रदायिकता का चेहरा: उनकी रचनाएँ हमें बताती हैं कि सांप्रदायिकता केवल दंगे नहीं है, बल्कि वह सूक्ष्म नफरत है जो हमारे दैनिक व्यवहार में घुल रही है।

लोकतंत्र की जड़ें: वे सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि उन कस्बों में लोकतंत्र की खोज करते हैं जहाँ 'छोटू उस्ताद' जैसे बच्चे अपने हक़ के लिए खड़े होते हैं।

भूमंडलीकरण की मार: 'ईंधन' जैसे उपन्यासों के माध्यम से वे बताते हैं कि कैसे विकास के नाम पर मानवीय संवेदनाओं का निजीकरण हो रहा है।

मीमांसा का दृष्टिकोण: एक तटस्थ मूल्यांकन
'मीमांसा' पत्रिका का मानना है कि स्वयं प्रकाश केवल एक धारा (जनवाद) के लेखक नहीं थे, बल्कि वे भारतीय समाज के सूक्ष्म पर्यवेक्षक थे। हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट हैसाहित्य को किसी खाँचे में नहीं बाँधना चाहिए। स्वयं प्रकाश ने विचारधारा को 'हथियार' की तरह नहीं, बल्कि 'औजार' की तरह इस्तेमाल किया ताकि वे समाज की गंदगी को साफ़ कर सकें।

उनकी रचनाएँ हमें यह सिखाती हैं कि एक लेखक को अपनी जड़ों (कस्बों और गाँवों) से जुड़ा होना चाहिए, भले ही उसकी दृष्टि वैश्विक (Global) हो। 'मीमांसा' का यह विशेषांक उनकी उसी 'ईमानदार रचनात्मकता' को समर्पित है।


सम्मान 

राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार
विशिष्ट साहित्यकार सम्मान
वनमाली स्मृति पुरस्कार
सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार
पहल सम्मान
कथाक्रम सम्मान
भवभूति अलंकरण
बाल साहित्य अकादमी पुरस्कार 'प्यारे भाई रामसहाय' पर।

निष्कर्ष: अच्छे दिन आएँगे...

स्वयं प्रकाश जी ने एक कहानी लिखी थी 'आयेंगे अच्छे दिन भी'। यह केवल एक शीर्षक नहीं, एक विश्वास था। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, उनकी कहानियाँ ही वह रोशनी हैं जो उस विश्वास को जीवित रखती हैं। वे एक ऐसे कथाकार थे जिन्होंने अपनी कलम से नफ़रत के विरुद्ध प्रेम और जड़ता के विरुद्ध गतिशीलता का दस्तावेज़ लिखा।
वे चले गए, लेकिन उनके द्वारा रचित 'चश्मे वाला', 'विनय' और 'छोटू उस्ताद' आज भी हमारे आसपास की भीड़ में जीवित हैं और हमसे सवाल पूछ रहे हैं।

जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

अस्वीकरण: इस जयंती विशेषांक में प्रकाशित 'स्वयं प्रकाश: सादगी के चितेरे' आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी और शोध-आधारित विश्लेषण हैं। यद्यपि तथ्यों की सत्यता सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों और संदर्भों का गहन अध्ययन किया गया है, तथापि 'मीमांसा' पत्रिका किसी भी अनजाने में हुई तथ्यात्मक त्रुटि के लिए उत्तरदायी नहीं होगी। इस आलेख का उद्देश्य दिवंगत साहित्यकार स्वयं प्रकाश जी के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना और उनके साहित्यिक योगदान का अकादमिक मूल्यांकन करना है। यह किसी भी व्यक्ति, समुदाय या विचारधारा की भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है।

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