महिलाओं की स्थिति: वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय और पाश्चात्य समाजों का तुलनात्मक समाजशास्त्रीय अध्ययन । वागेश्वरी स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। अभिषेक यादव।

स्त्रियों की स्थिति किसी भी समाज की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मूल्यों और सत्ता-संबंधों की दर्पण होती है। यह स्थिति केवल जैविक लिंग से निर्धारित नहीं होती, बल्कि सामाजिक भूमिकाओं, आर्थिक सहभागिता, शिक्षा, राजनीतिक अधिकारों और सांस्कृतिक अपेक्षाओं के जटिल अंतर्संबंधों से निर्मित होती है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो महिलाओं की स्थिति का अध्ययन वस्तुतः समाज में शक्ति, असमानता और परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने का अध्ययन है।

वैश्वीकरण के इस दौर में महिलाओं की स्थिति को केवल किसी एक देश या संस्कृति तक सीमित रखकर नहीं समझा जा सकता। भारतीय और पाश्चात्य समाज दोनों ही ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से भिन्न होते हुए भी पितृसत्ता, लैंगिक असमानता और स्त्री-अधिकारों के प्रश्न पर अपने-अपने ढंग से जूझते रहे हैं। यही कारण है कि इन दोनों समाजों का तुलनात्मक अध्ययन न केवल भिन्नताओं को, बल्कि अंतर्निहित समानताओं को भी उजागर करता है।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण: स्त्री और पितृसत्ता

समाजशास्त्र में स्त्री की स्थिति को समझने के लिए पितृसत्ता (Patriarchy) एक केंद्रीय अवधारणा है। पितृसत्ता वह सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें सत्ता, संसाधनों और निर्णय-प्रक्रियाओं पर पुरुषों का प्रभुत्व स्थापित होता है। यह व्यवस्था भारतीय और पाश्चात्य दोनों समाजों में विद्यमान रही है, किंतु इसके रूप और अभिव्यक्ति भिन्न रहे हैं। 

भारतीय समाज में पितृसत्ता पारंपरिक, पारिवारिक और धार्मिक संरचनाओं के माध्यम से अधिक सुदृढ़ रही है, जबकि पाश्चात्य समाज में यह कानूनी और सार्वजनिक संस्थानों में लंबे समय तक संस्थागत रूप में मौजूद रही। समाजशास्त्रीय अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि पितृसत्ता केवल दमन का तंत्र नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति और सांस्कृतिक मान्यताओं के माध्यम से पुनरुत्पादित होने वाली संरचना है।


भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति

भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से विविधतापूर्ण रहा है। यहाँ महिलाओं की स्थिति को किसी एक रूप में परिभाषित करना संभव नहीं है। प्राचीन काल में स्त्री को कहीं देवी का स्थान मिला, तो कहीं उसे सीमित घरेलू भूमिकाओं में बाँध दिया गया। मध्यकाल में सामाजिक रूढ़ियाँ और अधिक कठोर हुईं, जिनका प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

औपनिवेशिक काल में स्त्री-सुधार आंदोलनों ने शिक्षा, विधवा-पुनर्विवाह और बाल-विवाह जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए।

स्वतंत्रता के बाद संवैधानिक समानता, मतदान अधिकार और कानूनी संरक्षण ने महिलाओं की स्थिति में औपचारिक सुधार किया। किंतु समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह सुधार प्रायः कानूनी रहा, सामाजिक नहीं।

आज भारतीय महिलाएँ शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में उपस्थित हैं, फिर भी घरेलू श्रम का असमान बोझ, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव और हिंसा जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। यह स्थिति बताती है कि संरचनात्मक परिवर्तन अभी अधूरा है।

 

पाश्चात्य समाज में महिलाओं की स्थिति

पाश्चात्य समाज में महिलाओं की स्थिति को प्रायः अधिक समानतावादी माना जाता है, किंतु समाजशास्त्रीय अध्ययन इस धारणा को सरल निष्कर्ष मानने से रोकता है। औद्योगिक क्रांति के बाद महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी बढ़ी, किंतु यह भागीदारी भी लंबे समय तक पुरुष-प्रधान ढाँचे के भीतर ही सीमित रही।

बीसवीं सदी में नारीवादी आंदोलनों ने मताधिकार, समान वेतन और प्रजनन अधिकार जैसे मुद्दों पर निर्णायक बदलाव लाए। परिणामस्वरूप महिलाओं को कानूनी और संस्थागत स्तर पर अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिली।

फिर भी पाश्चात्य समाज में भी “काँच की छत” (Glass Ceiling), वेतन-अंतर और सौंदर्य-आधारित वस्तुकरण जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। यहाँ स्त्री की स्वतंत्रता अक्सर उपभोक्तावादी संस्कृति के दबावों से जुड़ जाती है, जो एक नए प्रकार की असमानता को जन्म देती है।


तुलनात्मक विश्लेषण: समानताएँ और भिन्नताएँ


भारतीय और पाश्चात्य समाजों की तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि दोनों में स्त्री-असमानता की जड़ें समान हैं, किंतु उनकी अभिव्यक्ति भिन्न है। भारत में असमानता अधिकतर परंपरा और परिवार के माध्यम से नियंत्रित होती है, जबकि पाश्चात्य समाज में यह बाज़ार और संस्थानों के ज़रिए कार्य करती है।

भारतीय समाज में स्त्री की पहचान प्रायः संबंधों से जुड़ी होती है माता, पत्नी, बेटी जबकि पाश्चात्य समाज में व्यक्तिगत पहचान पर अधिक बल दिया जाता है। किंतु समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो दोनों ही स्थितियों में स्त्री की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है, बल्कि अलग-अलग सीमाओं से बंधी हुई है।


शिक्षा और आर्थिक भागीदारी


शिक्षा को महिलाओं की स्थिति सुधारने का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है। पाश्चात्य देशों में उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि भारत में क्षेत्रीय और वर्गीय असमानताएँ इसे सीमित करती हैं। आर्थिक भागीदारी के स्तर पर भी अंतर स्पष्ट है। भारत में बड़ी संख्या में महिलाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जहाँ सुरक्षा और अधिकारों का अभाव है। पाश्चात्य समाज में औपचारिक रोजगार अधिक है, किंतु वहाँ भी नेतृत्वकारी भूमिकाओं में महिलाओं की संख्या सीमित है। 

वैश्वीकरण और बदलती स्त्री-स्थिति


वैश्वीकरण ने महिलाओं के लिए नए अवसर और नई चुनौतियाँ दोनों उत्पन्न की हैं। एक ओर शिक्षा, सूचना और रोजगार के नए द्वार खुले हैं, तो दूसरी ओर श्रम-शोषण, अस्थिर रोजगार और सांस्कृतिक दबाव बढ़े हैं।

भारतीय और पाश्चात्य दोनों समाजों में स्त्री अब केवल परंपरा की वाहक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय एजेंट बन रही है। यह परिवर्तन धीमा है, किंतु समाजशास्त्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है।


निष्कर्ष

महिलाओं की स्थिति का तुलनात्मक भारतीय और पाश्चात्य अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि लैंगिक समानता कोई एक-रेखीय उपलब्धि नहीं, बल्कि एक निरंतर सामाजिक प्रक्रिया है। न तो भारतीय समाज पूर्णतः पिछड़ा है और न ही पाश्चात्य समाज पूर्णतः समानतावादी।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से वास्तविक चुनौती कानूनी सुधारों से आगे जाकर सामाजिक मानसिकता, सत्ता-संबंधों और सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन लाने की है। जब तक स्त्री को केवल भूमिका नहीं, बल्कि स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक समानता अधूरी रहेगी। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्त्री-अधिकारों की यह लड़ाई साझा है सीमाओं से परे, संस्कृतियों के आर-पार। और शायद यही साझा संघर्ष भविष्य की अधिक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला बनेगा।

लेखक परिचय: अभिषेक यादव, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी के हिंदी विभाग के पूर्व छात्र हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर इनका गहन शोध और विश्लेषण मौलिक वैचारिक दृष्टि प्रस्तुत करता है।

वागेश्वरी स्तंभ/ स्तंभ 

अभिषेक यादव (स्तंभकार)

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