मन की कठौती में भक्ति की गंगा : संत शिरोमणि गुरु रैदास जी महाराज। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

आज मन की वीणा पर श्रद्धा के स्वर कुछ अधिक ही झंकृत हैं। प्रकृति भी जैसे अपनी समस्त मधुरता माघ की इस पूर्णिमा में उढ़ेल रही है। यह वह पावन बेला है, जब हम केवल एक कैलेंडर की तिथि को नहीं मना रहे, बल्कि उस महाचेतना को नमन कर रहे हैं जिसने सदियों से सोई हुई भारतीय मनीषा को जगाया था। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस प्रांगण में, आप सभी का स्वागत करते हुए मेरा हृदय उस विनम्रता से भरा है, जो संत शिरोमणि सतगुरु श्री रविदास जी की पहचान थी।

कल्पना कीजिए उस युग की, जहाँ समाज की कंचन-काया पर छुआछूत और ऊॅंच-नीच के गहरे घाव थे। उस समय काशी की गलियों से एक ऐसी सुरीली तान उभरी, जिसने न केवल उन घावों पर प्रेम का मरहम लगाया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि ईश्वर किसी मंदिर की स्वर्ण-दीवारों में नहीं, बल्कि एक श्रमिक की पसीने से भीगी निष्ठा में बसता है। आज माघी पूर्णिमा का पावन अवसर है। आकाश में पूर्ण चंद्रमा अपनी धवल रश्मियों से धरा को आलोकित कर रहा है, किंतु आध्यात्मिक जगत में आज का दिन उस 'सूर्य' के स्मरण का है जिसने मध्यकाल के घने सामाजिक अंधकार में आत्मज्ञान की लौ जलाई थी। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक में हम नमन करते हैं संत शिरोमणि, सतगुरु श्री रविदास (रैदास) जी को।

व्यक्तित्व और कृतित्व: सादगी में समाहित गरिमा

वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में जन्मे गुरु रविदास का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म और विचारों से महान होता है। एक ऐसे कालखंड में जहाँ छुआछूत और जातीय संकीर्णता अपने चरम पर थी, वहाँ एक 'चर्मकार' परिवार में जन्म लेकर उन्होंने अध्यात्म के उस शिखर को छुआ, जहाँ बड़े-बड़े विद्वान नतमस्तक हो गए।

 "जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात। 
रैदास मनुष ना जुड़ सके, जब तक जाति न जात।।"

उनका व्यक्तित्व 'मृदुल' था, किंतु उनके विचार 'वज्र' के समान दृढ़ थे। उन्होंने जूते बनाने के अपने पैतृक व्यवसाय को कभी हेय नहीं समझा। उनके लिए श्रम ही पूजा थी। जब वे अपनी 'कठौती' में चमड़ा भिगोते थे, तो उसमें केवल पानी नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा होती थी। इसी निष्ठा से वह अमर उक्ति उपजी "मन चंगा तो कठौती में गंगा।" यह केवल एक मुहावरा नहीं, बल्कि कर्मयोग का दर्शन है।

कबीर से मैत्री और वैचारिक साम्यता 

मध्यकालीन भारत के इतिहास में कबीर और रैदास की मैत्री एक अद्भुत अध्याय है। जहाँ कबीर की वाणी में 'अक्खड़पन' और 'फटकार' थी, वहीं रैदास की वाणी 'विनम्रता' और 'धैर्य' से ओत-प्रोत थी। युवा कवि गोलेन्द्र पटेल ने सत्य ही लिखा है कि रैदास की कठौती और कबीर के करघे के बीच का सेतु ही भारतीय समाज की उस 'बुनावट' को दर्शाता है, जिसे आज हम साझा संस्कृति कहते हैं।

दोनों ही संतों ने बाहरी आडंबरों, तीर्थों और कर्मकांडों का खंडन किया। कबीर जहाँ समाज को झकझोर कर जगा रहे थे, वहीं रैदास अपनी सौम्य वाणी से मरहम लगा रहे थे। उनके लिए राम और रहीम में कोई भेद नहीं था:
 "कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।  वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।"

सामाजिक व्यवस्था की 'तुरपाई' और बेगमपुरा का स्वप्न

रैदास जी ने मध्यकालीन समाज की फटी हुई चादर को अपनी भक्ति की सुई और प्रेम के धागे से 'तुरपने' का कार्य किया। उन्होंने जिस 'बेगमपुरा' (ऐसा शहर जहाँ कोई गम न हो) की कल्पना की, वह आज के लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार है।

बेगमपुरा का अर्थ: एक ऐसा समाज जहाँ न कोई छोटा हो, न बड़ा; न कोई भूखा हो, न कोई भयभीत।

समानता का संदेश: उन्होंने ऊॅंच-नीच की व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कहा कि जब आत्मा एक ही परमात्मा का अंश है, तो शरीर के आधार पर भेदभाव कैसा?

मीराबाई की दीक्षा: भक्ति का नया मार्ग

गुरु रविदास के व्यक्तित्व की व्यापकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चित्तौड़ की महारानी मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया। एक राजसी वैभव में पली-बढ़ी स्त्री का एक निर्धन संत के चरणों में बैठकर दीक्षा लेना तत्कालीन समाज के लिए एक क्रांतिकारी घटना थी।

मीरा ने स्वयं स्वीकार किया:

 "गुरु मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।"

यह इस बात का प्रमाण है कि गुरु रविदास का ज्ञान वर्ण और वर्ग की सीमाओं से परे था। उन्होंने भक्ति को 'महलों' से निकालकर 'झोपड़ियों' तक पहुँचाया और स्त्री-मुक्ति की एक मौन चेतना को स्वर दिया।

गुरुग्रंथ साहिब में स्थान और साहित्यिक अवदान

सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ 'गुरुग्रंथ साहिब' में गुरु रविदास जी के 41 पद संकलित हैं, जो 16 रागों में विभाजित हैं। सिरीराग से शुरू होने वाली उनकी वाणी आज भी मानवता को शांति का संदेश देती है। उनके पदों की भाषा सरल, सरस और हृदय को छू लेने वाली 'ब्रज' और 'सधुक्कड़ी' है, जिसमें अरबी-फारसी के शब्द भी सहजता से घुल-मिल गए हैं।
उनका एक पद जो सार्वभौमिक प्रार्थना बन गया:

 "अब कैसे छूटे राम नाम रटि लागी।
‌ प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग-अंग बास समानी।।"

यहाँ भक्त और भगवान के बीच का संबंध द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है।

आज के युग में पदों का पुनर्पाठ और व्यक्तित्व निर्माण

21वीं सदी के भौतिकवादी और विभाजित समाज में गुरु रविदास के विचारों का पुनर्पाठ केवल साहित्यिक विलास नहीं, बल्कि 'अस्तित्व' की आवश्यकता है।

विनम्रता का पाठ: आज के 'अहंकार प्रधान' युग में रैदास जी सिखाते हैं कि 'पिपिलिका' (चींटी) बनकर ही शक्कर के दाने (ईश्वर का आनंद) चुने जा सकते हैं, हाथी बनकर नहीं।

श्रम की महत्ता: वे पहले 'प्रोफेशनल' थे जिन्होंने सिखाया कि अपना काम पूरी ईमानदारी से करना ही सबसे बड़ी इबादत है।

व्यक्तित्व निर्माण: उनका जीवन सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न खोएं। माता-पिता ने घर से निकाला, समाज ने दुत्कारा, पर उन्होंने केवल 'प्रेम' और 'सेवा' को अपना हथियार बनाया।

उपसंहार

गुरु रविदास जी केवल एक समुदाय के नहीं, बल्कि पूरी मानवता के पथ-प्रदर्शक हैं। उनकी जयंती पर केवल दीप जलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके बताए 'बेगमपुरा' के सपने को सच करने की दिशा में एक कदम बढ़ाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आइए, हम सब मिलकर उस 'सतगुरु' के चरणों में वंदन करें और अपने भीतर की संकीर्णताओं को त्यागकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ प्रेम ही एकमात्र धर्म हो।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' परिवार की ओर से समस्त पाठकों को संत शिरोमणि रविदास जयंती की कोटि-कोटि मंगलकामनाऍं।

अस्वीकरण (Disclaimer)

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक में प्रकाशित आलेख 'संत शिरोमणि गुरु रविदास: व्यक्तित्व एवं कृतित्व' में व्यक्त विचार शोध, उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों और लोक-मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति या व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु संत रविदास जी के मानवीय मूल्यों, साहित्यिक अवदान और सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाना है। ऐतिहासिक तिथियों और प्रसंगों में विभिन्न विद्वानों के मत भिन्न हो सकते हैं, पत्रिका सर्वमान्य और सद्भावपूर्ण तथ्यों को प्राथमिकता देती है।

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