वेब पत्रिका 'मीमांसा' प्रकाश-स्तंभ विशेषांक : बौद्धिक कंगाली और 'फॉरवर्ड' होती विकृति

प्रिय पाठकों, वेब पत्रिका 'मीमांसा' के 'प्रकाश-स्तंभ' विशेषांक में आपका स्वागत है। 'मीमांसा' का यह प्रयास एक गिलहरी प्रयास है। हम जानते हैं कि सूचनाओं के इस अंतहीन सागर को साफ करना कठिन है, लेकिन हम चुप रहकर इस प्रदूषण के मूक गवाह भी नहीं बनना चाहते। आइए, इस 'प्रकाश-स्तंभ' की रोशनी में हम स्वयं को टटोलें। किसी भी संदेश को 'फॉरवर्ड' करने से पहले रुकें, सोचें और पूछें क्या यह मेरी गरिमा और मेरी संस्कृति के अनुरूप है?


आज का युग सूचनाओं का महासागर है, परंतु दुर्भाग्यवश इस सागर में ज्ञान की गहराई से अधिक 'फॉरवर्ड संस्कृति' का कचरा तैर रहा है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ उंगलियां दिमाग से तेज चलती हैं। किसी भी संदेश को साझा करने (Share) से पहले हम यह भूल जाते हैं कि हमारा एक 'क्लिक' हमारी बौद्धिक विरासत के चेहरे पर कालिख पोत सकता है।

साहित्यिक शुचिता का चीरहरण

हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रसारित एक तथाकथित 'हास्य' रचना दृष्टिगोचर हुई, जिसमें राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' के नाम का कुत्सित पैरोडीकरण कर उन्हें 'रजाईधारी सिंह दिनभर' लिखा गया।
यह केवल एक जोक नहीं है, बल्कि साहित्यिक व्यभिचार है। जिस कवि ने 'कुरुक्षेत्र' लिखकर सोई हुई आत्माओं को जगाया, जिसने 'रश्मिरथी' के माध्यम से पुरुषार्थ की नई व्याख्या की, उनके नाम के साथ ऐसा ओछा मजाक करना हमारी वैचारिक दरिद्रता का प्रमाण है।
(हास्य-व्यंग्य के नाम पर पड़ोस गया साहित्यिक कूड़ा)

 मीमांसा का प्रश्न: क्या हास्य के नाम पर हम अपनी जड़ों को काटने की अनुमति दे सकते हैं? क्या 'वीर तुम बढ़े चलो' जैसे ओजस्वी गीतों की पैरोडी बनाकर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कायरता और आलस्य का पाठ पढ़ाना चाहते हैं?

फॉरवर्ड संस्कृति: विवेक का अंत

'फॉरवर्ड संस्कृति' ने हमें एक ऐसे 'बौद्धिक परजीवी' में बदल दिया है जो बिना सोचे-समझे कूड़ा परोसने में आनंद का अनुभव करता है। जब हम ऐसी रचनाओं को साझा करते हैं, तो हम केवल एक संदेश आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि:

1. अपनी सांस्कृतिक धरोहर का अपमान करते हैं।
2. साहित्यिक मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा लांघते हैं।
3. गंभीर साहित्य के प्रति नई पीढ़ी में अरुचि और अनादर पैदा करते हैं।

एक करारा तमाचा

उन लोगों के लिए यह एक चेतावनी है जो 'मजे' के नाम पर महापुरुषों का उपहास उड़ाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ साहित्यिक उच्छृंखलता नहीं है। यदि हम अपने नायकों और ऋषियों (कवियों) का सम्मान नहीं कर सकते, तो हमें उनकी रचनाओं का उपयोग करने का भी कोई अधिकार नहीं है।

'रजाईधारी' जैसे शब्द गढ़ना आपकी रचनात्मकता नहीं, बल्कि आपकी बौद्धिक रुग्णता को दर्शाता है। यह उन महान पूर्वजों के प्रति कृतघ्नता है जिन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्र का निर्माण किया।

'मीमांसा' का आह्वान: सहेजें अपनी विरासत

वेब पत्रिका 'मीमांसा' अपने पाठकों से विनम्र परंतु दृढ़ अपील करती है:

सत्यापन करें: किसी भी रचना को फॉरवर्ड करने से पहले उसके स्रोत और लेखक की गरिमा का ध्यान रखें।

प्रतिरोध करें: यदि कोई साहित्यिक मर्यादा का उल्लंघन करे, तो उसे तुरंत टोकें (जैसा कि हमारे सुधि पाठक ने किया)।

शुचिता अपनाएं: हास्य मर्यादित होना चाहिए, अपमानजनक नहीं।

निष्कर्ष:

प्रकाश-स्तंभ की यह रोशनी हमें यह याद दिलाने के लिए है कि सूचनाओं के इस अंधकारमय सागर में विवेक ही हमारा एकमात्र किनारा है। आइए, हम 'फॉरवर्ड' संस्कृति के दास न बनकर अपनी गौरवशाली साहित्यिक विरासत के सजग प्रहरी बनें।

प्रकाश-स्तंभ/संपादकीय विशेषांक 
अमन कुमार होली 
© संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा' 


अस्वीकरण (Disclaimer)
'मीमांसा' वेब पत्रिका (विशेषांक: प्रकाश-स्तंभ)
इस अंक में प्रकाशित विचार और विश्लेषण साहित्यिक शुचिता एवं बौद्धिक चेतना के संरक्षण हेतु 'मीमांसा' के संपादकीय दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करते हैं।

उद्देश्य: पत्रिका में उद्धृत 'रजाईधारी...' जैसी पैरोडी रचना का उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि महान साहित्यकारों (जैसे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर') के नाम के साथ हो रहे खिलवाड़ और 'फॉरवर्ड संस्कृति' के दुष्प्रभावों के प्रति समाज को सचेत करना है।

तथ्यात्मकता: 'मीमांसा' का यह स्तंभ केवल स्वस्थ आलोचना और साहित्यिक विमर्श को बढ़ावा देता है। हम किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना या ऐसी सामग्री का समर्थन नहीं करते जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर का उपहास उड़ाती हो।

पाठक विवेक: पाठकों से अनुरोध है कि वे इस सामग्री को शिक्षाप्रद और सुधारात्मक दृष्टिकोण से ग्रहण करें। सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली किसी भी सामग्री के प्रति 'मीमांसा' उत्तरदायी नहीं है, हमारा प्रयास केवल जागरूकता फैलाना है।

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