वेब पत्रिका 'मीमांसा' जयंती विशेषांक विमर्श-स्तंभ के स्तंभकार श्री इन्द्र ज्योति राय : "विवेकानंद का युवा आह्वान: सांस्कृतिक पुनर्जागरण और मानसिक स्वास्थ्य की डगर"

वेब पत्रिका 'मीमांसा' जयंती विशेषांक विमर्श-स्तंभ में आज पढ़िए श्री इन्द्र ज्योति राय ने उसे पक्ष को उठाया है जो आज के समय की मांग है।

फरवरी 1897 का वह ऐतिहासिक समय, जब शिकागो की विश्व विजय के पश्चात स्वामी विवेकानंद मद्रास (अब चेन्नई) के विक्टोरिया हॉल में खड़े थे। उनके शब्दों में केवल ओज नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के पुनरुत्थान का ब्लूप्रिंट था। मात्र 34 वर्ष की ऊर्जावान आयु में उन्होंने युवाओं के समक्ष अपनी क्रांतिकारी योजनाओं का प्रकटीकरण किया। स्वामी जी का यह संबोधन केवल एक भाषण नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण का वह बीज था, जो आज के संक्रमण काल में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आइए, उनके विचारों के आलोक में वर्तमान युवा पीढ़ी की चुनौतियों और समाधान का विश्लेषण करें। 

सामाजिक सुधार: वस्तुनिष्ठ बनाम आत्मनिष्ठ

स्वामी विवेकानंद ने सामाजिक दोषों और नैतिक विचलन पर प्रहार करते हुए एक अत्यंत गूढ़ सत्य साझा किया था। उन्होंने कहा था कि सामाजिक बुराइयों का निराकरण केवल बाहरी तंत्र को बदलने (वस्तुनिष्ठ) से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन (आत्मनिष्ठ) की आवश्यकता है। जब तक मनुष्य का अंतर्मन जागृत नहीं होगा, समाज की विकृतियाँ दूर नहीं की जा सकतीं।

युवा मानस: चुनौतियां और भटकाव

आज हम अपने युवाओं के चारित्रिक उन्नयन और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गहरे विमर्श में हैं। एक ओर हमारे शिक्षण संस्थान और विचार केंद्र ऐसे समीकरणों की खोज में हैं जो युवाओं को परंपरा और संस्कृति से जोड़ सकें, वहीं दूसरी ओर कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व इस अस्थिरता का लाभ उठाकर उन्हें दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। स्वामी जी ने सदैव युवाओं की क्षमता पर विश्वास किया; वे जानते थे कि सही मार्गदर्शन उन्हें विश्व की सकारात्मक शक्ति बना सकता है।

संवाद की प्रासंगिकता और स्वदेशी परिवेश

वर्तमान में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन मूल्यों को लेकर जो योजनाएं बनाई जा रही हैं, उन पर एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है, क्या संवाद के ये सूत्र हमारे अपने परिवेश और मिट्टी से मेल खाते हैं? हम बड़ी-बड़ी योजनाएं तो बनाते हैं, लेकिन क्या हम वास्तव में युवाओं के साथ ऐसा बौद्धिक और सांस्कृतिक संवाद स्थापित कर पा रहे हैं, जो उनके चरित्र का निर्माण कर सके? यह विचारणीय है कि समाज सुधार का कार्य स्वयं के सुधार से ही आरंभ होता है।

लोक शक्ति का संगठन: राष्ट्र निर्माण की कुंजी

युवा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि वह 'लोक शक्ति' है जो राष्ट्र का भविष्य गढ़ने और नई व्यवस्था स्थापित करने का सामर्थ्य रखती है। स्वामी जी का स्पष्ट मत था कि हमारा प्रथम कर्तव्य लोगों को शिक्षित करना होना चाहिए ताकि वे स्वयं समाज सुधार के संवाहक बनें। हमें उस बिखरी हुई युवा शक्ति को संगठित करने की आवश्यकता है, जिसे स्वामी जी ने 'देवताओं की संतान' और 'महिमशाली पूर्वजों का वंशज' कहकर पुकारा था।

उपसंहार: विचारों की सच्ची श्रद्धांजलि

वर्ष 1897 में स्वामी जी द्वारा किया गया वह आह्वान आज भी अमृत के समान है। उनकी बाहें आज भी देश के युवाओं को राष्ट्रीय हित में आलिंगनबद्ध करने के लिए तत्पर हैं। जिस महापुरुष के विचार समूचे विश्व का कल्याण करने की क्षमता रखते हों, उनके उन सूत्रों को जन-जन तक पहुँचाना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। स्वामी जी का यह संदेश आज के युवाओं के लिए एक मशाल है, जो उन्हें मानसिक द्वंद्व से निकालकर राष्ट्र निर्माण के पथ पर ले जा सकती है।

विमर्श -स्तंभ/ जयंती विशेषांक 
स्तंभकार : श्री इन्द्र ज्योति राय 
अनुवाद अधिकारी, 
पूर्व रेलवे (मालदा मंडल)

संपादकीय विश्लेषण: युवा शक्ति का शंखनाद और स्वामी विवेकानंद का कालजयी दर्शन

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के जयंती विशेषांक विमर्श-स्तंभ में श्री इन्द्र ज्योति राय का आलेख केवल एक लेख नहीं, बल्कि वर्तमान समय की शिराओं में दौड़ती बेचैनी का समाधान है। लेखक ने 1897 के मद्रास के उस ऐतिहासिक क्षण को पुनर्जीवित कर दिया है, जब स्वामी विवेकानंद ने विश्व विजय के बाद भारत की मिट्टी पर कदम रखा था। आज के इस दौर में, जहाँ 'डिजिटल शोर' के बीच युवा मन कहीं खो गया है, इन्द्र ज्योति राय जी का यह विश्लेषण एक ठंडी और सुसंस्कृत बयार की तरह है।

वर्तमान संदर्भ: भटकाव के बीच खड़ा युवा

आज का युवा सूचनाओं के महासागर में गोते तो लगा रहा है, लेकिन संस्कारों और धैर्य के किनारे से दूर होता जा रहा है। लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता से 'वस्तुनिष्ठ बनाम आत्मनिष्ठ' सुधार की चर्चा की है। वर्तमान परिवेश में हम देखते हैं कि युवा पीढ़ी बाहरी सुख-सुविधाओं और गैजेट्स (वस्तुनिष्ठ) में तो समृद्ध है, लेकिन मानसिक शांति और चारित्रिक दृढ़ता (आत्मनिष्ठ) के मोर्चे पर संघर्ष कर रही है।

 "जब तक अंतर्मन का दीया नहीं जलता, बाहर का उजाला केवल चकाचौंध पैदा करता है, दृष्टि नहीं देता।"

लेखक का यह संकेत कि कुछ 'राष्ट्रविरोधी तत्व' युवाओं की इस अस्थिरता का लाभ उठा रहे हैं, आज की कड़वी सच्चाई है। सोशल मीडिया के 'इको चैंबर' में युवा अक्सर वैचारिक कट्टरता या दिग्भ्रमित करने वाले विमर्श के शिकार हो जाते हैं। यहाँ स्वामी जी का वह विचार एक औषधि का काम करता है, जहाँ वे युवाओं को अपनी शक्ति पहचानने का आह्वान करते हैं।

लोकरस और सांस्कृतिक परिवेश का जुड़ाव

इन्द्र ज्योति राय जी की दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'मिट्टी से जुड़ाव' है। वे प्रश्न करते हैं कि क्या हमारे आधुनिक संवाद के सूत्र हमारी अपनी संस्कृति से मेल खाते हैं? यह एक गंभीर विमर्श है। अक्सर हम पश्चिमी सिद्धांतों के आधार पर भारतीय मानस का उपचार करने की कोशिश करते हैं, जो सफल नहीं हो पाता। लेखक ने लोक शक्ति को संगठित करने की जो बात कही है, वह ग्रामीण भारत से लेकर महानगरों तक के युवाओं के लिए एक समान संदेश है। 'देवताओं की संतान' कहना केवल अलंकरण नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर आत्मविश्वास का संचार करने वाला मंत्र है।

निराकरण: शिक्षा और संगठन की शक्ति

लेखक ने स्वामी जी के विचारों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि समाधान केवल आलोचना में नहीं, बल्कि 'शिक्षा' में है। ऐसी शिक्षा जो मनुष्य का निर्माण करे। आज के संदर्भ में निराकरण के तीन मुख्य बिंदु उभरते हैं:
स्व-जागरूकता: तकनीक का उपयोग करें, पर उसके दास न बनें।
सांस्कृतिक संवाद: अपनी जड़ों और महापुरुषों के वास्तविक विचारों से सीधा जुड़ाव।
संगठित प्रयास: निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में अपनी ऊर्जा का निवेश।

श्री इन्द्र ज्योति राय ने जिस प्रवाह और भावप्रवणता के साथ स्वामी जी के 'ब्लूप्रिंट' को आज के युवाओं के लिए अनुवादित किया है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने इतिहास के सूखे तथ्यों को वर्तमान की ज्वलंत समस्याओं के साथ पिरोकर एक ऐसी माला तैयार की है, जो युवा पीढ़ी के गले का हार बन सकती है। उनका यह आलेख बौद्धिक जुगाली नहीं, बल्कि कर्मठता का आह्वान है।

निष्कर्ष: 'मीमांसा' का यह विशेषांक इस सत्य को पुख्ता करता है कि स्वामी विवेकानंद के विचार पुराने नहीं हुए, बल्कि वे भविष्य के विचार हैं। इन्द्र ज्योति राय जी का यह योगदान युवाओं को मानसिक द्वंद्व के अंधेरे से निकालकर राष्ट्र निर्माण के उजालों की ओर ले जाने का एक सशक्त माध्यम बनेगा।

अमन कुमार होली 
© संपादक 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

अस्वीकरण (Disclaimer):

इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। वेब पत्रिका 'मीमांसा'  अपने विमर्श स्तंभ के जरिए उन आवाजों को एक माध्यम प्रदान करती है, जो हमारे मस्तिष्क और शिराओं में उबाल के रूप में सामाजिक विसंगतियों कौंधती है।  हम बस इस विमर्श में एक कड़ी हैं। किसी भी ऐतिहासिक संदर्भ की व्याख्या लेखक के अध्ययन पर आधारित हैं और उनके निजी विचार हैं।
संवाद में सूत्रधार की भूमिका संपादक मीमांसा ने निभाई है मीमांसक दृष्टि उनकी अपनी है।

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