हिंदी के छह श्रेष्ठ आलोचकों पर एकाग्र विमर्श : मौलिक प्रज्ञा की वापसी का संकल्प । संपादकीय।

साहित्य जब अपनी जड़ों से कटकर केवल अकादमिक जुगाड़ और बौद्धिक विलासिता का साधन बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि समाज वैचारिक रेगिस्तान की ओर बढ़ रहा है। आज हमारे विश्वविद्यालयों के गलियारों से लेकर साहित्य की बड़ी-बड़ी गोष्ठियों तक, 'मौलिकता' एक दुर्लभ शब्द बन गई है। शोध के नाम पर 'कट-कॉपी-पेस्ट' की संस्कृति और दूसरों के तथ्यों को अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़कर पेश करने का जो उपक्रम चल रहा है, उसने हिंदी आलोचना की धार को कुंद कर दिया है।


साहित्यिक शुचिता और समावेशी दृष्टि का वह आसमान अब खाली नज़र आता है, जिसे कभी हमारे मनीषियों ने अपने रक्त और पसीने से सींचा था। आज के मठाधीश श्रेष्ठता की होड़ में उलझे हैं और युवा पीढ़ी नवीनता के अभाव में लकीर की फकीर बनी हुई है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ज्ञान-भूमि से देशभर के शैक्षणिक केंद्रों तक की मेरी यात्रा ने मुझे इस कटु सत्य से रूबरू कराया है कि हम अपनी मौलिक प्रज्ञा को खोते जा रहे हैं।

'मीमांसा' केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि इस बौद्धिक जड़ता के विरुद्ध एक युगांतकारी युद्ध का शंखनाद है। हमारा उद्देश्य उन सनातन ऋषियों-मुनियों और मनीषियों की मेधा को पुनर्जीवित करना है, जिन्होंने आलोचना को केवल शास्त्र नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि माना था।

इस विशेष विमर्श के माध्यम से हम हिंदी आलोचना के छह सूर्यों— शुक्ल, द्विवेदी, नंद दुलारे, रामविलास, नामवर और नगेंद्र के आलोक में आज के अंधेरे को चीरने का प्रयास कर रहे हैं। यह आह्वान उन सभी के लिए है जो बौद्धिक दासता की बेड़ियाँ तोड़कर मौलिक विमर्श की मशाल जलाना चाहते हैं।

विमर्श के केंद्र:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: जिनके बिना हिंदी आलोचना का इतिहास अधूरा है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: जिन्होंने 'परंपरा' को आधुनिक दृष्टि से जोड़ा।
डॉ. नंद दुलारे वाजपेयी : सौंदर्य और सौष्ठव के चितेरे छायावाद के प्रतिस्थापक।
डॉ. रामविलास शर्मा: मार्क्सवादी चेतना और भारतीय अस्मिता के प्रखर स्वर।
डॉ. नगेंद्र: रस-सिद्धांत के व्याख्याता और मनोवैज्ञानिक आलोचना के पुरोधा।
डॉ. नामवर सिंह: जिन्होंने आलोचना को जनसंवाद और नई व्याख्याओं से भरा।

आइए, इस वैचारिक अनुष्ठान में अपनी आहुति दें और हिंदी आलोचना को उसका खोया हुआ गौरव वापस लौटाएं।

संपादकीय नोट

अमन कुमार होली
संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा'


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