प्रकृति के अनुपम चितेरे और स्वच्छंदतावाद के पुरोधा: पंडित श्रीधर पाठक प्रकृति और खड़ी बोली के समर्थ पुत्र।


आज वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह विशेष अंक हिंदी साहित्य के उस 'एकांतवासी योगी' को समर्पित है, जिसने आधुनिक कविता की शुष्क ज़मीन पर प्रकृति की कोमल संवेदनाओं की पहली फुहार डाली थी। हम बात कर रहे हैं आधुनिक हिंदी काव्य के प्रथम समर्थ कवि पण्डित श्रीधर पाठक की।

अक्सर इतिहास उन्हें केवल एक नाम या एक तिथि के रूप में याद रखता है, लेकिन श्रीधर पाठक जी वह नाम हैं, जिन्होंने ब्रजभाषा की संकुचित गलियों से हिंदी कविता को बाहर निकालकर हिमालय की चोटियों और कश्मीर की वादियों में स्वच्छंद विचरण करना सिखाया। यह अंक केवल उनकी जयंती का उत्सव नहीं है, बल्कि उस 'स्वच्छंदतावाद' (Romanticism) की पुनरावृत्ति है, जिसकी बुनियाद उन्होंने रखी थी।


आज जब हम आधुनिक हिंदी कविता की यात्रा को देखते हैं, तो एक ऐसे युगपुरुष का नाम उभरकर सामने आता है जिन्होंने ब्रजभाषा की कोमलता को खड़ी बोली की शक्ति के साथ कुछ इस तरह मिलाया कि कविता घर-आँगन से निकलकर पहाड़ों, वादियों और जन-मानस के हृदय तक जा पहुँची। वे व्यक्तित्व थे पण्डित श्रीधर पाठक।

पंडित श्रीधर पाठक का जीवन और उनका साहित्य

भारतीय काव्य जगत का वह सेतु है, जिसने पुरानी परिपाटी और आधुनिक चेतना को जोड़ने का कार्य किया। आज उनके जन्मदिन (11 जनवरी) के शुभ अवसर पर, आइए उनके जीवन के उन पन्नों को पलटते हैं, जो हमें प्रकृति, स्वदेश प्रेम और सरलता का संदेश देते हैं।

जन्म और सुसंस्कृत परिवेश

श्रीधर पाठक का जन्म 11 जनवरी, 1860 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के जौंधरी नामक गाँव में हुआ था। वे एक अत्यंत सुसंस्कृत 'सारस्वत' ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता पंडित लीलाधर ने उनके भीतर साहित्य और ज्ञान के प्रति जिज्ञासा के बीज बचपन में ही बो दिए थे। यह वह काल था जब भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को पुनः खोज रहा था। श्रीधर जी का परिवार मूलतः पंजाब से आकर यहाँ बसा था, जिसने उन्हें विविध संस्कृतियों को समझने की एक स्वाभाविक दृष्टि प्रदान की।
उनकी शिक्षा का सफर असाधारण रहा। उन्होंने बहुत ही कम उम्र में घर पर ही संस्कृत और फ़ारसी जैसी समृद्ध भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उनकी मेधा का प्रमाण इसी बात से मिलता है कि उन्होंने 1875 में हिंदी प्रवेशिका और 1879 में अंग्रेज़ी मिडिल की परीक्षाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। उस समय की 'ऐंट्रेंस' परीक्षा (मैट्रिक) में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, और पाठक जी ने इसे बड़ी सहजता से प्राप्त किया।

व्यावसायिक यात्रा और प्रकृति से साक्षात्कार

शिक्षा पूरी करने के बाद श्रीधर पाठक ने राजकीय सेवा का मार्ग चुना। उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) में जनगणना आयुक्त के कार्यालय में अपनी सेवाएँ शुरू कीं। सरकारी नौकरी उनके लिए केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं थी, बल्कि यह उनके अंतर्मन के कवि के लिए एक वरदान साबित हुई। जनगणना के कार्यों के सिलसिले में उन्हें भारत के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर उत्तर भारत के दुर्गम और सुंदर पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा करने का अवसर मिला।

हिमालय की कंदराओं, देहरादून की घाटियों और कश्मीर की वादियों को उन्होंने केवल देखा नहीं, बल्कि उन्हें जिया। इसी प्रत्यक्ष अनुभव का परिणाम था कि उनकी कविताओं में प्रकृति केवल एक पृष्ठभूमि बनकर नहीं आती, बल्कि एक सजीव पात्र बनकर बोलती है। रेलवे, लोक निर्माण (PWD) और सिंचाई विभागों में अपनी सेवाएँ देते हुए वे अधीक्षक के उच्च पद तक पहुँचे, लेकिन उनके भीतर का कवि सदैव जागृत रहा।

काव्यगत विशेषताएँ: खड़ी बोली के प्रथम समर्थ कवि
हिंदी साहित्य के इतिहास में श्रीधर पाठक का नाम स्वर्ण अक्षरों में इसलिए अंकित है क्योंकि वे खड़ी बोली के प्रथम समर्थ कवि माने जाते हैं। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने से पहले ही, पाठक जी अपनी स्वच्छंद प्रवृत्ति के कारण इस भाषा में कविताएँ लिख रहे थे।
उनकी कविताओं की सबसे बड़ी खूबी है - सहजता। उन्होंने ब्रजभाषा में भी काव्य सृजन किया, लेकिन उसे कृत्रिम शब्दावली और भारी भरकम अलंकारों से मुक्त रखा। उन्होंने गद्य और पद्य की भाषा के बीच की खाई को पाटने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनकी भाषा में 'मृदुता' है, जो सीधे पाठक के मन में उतर जाती है।

प्रकृति चित्रण: जहाँ कविता बोलती है

श्रीधर पाठक को हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद (Romanticism) का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने रूढ़ियों को तोड़कर प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया। जिसका अनुसरण बाद में छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत ने किया। उनकी प्रसिद्ध रचना 'काश्मीर सुषमा' (1904) इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। जहाँ अन्य कवि नायिका के रूप-वर्णन में उलझे थे, पाठक जी ने प्रकृति के सौंदर्य को ही अपनी नायिका बना लिया।

 "प्रकृति यहाँ एकांत बैठी निज रूप सँवारती,
  पल-पल पलटती भेष, छन-छन छवि विस्तारती।"
 
उनकी रचनाओं में प्रकृति की गोद में बसने वाली शांति और एकांत के प्रति गहरा अनुराग दिखता है। 'वनाश्टक', 'देहरादून' और 'गोपिका गीत' जैसी कृतियों में उन्होंने प्रकृति के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा को अभिव्यक्ति दी है।

राष्ट्रप्रेम और समाज सुधार

पंडित श्रीधर पाठक केवल फूलों और वादियों के कवि नहीं थे, बल्कि वे एक सचेत नागरिक भी थे। उनकी रचनाओं में देशभक्ति की तीव्र भावना विद्यमान है। 'भारत गीत' जैसी रचनाओं में उन्होंने देश के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान की आकांक्षाओं को स्वर दिया।
दिलचस्प बात यह है कि उस दौर के अन्य कवियों की तरह, उनमें देशभक्ति के साथ-साथ एक विशेष प्रकार की राजभक्ति (ब्रिटिश सत्ता के प्रति निष्ठा) भी दिखाई देती है, जो तत्कालीन शिक्षित वर्ग का एक सामान्य चरित्र था। जहाँ उन्होंने 'भारतोत्थान' और 'भारत प्रशंसा' लिखी, वहीं 'जार्ज वन्दना' भी की। यह उनके व्यक्तित्व के उस दौर के जटिल द्वंद्व को दर्शाता है।
समाज के प्रति उनकी करुणा 'बाल विधवा' जैसी कविताओं में फूटती है, जहाँ उन्होंने विधवाओं के कष्टों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि किसी भी सहृदय व्यक्ति की आँखें नम हो जाएँ।

एक कुशल अनुवादक की दृष्टि

श्रीधर पाठक की साहित्यिक सेवा केवल मौलिक लेखन तक सीमित नहीं थी। वे एक विश्वदृष्टि रखने वाले साहित्यकार थे। उन्होंने वैश्विक साहित्य को हिंदी के करीब लाने का महान कार्य किया।
कालिदास के 'ऋतुसंहार' का उन्होंने अत्यंत सुंदर काव्यानुवाद किया।
अंग्रेज़ी कवि गोल्डस्मिथ की कालजयी कृतियों का अनुवाद कर उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया:
'द हर्मिट' का अनुवाद 'एकांतवासी योगी' के रूप में।
'द डेजर्टेड विलेज' का अनुवाद 'ऊजड़ ग्राम' के रूप में।
'द ट्रैवलर' का अनुवाद 'श्रांत पथिक' के रूप में।
ये अनुवाद इतने जीवंत हैं कि इन्हें पढ़कर लगता ही नहीं कि ये किसी दूसरी भाषा से प्रेरित हैं।

सम्मान और अवसान

उनकी विद्वत्ता और हिंदी साहित्य के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए उन्हें 'कविभूषण' की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1915 में लखनऊ में आयोजित 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' के पाँचवें अधिवेशन के वे सभापति चुने गए, जो उस समय का सर्वोच्च सम्मान था।
13 सितम्बर, 1928 को हिंदी का यह सितारा हमेशा के लिए अस्त हो गया, लेकिन अपनी कृतियों के माध्यम से वे आज भी हमारे बीच जीवित हैं।

निष्कर्ष : क्यों याद रखें हम श्रीधर पाठक को?

आज के शोर-शराबे वाले युग में श्रीधर पाठक की कविताएँ हमें उस शांति और सरलता की ओर ले जाती हैं, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है। वे सिखाते हैं कि भाषा जब तक जन-भाषा नहीं बनती, वह अमर नहीं होती। उन्होंने खड़ी बोली को वह कोमलता प्रदान की, जिसे बाद में छायावाद के कवियों ने अपने शिखर पर पहुँचाया।

यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं, यदि आपको अपनी माटी से प्यार है, और यदि आप भाषा की शुद्धता के साथ उसकी सरलता के कायल हैं, तो श्रीधर पाठक का साहित्य आपके लिए एक खजाना है। वे केवल एक कवि नहीं, बल्कि आधुनिक हिंदी कविता की उस नींव के पत्थर हैं, जिस पर आज का विशाल साहित्य खड़ा है।

जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक, 
 वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

अस्वीकरण (Disclaimer)

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस 'श्रीधर पाठक जयंती विशेषांक' में प्रकाशित विचार लेखक के निजी विश्लेषण और उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं। इस आलेख का उद्देश्य पण्डित श्रीधर पाठक के साहित्यिक योगदान को रेखांकित करना और उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करना है। यद्यपि सामग्री की सत्यता और भाषायी शुद्धता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है, तथापि ऐतिहासिक तिथियों या संदर्भों में किसी भी अनजानी त्रुटि के लिए पत्रिका प्रबंधन उत्तरदायी नहीं होगा। लेख में प्रयुक्त उद्धरण और संदर्भ हिंदी साहित्य के विभिन्न मान्य स्रोतों से लिए गए हैं।

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