आजाद हिंद फौज: सामान्य युद्धबंदी से महायोद्धा बनने की राष्ट्रगाथा। शूरवीर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। खंड 4
इतिहास के पन्नों पर जब-जब स्वाधीनता का रक्त रंजित अध्याय लिखा जाएगा, तब-तब 'आजाद हिंद फौज' (INA) का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा। यह केवल एक सेना नहीं थी, बल्कि यह जलते हुए भारत की वह हुंकार थी जिसने सात समुद्र पार बैठी ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। वेब पत्रिका 'मीमांसा' संपादकीय टीम 'देश प्रेम सप्ताह' के तहत शूरवीर स्तंभ के माध्यम से उन गुमनाम पदचापों को पुनर्जीवित कर रही है, जिन्होंने मातृभूमि की मुक्ति के लिए हँसते-हँसते फाॅंसी के फंदे और गोलियों की बौछार को गले लगाया।
आज इस चौथे खंड में, हम प्रवेश कर रहे हैं उस अनुशासित सैन्य संरचना के भीतर, जहाँ एक साधारण क्लर्क सिपाही बना और एक आम मजदूर ने जनरल की कमान संभाली। यह आलेख उन रणबांकुरों के सैन्य पदानुक्रम और उनके 'स्वयंसेवक से महायोद्धा' बनने की उस अविश्वसनीय यात्रा को समर्पित है।
स्वयंसेवक से योद्धा तक: एक आध्यात्मिक और शारीरिक कायाकल्प
आजाद हिंद फौज का उदय विश्व इतिहास की सबसे अनोखी सैन्य घटना है। आमतौर पर सेनाओं का गठन राज्य द्वारा किया जाता है, लेकिन INA का गठन एक 'अदृश्य राष्ट्र' की संकल्प शक्ति से हुआ था।
युद्धबंदियों का हृदय परिवर्तन
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापान ने मलाया और सिंगापुर में ब्रिटिश सेना को परास्त किया, तो हजारों भारतीय सैनिक युद्धबंदी (POW) बना लिए गए। यहीं से शुरू होता है 'हृदय परिवर्तन का अध्याय'।
ब्रिटिश सेना के लिए 'भाड़े के सैनिक' (Mercenaries) के रूप में लड़ने वाले इन भारतीयों के भीतर जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गर्जना पहुँची, तो उनकी निष्ठा का पासा पलट गया। जो हाथ कल तक यूनियन जैक (Union Jack) को सलामी देते थे, वे अब तिरंगे की आन पर मर मिटने को व्याकुल हो उठे। कैप्टन मोहन सिंह और बाद में नेताजी के आह्वान पर, जेल की कालकोठरियों से निकलकर ये सैनिक 'भारत की मुक्ति सेना' के स्तंभ बने।
आम नागरिकों का रण-कौशल
नेताजी का सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि उन्होंने दक्षिण-पूर्वी एशिया (बर्मा, मलाया, थाईलैंड) में बसे भारतीय प्रवासियों जिनमें रबर बागानों के मजदूर, छोटे व्यापारी, और छात्र शामिल थे को एक पेशेवर सेना में बदल दिया।
अनुशासन की भट्टी: इन स्वयंसेवकों के लिए प्रशिक्षण शिविर (Training Camps) किसी मंदिर से कम नहीं थे। सुबह के 'रोल कॉल' से लेकर रात की गश्त तक, इनमें वह कठोरता भरी गई जो एक पेशेवर सैनिक की पहचान होती है।
अभाव में भी स्वाभिमान: कई बार इनके पास पर्याप्त जूते नहीं होते थे, वर्दी फटी होती थी, लेकिन सीने में 'दिल्ली चलो' का जो जज्बा था, उसने शारीरिक कमियों को बौना कर दिया। 'मीमांसा' की टीम उन गुमनाम स्वयंसेवकों को नमन करती है, जिन्होंने अपनी जमी-जमाई गृहस्थी त्याग कर बंदूक थाम ली थी।
सैन्य संरचना और पदानुक्रम (Military Hierarchy)
नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक दूरदर्शी राजनेता ही नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म सैन्य रणनीतिकार भी थे। उन्होंने आजाद हिंद फौज को केवल एक विद्रोही गुट नहीं, बल्कि एक 'State-in-Exile' (प्रवासी सरकार) की विधिवत सेना के रूप में संगठित किया।
उच्च कमान और नेतृत्व (The High Command)
INA की संरचना में 'सुप्रीम कमांड' स्वयं नेताजी के पास थी। उनके अधीन एक सुव्यवस्थित पदानुक्रम था:
सुप्रीम कमांडर: नेताजी सुभाष चंद्र बोस।
मिलिट्री काउंसिल: जिसमें वरिष्ठ अधिकारी रणनीति तैयार करते थे।
फील्ड कमांडर्स: कर्नल और मेजर जनरल स्तर के अधिकारी जो मोर्चे पर सेना का नेतृत्व करते थे।
पदानुक्रम का विभाजन: सिपाही से जनरल तक
आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश सैन्य रैंक प्रणाली को ही अपनाया था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे एक 'वैध सेना' के रूप में मान्यता मिले।
अधिकारी वर्ग (Officers): इसमें सेकेंड लेफ्टिनेंट से लेकर मेजर जनरल तक के पद थे। जनरल शाहनवाज खान, कर्नल प्रेम सहगल और कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन जैसे जांबाज इसी श्रेणी के रत्न थे।
NCOs और JCOs: नायब सूबेदार, सूबेदार और सूबेदार मेजर जैसे पद सेना की रीढ़ थे, जो जवानों और उच्च अधिकारियों के बीच सेतु का कार्य करते थे।
जवान (The Volunteers): ये वे वीर थे जो अग्रिम पंक्ति में लड़ते थे। इनमें से अधिकांश वे थे जिन्होंने कभी हथियार नहीं छुआ था, लेकिन कुछ ही महीनों के प्रशिक्षण के बाद वे जापानी सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने लगे।
संगठन की कार्यप्रणाली: धर्मनिरपेक्षता और सामूहिकता
आजाद हिंद फौज की सबसे बड़ी विशेषता उसका 'भारतीय स्वरूप' था। ब्रिटिश सेना में रेजीमेंट अक्सर जाति या धर्म के आधार पर होती थी (जैसे सिख रेजीमेंट, गोरखा रेजीमेंट), लेकिन नेताजी ने इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया।
साझा रसोई (Common Kitchen): हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी एक ही लंगर में भोजन करते थे। यह उस समय के कट्टरपंथी समाज के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।
साझी भाषा: सेना की आधिकारिक भाषा 'हिंदुस्तानी' (हिंदी-उर्दू का मिश्रण) थी और अभिवादन का शब्द था 'जय हिंद'।
प्रशासनिक विभाग: सेना के भीतर केवल लड़ाकू दस्ते ही नहीं थे, बल्कि 'इंटेलिजेंस विंग', 'प्रचार विभाग' और 'रसद विभाग' भी थे जो अत्यंत कुशलता से कार्य करते थे।
अधिकारी वर्ग की नियुक्ति: योग्यता ही एकमात्र मापदंड
आजाद हिंद फौज में पदों का वितरण सिफारिश पर नहीं, बल्कि 'रणक्षेत्र की वीरता' और 'समर्पण' पर आधारित था। नेताजी ने पूर्व ब्रिटिश भारतीय सेना के अनुभवी अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं, लेकिन साथ ही नए युवाओं को भी नेतृत्व के लिए तैयार किया।
रानी झाॅंसी रेजिमेंट के रूप में महिलाओं को सैन्य कमान सौंपना, नेताजी की आधुनिक सोच का प्रमाण था। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने जिस प्रकार महिलाओं की एक सशक्त ब्रिगेड तैयार की, उसने दुनिया को दिखा दिया कि भारत की बेटियां केवल चूल्हा-चौका ही नहीं, बल्कि शत्रु का संहार करना भी जानती हैं।
ब्रिगेडों के नाम में ही छिपा था राष्ट्र का स्वरूप
जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की कमान संभाली, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी विविधता से भरे भारत को एक सूत्र में पिरोना। अंग्रेजों ने हमेशा 'बांटो और राज करो' की नीति अपनाई थी, लेकिन नेताजी ने 'जोड़ो और स्वाधीन करो' का मंत्र दिया। उन्होंने अपनी सैन्य टुकड़ियों के नाम देश के उन महान जन-नायकों के नाम पर रखे, जिनकी विचारधाराएं भले ही भिन्न रही हों, लेकिन लक्ष्य केवल एक था स्वतंत्र भारत।
आज का यह आलेख उन विशिष्ट ब्रिगेड्स की गाथा है, जिन्होंने बर्मा के घने जंगलों और अराकान की दुर्गम पहाड़ियों में भूखे-प्यासे रहकर भी 'जय हिंद' का उद्घोष कम नहीं होने दिया।
सुभाष, गाॅंधी और नेहरू ब्रिगेड: त्रिवेणी संगम की युद्ध-शक्ति।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का हृदय कितना विशाल था, इसका प्रमाण इन ब्रिगेड्स के नाम हैं। महात्मा गाॅंधी और पंडित नेहरू से वैचारिक मतभेद होने के बावजूद, नेताजी जानते थे कि ये नाम करोड़ों भारतीयों की आस्था के प्रतीक हैं। उन्होंने सेना की इन कड़ियों को राष्ट्रवाद के अटूट धागे में पिरो दिया।
सुभाष ब्रिगेड (No. 1 Guerrilla Regiment)
इसे 'प्रथम छापामार रेजीमेंट' भी कहा जाता था। इसका नेतृत्व कर्नल शाहनवाज खान ने किया।
रणकौशल: इस ब्रिगेड का मुख्य कार्य अग्रिम मोर्चे पर रहकर शत्रु की रसद काटना और जापानी सेना के साथ समन्वय करना था।
अराकान का मोर्चा: फरवरी 1944 में, सुभाष ब्रिगेड ने अराकान (बर्मा) के मोर्चे पर ब्रिटिश 'वेस्ट अफ्रीकन डिवीजन' को धूल चटाई। यह पहली बार था जब आईएनए के सैनिकों ने अपनी वीरता से यह सिद्ध किया कि वे केवल परेड करने वाली सेना नहीं, बल्कि मृत्यु से खेलने वाले योद्धा हैं।
गाॅंधी ब्रिगेड (2nd Guerrilla Regiment)
इस ब्रिगेड का नेतृत्व कर्नल इनायत कियानी ने किया। यह टुकड़ी अपने अनुशासन और संयम के लिए जानी जाती थी।
बलिदान की गाथा: गाॅंधी ब्रिगेड ने इंफाल और कोहिमा के मोर्चों पर वह कर दिखाया जिसकी कल्पना ब्रिटिश जनरलों ने भी नहीं की थी। भारी बारिश, मलेरिया और रसद की कमी के बावजूद, इस ब्रिगेड के सैनिकों ने 'करो या मरो' के मंत्र को साक्षात धरातल पर उतारा।
नेहरू ब्रिगेड (3rd Guerrilla Regiment)
इस ब्रिगेड की कमान कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन जैसे जांबाज के हाथों में थी।
रणनीतिक महत्व: नेहरू ब्रिगेड को अक्सर उन क्षेत्रों में तैनात किया जाता था जहाँ रक्षात्मक रणनीति की आवश्यकता होती थी। इन्होंने इरावदी नदी के तट पर ब्रिटिश सेना के भीषण हमलों का सामना किया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
रानी झाॅंसी रेजिमेंट: भारत की शक्ति का स्वरूप
एशिया के सैन्य इतिहास में 'रानी झाॅंसी रेजिमेंट' का गठन एक युगांतकारी घटना थी। यह केवल एक महिला विंग नहीं थी, बल्कि यह दुनिया की पहली सशस्त्र महिला लड़ाकू रेजिमेंट थी।
डॉ. लक्ष्मी सहगल का नेतृत्व
नेताजी ने जब महिलाओं से सेना में आने का आह्वान किया, तो सिंगापुर और मलाया की गलियों से युवतियां अपनी चूड़ियां तोड़कर बंदूकें थामने निकल पड़ीं। डॉ. लक्ष्मी सहगल (तब कैप्टन लक्ष्मी) ने इस रेजिमेंट की कमान संभाली।
प्रशिक्षण और समर्पण
कठिन जीवन: इन महिलाओं को वही कठोर सैन्य प्रशिक्षण दिया गया जो पुरुषों को मिलता था। इसमें संगीन चलाना (Bayonet fighting), ग्रेनेड फेंकना और जंगलों में छिपकर वार करना शामिल था।
समाज की बेड़ियां टूटीं: उस दौर में जब महिलाओं का घर से निकलना भी कठिन था, रानी झांसी रेजिमेंट की सदस्याओं ने खाकी वर्दी पहनकर और कंधे पर राइफल टांगकर दुनिया को बता दिया कि भारत की नारी 'शक्ति' का साक्षात अवतार है।
वीरता का परिचय: जब युद्ध की स्थितियां विपरीत हुईं, तब भी इन वीरांगनाओं ने आत्मसमर्पण करने के बजाय लड़ते हुए पीछे हटना या शहीद होना चुना।
अराकान और इंफाल: जहाँ पत्थर भी 'जय हिंद' बोल उठे
इन ब्रिगेड्स का सबसे बड़ा योगदान द्वितीय विश्व युद्ध के उस कालखंड में था जब भारत की सीमा (मणिपुर और नगालैंड) पर युद्ध लड़ा जा रहा था।
पहाड़ों की चुनौती: अराकान की पहाड़ियां ऊबड़-खाबड़ और घने जंगलों से ढकी थीं। यहाँ आईएनए के सैनिकों के पास न तो पर्याप्त जूते थे और न ही बारिश से बचने के कोट।
रसद का संकट: कई दिनों तक इन सैनिकों ने केवल घास और उबले हुए पत्तों पर गुजारा किया, लेकिन उनका मनोबल हिमालय से भी ऊंचा था। जब सुभाष, गांधी और नेहरू ब्रिगेड के जवान एक साथ 'चलो दिल्ली' का नारा लगाते थे, तो अराकान की घाटियाँ गूँज उठती थीं।
एकता और राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप
'मीमांसा' की टीम इस तथ्य को रेखांकित करना चाहती है कि इन ब्रिगेड्स की सबसे बड़ी जीत केवल सैन्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक थी।
साझा पहचान: ब्रिगेड के भीतर कोई ब्राह्मण नहीं था, कोई दलित नहीं था, कोई पठान नहीं था वहाँ केवल 'भारतीय' थे।
साझा लक्ष्य: गाॅंधी, नेहरू और सुभाष के नामों का एक ही रेजिमेंट में होना यह दर्शाता था कि बाहर भले ही रास्ते अलग हों, लेकिन सेना के भीतर सबका गंतव्य 'लाल किला' था।
वैश्विक प्रभाव: दक्षिण-पूर्वी एशिया के भारतीयों ने अपनी जीवन भर की जमापूँजी 'आजाद हिंद बैंक' में इन ब्रिगेड्स के नाम दान कर दी। यह राष्ट्रप्रेम का वह ज्वार था जिसने अंग्रेजों के 'फूट डालो और राज करो' के तिलिस्म को तोड़ दिया।
आजाद हिंद फौज: अभावों में गढ़ा गया 'विजेता' व्यक्तित्व जब संकल्प ही रसद बन गया
किसी भी सेना की जीत उसके हथियारों से ज्यादा उसके 'लॉजिस्टिक्स' (रसद और आपूर्ति) पर निर्भर करती है। लेकिन आजाद हिंद फौज (INA) के मामले में यह परिभाषा ही उलट गई। जहाँ ब्रिटिश सेना के पास हवाई रसद, डिब्बाबंद भोजन और आधुनिकतम शस्त्र थे, वहीं आईएनए के पास केवल एक चीज प्रचुर मात्रा में थी देशभक्ति। इन देशभक्त सैनिकों ने जंगलों को अपना घर और सूखी रोटियों को अपना अमृत बनाया।
कठिन प्रशिक्षण: जापानी कौशल और भारतीय जीवटता
आजाद हिंद फौज का प्रशिक्षण केवल शारीरिक कवायद नहीं, बल्कि मानसिक फौलाद गढ़ने की प्रक्रिया थी। सिंगापुर के सेलेटर (Seletar) और पेनांग के प्रशिक्षण केंद्रों में जो दृश्य दिखता था, वह किसी भी सैन्य विश्लेषक को हैरान कर सकता था।
जंगलों की पाठशाला: जापानी सेना 'जंगल वारफेयर' (Jungle Warfare) में विश्व विजेता मानी जाती थी। उनके सहयोग से आईएनए के जवानों को बर्मा के उन घने जंगलों में लड़ने का अभ्यास कराया गया, जहाँ सूरज की रोशनी भी धरती तक नहीं पहुँचती थी। उन्हें सिखाया गया कि कैसे बिना आवाज किए दलदलों को पार करना है और कैसे पेड़ों पर चढ़कर स्नाइपर (Sniper) की तरह वार करना है।
साॅंप और बिच्छू के बीच अस्तित्व: प्रशिक्षण इतना कठोर था कि सैनिकों को कई दिनों तक बिना पानी और भोजन के घने जंगलों में छोड़ दिया जाता था। उन्हें प्रकृति के बीच जीवित रहने (Survival Training) की कला सिखाई गई, जो बाद में इंफाल अभियान में उनके काम आई।
वस्त्र और भोजन: अभावों का महाकाव्य
अगर हम आईएनए के रसद विभाग की फाइलें खोलें, तो आँखों में आँसू आना स्वाभाविक है। दक्षिण-पूर्वी एशिया की भीषण गर्मी और बर्मा की हाड़ कंपाने वाली बारिश के बीच ये सिपाही किन स्थितियों में थे?
फटे जूते और खाकी वर्दी: शुरुआत में सैनिकों को वही वर्दी दी गई जो ब्रिटिश भंडार से मिली थी, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर नए वस्त्रों का अभाव हो गया। कई जवान फटे हुए जूतों में मीलों पैदल चलते थे, जिससे उनके पैरों में गहरे जख्म हो जाते थे। फिर भी, उनकी परेड की धमक में कोई कमी नहीं आती थी।
नमक और उबले पत्ते: बर्मा के मोर्चे पर जब रसद की लाइनें कट गईं, तो आईएनए के सिपाहियों ने हफ़्तों तक केवल उबले हुए जंगली पत्तों, शकरकंद और कभी-कभी केवल नमक-चावल पर गुजारा किया। 'मीमांसा' के पाठकों को यह जानकर गर्व होगा कि भूख से तड़पते हुए भी किसी सिपाही ने शत्रु के सामने घुटने नहीं टेके।
आयुध सामग्री (Ammunition): पुरानी बंदूकों से आधुनिक टैंकों का सामना
हथियारों के मामले में आईएनए की स्थिति 'जुगाड़ और वीरता' का मिश्रण थी।
कब्जाए हुए हथियार: आईएनए के पास अधिकांश हथियार वे थे जो जापानियों ने अंग्रेजों से छीने थे। इनमें पुरानी .303 ली-एनफील्ड राइफलें, स्टेन गन और कुछ पुरानी मशीन गन शामिल थीं।
अम्युनिशन का संकट: गोलियों की एक-एक खेप के लिए सैनिकों को जापानी आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता था। अक्सर ऐसा होता था कि भारतीय सैनिकों के पास जज्बा तो होता था, लेकिन राइफल में भरने के लिए गोलियां खत्म हो जाती थीं। ऐसे समय में आईएनए के वीरों ने 'संगीन' (Bayonet) का इस्तेमाल किया और आमने-सामने की लड़ाई में ब्रिटिश सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए।
हथियार बंद कारें और आर्टिलरी: कुछ भारी तोपें और बख्तरबंद गाड़ियाँ भी आईएनए के पास थीं, जिन्हें 'बहादुर ग्रुप' जैसे विशिष्ट दस्ते संचालित करते थे। उनका उपयोग रणनीतिक ठिकानों को उड़ाने के लिए किया जाता था।
रसद की 'गुमनाम' रक्षक: दक्षिण-पूर्वी एशिया की जनता
खोजी पत्रकारिता के इस दौर में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आईएनए की रसद का सबसे बड़ा स्रोत कौन था। वह कोई सरकार नहीं, बल्कि प्रवासी भारतीय थे।
झाॅंसी की रानी का दान: रंगून और बैंकॉक की गलियों में रहने वाली भारतीय महिलाओं ने अपने सोने के जेवर, यहाँ तक कि अपनी मंगलसूत्र तक 'आजाद हिंद बैंक' में जमा कर दिए ताकि सैनिकों के लिए गोलियां और कपड़े खरीदे जा सकें।
मुट्ठी भर अनाज: छोटे भारतीय व्यापारियों ने अपने गोदाम आईएनए के लिए खोल दिए। यह इतिहास का वह 'क्राउडफंडिंग' मॉडल था, जिसने एक पूरी सेना को खड़ा कर दिया।
'मीमांसा' की इस पड़ताल का निष्कर्ष यह है कि आजाद हिंद फौज केवल हथियारों के दम पर नहीं, बल्कि अपनी 'आत्मा' के दम पर लड़ी थी। उनके पास लॉजिस्टिक्स की कमी थी, लेकिन उनके पास 'नेताजी' का नेतृत्व था, जो किसी भी रसद से ज्यादा ताकतवर था।
वे अंग्रेजों से इसलिए नहीं हारे कि वे कमजोर थे, बल्कि इसलिए क्योंकि प्रकृति (भारी मानसून) और वैश्विक राजनीति ने उनका साथ छोड़ दिया था। लेकिन उनकी इस कमी ने ही उनके संघर्ष को महान बना दिया।
विजय पथ और रक्त रंजित इतिहास: अराकान से लाल किले तक की हुंकार
इतिहास गवाह है कि साम्राज्य केवल सेनाओं से नहीं, बल्कि 'निष्ठा' (Loyalty) के दम पर टिकते हैं। फरवरी 1942 में जब सिंगापुर का पतन हुआ, तो वह केवल एक सैन्य हार नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश राज के गौरव का सूर्यास्त था। हजारों भारतीय युद्धबंदी (POWs) के सामने एक यक्ष प्रश्न था ब्रिटिश क्राउन के प्रति वह वफादारी जिसे जबरन थोपा गया था, या अपनी मिट्टी के प्रति वह पुकार जिसे सदियों से दबाया गया था? कैप्टन मोहन सिंह और बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 'जय हिंद' के आह्वान ने इन बंदियों को 'आजाद हिंद के सिपाहियों' में बदल दिया। यही वह बिंदु था जहाँ 'भाड़े के सैनिक' (Mercenaries) राष्ट्र के 'मुक्तिदाता' (Liberators) बन गए।
रणक्षेत्र का विस्तार: बर्मा से इंफाल की दुर्गम राहें
आजाद हिंद फौज की सैन्य रणनीति केवल 'किताबी' नहीं थी। नेताजी और उनके सेनापतियों ने 'छापामार युद्ध' (Guerrilla Warfare) को अपना मुख्य आधार बनाया। 1944 के 'यू-गो' (U-Go) और 'हा-गो' (Ha-
Go) ऑपरेशनों ने ब्रिटिश खुफिया तंत्र की नींद उड़ा दी।
अराकान का मोर्चा: मार्च 1944 में, आईएनए की पहली छापामार रेजिमेंट ने अराकान की पहाड़ियों में वह कर दिखाया जिसकी कल्पना जनरल वेवेल ने भी नहीं की थी। आईएनए के 'बहादुर ग्रुप' ने जासूसी और विध्वंसक गतिविधियों के माध्यम से ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर विद्रोह के बीज बो दिए।
मोइरांग का ऐतिहासिक क्षण: 14 अप्रैल 1944 यह वह तारीख है जब कर्नल शौकत मलिक के नेतृत्व में आईएनए के बहादुरों ने मणिपुर के मोइरांग में पहली बार भारतीय धरती पर तिरंगा फहराया। 'आजाद हिंद सरकार' ने स्वतंत्र भारतीय क्षेत्र का प्रशासन संभाला, जो ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की पहली औपचारिक घोषणा थी।
कोहिमा और इंफाल: जहाँ पत्थर भी गवाह बने
मई 1944 तक युद्ध अपने चरम पर था। शाहनवाज खान की टुकड़ियां उखरुल तक पहुँच चुकी थीं। कोहिमा और इंफाल की लड़ाई केवल जमीन के टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि दिल्ली के रास्ते के लिए थी।
अजेय साहस: कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन और कर्नल प्रेम सहगल के नेतृत्व में 'नेहरू' और 'गांधी' ब्रिगेड ने पलेल हवाई पट्टी और इरावदी नदी के तटों पर भीषण संघर्ष किया। इरावदी को पार करने के दौरान ब्रिटिश जनरल स्लिम ने स्वयं स्वीकार किया कि यह उनके जीवन का सबसे कठिन 'अपोज्ड रिवर क्रॉसिंग' (Opposed River Crossing) था।
प्रकृति का प्रकोप: आईएनए की हार का कारण केवल ब्रिटिश तोपें नहीं थीं, बल्कि मानसून की बेदर्द बारिश, मलेरिया और रसद की पूर्ण समाप्ति थी। रसद न होने के कारण सैनिकों ने जंगली घास खाई, लेकिन 'दिल्ली चलो' का नारा नहीं छोड़ा।
शहीदों की गाथा: गुमनाम लहू की महक
आईएनए के लगभग 26,000 सैनिकों ने अपनी मातृभूमि के लिए शहादत दी। इनमें से अधिकांश के नाम आज सरकारी फाइलों में शायद न हों, लेकिन अराकान की मिटटी में उनके त्याग की महक आज भी सुरक्षित है।
कठिन वापसी (The Retreat): जब जापान का पलड़ा भारी मानसून और परमाणु हमलों के कारण कमजोर पड़ा, तब आईएनए को पीछे हटना पड़ा। शाहनवाज खान लिखते हैं कि पीछे हटते समय सैकड़ों बीमार सैनिक केवल इसलिए गोली खा गए ताकि वे अंग्रेजों के हाथ लगकर अपनी सेना का रहस्य न उगलें। भुखमरी और बीमारी ने कोहिमा की पहाड़ियों को वीरों की समाधि बना दिया था।
लाल किले का ट्रायल: हारकर भी जीत गई 'आजाद हिंद'
युद्ध के मैदान में भले ही आईएनए को पीछे हटना पड़ा, लेकिन असली विजय 'लाल किले के मुकदमों' (Red Fort Trials) में हुई। कर्नल सहगल, कर्नल ढिल्लन और जनरल शाहनवाज खान एक हिंदू, एक सिख और एक मुसलमान को जब एक साथ कटघरे में खड़ा किया गया, तो पूरा भारत एक हो गया।
जन-ज्वार का उदय: आईएनए के इन वीरों की गाथाओं ने ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर उस 'निष्ठा' को पूरी तरह खत्म कर दिया जिसके दम पर अंग्रेज भारत पर राज कर रहे थे। 1946 का नौसेना विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny) इसी आग का परिणाम था।
ब्रिटिश स्वीकारोक्ति: लॉर्ड वेवेल ने अपनी डायरी में लिखा था कि आईएनए अब सैन्य खतरा नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक विस्फोट' है जिसे रोकना नामुमकिन है।
विजय का शंखनाद: अंडमान से कोहिमा तक तिरंगे का शौर्य
इतिहास अक्सर हार और जीत को केवल सैन्य आंकड़ों में मापता है, लेकिन 'मीमांसा' अगली कड़ी में आज आपको उस 'भाव' की यात्रा पर ले जा रही है, जहाँ जीत का अर्थ केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि सदियों पुराने आत्मविश्वास की वापसी थी। वह पल कैसा रहा होगा, जब साढ़े तीन सौ वर्षों की गुलामी के बाद पहली बार किसी भारतीय ने अपनी सेना के दम पर अपनी ही माटी पर तिरंगा फहराया होगा? अंडमान की लहरों से लेकर कोहिमा की चोटियों तक, आज़ाद हिंद फौज का विजय अभियान वास्तव में भारत के स्वाभिमान का पुनर्जन्म था।
अंडमान और निकोबार: मुक्ति का पहला टापू ('शहीद' और 'स्वराज')
30 दिसंबर, 1943 यह वह तिथि है जिसे भारतीय कालचक्र में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। पोर्ट ब्लेयर के 'जिमखाना मैदान' में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया, तो समुद्र की लहरें भी 'वन्दे मातरम्' का उद्घोष कर रही थीं।
गुलामी के प्रतीकों का अंत: जिस सेलुलर जेल में वीर सावरकर जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी जवानी खपा दी थी, उस द्वीप को नेताजी ने ब्रिटिश चंगुल से मुक्त कराया। नेताजी ने अंडमान का नाम 'शहीद द्वीप' और निकोबार का नाम 'स्वराज द्वीप' रखा।
नेताजी की मुस्कान: चश्मदीद बताते हैं कि उस दिन नेताजी के चेहरे पर जो दीप्ति थी, वह किसी सम्राट की नहीं, बल्कि एक ऐसे तपस्वी की थी जिसकी साधना सफल हुई थी। उन्होंने वहां की धरती को चूमते हुए कहा था कि "यह भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की पहली किरण है।" भारतीयों के भीतर उमड़ता वह प्रेम और उत्साह ऐसा था कि वहां के स्थानीय नागरिकों ने अपनी अल्प बचत को आज़ाद हिंद के कोष में समर्पित कर दिया।
अराकान और मोइरांग: भारतीय भूमि पर कदम
मार्च-अप्रैल 1944 की वह सुबह, जब आईएनए की 'बहादुर ग्रुप' की टुकड़ियों ने बर्मा की सीमा लांघकर भारत की पवित्र भूमि मणिपुर में प्रवेश किया। कर्नल शौकत अली मलिक के नेतृत्व में आईएनए के वीरों ने ब्रिटिश सेना को खदेड़ते हुए मोइरांग पर कब्जा कर लिया।
झंडोत्तोलन का गौरव: 14 अप्रैल, 1944 को शाम के धुंधलके में जब मोइरांग के मुख्य भवन पर आईएनए का तिरंगा लहराया, तो सैनिकों की आँखों से अविरल आंसू बह रहे थे। वह आंसू हार के नहीं, बल्कि उस 'पुनीत कर्तव्य' की पूर्ति के थे जो उन्होंने अपने देश के प्रति लिया था।
स्वदेश प्रेम की लहर: जैसे ही यह खबर फैली कि 'नेताजी की फौज' आ गई है, सीमावर्ती गांवों के लोग अपने घरों से निकलकर आज़ाद हिंद के सिपाहियों के लिए रसद और पुष्प लेकर उमड़ पड़े। बूढ़ी माँओं ने जवानों को तिलक लगाया और युवाओं ने बंदूक थामकर सेना में भर्ती होने की शपथ ली। 'मीमांसा' उस कालजयी उत्साह को नमन करती है जिसने एक पूरे प्रांत को क्रांति की ज्वाला में बदल दिया।
कोहिमा का रण: 'दिल्ली चलो' की सबसे ऊँची गूँज
कोहिमा जिसे 'पूर्व का स्टालिनग्राद' कहा जाता है। यहाँ का युद्ध केवल युद्ध नहीं, बल्कि एक 'धर्मयुद्ध' था। आईएनए और जापानी सेना ने मिलकर कोहिमा की ऊँची पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया और कोहिमा-इंफाल रोड की नाकेबंदी कर दी।
शौर्य की पराकाष्ठा: अराकान की पहाड़ियों में आईएनए के सिपाहियों ने 'हैंड-टू-हैंड' फाइटिंग (मल युद्ध) में ब्रिटिश गोरे सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए। .303 राइफल के सामने केवल एक संगीन लेकर भारतीय जवान "चलो दिल्ली" चिल्लाते हुए मौत के मुंह में कूद जाते थे।
इंफाल का घेरा: इंफाल की घेराबंदी ने दिल्ली में बैठे वायसराय के पसीने छुड़ा दिए थे। नेताजी की योजना स्पष्ट थी अगर इंफाल गिरता है, तो बंगाल का रास्ता साफ है, और अगर बंगाल का रास्ता साफ है, तो दिल्ली दूर नहीं। भारतीयों के अंदर यह विश्वास घर कर गया था कि अब फिरंगी हुकूमत के दिन गिनती के बचे हैं।
जन-मानस का ज्वार और राष्ट्रप्रेम का उफान
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सबसे बड़ी विजय सैन्य नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक थी। उन्होंने भारतीयों के मन से 'गोरे साहब' का खौफ निकाल दिया था।
एकता का चमत्कार: कोहिमा के मोर्चे पर जब पंजाब का सिख, बंगाल का ब्राह्मण और मद्रास का नायर एक साथ अपनी धरती को चूमते हुए आगे बढ़ रहे थे, तब 'राष्ट्रवाद' की वह लहर पैदा हुई जिसने भारत की सदियों पुरानी जातिगत दीवारों को ढहा दिया।
आजाद हिंद रेडियो की गूँज: जब रेडियो पर नेताजी की आवाज गूँजी "हमारी सेनाएं भारत की धरती पर प्रवेश कर चुकी हैं" तो कलकत्ता से लेकर पेशावर तक भारतीयों के घरों में दीये जलाए जाते थे। यह स्वदेश प्रेम का वह उफान था जिसे दबाने की शक्ति ब्रिटिश गोलियों में नहीं थी।
मीमांसा' के संपादक श्री अमन कुमार होली के शब्दों में "अंडमान, मोइरांग और कोहिमा केवल भूगोल के नाम नहीं हैं, ये भारतीय शौर्य के वे तीर्थ हैं जहाँ आज़ादी की पहली आरती उतारी गई थी।" आज़ाद हिंद फौज का यह विजय अभियान हमें सिखाता है कि जब एक राष्ट्र का स्वाभिमान जागता है, तो बड़ी से बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियां भी तिनके की तरह बिखर जाती हैं। भले ही बाद में परिस्थितियों के कारण हमें कोहिमा से पीछे हटना पड़ा, लेकिन वह तिरंगा जो मोइरांग में फहराया गया था, उसने भारतीयों के हृदय में स्वतंत्रता की जो मशाल जलाई, उसी की लौ में 1947 का सूर्योदय हुआ।
युद्ध केवल सरहदों पर नहीं, बल्कि सूचनाओं और धारणाओं (Propaganda Warfare) के धरातल पर भी लड़ा जा रहा था। आलेख का अंतिम खंड उन कुचक्रों का विश्लेषण है, जिनके माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीयों को भारतीयों के ही विरुद्ध खड़ा करने का षड्यंत्र रचा।
धारणाओं का छद्म युद्ध: ब्रिटिश प्रोपेगेंडा और आईएनए की अग्निपरीक्षा
किसी भी साम्राज्य को केवल बंदूकों के दम पर नहीं चलाया जा सकता; उसे चलाने के लिए शासितों के मस्तिष्क में अपनी 'अनिवार्यता' और विद्रोहियों की 'अनैतिकता' का भ्रम पैदा करना होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब आजाद हिंद फौज (INA) ने 'दिल्ली चलो' का उद्घोष किया, तो ब्रिटिश सत्ता डरी हुई थी। वह जानती थी कि यदि भारतीय जनमानस को यह पता चल गया कि उनकी अपनी सेना सीमा पर खड़ी है, तो विद्रोह की ज्वाला को बुझाना नामुमकिन होगा। इसी डर से जन्म हुआ प्रॉक्सि और प्रोपेगेंडा वॉरफेयर का। आज 'मीमांसा' उन कड़वी सच्चाइयों से पर्दा उठा रही है, जहाँ अपनी ही माटी के कुछ प्रभावशाली लोग और ब्रिटिश तंत्र ने मिलकर आजाद हिंद के वीरों की छवि धूमिल करने का प्रयास किया।
'भगोड़ा' और 'लुटेरा': शब्दों का विषैला जाल
ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक युद्ध विशेषज्ञों ने आईएनए के सैनिकों के लिए बहुत सावधानी से 'जिफ्स' (Jiffs - Japanese Inspired Fifth Columnists) और 'ट्रेटर' (गद्दार) जैसे शब्दों का प्रयोग शुरू किया।
छवि बिगाड़ने का षड्यंत्र: अंग्रेजों ने यह प्रचारित किया कि आईएनए के सैनिक कोई देशभक्त नहीं, बल्कि वे 'भगोड़े' हैं जिन्होंने अपनी शपथ तोड़ी है। उन्होंने जापानी सेना द्वारा चीन के नानजिंग में किए गए अत्याचारों की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर भारतीय अखबारों में छपवाया और यह डर फैलाया कि यदि आईएनए सफल हुई, तो भारत जापान का गुलाम बन जाएगा और जापानी सैनिक भारतीय घरों में लूटपाट करेंगे।
अहिंसा का छद्म ढोल: अंग्रेज, जो स्वयं विश्व के सबसे बड़े हिंसक दमनकारी थे, अचानक 'शांति और अहिंसा' के संरक्षक बन बैठे। उन्होंने आईएनए को 'लुटेरा' और 'अहिंसक हत्यारों' की टोली करार दिया, ताकि गांधीवादी विचारधारा वाले भारतीयों के मन में नेताजी के प्रति संशय पैदा किया जा सके।
रियासतों का विश्वासघात: पद और प्रतिष्ठा की गुलामी
इतिहास का यह सबसे लज्जाजनक अध्याय है कि जब आईएनए के जवान भूखे-प्यासे जंगलों में लड़ रहे थे, तब भारत की कई बड़ी रियासतें और राजे-रजवाड़े ब्रिटिश ताज के प्रति अपनी वफादारी का प्रदर्शन करने में व्यस्त थे।
तलवे चाटने की संस्कृति: कई देसी रियासतों के शासकों को डर था कि यदि आज़ादी मिली, तो उनकी विलासिता और पद-प्रतिष्ठा छिन जाएगी। उन्होंने अंग्रेजों को खुश करने के लिए आईएनए के विरुद्ध सार्वजनिक बयान जारी किए और अपनी सेनाओं को ब्रिटिश युद्ध-कोष में दान कर दिया।
कोलकाता को 'बचाने' का कुचक्र: जब आईएनए बंगाल की दहलीज पर थी, तब अंग्रेजों ने स्थानीय रईसों के साथ मिलकर 'डिफेंस ऑफ इंडिया' की कमेटियां बनाईं। उन्होंने प्रचार किया कि जापानी बमबारी से कोलकाता को केवल ब्रिटिश राज ही बचा सकता है। यह एक ऐसा कुचक्र था जिसमें अपनों ने ही अपनों के लिए दरवाजे बंद करने की कोशिश की।
मजबूरी की भर्ती और 'भाई बनाम भाई' का युद्ध
ब्रिटिश सेना ने अपनी फौज की संख्या बढ़ाने के लिए भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में 'जबरन भर्ती' और 'नौकरी का लालच' देने की नीति अपनाई।
अनभिज्ञ सैनिक: हजारों भोले-भाले भारतीय युवाओं को यह कहकर भर्ती किया गया कि वे केवल सुरक्षा ड्यूटी करेंगे, लेकिन उन्हें सीधे अराकान और इंफाल के मोर्चे पर अपने ही भाइयों (INA) के विरुद्ध झोंक दिया गया।
गोरखा शौर्य का दुरुपयोग: अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों की अदम्य बहादुरी और उनकी स्वामिभक्ति का प्रोपेगेंडा के रूप में भरपूर इस्तेमाल किया। उन्होंने गोरखा रेजिमेंटों को यह विश्वास दिलाया कि आईएनए के लोग उनके अस्तित्व के दुश्मन हैं। यह ब्रिटिश 'डिवाइड एंड रूल' का सबसे चतुर और क्रूर प्रयोग था, जहाँ युद्धभूमि में एक तरफ तिरंगा था और दूसरी तरफ मजबूर भारतीय सैनिक, जिनके गोरे मालिक पीछे बैठकर तमाशा देख रहे थे।
प्रोपेगेंडा फिल्में और पोस्टरों का मायाजाल
उस दौर में सिनेमा और विजुअल मीडिया नया था। अंग्रेजों ने इसका भरपूर लाभ उठाया।
भ्रामक फिल्में: ब्रिटिश मिलिट्री इंटेलिजेंस ने ऐसी कई 'न्यूज रील्स' और छोटी फिल्में बनाईं जिनमें आईएनए के सैनिकों को जापानी सेना के 'गुलाम' के रूप में दिखाया गया। इन फिल्मों में आईएनए के अधिकारियों को शराब और विलासिता में डूबा हुआ चित्रित किया गया, जबकि हकीकत में वे अपनी मातृभूमि के लिए घास खा रहे थे।
पोस्टर वॉर: पूरे भारत के रेलवे स्टेशनों और बाजारों में ऐसे पोस्टर लगाए गए जिनमें दिखाया गया कि आईएनए के आने से भारत में अकाल और तबाही आएगी। इन पोस्टरों का उद्देश्य भारतीय जनमानस के उस 'भोले हृदय' में भय भरना था जो नेताजी के प्रति प्रेम से लबालब था।
सत्य की विजय: प्रोपेगेंडा की दीवार का ढहना
ब्रिटिश हुकूमत ने शब्दों का जाल तो बुना, लेकिन वे 'सत्य की ऊष्मा' को नहीं पहचान पाए। जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ और आईएनए के बंदी लाल किले लाए गए, अंग्रेजों का पूरा प्रोपेगेंडा ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
खुल गई पोल: जब भारतीय जनता को पता चला कि जिन्हें 'भगोड़ा' कहा गया, वे दरअसल महानायक थे; जिन्हें 'लुटेरा' कहा गया, वे अपनी संपत्ति दान कर चुके थे; तो पूरे देश में वह जन-उभार आया जिसकी कल्पना ब्रिटिश इंटेलिजेंस ने कभी नहीं की थी।
विद्रोह की गूँज: वह प्रोपेगेंडा ही था जिसने अंततः अंग्रेजों को ले डूबा, क्योंकि जब ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों ने आईएनए की हकीकत जानी, तो उनकी वफादारी अपने गोरे मालिकों से हटकर भारत माता की ओर मुड़ गई। 1946 का नौसेना विद्रोह इसी 'प्रोपेगेंडा के अंत' की परिणति थी।
निष्कर्ष: इतिहास की सीख
'मीमांसा' के संपादक श्री अमन कुमार होली के शब्दों में "इतिहास केवल विजेताओं द्वारा लिखा गया साहित्य नहीं है, बल्कि यह उन साजिशों का भी गवाह है जो सत्य को दबाने के लिए रची गई थीं।" आज जब हम उन 'गुमनाम गाथाओं' को पढ़ते हैं, तो हमें समझना होगा कि सूचनाओं के जाल से भी बड़ी शक्ति 'राष्ट्रप्रेम' की होती है।
आजाद हिंद फौज के सिपाहियों ने न केवल अंग्रेजों की गोलियों का सामना किया, बल्कि उन्होंने उस जहरीले प्रोपेगेंडा का भी मुकाबला किया जिसने उन्हें अपने ही देश में अजनबी बनाने की कोशिश की। आज का 'शूरवीर स्तंभ' उन वीरों को नमन करता है जो हर मोर्चे पर अजेय रहे।
इतिहास के ऋण और हमारी जिम्मेदारी
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के संपादक श्री अमन कुमार होली के शब्दों में "आजाद हिंद फौज की ये ब्रिगेड्स केवल सेना की टुकड़ियां नहीं थीं, वे भारत की उस अटूट आत्मा का प्रतिबिंब थीं जो गुलामी की जंजीरों को पिघला देने की क्षमता रखती थी।"
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो हमें याद करना होगा उन गुमनाम नायकों को, जिन्होंने इन ब्रिगेड्स में लड़ते हुए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। वे इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में भले ही कम दिखें, लेकिन राष्ट्र की नींव के पत्थर वही हैं।
आज 'शूरवीर स्तंभ' के माध्यम से हम उन गुमनाम सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने अपने लहू से भारत माता के चरणों को पखारा। 'मीमांसा' का यह आलेख माला केवल सूचना साझा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक तर्पण है उन वीरों के प्रति जिनके नाम हम भूलते जा रहे हैं। आजाद हिंद फौज की सैन्य संरचना हमें सिखाती है कि जब राष्ट्र रक्षा का प्रश्न हो, तो व्यक्ति की जाति, वर्ग और धर्म गौण हो जाते हैं।
आज के युवाओं को यह समझना होगा कि आजाद हिंद फौज के वे सिपाही कोई काल्पनिक नायक नहीं थे, बल्कि वे हम और आप जैसे ही साधारण मनुष्य थे, जिन्हें 'देश प्रेम' की अग्नि ने 'असाधारण' बना दिया था।
मीमांसा' की यह आलेख माला यह याद दिलाती है कि आजादी हमें 'दान' में नहीं मिली। यह उन युवाओं के लहू से खरीदी गई है जिन्होंने सिंगापुर की जेलों से निकलकर, फटे जूतों और खाली पेट के साथ दुनिया की सबसे बड़ी ताकत से टकराने का साहस किया। संपादक श्री अमन कुमार होली के नेतृत्व में हमारा यह प्रयास केवल इतिहास की कतरन पेश करना नहीं था, बल्कि उन गुमनाम शूरवीरों को आपके हृदय के मंदिर में पुनर्स्थापित करना था।
जय हिंद! जय भारत!
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
सूचना के स्रोत और सटीकता:
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के 'शूरवीर स्तंभ' के अंतर्गत प्रकाशित यह आलेख श्रृंखला विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों, आजाद हिंद फौज के वयोवृद्ध सैनिकों (Veterans) के संस्मरणों, 'आजाद हिंद ब्यूरो' (Berlin/Singapore), 'नेताजी रिसर्च ब्यूरो' (Kolkata), यूट्यूब पर उपलब्ध प्रत्यक्षदर्शियों के साक्षात्कारों, विकिपीडिया एवं अन्य विश्वसनीय इंटरनेट पोर्टल्स से प्राप्त तथ्यात्मक जानकारी के गहन शोध के बाद तैयार की गई है।
उद्देश्य:
इस सामग्री का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक जागरूकता बढ़ाना और राष्ट्र के गुमनाम नायकों को श्रद्धांजलि अर्पित करना है। 'मीमांसा' किसी भी राजनैतिक या विवादित विचारधारा का समर्थन नहीं करती है।
दृश्य सामग्री:
आलेख में प्रयुक्त तस्वीरें इंटरनेट के विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों (Public Domain) से ली गई हैं। इन तस्वीरों पर मूल कॉपीराइट उनके संबंधित छायाकारों या अभिलेखागारों (Archives) का है। 'मीमांसा' इनका उपयोग केवल संदर्भ और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए कर रही है।
कॉपीराइट चेतावनी एवं नीति (Copyright Warning)
मौलिकता और शब्द-शिल्प:
यद्यपि तथ्य ऐतिहासिक स्रोतों से लिए गए हैं, परंतु इस आलेख की प्रस्तुति, भाषा-शैली, विश्लेषण और 'शब्द-शिल्प' पूरी तरह से वेब पत्रिका 'मीमांसा' की अपनी निजी और मौलिक बौद्धिक संपदा है।
प्रतिबंध: इस आलेख के किसी भी भाग (शब्दों, वाक्यों या संरचना) को संपादक की लिखित अनुमति के बिना किसी अन्य वेबसाइट, पत्रिका, समाचार पत्र, सोशल मीडिया पेज या वीडियो प्लेटफॉर्म पर कॉपी, रीप्रोड्यूस या पुन: प्रकाशित करना 'कॉपीराइट अधिनियम' के तहत दंडनीय अपराध है।
उचित उपयोग: आप इस लेख को इसके मूल लिंक (URL) के साथ साझा कर सकते हैं, बशर्ते सामग्री के साथ 'मीमांसा' का श्रेय (Credit) स्पष्ट रूप से दिया गया हो।
©2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा'। सर्वाधिकार सुरक्षित
Comments
Post a Comment