हिंदी साहित्य और भाषा जगत के अनन्य सेनानी: आचार्य चंद्रबली पांडेय। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। अमन कुमार होली

कल्पना कीजिए काशी की उन संकरी गलियों की, जहाँ एक ओर शास्त्रार्थ की गूँज है और दूसरी ओर राष्ट्रभाषा को लेकर छिड़ा महासंग्राम। उस दौर में एक ऐसे विद्वान उभरते हैं जिनके हाथ में न तो सत्ता का डंडा है और न ही धन का वैभव, किंतु जिसकी लेखनी की धमक से तत्कालीन भाषाई राजनीति के बड़े-बड़े स्तंभ डोल जाते हैं। वे थे आचार्य चंद्रबली पांडेय एक ऐसे विद्वान जिन्हें शब्दों का 'फकीर' और तर्कों का 'वजीर' कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी।

आचार्य पांडेय का व्यक्तित्व कबीर की उस 'मसि कागद छुयौ नहीं' वाली फक्कड़ता और आचार्य रामचंद्र शुक्ल की उस गंभीर 'बुद्धि-दृष्टि' का अनूठा मिश्रण था। वे विश्वविद्यालयी ढांचों में नहीं बंधे, फिर भी विश्वविद्यालयों के बड़े-बड़े आचार्य उनके तर्कों के सामने निरुत्तर हो जाते थे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वाध्याय (Self-study) की शक्ति किसी भी डिग्री से कहीं ऊपर होती है।


हिंदी साहित्य के आकाश में कुछ ऐसे नक्षत्र हैं जिनकी चमक किसी पद या प्रतिष्ठा की मोहताज नहीं रही। आजमगढ़ की माटी से उपजा एक ऐसा ही दैदीप्यमान नक्षत्र था आचार्य चंद्रबली पांडेय। वे केवल एक विद्वान नहीं, बल्कि हिंदी के वह अक्खड़ सिपाही थे, जिन्होंने अपनी मेधा और तर्कों से 'राष्ट्रभाषा' के महासमर की दिशा बदल दी।

जीवन: माटी से मनीषी तक का सफर

आचार्य चंद्रबली पांडेय का जन्म 25 अप्रैल, 1904 को आजमगढ़ के नासिरुद्दीन गाँव में एक कृषक परिवार में हुआ था। गाँव की पगडंडियों से शुरू हुआ उनका सफर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की ज्ञान-दीर्घाओं तक पहुँचा। यहाँ वे युगप्रवर्तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतने निकट आए कि शुक्ल जी उन्हें 'शाह साहब' कहकर पुकारते थे।

पांडेय जी ने आजीवन अविवाहित रहकर हिंदी की सेवा का व्रत लिया। वे फक्कड़पन और पांडित्य का ऐसा अनूठा संगम थे, जो काशी के घाटों और तंग गलियों में रहकर भी वैश्विक स्तर का शोध कर रहा था। विश्वविद्यालयी सुख-सुविधाओं से दूर रहकर उन्होंने जो ज्ञान साधना की, वह आज के शोधार्थियों के लिए एक तीर्थ के समान है।

रचनाकर्म और प्रमुख कृतियाँ

आचार्य पांडेय की लेखनी में शोध की गहराई और निर्भीकता का अद्भुत मेल था। उनके द्वारा रचित लगभग 34 ग्रंथ हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।
सूफी मत का प्रथम अन्वेषण: उनकी पुस्तक 'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत' हिंदी में इस विषय पर पहला क्रमबद्ध और प्रामाणिक शोध है।
भाषाई विमर्श: 'उर्दू का रहस्य', 'भाषा का प्रश्न', 'राष्ट्रभाषा पर विचार' और 'हिन्दी गद्य का निर्माण' उनके भाषाई बोध के जीवंत प्रमाण हैं।
क्लासिक आलोचना: 'कालिदास', 'केशवदास', 'तुलसीदास' और 'शूद्रक' जैसी कृतियों पर उन्हें राजकीय सम्मान प्राप्त हुआ।

विशेष: प्रख्यात भाषाविद् डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने उनकी मेधा को नमन करते हुए कहा था "पांडेय जी का लिखा एक-एक पैम्फलेट भी डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि के लिए पर्याप्त है।"

शैली: भाव पक्ष एवं कला पक्ष

पांडेय जी की लेखन शैली 'गंभीर' और 'तार्किक' थी। वे हवा में बात करने वाले साहित्यकार नहीं थे; उनके प्रत्येक शब्द के पीछे ठोस प्रमाण होते थे।
भाव पक्ष: उनके लेखन में राष्ट्रप्रेम और हिंदी के प्रति एक योद्धा जैसी अटूट निष्ठा झलकती है। वे भाषा को केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि देश की 'सांस्कृतिक रीढ़' मानते थे।
कला पक्ष: उनकी भाषा सरस होते हुए भी संस्कृत, अरबी, फारसी और उर्दू के मर्म से गुंथी हुई थी। वे एक ही समय में कबीर जैसी मारक क्षमता और तुलसी जैसी सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले आलोचक थे।

हिंदी साहित्य में योगदान और थाती

जब देश में हिंदी, उर्दू और 'हिंदुस्तानी' के नाम पर भाषाई द्वंद्व चरम पर था, तब चंद्रबली पांडेय ने हिंदी का पक्ष पूरी प्रखरता से रखा। उन्होंने:
नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति के रूप में हिंदी को संगठनात्मक शक्ति प्रदान की।
दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अलख जगाई।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और केशव प्रसाद मिश्र जैसे दिग्गजों की निष्पत्तियों पर भी विवेकपूर्ण प्रश्नचिह्न लगाने का साहस दिखाया।

पुनर्पाठ क्यों जरूरी है?

आज के 'हिंग्लिश' और भाषाई मिलावट के दौर में आचार्य चंद्रबली पांडेय का स्मरण और भी अनिवार्य हो जाता है। उनका पुनर्पाठ हमें सिखाता है कि:
भाषा की शुद्धता: भाषा में कृत्रिम मिलावट उसकी आत्मा को नष्ट कर देती है।
निर्भीक शोध: बिना किसी पद या लोभ के भी सत्य की स्थापना की जा सकती है।ऐ थे
सांस्कृतिक पहचान: हिंदी केवल एक भाषा नहीं, भारत को एक सूत्र में पिरोने वाला मंत्र है।
24 जनवरी, 1958 को हिंदी का यह महायोद्धा शांत हो गया, लेकिन उनकी 'मीमांसा' आज भी हमें सही राह दिखाती है।

जयंती विशेषांक/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
संपादक, 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

इस विशेषांक 'हिंदी के अनन्य सेनानी: आचार्य चंद्रबली पांडेय' में प्रकाशित आलेख का उद्देश्य महान साहित्यकार के जीवन, उनके संघर्षों और हिंदी साहित्य में उनके योगदान को रेखांकित करना है।
तथ्यात्मक जानकारी: आलेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्य, तिथियां और संदर्भ उपलब्ध साक्ष्यों (विकीपीडिया, लोक संवाद, शोध पत्र एवं पारिवारिक संस्मरण) पर आधारित हैं। पत्रिका इन तथ्यों की पूर्ण शुद्धता का दावा नहीं करती, हालांकि इन्हें यथासंभव प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है।
व्यक्तिगत विचार: आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी अध्ययन और विश्लेषण का परिणाम हैं। महापुरुषों के मूल्यांकन के प्रति विभिन्न विद्वानों की राय भिन्न हो सकती है।
उद्देश्य: इस सामग्री का उद्देश्य किसी भी भाषा, संप्रदाय या विचारधारा की भावना को आहत करना नहीं, बल्कि भाषाई इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।

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