खड़ी बोली साहित्य के तार्किक पुरोधा : बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री के जीवन एवं परिचय पर पुण्यतिथि विशेषांक
हिंदी साहित्य के आकाश में कुछ नक्षत्र ऐसे होते हैं जिनकी चमक समय बीतने के साथ और भी प्रखर होती जाती है। बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री एक ऐसे ही 'युगांतरकारी' व्यक्तित्व थे। जहाँ एक ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र को हम आधुनिक हिंदी साहित्य के 'सृष्टा' के रूप में पूजते हैं, वहीं अयोध्या प्रसाद खत्री उस दौर के अनन्य 'द्रष्टा' थे, जिन्होंने भाषा के भविष्य को भांप लिया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर 'मीमांसा' पत्रिका उनके ऐतिहासिक संघर्ष और भाषायी आंदोलन की प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रही है।
जीवन परिचय : संघर्ष और विस्थापन से उपजा संकल्प
अयोध्या प्रसाद खत्री का 4 जनवरी जन्म 1857 की महान क्रांति के वर्ष में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिकंदरपुर में हुआ था। यह वह समय था जब देश राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुज़र रहा था। विस्थापन की मार झेलते हुए उनका परिवार मुजफ्फरपुर (बिहार) आ बसा। पिता जगजीवन लाल खत्री के देहांत के बाद, उन्होंने अपनी शिक्षा बीच में छोड़ दुकान संभाली, शिक्षित हुए, शिक्षक बने और अंततः मुजफ्फरपुर कलेक्टरी में पेशकार के पद पर प्रतिष्ठित हुए। इसी पद पर रहते हुए उन्होंने वह ऐतिहासिक कार्य किया जिसने हिंदी कविता की धारा बदल दी। अयोध्या प्रसाद खत्री वह 'द्रष्टा' थे जिन्होंने गद्य और पद्य के भाषायी द्वैत को समाप्त करने का स्वप्न देखा। 1857 की क्रांति के वर्ष जन्मे खत्री जी ने मुजफ्फरपुर की कलेक्टरी में पेशकार रहते हुए वह युगांतरकारी कार्य किया, जिसने ब्रजभाषा के वर्चस्व के बीच 'खड़ी बोली' को सिंहासन पर बैठाया।
ऐतिहासिक संघर्ष और भाषायी आंदोलन
खत्री जी का सबसे बड़ा योगदान 'भाषिक एकरूपता' का सिद्धांत था। 1887-89 के बीच प्रकाशित उनकी कृति 'खड़ी बोली का पद्य' ने न केवल भारतेंदु मंडल में हलचल मचाई, बल्कि सात समंदर पार फ्रेडरिक पिन्काट जैसे विद्वानों को भी इस विमर्श में शामिल होने पर विवश कर दिया।
खड़ी बोली का आंदोलन: एक भाषायी क्रांति
भारतेंदु युग में हिंदी गद्य ने तो खड़ी बोली को अपना लिया था, लेकिन कविता (पद्य) अभी भी ब्रजभाषा की दासी बनी हुई थी। खत्री जी इस 'भाषिक द्वैत' (गद्य और पद्य की अलग-अलग भाषा) के प्रबल विरोधी थे।
प्रथम व्याकरण की रचना : बहुत कम लोग जानते हैं कि 1877 में खत्री जी ने 'हिंदी व्याकरण' नामक खड़ी बोली की पहली व्याकरण पुस्तक की रचना की, जिसे बिहार बंधु प्रेस ने प्रकाशित किया। यह उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण था कि वे जानते थे कि किसी भी भाषा को स्थापित करने के लिए उसका व्याकरणिक आधार होना अनिवार्य है।
आंदोलन का शंखनाद : 1888 में उन्होंने 'खड़ी बोली का आंदोलन' नामक पुस्तिका प्रकाशित कर साहित्यिक जगत में खलबली मचा दी। उन्होंने गद्य और पद्य की एकरूपता पर जोर दिया।
"खड़ी बोली का प्रचार करने के लिए इन्होंने इतना द्रव्य खर्च किया कि राजा-महाराजा भी कम करते हैं।"
- पुरुषोत्तम प्रसाद (सरस्वती, 1905)
'खड़ी बोली का पद्य' और वैश्विक संवाद
1887-89 के बीच खत्री जी ने 'खड़ी बोली का पद्य' दो खंडों में प्रकाशित किया। इस कृति ने न केवल स्थानीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी।
समर्थन और विरोध: एक ओर जहाँ 'फ्रेडरिक पिन्काट' जैसे विदेशी विद्वान ने उनके विचारों का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर 'जॉर्ज इब्राहिम ग्रियर्सन' और स्वयं भारतेंदु मंडल के कई लेखकों ने इनका प्रतिवाद किया।
चाणक्य नीति: खत्री जी ने अपनी इस पुस्तक को नि:शुल्क वितरित किया ताकि भाषायी चेतना का प्रसार हो सके। इसी रणनीतिक कौशल के कारण उन्हें 'खड़ी बोली का चाणक्य' भी कहा जाता है।
भाषा की चार शैलियाँ और सर्वव्यापकता
खत्री जी ने खड़ी बोली को किसी एक सांचे में नहीं बांधा, बल्कि उसकी व्यापकता को पहचानते हुए चार प्रमुख शैलियों का वर्गीकरण किया :
मौलवी शैली: अरबी-फारसी प्रधान।
मुंशी शैली: व्यावहारिक और संतुलित हिंदी (जिसे उन्होंने आदर्श माना)।
पंडित शैली: संस्कृतनिष्ठ शब्दावली युक्त।
मास्टर (अध्यापक) शैली: वह शैली जो शिक्षा और विमर्श के लिए उपयुक्त हो।
उन्होंने 'मुंशी शैली' को प्राथमिकता दी क्योंकि यह भाषा धर्म, जाति और क्षेत्रीयताओं के बंधनों को तोड़कर 'हिंदुस्तानी' जनमानस को जोड़ने की क्षमता रखती थी।
विरासत और सम्मान : 21वीं सदी में खत्री जी
खत्री जी का योगदान केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है।
उनकी स्मृति को जीवंत रखने के लिए:
समारोह समिति: जुलाई 2007 में मुजफ्फरपुर में 'अयोध्या प्रसाद खत्री जयंती समारोह समिति' की स्थापना की गई।
पुरस्कार: प्रतिवर्ष साहित्य में विशिष्ट योगदान हेतु 'अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान' दिया जाता है, जिसमें उनकी डेढ़ फुट ऊँची प्रतिमा प्रदान की जाती है।
वृत्तचित्र (Documentary): श्री वीरेन नन्दा द्वारा उनके जीवन पर केंद्रित 'खड़ी बोली का चाणक्य' फिल्म का निर्माण किया गया है, जो उनकी संघर्ष यात्रा को जीवंत करती है।
निष्कर्ष: 'सर्वेषां हितम् एव साहित्यम्'
बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने जिस खड़ी बोली के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया, आज वह विश्व की सबसे बड़ी भाषाओं में से एक है। 'मीमांसा' पत्रिका मानती है कि खत्री जी का आंदोलन केवल भाषा का आंदोलन नहीं था, बल्कि वह 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' का सामूहिक उद्घोष था। 4 जनवरी, 1905 को उनका पार्थिव शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन खड़ी बोली का हर शब्द उनकी कीर्ति का गान कर रहा है।
खड़ी बोली के इस अमर पुरोधा को शत-शत नमन!
अयोध्या प्रसाद खत्री को क्यों पढ़े?
प्रथम व्याकरण (1877): उन्होंने 'हिंदी व्याकरण' रचकर खड़ी बोली को भाषायी अनुशासन दिया।
शैलियों का वर्गीकरण: खत्री जी ने खड़ी बोली को चार शैलियों (मौलवी, मुंशी, पंडित और मास्टर) में विभाजित किया, जिसमें 'मुंशी शैली' को उन्होंने जनमानस की भाषा (हिंदुस्तानी) के रूप में प्रतिष्ठित किया।
त्याग की पराकाष्ठा: 'सरस्वती' (1905) के अनुसार, उन्होंने खड़ी बोली के प्रचार हेतु इतना धन व्यय किया जो उस समय के राजा-महाराजाओं के लिए भी दुष्कर था।
21 वीं सदी में विरासत
आज मुजफ्फरपुर में उनकी स्मृति में स्थापित 'समारोह समिति' और वीरेन नन्दा द्वारा निर्मित वृत्तचित्र 'खड़ी बोली का चाणक्य' नई पीढ़ी को उनके संघर्षों से परिचित करा रहे हैं। उनकी १५०वीं जयंती और प्रतिवर्ष दिया जाने वाला 'स्मृति सम्मान' इस बात का प्रमाण है कि खत्री जी का आंदोलन आज एक वटवृक्ष बन चुका है।
संपादकीय: 'मीमांसा' का उद्देश्य और भाषायी अस्मिता
'मीमांसा' पत्रिका का ध्येय केवल सूचना प्रदान करना नहीं, बल्कि साहित्य के उन विस्मृत अध्यायों का 'प्रामाणिक विश्लेषण' करना है जिन्होंने आधुनिक भारत की वैचारिक नींव रखी है। हमारा उद्देश्य हिंदी साहित्य के 'द्रष्टा' और 'सृष्टा' के बीच के उस सेतु को उजागर करना है, जिसे समय की धूल ने धुंधला कर दिया है। बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर केंद्रित यह विशेष प्रस्तुति इसी संकल्प का हिस्सा है कि हम अपनी भाषायी जड़ों और उनके संरक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकें।
पुण्यतिथि विशेषांक/ संपादकीय
अमन कुमार होली
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
अंतिम डिस्क्लेमर (Disclaimer)
'मीमांसा' पत्रिका में प्रकाशित यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों, उपलब्ध साहित्यिक दस्तावेजों और समिति के अभिलेखों पर आधारित है। लेख का उद्देश्य बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री के योगदान का निष्पक्ष विश्लेषण करना है। लेख में व्यक्त विचार शोधपरक हैं और किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, संप्रदाय या भाषायी समूह की भावनाओं को ठेस पहुँचाना हमारा उद्देश्य नहीं है। ऐतिहासिक तथ्यों की व्याख्या भिन्न-भिन्न शोधकर्ताओं के अनुसार भिन्न हो सकती है।
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