वेब पत्रिका 'मीमांसा' जयंती विशेषांक संपादकीय आलेख : इतिहास के सजीव चितेरे और बुंदेलखंड के शिल्पी वृन्दावनलाल वर्मा

आज की आपाधापी भरी डिजिटल दुनिया में, जहाँ सूचनाएँ पलक झपकते ओझल हो जाती हैं, वहाँ ठहरकर अपनी जड़ों को पहचानना एक आध्यात्मिक यात्रा के समान है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेष जयंती विशेषांक में, हम आज एक ऐसे मनीषी के चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित कर रहे हैं, जिनकी लेखनी ने भारतीय इतिहास के धूल धूसरित पन्नों में प्राण फूँक दिए। आज 9 जनवरी है उपन्यासकार, नाटककार और बुंदेलखंड की माटी के अमर साहित्यिक हस्ताक्षर पद्म भूषण वृन्दावनलाल वर्मा की जन्म जयंती।

इतिहास की कोख से उपजा एक रचनाकार

1889 की वह 9 जनवरी, जब झाँसी के मऊरानीपुर की धरती ने इस अनमोल रत्न को जन्म दिया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि तहसीलदार का यह पुत्र अपनी कलम से मराठा शौर्य और बुंदेली गौरव का ऐसा महाकाव्य रचेगा कि समय भी नतमस्तक हो जाएगा। वर्मा जी का जीवन संघर्ष, लगन और जिजीविषा का जीवंत उदाहरण है। मैट्रिक के बाद मुहर्रिर की नौकरी से लेकर वकालत की बुलंदियों तक, और फिर वकालत की मोटी कमाई को खेती के प्रयोगों में गँवा देने तक उनका जीवन स्वयं में किसी कालजयी उपन्यास से कम नहीं।
लेकिन साहित्यकार वही है जो हार को भी सृजन का आधार बना ले। जब खेती के प्रयोगों में साठ हजार का कर्ज हुआ, तो उस अभाव की कोख से 'मृगनयनी' और 'झाँसी की रानी' जैसी श्रेष्ठ कृतियों का जन्म हुआ। यह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ा सबक है कि असफलताएँ अंत नहीं, बल्कि एक नई और विराट शुरुआत का माध्यम होती हैं।

वृन्दावनलाल वर्मा का संपूर्ण रचनात्मक संसार: एक विहंगम दृष्टि

वृन्दावनलाल वर्मा का साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत और विशेषकर बुंदेलखंड के गौरवशाली इतिहास का सजीव दस्तावेजीकरण है। उनकी लेखनी ने किलों की प्राचीरों, युद्ध के मैदानों और लोक-मानसों के बीच सोए हुए इतिहास को पुनर्जीवित किया। उनके संपूर्ण सृजन को हम निम्नलिखित प्रमुख श्रेणियों में देख सकते हैं:

1. ऐतिहासिक एवं सामाजिक उपन्यास: महागाथाओं का सृजन

वर्माजी ने हिंदी उपन्यास को 'ऐतिहासिक रोमांस' की एक नई ऊँचाई दी। उनके उपन्यास इतिहास की प्रामाणिकता और कल्पना की उड़ान का अनूठा मिश्रण हैं।
कालजयी कृतियाँ: गढ़ कुंडार (1930) और मृगनयनी (1950) उनके लेखन के मील के पत्थर हैं। जहाँ मृगनयनी ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर और गूजरी रानी की प्रेम-कथा के साथ तत्कालीन कला-संस्कृति को उकेरती है, वहीं झाँसी की रानी (1946) वीरता का अनुपम उदाहरण है।
अन्य प्रमुख उपन्यास: प्रत्यागत, संगम, विराटा की पद्मिनी, कचनार, माधवजी सिंधिया, अहिल्याबाई, रामगढ़ की रानी, महारानी दुर्गावती, भुवनविक्रम, अमरबेल, अचल मेरा कोई, कुंडलीचक्र, टूटे काँटे, और कीचड़ और कमल आदि।

2. नाट्य साहित्य: रंगमंच पर इतिहास का स्पंदन

वर्माजी ने नाटकों के माध्यम से इतिहास के जटिल प्रसंगों को जनता के लिए सुबोध और दृश्य बनाया। उनके नाटकों में संवादों की तीक्ष्णता और चारित्रिक गहराई स्पष्ट झलकती है।
प्रमुख नाटक: राखी की लाज, जहाँदारशाह, फूलों की बोली, बाँस की फाँस, काश्मीर का काँटा, हंसमयूर, रानी लक्ष्मीबाई, बीरबल, पूर्व की ओर, नीलकण्ठ और ललित विक्रम।
प्रहसन एवं एकांकी: लो भाई पंचों लो, देखादेखी और पीले हाथ जैसे नाटकों में उन्होंने सामाजिक विसंगतियों पर भी प्रहार किया।

3. कहानी संग्रह: लघु कलेवर में विराट संवेदना

उनकी कहानियाँ ऐतिहासिक घटनाओं की विचित्रता और मानव स्वभाव के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिए जानी जाती हैं।
प्रमुख संग्रह: दबे पाँव (शिकार कथाएँ), शरणागत, कलाकार का दण्ड, तोषी, ऐतिहासिक कहानियाँ, अँगूठी का दान और अम्बपुर के अमर वीर। 'शरणागत' जैसी कहानियाँ मानवीय मूल्यों और नैतिकता की स्थापना करती हैं।

4. निबंध एवं समग्र संकलन

निबंध: 'हृदय की हिलोर' उनके वैचारिक परिपक्वता और भावुकता का सुंदर समन्वय है।

वृन्दावनलाल वर्मा समग्र: 

उनके निधन के पश्चात, उनके विशाल साहित्यिक अवदान को सहेजने हेतु 1991 से 2000 के बीच सात खण्डों में उनकी संपूर्ण रचनावली का प्रकाशन किया गया, जो आज के शोधार्थियों और पाठकों के लिए एक अमूल्य निधि है।

वर्मा जी का यह विशाल रचनात्मक क्षितिज यह सिद्ध करता है कि वे केवल एक लेखक नहीं, बल्कि संस्कृति के रक्षक थे। उनकी रचनाएँ आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने और राष्ट्रीय अस्मिता को समझने की प्रेरणा देती हैं।

साहित्य का क्षितिज: भाव, शैली और शिल्प

वृन्दावनलाल वर्मा केवल एक कहानीकार नहीं थे, वे एक 'ऐतिहासिक अन्वेषक' थे। उनकी रचना संसार इतनी व्यापक है कि उसमें मध्यकालीन भारत की तलवारों की खनक भी है और लोक-संस्कृति की मधुर गूँज भी।

शिल्प पक्ष : वर्मा जी ने हिंदी उपन्यास को 'तिलिस्मी और ऐयारी' के जादुई घेरे से निकालकर ठोस ऐतिहासिक धरातल पर खड़ा किया। उनकी भाषा में बुंदेली का पुट है, जो संवादों को सजीव बनाता है। वे केवल दृश्य नहीं लिखते थे, वे वातावरण निर्मित करते थे। जब आप 'विराटा की पद्मिनी' या 'गढ़ कुण्डार' पढ़ते हैं, तो आपको झाँसी के बीहड़, पथरीली ज़मीन और पुराने किलों की गंध महसूस होने लगती है।

भाव पक्ष : उनके साहित्य का मूल स्वर 'राष्ट्रीयता' और 'स्वाभिमान' है। वे नारी शक्ति के प्रबल पक्षधर थे। उनके उपन्यासों की नायिकाएँ चाहे वह 'मृगनयनी' हो, 'कचनार' हो या 'रानी लक्ष्मीबाई' वे केवल सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि बुद्धि, शौर्य और त्याग का संगम हैं।

युवाओं के लिए विरासत और समावेशी वैचारिकी

आज का युवा, जो 'आइडेंटिटी क्राइसिस' के दौर से गुजर रहा है, उसे वर्माजी के साहित्य की ओर मुड़ना होगा। वर्माजी ने हमें सिखाया कि अपनी विरासत पर गर्व करना संकीर्णता नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की नींव है। उनकी वैचारिकी समावेशी थी; वे इतिहास के नायकों को संप्रदाय के चश्मे से नहीं, बल्कि उनके कृतित्व और राष्ट्र-प्रेम के पैमाने पर तौलते थे।

क्रांतिकारियों से उनके गहरे संबंध और अहिंसा के साथ-साथ सशस्त्र संघर्ष के प्रति उनका सम्मान यह दर्शाता है कि वे एक यथार्थवादी विचारक थे। उनका मानना था कि आज़ादी केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि बलिदानों और सामूहिक शक्ति से मिलती है। गाँधीजी के प्रति सम्मान रखते हुए भी वे आज़ाद हिंद फौज और सावरकर के योगदान को विस्मृत नहीं होने देना चाहते थे। यही वह संतुलित दृष्टि है, जिसकी आज के ध्रुवीकृत समाज को सबसे अधिक आवश्यकता है।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' और सांस्कृतिक निरंतरता

'मीमांसा' का यह अंक केवल एक स्मृति शेष नहीं है, बल्कि एक आह्वान है। हम चाहते हैं कि आज का युवा पाठक वर्माजी की उन शिकार-कहाानियों (दबे पाँव) को पढ़े, उनके नाटकों (बीरल, ललित विक्रम) के माध्यम से लोक-नीति को समझे और उनके 'हंस मयूर' जैसे नाटकों के शिल्प को परखे।

वर्माजी ने झाँसी में को-ऑपरेटिव बैंक की स्थापना की, वे चेयरमैन रहे, उन्होंने समाज सेवा की; यह बताता है कि एक लेखक को केवल 'हाथी दाँत की मीनार' में नहीं बैठना चाहिए, बल्कि समाज के बीच रहकर कर्मठता का परिचय देना चाहिए।

उपसंहार: समय के शिलालेख पर अंकित नाम

23 फरवरी 1969 को भले ही उनका भौतिक शरीर शांत हो गया, लेकिन 'मृगनयनी' की आँखों की चमक और 'झाँसी की रानी' की तलवार की धार में वे आज भी जीवित हैं। आगरा विश्वविद्यालय का 'डी.लिट' और भारत सरकार का 'पद्म भूषण' उनके विराट व्यक्तित्व के छोटे से प्रमाण मात्र हैं; उनका असली पुरस्कार तो पाठकों का वह अगाध प्रेम है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
आइए, इस जयंती पर हम संकल्प लें कि हम अपनी जड़ों को सींचेंगे। हम उस साहित्य को पढ़ेंगे जो हमें वीरता सिखाता है, जो हमें मर्यादा सिखाता है और जो हमें भारत होने का बोध कराता है। 'मीमांसा' के इस वैचारिक यज्ञ में आप सभी का स्वागत है।

जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
संपादक, 
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
ई-मेल : editorwebmimansa@gmail.com 

अस्वीकरण (Disclaimer)

इस आलेख में प्रस्तुत जानकारी ऐतिहासिक तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और  वृन्दावनलाल वर्मा के साहित्यिक परिचय पर आधारित है। वेब पत्रिका 'मीमांसा'  का उद्देश्य स्वर्गीय वर्मा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से युवा पीढ़ी को परिचित कराना है। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी अध्ययन और विश्लेषण का परिणाम हैं।
इसकी सामग्री हेतु इंटरनेट, विकिपीडिया और शोधों से  तथ्यात्मक जानकारी जुटाई गई है। पाठकों से निवेदन है कि ऐतिहासिक तिथियों या तथ्यों के गहन शोध हेतु लेखक की मूल कृतियों एवं प्रमाणित अभिलेखागारों का संदर्भ भी अवश्य लें।

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पाठकों के लिए एक प्रश्न (संवाद की कड़ी)

वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का वर्णन नहीं है, बल्कि वह आम आदमी और लोक-संस्कृति के जीवंत संघर्ष की गाथा है। वर्माजी की कौन सी रचना आपको आज के दौर में सबसे अधिक प्रासंगिक लगती है और क्यों? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर 'मीमांसा' के इस वैचारिक विमर्श का हिस्सा बनें।


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