हिंदी साहित्य के गंगापुत्र, हालावाद के शलाका पुरुष, अग्निपथ के राही डाॅ. हरिवंश राय बच्चन। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

आज संगम नगरी प्रयाग की लहरें भी जैसे एक मौन राग गा रही हैं। काल के कपाल पर अमिट हस्ताक्षर अंकित करने वाले, 'हालावाद' के प्रवर्तक और हिंदी साहित्य के 'गंगापुत्र' डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी की पुण्यतिथि है। 'मीमांसा' का यह विशेषांक उस ऋषियतुल्य रचनाकार को समर्पित है, जिसने कविता को केवल दरबारों या गोष्ठियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जन-सामान्य के कंठ का हार बना दिया।

आज जब हम बच्चन जी का स्मरण करते हैं, तो केवल एक कवि का नहीं, बल्कि एक ऐसे पथिक का स्मरण करते हैं जिसने नियति के थपेड़ों को अपनी लेखनी से परास्त किया। यह आलेख उनकी उसी अनवरत साहित्यिक साधना का एक विनम्र वंदन है। आइए पढ़ते हैं "मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन, मेरा परिचय। "~ बच्चन

हालावाद के पुरोधा: जब मधुशाला में जीवन का दर्शन उतरा

हिंदी साहित्य के 'उत्तर छायावाद' काल में जब कविता रहस्यात्मकता और दार्शनिक बोझ तले दबी थी, तब बच्चन जी ने 'मधुशाला' (1935) के माध्यम से एक नई चेतना का संचार किया। लोग अक्सर 'मधुशाला' को केवल मदिरा और साकी का काव्य समझ लेते हैं, किंतु बच्चन जी की 'हाला' वह मदिरा नहीं है जो मदहोश करे, बल्कि वह वह चेतना है जो मनुष्य को जीवन के दुखों को भूलकर आगे बढ़ने का हौसला दे। उन्होंने लिखा:

"मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ,
राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।"

यही उनके जीवन का मूलमंत्र था समन्वय और अटलता। उनकी त्रयी 'मधुशाला', 'मधुबाला' और 'मधुकलश' ने हिंदी काव्य जगत में वह हलचल पैदा की जो आज भी कम नहीं हुई है।

संघर्ष और सृजन: नीड़ का निर्माण फिर-फिर

बच्चन जी का निजी जीवन किसी महाकाव्य के संघर्ष जैसा रहा। 1936 में प्रथम पत्नी श्यामा जी के देहावसान ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। 'निशा निमंत्रण' और 'एकांत संगीत' जैसी रचनाओं में उस वियोग की गहन वेदना स्पष्ट झलकती है। लेकिन एक सच्चा रचनाकार वही है जो अपनी राख से पुनर्जीवित हो।
श्रीमती तेजी बच्चन जी के जीवन में आने के बाद बच्चन जी के काव्य में एक नया उल्लास, एक नई जिजीविषा लौटी। उन्होंने घोषणा की 'नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर।' यह केवल कविता नहीं थी, यह टूटे हुए मन को जोड़ने का एक वैश्विक आह्वान था। आज भी जब निराशा के बादल घने होते हैं, बच्चन जी की ये पंक्तियाँ एक जलती मशाल की तरह मार्ग दिखाती हैं।

आत्मकथा: सत्य के साथ एक निर्भीक साक्षात्कार

बच्चन जी ने हिंदी आत्मकथा विधा को जो आयाम दिया, वह अप्रतिम है। उनकी आत्मकथा के चार खंड:

क्या भूलूँ क्या याद करूँ
नीड़ का निर्माण फिर
बसेरे से दूर
दशद्वार से सोपान तक

ये केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की कहानी नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन भारत के सामाजिक-साहित्यिक परिवेश का दस्तावेज हैं। उन्होंने अपनी कमजोरियों को, अपनी गलतियों को और अपने प्रेम को जिस निष्कपटता और ईमानदारी के साथ कागज पर उतारा, वैसा साहस हिंदी साहित्य में विरले ही मिलता है। उन्होंने सिद्ध किया कि सत्य कड़वा हो सकता है, लेकिन वही शाश्वत है।

वैश्विक दृष्टि और भाषा की गरिमा

बच्चन जी केवल एक कवि नहीं थे, वे एक प्रकांड विद्वान भी थे। प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक से लेकर कैम्ब्रिज से डॉ. डब्लू. बी. यीट्स पर शोध करने तक, और फिर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के पद पर सेवाएँ देने तक, उनका व्यक्तित्व बहुआयामी रहा।
शेक्सपियर के 'मैकबेथ', 'ओथेलो' और 'हैमलेट' का हिंदी अनुवाद करके उन्होंने वैश्विक साहित्य को भारतीय जनमानस के लिए सुलभ बनाया। उनकी भाषा में अवधी की मिठास और खड़ी बोली की स्पष्टता का ऐसा संगम था कि वह सीधे हृदय को छूती थी। वे शब्दों के जादूगर थे, पर उनके जादू में सादगी थी, कृत्रिमता नहीं।


कविता संग्रह

तेरा हार (1929),
मधुशाला (1935),
मधुबाला (1936),
मधुकलश (1937),
आत्म परिचय (1937),
निशा निमंत्रण (1938),
एकांत संगीत (1939),
आकुल अंतर (1943),
सतरंगिनी (1945),
हलाहल (1946),
बंगाल का काल (1946),
खादी के फूल (1948),
सूत की माला (1948),
मिलन यामिनी (1950),
प्रणय पत्रिका (1955),
धार के इधर-उधर (1957),
आरती और अंगारे (1958),
बुद्ध और नाचघर (1958),
त्रिभंगिमा (1961),
चार खेमे चौंसठ खूंटे (1962),
दो चट्टानें (1965),
बहुत दिन बीते (1967),
कटती प्रतिमाओं की आवाज़ (1968),
उभरते प्रतिमानों के रूप (1969),
जाल समेटा (1973)
नई से नई-पुरानी से पुरानी (1985)

आत्मकथा

क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969),
नीड़ का निर्माण फिर (1970),
बसेरे से दूर (1977),
दशद्वार से सोपान तक (1985)


विविध

बच्चन के साथ क्षण भर (1934),
खय्याम की मधुशाला (1938),
सोपान (1953),
मैकबेथ (1957),
जनगीता (1958),
ओथेलो (1959),
उमर खय्याम की रुबाइयाँ (1959),
कवियों में सौम्य संत: पंत (1960),
आज के लोकप्रिय हिन्दी कवि: सुमित्रानंदन पंत (1960),
आधुनिक कवि (1961),
नेहरू: राजनैतिक जीवनचरित (1961),
नये पुराने झरोखे (1962),
अभिनव सोपान (1964)
चौंसठ रूसी कविताएँ (1964)
नागर गीता (1966),
बच्चन के लोकप्रिय गीत (1967)
डब्लू बी यीट्स एंड अकल्टिज़म (1968)
मरकत द्वीप का स्वर (1968)
हैमलेट (1969)
भाषा अपनी भाव पराये (1970)
पंत के सौ पत्र (1970)
प्रवास की डायरी (1971)
किंग लियर (1972)
टूटी छूटी कड़ियाँ (1973)


सम्मान और पुरस्कार: कृतित्व का अर्घ्य

बच्चन जी के अवदान को राष्ट्र ने मुक्त कंठ से स्वीकार किया।
उनकी अमर कृति 'दो चट्टानें' के लिए उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
साहित्यिक श्रेष्ठता के लिए उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और सरस्वती सम्मान से नवाजा गया।
1976 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया।
राज्य सभा के मनोनीत सदस्य के रूप में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और साहित्य के समन्वय को नई ऊँचाई प्रदान की।

विरासत: जो कभी धूमिल नहीं होगी

आज बच्चन जी शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वाणी हर उस युवा के भीतर धड़कती है जो संघर्ष कर रहा है। उनकी विरासत केवल उनके पुत्र श्री अमिताभ बच्चन जी की सफलता में ही नहीं, बल्कि उस हर पाठक की आँखों में है जो 'अग्निपथ' पढ़कर अपने जीवन के युद्ध के लिए तैयार होता है।

अमिताभ जी अक्सर बाबूजी की कविताओं का पाठ करते हैं, और उनकी आवाज में जब वे पंक्तियाँ गूँजती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे समय ठहर गया हो। बच्चन जी ने हमें सिखाया कि जीवन कठिन है, 'वृक्ष हों भले खड़े, हों बड़े, हों घने', पर हमें 'एक पत्र छाँह भी माँगनी' नहीं है। हमें बस चलते जाना है।

उपसंहार

डॉ. हरिवंश राय बच्चन एक कालजयी चेतना का नाम है। वे प्रयाग के गौरव थे और विश्व के नागरिक। उनकी पुण्यतिथि पर 'मीमांसा' उन्हें शत-शत नमन करता है। उनके द्वारा जलाई गई साहित्य की यह मशाल आने वाली पीढ़ियों को 'हाला', 'प्याला' और 'मधुशाला' के गूढ़ अर्थ समझाती रहेगी और मानवता को प्रेम व संघर्ष का पाठ पढ़ाती रहेगी।


पुण्यतिथि विशेषांक/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस विशेषांक 'पुण्यतिथि विशेष: हरिवंश राय बच्चन' में प्रकाशित आलेख का उद्देश्य महान साहित्यकार डॉ. हरिवंश राय बच्चन के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना और उनके साहित्यिक योगदान को जन-सामान्य तक पहुँचाना है।
तथ्यात्मक जानकारी: आलेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तिथियाँ, पुरस्कार और रचनाओं की सूची उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों और संदर्भ ग्रंथों पर आधारित है। 'मीमांसा' संपादकीय टीम ने इनकी शुद्धता सुनिश्चित करने का पूर्ण प्रयास किया है।
निजी विचार: आलेख में व्यक्त विश्लेषण और व्याख्याएँ लेखक के मौलिक विचार हैं, जिनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि साहित्य की सेवा करना है।
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