युग-द्रष्टा रामनरेश त्रिपाठी और शुचिता का संकल्प पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

समय की अविरल धारा में कुछ हस्ताक्षर ऐसे होते हैं, जिनकी चमक धूमिल होने के बजाय और अधिक प्रखर होती जाती है। आज जब हम हिंदी साहित्य के अनन्य उपासक, 'पथिक' और 'स्वप्न' जैसे कालजयी काव्यों के सर्जक रामनरेश त्रिपाठी जी को उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण कर रहे हैं, तो यह केवल एक रस्म अदायगी नहीं है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह विशेषांक उनके कृतित्व के माध्यम से आज के साहित्यिक विमर्श में खोई हुई 'शुचिता' को खोजने का एक विनम्र प्रयास है।

साहित्य-शिल्प और सृजन की अविरल यात्रा

त्रिपाठी जी का साहित्य केवल शब्दों का संचयन नहीं, बल्कि भारतीय मानस की धड़कन है। छायावाद के उस स्वर्ण युग में, जहाँ एक ओर सूक्ष्म रहस्यवाद था, वहीं त्रिपाठी जी ने 'स्वच्छंदतावाद' को एक नई जमीन दी। उनकी रचना यात्रा लोक-जीवन के गीतों से शुरू होकर राष्ट्रभक्ति के उच्च शिखरों तक जाती है।

लोक-संस्कृति का संरक्षण: 'कविता कौमुदी' के माध्यम से उन्होंने लोक-गीतों का जो संरक्षण किया, वह आज के शोधार्थियों के लिए किसी धरोहर से कम नहीं है।

भाव और भाषा का समन्वय: उनकी भाषा में वह वत्सलता और सहजता है, जो पाठक के हृदय में सीधे उतर जाती है। 'मृदु' स्वर में कठोर सत्य कहने की कला उन्हें अपने समकालीनों से अलग खड़ा करती है।


कृतियाँ

प्रबंध काव्य :
मिलन (1918) १३ दिनों में रचित
पथिक (1920) २१ दिनों में रचित
मानसी (1927)
स्वप्न (1929) १५ दिनों में रचित * इसके लिए उन्हें हिन्दुस्तान अकादमी का पुरस्कार मिला

मुक्तक :
मारवाड़ी मनोरंजन
आर्य संगीत शतक
कविता-विनोद
क्या होम रूल लोगे
मानसी

कहानी :
तरकस
आखों देखी कहानियां
स्वपनों के चित्र
नखशिख
उन बच्चों का क्या हुआ..?
२१ अन्य कहानियाँ

उपन्यास :
वीरांगना
वीरबाला
मारवाड़ी और पिशाचनी
सुभद्रा और लक्ष्मी

नाटक :
जयंत
प्रेमलोक
वफ़ाती चाचा
अजनबी
पैसा परमेश्वर
बा और बापू
कन्या का तपोवन

व्यंग्य :
दिमाग़ी ऐयाशी
स्वप्नों के चित्र

अनुवाद :
इतना तो जानो (अटलु तो जाग्जो - गुजराती से)
कौन जागता है (गुजराती नाटक)।

संपादित पुस्तकें :
रामचरितमानस
कविता कौमुदी’ (६ खंडों में )


आज पुनर्पाठ क्यों जरूरी है?

आज का साहित्यिक विमर्श अक्सर व्यक्तिगत आक्षेपों, वैचारिक संकीर्णता और बाजारवाद के शोर में उलझ गया है। ऐसे समय में रामनरेश त्रिपाठी जी की रचनाओं का पुनर्पाठ इसलिए अनिवार्य है क्योंकि:

नैतिक शुचिता: उनका साहित्य हमें सिखाता है कि रचनाकार का चरित्र और उसकी लेखनी में सामंजस्य होना चाहिए। उन्होंने सदा 'शिवत्व' (कल्याण) को साहित्य का मूल माना।

 सांस्कृतिक चेतना: वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी जड़ों से कटते समाज के लिए त्रिपाठी जी की राष्ट्रभक्ति और प्रकृति-प्रेम एक संजीवनी की तरह है।

स्वस्थ विमर्श: वे मतभेदों के बीच भी मर्यादा बनाए रखने के हिमायती थे। उनका साहित्य हमें 'प्रतिरोध' को भी 'परिमार्जित' भाषा में व्यक्त करना सिखाता है।

मीमांसा की श्रद्धांजलि: एक मार्गदर्शक प्रकाश

'मीमांसा' उन्हें एक ऐसे पथ-प्रदर्शक के रूप में याद कर रही है, जिन्होंने साहित्य को ड्राइंग रूम की विलासिता से निकालकर गांव की पगडंडियों और राष्ट्रीय आंदोलनों की रणभेरी तक पहुँचाया।

उनका साहित्य कर्म आज के युवा लेखकों के लिए एक मौन संदेश है कि सृजन का उद्देश्य केवल प्रशंसा पाना नहीं, बल्कि समाज के भीतर सोई हुई चेतना को जगाना है।

उनकी विशिष्टता चाहे वह छंदों की शुद्धता हो या विचारों की स्पष्टता आज के 'शॉर्टकट' वाले लेखन युग में धैर्य और साधना का पाठ पढ़ाती है। आइए, इस विशेषांक के माध्यम से हम उस महान साधक के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें और उनके बताए 'शुचिता पूर्ण' मार्ग पर चलने का संकल्प लें।

पुण्यतिथि विशेषांक/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
— संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

वेब पत्रिका ‘मीमांसा’ में प्रकाशित यह संपादकीय आलेख रामनरेश त्रिपाठी जी की पुण्यतिथि के अवसर पर श्रद्धांजलि, साहित्यिक स्मरण और वैचारिक विमर्श के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें व्यक्त विचार, मूल्यांकन एवं निष्कर्ष लेखक/संपादक के निजी साहित्यिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, विचारधारा या समकालीन लेखक का समर्थन अथवा विरोध करना नहीं है।

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