मेजर जनरल ईयान कारडोजो : वह योद्धा जिसने 'खुखरी' से स्वयं लिखा अपना भाग्य। शूरवीर स्तंभ। संपादकीय आलेख।
इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन अनाम और नामचीन योद्धाओं के रक्त से सींची गई माटी है, जिन्होंने मातृभूमि की अखंडता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। जब हम 77वें गणतंत्र दिवस की देहरी पर खड़े हैं, तो हमारी यादों में उन वीर सेनानियों का चेहरा उभरता है, जिन्होंने 'असंभव' शब्द को अपनी डिक्शनरी से मिटा दिया। इन्हीं महान नायकों में एक नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है मेजर जनरल ईयान कारडोजो। वे केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं, बल्कि मानवीय जिजीविषा और फौलादी इरादों का दूसरा नाम हैं।
7 अगस्त 1937 को बॉम्बे (अब मुंबई) के एक साधारण लेकिन संस्कारी परिवार में ईयान का जन्म हुआ। विंसेंट और डायना कारडोजो के आंगन में पल रहे इस बालक की आँखों में बचपन से ही कुछ असाधारण कर गुजरने की चमक थी। सेंट जेवियर्स स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही उनमें अनुशासन और नेतृत्व के गुण दिखने लगे थे। लेकिन नियति ने उनके लिए एक बड़ा मंच तैयार किया था भारतीय सैन्य अकादमी।
ईयान कारडोजो की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) के इतिहास के पहले ऐसे कैडेट बने, जिन्हें 'स्वर्ण' और 'रजत' दोनों पदकों से नवाजा गया। सेना में शामिल होने के बाद वे '5 गोरखा राइफल्स' (फ्रंटियर फोर्स) का हिस्सा बने। गोरखा रेजीमेंट, जिसके बारे में कहा जाता है कि "यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो या तो वह झूठ बोल रहा है या वह गोरखा है।" इसी जांबाज टुकड़ी ने ईयान को प्रेम से नाम दिया 'कारतूस साहब'।
1971 का युद्ध: जब इतिहास ने करवट ली
दिसंबर 1971 का समय था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का बिगुल बज चुका था। ईयान कारडोजो उस समय वेलिंगटन में 'डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कोर्स' कर रहे थे। उनकी बटालियन (4/5 गोरखा राइफल्स) पूर्वी मोर्चे पर तैनात थी। युद्ध के बीच खबर आई कि बटालियन के सेकंड-इन-कमांड वीरगति को प्राप्त हो गए हैं। ईयान को तुरंत अपनी यूनिट में शामिल होने का आदेश मिला।
वे बिना एक क्षण गंवाए युद्धभूमि की ओर दौड़ पड़े। वे उस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बने जब भारतीय सेना ने पहली बार 'हेलीबोर्न ऑपरेशन' (हेलीकॉप्टर से सैनिकों को उतारना) किया। सिलहट की लड़ाई में 'कारतूस साहब' के नेतृत्व में गोरखा सैनिकों ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। लेकिन नियति उनकी वीरता की सबसे कठिन परीक्षा लेने वाली थी।
वह क्षण: खुखरी, संकल्प और बलिदान
ढाका के पतन के बाद, युद्ध के अंतिम चरणों में एक पेट्रोलिंग के दौरान मेजर ईयान का पैर दुश्मन द्वारा बिछाई गई एक 'लैंड माइन' (बारूदी सुरंग) पर पड़ गया। एक भयानक विस्फोट हुआ और उनका पैर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया। चारों तरफ गोलियों की गूँज थी और चिकित्सा सहायता मीलों दूर।
उस समय न तो वहां कोई डॉक्टर उपलब्ध था और न ही दर्द कम करने के लिए 'मॉर्फिन' का इंजेक्शन। घाव इतना गहरा था कि जहर फैलने का खतरा था। ईयान ने अपने साथी डॉक्टर से पैर काटने को कहा, लेकिन संसाधनों के अभाव में डॉक्टर ने असमर्थता जताई। तब जो हुआ, वह सैन्य इतिहास की सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना है।
मेजर ईयान कारडोजो ने अपनी कमर से 'खुखरी' निकाली और अपने साथियों से कहा, "अब इसे मैं खुद करूँगा।" बिना किसी एनेस्थीसिया के, केवल अदम्य साहस के बल पर, उन्होंने अपना घायल पैर खुद काटकर अलग कर दिया। दर्द की उस पराकाष्ठा पर भी उनकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि देश के प्रति कर्तव्य का भाव था। उन्होंने अपनी कटी हुई टांग को दफनाने का आदेश दिया और कहा "अब इसे संभालो, मैं अभी भी लड़ सकता हूँ।"
बाद में, एक पाकिस्तानी सर्जन (मेजर मोहम्मद बशीर), जिसे युद्धबंदी बनाया गया था, ने उनका विधिवत ऑपरेशन किया। यह भारतीय शूरवीरता का ऐसा प्रदर्शन था जिसने दुश्मन के माथे पर भी सम्मान की लकीरें खींच दीं।
कृत्रिम पैर और फौलादी इरादा: हार न मानने की जिद
युद्ध समाप्त हुआ, देश आजाद हुआ (बांग्लादेश का उदय), लेकिन ईयान कारडोजो के लिए एक नया युद्ध शुरू हुआ। सेना के नियमों के अनुसार, विकलांग अधिकारी को 'कमांड' यानी बटालियन का नेतृत्व करने की अनुमति नहीं थी। उन्हें 'डेस्क जॉब' का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन 'कारतूस साहब' को फाइलों के बीच बैठना मंजूर नहीं था।
उन्होंने लकड़ी का कृत्रिम पैर (Prosthetic leg) लगवाया और खुद को साबित करने की ठानी। उन्होंने तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल टी.एन. रैना के सामने अपनी बात रखी। जनरल ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों पर साथ चलने को कहा। ईयान कारडोजो ने लकड़ी के पैर के साथ न केवल पहाड़ चढ़े, बल्कि शारीरिक दक्षता परीक्षा (BPET) में पूरी तरह स्वस्थ अधिकारियों को भी पीछे छोड़ दिया।
उनकी इस अदम्य इच्छाशक्ति को देखकर सेना के नियम बदलने पड़े। ईयान कारडोजो भारतीय सेना के पहले दिव्यांग अधिकारी बने जिन्होंने न केवल एक बटालियन, बल्कि एक ब्रिगेड की भी कमान संभाली।
सेवानिवृत्ति और समाज सेवा: कलम की ताकत
मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी कारडोजो रुके नहीं। उन्होंने 'भारतीय पुनर्वास परिषद' के अध्यक्ष के रूप में दिव्यांगों के जीवन में उजाला फैलाया। उन्होंने कई कालजयी पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'Param Vir: Our Heroes in Battle' और '1971 Stories of Grit and Glory from the Indo-Pak war' प्रमुख हैं। इन किताबों के माध्यम से वे आज भी युवाओं के दिलों में राष्ट्रभक्ति की अलख जगा रहे हैं।
आज 88 वर्ष की आयु में भी वे मैराथन में भाग लेते हैं। उनकी चाल में आज भी वही गोरखा रेजिमेंट वाली धमक है।
उपसंहार: युवाओं के लिए संदेश
मेजर जनरल ईयान कारडोजो की गाथा हमें सिखाती है कि बाधाएं हमारे शरीर को रोक सकती हैं, लेकिन हमारे संकल्प को नहीं। युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि 'जिगर' से जीते जाते हैं। 77वें गणतंत्र दिवस पर 'मीमांसा' पत्रिका इस महान शूरवीर को नमन करती है।
'कारतूस साहब' का जीवन हर भारतीय युवा के लिए एक मंत्र है :
"जब लक्ष्य पवित्र हो और इरादे नेक, तो एक पांव पर भी पूरी दुनिया फतह की जा सकती है।"
जय हिन्द! जय भारत!
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
प्रकाशन का उद्देश्य:
यह आलेख 'शूरवीर' स्तंभ के अंतर्गत भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास और मेजर जनरल ईयान कारडोजो के अदम्य साहस से युवा पीढ़ी को परिचित कराने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, धर्म, जाति या समुदाय की भावनाओं को आहत करना नहीं है।
तथ्यों की सटीकता:
इस आलेख में दी गई जानकारी उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों, सार्वजनिक डोमेन (जैसे विकिपीडिया) और सैन्य संस्मरणों पर आधारित है। हालांकि तथ्यों की शुद्धता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास किया गया है, फिर भी 'मीमांसा' पत्रिका किसी भी ऐतिहासिक तिथि या घटना के विवरण में अनजाने में हुई त्रुटि के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी नहीं होगी। पाठकों से अनुरोध है कि वे शोध के लिए आधिकारिक सैन्य अभिलेखों का संदर्भ लें।
निजी विचार:
आलेख में व्यक्त किए गए वीरतापूर्ण चित्रण और विचार लेखक के शोध और रचनात्मक प्रस्तुति का हिस्सा हैं, जो भारतीय सेना के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना से प्रेरित हैं।
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