समय, कविता और विवेक के समकालीन आवाज अशोक वाजपेयी के रचना-शिल्प और वैविध्य का पुनर्मूल्यांकन। जयंती विशेषांक। संपादकीय आलेख।

हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य जिन व्यक्तित्वों के बिना अधूरा प्रतीत होता है, उनमें अशोक वाजपेयी का नाम एक विशिष्ट, किंचित विवादास्पद और अत्यंत सक्रिय उपस्थिति के रूप में दर्ज है। उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल किसी प्रतिष्ठित कवि को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि नई कविता आंदोलन से लेकर उत्तर-समकालीनता तक फैले उस काव्य-विवेक को पुनः परखना है, जिसने हिंदी कविता को संवेदनात्मक गहराई, वैचारिक सजगता और सांस्कृतिक बहुलता के नए मुहावरे दिए।

‘मीमांसा’ का यह जयंती विशेषांक अशोक वाजपेयी के रचना-शिल्प और काव्य वैविध्य का पुनर्मूल्यांकन साहित्यिक शुचिता, समावेशी भाव और प्रगतिशील काव्यधारा की कसौटी पर करता है बिना भक्तिभाव के, बिना पूर्वग्रह के और बिना किसी वैचारिक आग्रह को अंतिम सत्य माने।

अशोक वाजपेयी : जीवन 

अशोक वाजपेयी (16 जनवरी 1941) हिंदी के प्रमुख समकालीन कवि, निबंधकार, साहित्य-संस्कृति आलोचक और प्रतिष्ठित कला-संस्कृति प्रशासक हैं। वे एक ऐसे रचनाकार के रूप में पहचाने जाते हैं जिन्होंने कविता, विचार और सांस्कृतिक संस्थानों तीनों क्षेत्रों में गहरी और स्थायी छाप छोड़ी है। उनकी पहचान केवल एक कवि तक सीमित नहीं है, बल्कि वे आधुनिक हिंदी साहित्य के वैचारिक और संस्थागत विकास के महत्वपूर्ण सूत्रधार भी रहे हैं। उनका प्रारंभिक जीवन बौद्धिक वातावरण में बीता, जहाँ साहित्य, कला और सार्वजनिक जीवन के प्रश्नों से उनका गहरा परिचय हुआ। शिक्षा के दौरान ही उनमें कविता और विचारशील लेखन की प्रवृत्ति विकसित हो गई थी। आगे चलकर उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में प्रवेश किया और एक सफल सिविल सेवक के रूप में कार्य किया। प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ उन्होंने साहित्य और कला के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी, जो उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की विशेषता रही।

कविता के क्षेत्र में अशोक वाजपेयी का आगमन 1960 के दशक में हुआ। उनका पहला उल्लेखनीय काव्य संग्रह ‘शहर अब भी संभावना है’ (1966) नई कविता आंदोलन के भीतर एक विशिष्ट संवेदनात्मक स्वर लेकर आया। इसके बाद ‘तत्पुरुष’ (1986), ‘बहुरी अकेला’ (1992), ‘कहीं नहीं वहीं’ (1994), ‘इबारत से गिरी मात्राएँ’, ‘उम्मीद का दूसरा नाम’ (2004) और ‘विवक्षा’ (2006) जैसे संग्रह प्रकाशित हुए। उनकी कविता आत्मसंघर्ष, स्मृति, समय, नैतिक दुविधा और मनुष्य की आंतरिक अस्मिता के प्रश्नों से गहरे जुड़ी हुई है। भाषा में संयम, बिंबों में सादगी और विचार में गहनता उनके काव्य की पहचान है।

कविता के अतिरिक्त अशोक वाजपेयी ने साहित्य और कला आलोचना में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘फिलहाल’, ‘कुछ पूर्वग्रह’, ‘समय से बाहर’, ‘कविता का गल्प’ और ‘सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं’ जैसी कृतियाँ उनके आलोचनात्मक विवेक और सांस्कृतिक दृष्टि को प्रकट करती हैं। वे साहित्य को केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा कर्म मानते हैं।

प्रशासनिक और सांस्कृतिक जीवन में अशोक वाजपेयी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ललित कला अकादमी (भारत की राष्ट्रीय कला अकादमी) के अध्यक्ष रहे (2008–2011)। इस दौरान उन्होंने समकालीन कला, बहुलतावादी संस्कृति और संस्थागत स्वायत्तता को लेकर कई महत्वपूर्ण पहलें कीं।

उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया। वर्ष 1994 में ‘कहीं नहीं वहीं’ काव्य-संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। वे आधुनिक हिंदी साहित्य के उस वर्ग से जुड़े माने जाते हैं जिसे प्रायः दिल्ली-केंद्रित साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश कहा जाता है, जिसमें सीताकांत महापात्र, केकी दारूवाला, गोपीचंद नारंग, जे.पी. दास और के. सच्चिदानंदन जैसे नाम शामिल हैं।

कुल मिलाकर, अशोक वाजपेयी हिंदी साहित्य में एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने कविता को वैचारिक गरिमा, सांस्कृतिक विस्तार और नैतिक सजगता प्रदान की। उनका योगदान साहित्य और संस्कृति दोनों क्षेत्रों में लंबे समय तक प्रासंगिक बना रहेगा।

नई कविता आंदोलन और अशोक वाजपेयी : एक सजग हस्तक्षेप

नई कविता आंदोलन जब अपने आरंभिक आवेग से आगे बढ़कर आत्मालोचन की अवस्था में प्रवेश कर रहा था, तब अशोक वाजपेयी की कविता उसमें एक संयमित, विचारशील और विवेकपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। वे न तो अति-भावुकता के कवि हैं, न ही नारेबाज़ी के। उनकी कविता में अनुभव का ताप है, पर वह ताप शोर नहीं करता वह भीतर तक जलता है।

‘शहर अब भी संभावना है’ से लेकर ‘कहीं नहीं वहीं’ और ‘इस नक्षत्रहीन समय में’ तक उनकी कविता लगातार यह संकेत देती है कि आधुनिक मनुष्य का संकट केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। यह कविता अनुभव की नैतिकता पर बल देती है जहाँ संवेदना, भाषा और विचार एक-दूसरे को काटते नहीं, बल्कि साधते हैं।

रचना-शिल्प : सादगी का अनुशासन


संकलन (Anthology)

प्रतिनिधि कविताएँ: अशोक वाजपेई – राजकमल प्रकाशन
दिन फिरने वाले हैं – अशोक वाजपेई

अनुवाद कार्य (Translation)

एक अनुवादक के रूप में, उन्होंने रेनाटा चेकाल्स्का के साथ मिलकर चार प्रमुख पोलिश कवियों की रचनाओं का पोलिश भाषा से हिंदी में अनुवाद किया:
चेस्लाव मिलोज़ (Czesław Miłosz)
विस्लावा शिम्बोर्स्का (W. Szymborska)
ज़बिग्निएव हर्बर्ट (Z. Herbert)
तादेउश रोज़ेविच (T. Rozewicz)

अशोक वाजपेयी के काव्य-शिल्प की सबसे बड़ी विशेषता उसकी साधी हुई सादगी है। यह सादगी अलंकरण-विहीन नहीं, बल्कि अनावश्यक आडंबर से मुक्त है। उनकी कविता में शब्द चयन अत्यंत सावधान है कोई भी शब्द अनायास नहीं आता।

उनके यहाँ बिंब आक्रामक नहीं, बल्कि संकेतात्मक होते हैं घास, आकाश, दरवाज़ा, शहर, समय, स्मृति ये सब उनकी कविता में साधारण प्रतीत होते हुए भी गहरे अर्थ-वृत्त रचते हैं। यह बिंबात्मकता पाठक से धैर्य मांगती है; तात्कालिक चमत्कार नहीं देती, बल्कि धीरे-धीरे अपने अर्थ खोलती है।

यहीं उनकी कविता आज के ‘त्वरित उपभोग’ वाले साहित्यिक माहौल में एक प्रकार की प्रतिरोधी चुप्पी रचती है।

साहित्यिक शुचिता : भाषा और विचार का संतुलन

‘मीमांसा’ की वैचारिकी के संदर्भ में यदि अशोक वाजपेयी को देखा जाए, तो उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान साहित्यिक शुचिता की सतत रक्षा है। यह शुचिता नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि भाषा और विचार के संतुलन से उपजती है।

वे न तो भाषा को वैचारिक हिंसा का उपकरण बनाते हैं, न ही विचार को भाषा के सौंदर्य में डुबोकर निष्प्रभावी करते हैं। उनकी कविता में असहमति है, प्रश्न हैं, बेचैनी है पर अशिष्टता नहीं। यह गुण उन्हें कई समकालीन उग्र प्रगतिशील काव्य-स्वरों से अलग करता है।

समावेशी भाव और सांस्कृतिक बहुलता

अशोक वाजपेयी की कविता किसी एक विचारधारा के कठोर खांचे में बंद नहीं होती। वे समावेशी हैं सांस्कृतिक, भाषिक और वैचारिक स्तर पर। उनकी कविता में भारतीय परंपरा, यूरोपीय आधुनिकता और व्यक्तिगत अनुभव एक साथ उपस्थित रहते हैं।

उनका यह समावेशी दृष्टिकोण केवल कविता तक सीमित नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक कर्म भारत भवन की स्थापना, कला-संवाद की संस्थाएँ, अनुवाद और आलोचना में भी स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने कविता को एकाकी कक्ष से निकालकर संवाद के मंच पर रखा।

प्रगतिशीलता : नारा नहीं, विवेक

अशोक वाजपेयी की प्रगतिशीलता का स्वरूप विशेष ध्यान मांगता है। वे उस प्रगतिशीलता के पक्षधर नहीं हैं, जो कविता को केवल राजनीतिक वक्तव्य में बदल दे। उनकी प्रगतिशीलता विवेकजन्य है—जहाँ मनुष्य, समय और सत्ता के संबंधों की जटिलता को सरल सूत्रों में नहीं बांधा जाता।

इसी कारण उनकी कविता कई बार आलोचकों को ‘अपर्याप्त रूप से क्रांतिकारी’ लगती है। परंतु ‘मीमांसा’ की दृष्टि में यही उनकी शक्ति भी है और सीमा भी।

उत्तर-समकालीनता में प्रासंगिकता

उत्तर-समकालीन दौर में, जहाँ कविता या तो आत्मकेंद्रित हो गई है या अतिरंजित राजनीतिक घोषणाओं में बदल गई है, अशोक वाजपेयी की कविता संयम और संतुलन का पाठ पढ़ाती है। उनकी रचनाएँ यह याद दिलाती हैं कि कविता का काम केवल प्रतिवाद करना नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव को सहेजना भी है।

हालाँकि यह भी सत्य है कि आज के युवा कवि को उनकी कविता कभी-कभी अत्यधिक ‘बौद्धिक’ या ‘संस्थागत’ लग सकती है। यह दूरी उनके पाठक-वर्ग को सीमित करती है; यह एक ऐसी सीमा है, जिसे स्वीकार करना चाहिए।

सीमाएँ : एक ज़रूरी विमर्श

मीमांसा के लिए पुनर्मूल्यांकन का अर्थ केवल प्रशंसा नहीं है। अशोक वाजपेयी की कुछ सीमाएँ स्पष्ट रूप से रेखांकित की जानी चाहिए : 

1. अभिजात बोध : उनकी कविता कई बार सामान्य पाठक से अधिक प्रशिक्षित पाठक की अपेक्षा करती है।

2. संस्थागत निकटता : साहित्य और सत्ता-संरचना के साथ उनकी सक्रियता ने कभी-कभी उनके काव्य-स्वर पर प्रश्नचिह्न भी लगाए हैं।

3. भावनात्मक दूरी : उनकी कविता में करुणा है, पर वह आँसू नहीं बहाती यह गुण कुछ पाठकों को भावशून्य भी लग सकता है।

ये सीमाएँ उनकी उपलब्धियों को कम नहीं करतीं, बल्कि उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को और जटिल बनाती हैं।

निष्कर्ष : विवेक का कवि

अशोक वाजपेयी को किसी एक खांचे में बाँधना न संभव है, न उचित। वे नई कविता आंदोलन के उत्तराधिकारी हैं, पर उसके अनुयायी मात्र नहीं। वे प्रगतिशील हैं, पर नारेबाज़ नहीं। वे आधुनिक हैं, पर परंपरा-विरोधी नहीं।

‘मीमांसा’ की वैचारिकी में अशोक वाजपेयी एक ऐसे कवि के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं, जो समय के शोर में भी विवेक की आवाज़ को बचाए रखने का प्रयास करता है। उनकी जयंती पर यह पुनर्पाठ इसलिए आवश्यक है कि हम कविता को केवल पक्ष या विपक्ष का औज़ार न बनाएं, बल्कि उसे मनुष्य की जटिल, अपूर्ण और संघर्षशील चेतना का साक्ष्य मानें।

यही अशोक वाजपेयी की प्रासंगिकता है आज भी, और संभवतः आने वाले समय में भी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

वेब पत्रिका ‘मीमांसा’ में प्रकाशित यह जयंती विशेषांक संपादकीय आलेख अशोक वाजपेयी के रचना-कर्म, साहित्यिक योगदान और वैचारिक उपस्थिति के आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें व्यक्त विचार, विश्लेषण और निष्कर्ष मीमांसा की संपादकीय वैचारिकी तथा लेखक की स्वतंत्र साहित्यिक दृष्टि पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, वैचारिक समूह या राजनीतिक विचारधारा का समर्थन या विरोध करना नहीं है।

यह आलेख श्रद्धांजलि, समीक्षा और विमर्श तीनों के संतुलन को साधते हुए लिखा गया है। इसमें उल्लिखित तथ्य, कृतियाँ एवं संदर्भ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित हैं; तथापि किसी अनजाने तथ्यात्मक त्रुटि या व्याख्यात्मक मतभेद के लिए ‘मीमांसा’ या लेखक किसी प्रकार की विधिक या वैचारिक उत्तरदायित्व नहीं लेता। पाठकों से अपेक्षा है कि वे इसे साहित्यिक आलोचना और वैचारिक संवाद के रूप में ग्रहण करें, न कि किसी अंतिम निष्कर्ष या व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के रूप में।

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— संपादकीय विभाग
वेब पत्रिका ‘मीमांसा’


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