कबीर और तिरुवल्लुवर की नैतिक शिक्षाओं का तुलनात्मक विश्लेषण। स्वदेश स्वर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। अभिषेक यादव।


भारतीय मनीषा की थाती केवल वेदों और उपनिषदों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन जन-कवियों की वाणी में भी सुरक्षित है जिन्होंने धर्म को मंदिर-मस्जिद से निकालकर मनुष्य की देह और उसके आचरण में प्रतिष्ठित किया। 'मीमांसा' के इस अंक में हम एक अनूठा तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं तमिल गौरव 'थिरुवल्लुवर' और लोक-चेतना के स्वर 'कबीर' के बीच।
हजारों किलोमीटर की दूरी और सदियों के अंतराल के बावजूद, इन दोनों मनीषियों के स्वर में एक अद्भुत साम्य है। जहाँ थिरुवल्लुवर का 'थिरुक्कुरल' जीवन का व्याकरण है, वहीं कबीर की 'साखियाँ' पाखंड पर किया गया सीधा प्रहार। यह लेख हमें बताता है कि 'सत्य', 'करुणा' और 'मानवता' की कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं होती। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधार्थी अभिषेक यादव के माध्यम से प्राप्त यह आलेख हमारी साझी सांस्कृतिक विरासत के उस धरातल को छूता है, जहाँ नैतिकता ही एकमात्र धर्म है।

सार्वभौमिक मानवतावाद और व्यवहारिक नैतिकता का महासंवाद

भारतीय सभ्यता की नैतिक -दार्शनिक परंपरा में दो ऐसे शिखर व्यक्तित्व मिलते हैं जो भौगोलिक दूरी, भाषायी भिन्नता और ऐतिहासिक अंतर के बावजूद एक ही मानवीय सत्य की उद्घोषणा करते हैं। तमिल देश के महाकवि थिरुवल्लुवर और उत्तर भारत के निर्भीक संत कबीर। थिरुवल्लुवर की थिरुक्कुरल और कबीर की साखियाँ दोहे भारतीय मनीषा के उस साझा स्रोत की ओर संकेत करते हैं जहाँ धर्म का अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्यता है। दोनों विचारक किसी नए संप्रदाय की स्थापना के आकांक्षी नहीं थे; उनका लक्ष्य था मनुष्य को नैतिक, करुणाशील और विवेकपूर्ण बनाना।

थिरुक्कुरल लगभग 1330 संक्षिप्त कुरालों का एक सुव्यवस्थित ग्रंथ है, जो अरम (धर्म/नैतिकता), पोरुल (अर्थ/राजनीति) और इन्बम (काम/सौंदर्य) के त्रिवर्ग पर आधारित है। दूसरी ओर, कबीर की वाणी लोकभाषा में व्यक्त एक क्रांतिकारी नैतिक चेतना है, जो भक्ति आंदोलन के भीतर रहते हुए भी कर्मकांड, जाति और धार्मिक पाखंड पर तीखा प्रहार करती है। दोनों के लिए ईश्वर से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य का आचरण है यही उन्हें सार्वभौमिक मानवतावाद के धरातल पर प्रतिष्ठित करता है।

संरचना और शैली: संक्षिप्तता में गहनता

थिरुवल्लुवर और कबीर दोनों ने संक्षिप्त छंदों को माध्यम बनाया। कुराल केवल डेढ़–दो पंक्तियों में जीवन का सूत्र दे देता है, जबकि कबीर का दोहा या साखी दो पंक्तियों में सीधा, तीखा और लोकग्राह्य संदेश देता है। यह संक्षिप्तता केवल साहित्यिक प्रयोग नहीं, बल्कि ज्ञान को जन–जन तक पहुँचाने की रणनीति थी। मौखिक परंपरा में स्मरणीय रहने वाले ये छंद अनपढ़ समाज के लिए भी नैतिक शिक्षा का साधन बने।

जहाँ थिरुवल्लुवर की शैली वैज्ञानिक सटीकता और मनोवैज्ञानिक संतुलन लिए हुए है, वहीं कबीर की वाणी भावनात्मक तीव्रता और प्रतिरोध की आग से भरी है। फिर भी दोनों का लक्ष्य एक ही है; मनुष्य को आत्मावलोकन के लिए बाध्य करना।

सत्य और आंतरिक शुचिता

सत्य दोनों के नैतिक दर्शन की आधारशिला है। थिरुवल्लुवर के लिए सत्य वह है जो किसी को हानि न पहुँचाए। थिरुक्कुरल में सत्य को करुणा से जोड़ा गया है यदि कोई कथन असत्य होते हुए भी पूर्णतः कल्याणकारी हो, तो वह नैतिक रूप से स्वीकार्य है। इससे स्पष्ट होता है कि थिरुवल्लुवर की नैतिकता कठोर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से संचालित है।

कबीर के यहाँ सत्य (साँच) ईश्वर का पर्याय है "साँच बराबर तप नहीं"। उनके लिए बाहरी तपस्या, व्रत या कर्मकांड का कोई मूल्य नहीं, यदि हृदय में सत्य का वास न हो। दोनों ही बाहरी शुचिता की तुलना में आंतरिक पवित्रता को श्रेष्ठ मानते हैं। नदी में स्नान कर लेने मात्र से मुक्ति संभव नहीं यह बात दोनों अपने–अपने ढंग से स्पष्ट करते हैं।

समानता और जाति–विरोध

मानवीय समानता का सिद्धांत दोनों की शिक्षाओं का केंद्रीय तत्व है। थिरुवल्लुवर कहते हैं कि सभी प्राणी जन्म से समान हैं; भेद केवल कर्म और गुण से उत्पन्न होता है। उनकी नैतिकता वर्णाश्रम या जन्म आधारित श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करती।

कबीर इस प्रश्न पर और भी मुखर हैं। वे जाति–प्रथा को मानवीय पाखंड बताते हैं "जाति न पूछो साधु की"। उनका तर्क सीधा और तार्किक है: यदि जाति ईश्वरनिर्धारित होती, तो जन्म के समय उसका कोई चिह्न क्यों नहीं होता? कबीर का मानवतावाद इस आध्यात्मिक विश्वास पर आधारित है कि परमात्मा हर मनुष्य में विद्यमान है; अतः किसी को नीच कहना ईश्वर का अपमान है।

अहिंसा और करुणा

अहिंसा दोनों के नैतिक चिंतन का अभिन्न अंग है। थिरुवल्लुवर अहिंसा को केवल प्राण हत्या के निषेध तक सीमित नहीं रखते, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को पीड़ा न पहुँचाने की संकल्पना देते हैं। मांसाहार का त्याग उनके लिए करुणा की कसौटी है।

कबीर भी धार्मिक हिंसा और पशु बलि के तीखे आलोचक हैं। वे प्रश्न करते हैं कि जो ईश्वर ने सृष्टि रची, वह अपने ही जीवों की हत्या से कैसे प्रसन्न हो सकता है? दोनों करुणा को केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि समस्त जीव–जगत तक विस्तारित करते हैं।

पाखंड का प्रतिवाद

थिरुवल्लुवर और कबीर दोनों धार्मिक पाखंड के घोर विरोधी हैं। बाहरी वेश, तिलक, माला या गेरुआ वस्त्र यदि आंतरिक संयम से रहित हों, तो वे केवल छल हैं। थिरुवल्लुवर ऐसे तपस्वी की तुलना बाघ की खाल ओढ़ी गाय से करते हैं; कबीर कहते हैं कि शेर का चोला पहन लेने से बकरी शेर नहीं बन जाती।

मूर्ति पूजा, तीर्थ स्नान और कर्मकांडों की निरर्थकता पर कबीर जितने तीखे हैं, थिरुवल्लुवर उतने ही संतुलित विश्लेषक। दोनों का निष्कर्ष एक है आचरण के बिना धर्म खोखला है।

मधुर वाणी और विनम्रता

दैनिक जीवन की नैतिकता पर दोनों विशेष बल देते हैं। थिरुवल्लुवर के अनुसार मधुर वाणी किसी भी दान से श्रेष्ठ है। कबीर का प्रसिद्ध दोहा "ऐसी बानी बोलिए" वाणी को अहंकार विसर्जन का साधन बनाता है।

विनम्रता दोनों के लिए बड़प्पन की शर्त है। अहंकार जहाँ है, वहाँ ईश्वर का अनुभव असंभव है यह बात कबीर और थिरुवल्लुवर दोनों स्वीकार करते हैं।

कर्म, समय और पुरुषार्थ

दोनों विचारक भाग्यवाद के विरोधी हैं। थिरुवल्लुवर समय की पहचान और निरंतर कर्म को सफलता की कुंजी मानते हैं। कबीर का "काल करे सो आज कर" जीवन की क्षणभंगुरता और कर्म तत्परता का अमर सूत्र है। धैर्य और निरंतरता धीरे-धीरे फल देने वाला परिश्रम दोनों की साझा सीख है।

गृहस्थ जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्व

थिरुवल्लुवर गृहस्थ जीवन को नैतिक साधना का सर्वोच्च क्षेत्र मानते हैं। उनके अनुसार समाज की सेवा करने वाला गृहस्थ सन्यासी से भी श्रेष्ठ है। कबीर स्वयं गृहस्थ थे जुलाहे का कार्य करते हुए उन्होंने आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। दोनों पलायनवाद के विरोधी और श्रम सम्मान के पक्षधर हैं।

कृतज्ञता और सेवा दोनों की नैतिकता में केंद्रीय हैं उपकार को न भूलना और अपकार को भुला देना, यही सामाजिक सौहार्द का आधार है।

आत्म-निरीक्षण और चरित्र सुधार

कबीर का आत्म–बोध "मुझसे बुरा न कोय" और थिरुवल्लुवर का आत्म–समीक्षा पर बल, दोनों यह सिखाते हैं कि सामाजिक सुधार की शुरुआत स्वयं से होती है। ईर्ष्या, क्रोध और निंदा जैसे दोषों पर नियंत्रण के बिना नैतिक जीवन संभव नहीं।

राजनीति और अर्थनीति

थिरुवल्लुवर ने राजनीति और अर्थशास्त्र पर भी व्यावहारिक दृष्टि दी। उनका राजा न्यायप्रिय, परामर्शशील और प्रजा कल्याण को सर्वोच्च मानने वाला है। कबीर की राजनीति सामाजिक न्याय की राजनीति है जहाँ कोई भूखा न रहे और सत्ता अहंकार का साधन न बने।

धन के विषय में दोनों संतुलित हैं धन अर्जन निषिद्ध नहीं, यदि वह धर्मपूर्वक हो और समाज कल्याण में लगे।

निष्कर्ष: आज के युग में प्रासंगिकता

थिरुक्कुरल और कबीर का महासंवाद भारतीय चिंतन की उस एकता को प्रकट करता है, जो उत्तर–दक्षिण, भाषा–धर्म और काल की सीमाओं से परे है। उनकी शिक्षाएँ आज के विखंडित समाज में और भी प्रासंगिक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि नैतिकता पंथ नहीं, आचरण है; धर्म कर्मकांड नहीं, करुणा है; और अध्यात्म पलायन नहीं, जिम्मेदारी है।

इन दोनों महापुरुषों की वाणी आज भी हमें नफरत के स्थान पर प्रेम, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और पाखंड के स्थान पर सत्य चुनने की प्रेरणा देती है। यही उनका स्थायी योगदान है एक अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और सहिष्णु समाज की कल्पना।

लेखक परिचय 
अभिषेक यादव पूर्व छात्र, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी भारतीय सभ्यता के नैतिक मूल्यों और सामाजिक दर्शन में उनकी गहरी अभिरुचि है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

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