बांग्ला साहित्य के कालजयी कथाशिल्पी, मनुष्यता के मसीहा बाबू शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय। पुण्यतिथि विशेषांक। स्वदेश-स्वर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।
आज 16 जनवरी है। साहित्य के आकाश में एक ऐसे नक्षत्र की पुण्यतिथि, जिसकी लेखनी ने स्याही से नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय के रक्त और आंसुओं से शब्द रचे। बांग्ला माटी की सुगंध को वैश्विक चेतना बनाने वाले महान उपन्यासकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय को आज पूरा राष्ट्र नमन कर रहा है। 'स्वदेश-स्वर' स्तंभ के माध्यम से हमारा यह विनम्र प्रयास है कि हम केवल हिंदी तक सीमित न रहकर, भारतीय संविधान की उन 22 भाषाओं के मोतियों को भी पिरोएं, जिन्होंने भारतीय अस्मिता को गढ़ा है। शरत बाबू उस भाषाई सेतु के सबसे मजबूत स्तंभ हैं।
शब्दों का 'आवारा मसीहा': अभावों से प्रभाव तक का सफर
शरतचन्द्र का जीवन स्वयं में एक महाकाव्य है। हुगली के देवानन्दपुर की गलियों से शुरू हुआ यह सफर, गरीबी की तपिश में कुंदन बनकर निखरा। पिता मतिलाल की 'बेफिक्री' ने परिवार को भले ही आर्थिक विपन्नता दी, लेकिन शरत को वह 'यायावरी' और 'अनुभवों का संसार' दिया, जिसे कोई विश्वविद्यालय नहीं सिखा सकता।
उनका बचपन भागलपुर की ननिहाल में बीता। यही वह समय था जब उनके भीतर के 'देवदास' और 'श्रीकान्त' जन्म ले रहे थे। अभावों ने उन्हें तोड़ना चाहा, पर शरत ने उन अभावों को ही अपनी शक्ति बना लिया। उनकी किशोरावस्था की शरारतें और यौवन की भटकन चाहे वह सन्यासी का भेष धरकर घर छोड़ना हो या बर्मा (रंगून) के ऑफिस में क्लर्क की नौकरी हर अनुभव ने उनके कथा-संसार को समृद्ध किया।
नारी चेतना के प्रखर चितेरे: परंपरा बनाम विद्रोह
शरतचन्द्र को यदि 'नारी हृदय का चितेरा' कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बंकिम बाबू के पास 'आनंदमठ' का ओज था, रवींद्रनाथ के पास 'गीतांजलि' का दर्शन था, लेकिन शरत बाबू के पास वह जादुई स्पर्श था जो समाज की तिरस्कृत, लांछित और पीड़ित नारी के अंतर्मन की गहराइयों तक उतर जाता था।
सावित्री (चरित्रहीन): समाज जिसे 'कुलटा' कहता है, शरत ने उसके भीतर की पवित्रता को खोजा।
पार्वती (देवदास): एक ऐसा प्रेम जो समर्पण और विरह की पराकाष्ठा है।
राजलक्ष्मी (श्रीकान्त): जो वेश्यावृत्ति के कीचड़ में रहकर भी अपनी आत्मा को श्वेत कमल की तरह पवित्र बनाए रखती है।
शरत की नायिकाएं पुरुषों से अधिक बलिष्ठ, साहसी और तार्किक हैं। उन्होंने दिखाया कि सुंदरता केवल मुखमंडल में नहीं, बल्कि उन संघर्षों में है जो एक स्त्री पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों को तोड़ने के लिए करती है।
शरत का कथा-शिल्प: कुरुपता में सुंदरता की खोज
अक्सर कहा जाता है कि साहित्य केवल आदर्शों की बात करे, लेकिन शरत ने 'यथार्थ' के नग्न सत्य को स्वीकार किया। उन्होंने 'चरित्रहीन' लिखकर तत्कालीन समाज में भूचाल ला दिया था। लोग जिसे अनैतिक मानकर आंखें मूंद लेते थे, शरत ने उसे अपनी लेखनी का विषय बनाया। उन्होंने समाज के वंचितों, विधवाओं और दलितों के आर्तनाद को स्वर दिया।
उनकी रचनाओं में बंगाल का गांव बोलता है। वह गांव, जो केवल हरियाली का पर्याय नहीं, बल्कि अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और गरीबी का अखाड़ा भी था। 'पल्लीसमाज' और 'पंडित मोशाय' जैसी रचनाएं ग्रामीण भारत की नब्ज को उतनी ही सजीवता से पकड़ती हैं, जितनी प्रेमचंद की 'गोदान'।
राष्ट्रीय चेतना और 'पथेर दावी': क्रांति का शब्द-घोष
शरत केवल विरह और प्रेम के लेखक नहीं थे। उनके भीतर एक धधकता हुआ राष्ट्रवादी भी था। उनका उपन्यास 'पथेर दावी' (पथ के दावेदार) इसका प्रमाण है। क्रांतिकारियों के जीवन पर आधारित इस उपन्यास ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। परिणामस्वरूप, इसे तत्कालीन सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया।
वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से भी जुड़े और कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे। साहित्य और समाज का जो सामंजस्य उनके यहाँ दिखता है, वह विरल है। वे जानते थे कि जब तक समाज कुरीतियों से मुक्त नहीं होगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता बेमानी होगी।
भारतीय सिनेमा और शरत: अमर होती कहानियाँ
शरत बाबू की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी उनकी कहानियाँ निर्देशकों को मंत्रमुग्ध करती हैं। 'देवदास' को आधार बनाकर हिंदी सिनेमा ने बार-बार अपनी सृजनशीलता को परखा है। चाहे वह सहगल साहब की सादगी हो, दिलीप कुमार का दर्द हो या शाहरुख खान की भव्यता 'देवदास' हर पीढ़ी का अपना हो गया।
'परिणीता', 'बड़ी दीदी', 'मँझली बहन', 'खुशबू' (पंडित मोशाय पर आधारित) और 'स्वामी' जैसी फिल्मों ने यह सिद्ध किया कि शरत की कहानियों की जड़ें कितनी गहरी हैं। उनकी रचनाओं में जो 'नाटकीयता' और 'भावनात्मक उभार' है, वह स्वाभाविक रूप से सिने-पटल पर जीवंत हो उठता है।
हिंदी भाषियों के लिए शरत का संदेश
'मीमांसा' का यह विशेषांक 'स्वदेश-स्वर' के तहत यह संदेश देना चाहता है कि साहित्य की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। शरत बाबू ने बांग्ला में लिखा, लेकिन वे हर उस भारतीय के हैं जो प्रेम, त्याग और संघर्ष को समझता है। विष्णु प्रभाकर जी ने उनकी जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखकर उन्हें हिंदी जगत के लिए भी 'अमर' बना दिया।
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी 'अनीला देवी' (उनका छद्म नाम), उनके 'श्रीकान्त' और उनकी 'किरणमयी' हमारे आसपास की दुनिया में आज भी संघर्षरत हैं।
उपसंहार:
शरत बाबू ने लिखा था, "मनुष्य के दुःख की गहराई को नापना ही साहित्यकार का वास्तविक धर्म है।" आज उनकी पुण्यतिथि पर हम स्वयं से यह प्रश्न करें कि क्या हम अपने समय के वंचितों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं?
साहित्य के इस महाशिल्पी को, जिन्होंने शब्दों से मनुष्यता का मंदिर गढ़ा, 'मीमांसा' परिवार और समस्त हिंदी जगत की ओर से अश्रुपूर्ण और श्रद्धापूर्ण नमन।
स्वदेश-स्वर स्तंभ
पुण्यतिथि विशेषांक/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
© संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
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