नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना और हिंदी भाषा साहित्य के प्रचार प्रसार में सभा का योग

प्रस्तुत आलेख 'नागरी प्रचारिणी सभा' के गौरवशाली अतीत और चुनौतीपूर्ण वर्तमान पर एक गहन विश्लेषण  प्रस्तुत करता है। सन् 1893 ई॰  में काशी की पावन धरा पर तीन संकल्पित किशोरों ने हिंदी की उर्वरा भूमि में एक ऐसा बीज बोया, जिसने कालांतर में हिंदी को 'शब्दसागर' जैसा महाकोश और 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' जैसा बौद्धिक मंच प्रदान किया। जहाँ एक ओर यह आलेख सभा के ऐतिहासिक अवदानों को नमन करता है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान दौर में हावी होते बाजारवाद और विद्यार्थियों की पहुँच से दूर होती भाषाई विरासत पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। 'मीमांसा' का यह प्रयास ऐतिहासिक कृतज्ञता और भविष्य की चिंताओं के बीच एक सेतु है।

(श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र व शिव कुमार सिंह)

प्रस्तावना: जागरण का शंखनाद

इतिहास के पन्नों में कुछ तिथियाँ मात्र समय का अंकन नहीं होतीं, बल्कि वे एक नए युग के सूत्रपात की साक्षी होती हैं। 16 जुलाई, 1893 काशी की वह पावन भूमि और क्वींस कॉलेज की वह शांत छटा, जहाँ तीन किशोरों बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह ने एक संकल्प लिया था। यह संकल्प केवल एक संस्था की स्थापना का नहीं था, बल्कि यह पराधीन भारत में अपनी अस्मिता, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा 'हिंदी' को उसका खोया हुआ गौरव लौटाने का एक 'शब्द यज्ञ' था। आज 'मीमांसा' के इस विशेष स्तंभ में हम उसी महान संस्था 'नागरी प्रचारिणी सभा' के अवदान का स्मरण कर रहे हैं।

अंधकार में प्रकाश की किरण :

उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारतीय मानस के लिए भारी उथल-पुथल का समय था। एक ओर अंग्रेजी सत्ता का दबदबा था, तो दूसरी ओर अदालतों और दफ्तरों में उर्दू का वर्चस्व। हिंदी, जिसे 'गंवारू' कहकर उपेक्षित किया जाता था, अपने ही घर में बेगानी थी। ऐसे संक्रमण काल में नागरी प्रचारिणी सभा का जन्म एक सांस्कृतिक क्रांति की तरह हुआ। सभा का उद्देश्य स्पष्ट था देवनागरी लिपि का परिष्करण और हिंदी साहित्य का संरक्षण एवं संवर्धन। संस्था के प्रथम अध्यक्ष होने का गौरव भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुज बाबू राधाकृष्ण दास को प्राप्त हुआ। पिछले 131 वर्षों से यह सभा हिंदी साहित्य के मानकीकरण, नियमन और संवर्धन में एक धुरी की भूमिका निभा रही है।

(आर्य भाषा पुस्तकालय)

हिंदी शब्दसागर: भाषा को मिला अपना शब्द-कोश

किसी भी भाषा की शक्ति उसके शब्द सामर्थ्य में निहित होती है। सभा के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक था 'हिंदी शब्दसागर' का निर्माण। बाबू श्यामसुंदर दास के संपादन में तैयार यह महाकोश हिंदी भाषा के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसने हिंदी को वह गरिमा प्रदान की, जिससे वह विश्व की अन्य समृद्ध भाषाओं के समकक्ष खड़ी हो सकी। इसके साथ ही 'हिंदी व्याकरण' (पंडित कामता प्रसाद गुरु द्वारा रचित) के माध्यम से भाषा को एक मानक स्वरूप मिला, जिससे क्षेत्रीय भेदों के बावजूद हिंदी की एक सर्वमान्य धारा प्रवाहित हुई।

हस्तलिखित ग्रंथों की खोज: विलुप्त वैभव का पुनरुद्धार

नागरी प्रचारिणी सभा ने केवल भविष्य की नींव नहीं रखी, बल्कि अतीत के बिखरे हुए मोतियों को भी समेटा। सभा ने पूरे भारत में घूम-घूमकर हिंदी के प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों की खोज की। यदि सभा ने यह बीड़ा न उठाया होता, तो जायसी, कबीर, तुलसी और सूर के कई अनमोल पद समय की धूल में खो गए होते। डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल और अन्य विद्वानों के सहयोग से सभा ने इन ग्रंथों का संपादन और प्रकाशन कर हिंदी साहित्य की विरासत को सुरक्षित किया।

नागरी प्रचारिणी पत्रिका : विमर्श का नया मंच

साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में सभा द्वारा 1896 में प्रारंभ की गई 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' ने शोध और गंभीर आलोचना के नए मानक स्थापित किए। इसने हिंदी लेखकों को एक ऐसा मंच प्रदान किया जहाँ वे अपनी मौलिक सोच, ऐतिहासिक शोध और भाषाई विमर्श को प्रस्तुत कर सकें। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे महारथी इसी परिवेश में तपकर कुंदन बने, जिन्होंने बाद में 'हिंदी साहित्य का इतिहास' लिखकर हिंदी आलोचना को नई दृष्टि दी।

हिंदी और देवनागरी का राजनैतिक संघर्ष

सभा का योगदान केवल पुस्तकालयों और गोष्ठियों तक सीमित नहीं था। यह एक जुझारू संस्था थी। उस समय अदालतों में नागरी लिपि को स्थान दिलाने के लिए सभा ने लंबा संघर्ष किया। पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में सभा के शिष्टमंडल ने तत्कालीन सरकार पर दबाव बनाया, जिसके फलस्वरूप 1900 ई. में उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) की अदालतों में नागरी लिपि को प्रवेश मिला। यह हिंदी की पहली बड़ी जीत थी, जिसने भाषाई आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया।

शिक्षा और जन-जागरण

सभा ने हिंदी को केवल साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने का भी प्रयास किया। वैज्ञानिक शब्दावली का निर्माण हो या भूगोल, गणित और इतिहास की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद, सभा ने हर मोर्चे पर काम किया। 'आर्यभाषा पुस्तकालय' के रूप में सभा ने हिंदी का सबसे बड़ा संग्रह स्थापित किया, जो आज भी शोधार्थियों के लिए तीर्थ स्थल के समान है।शुरुआत में इसे 'नागरी भंडार' कहा जाता था, लेकिन संवत् 1953 में श्री गदाधर सिंह के निजी संग्रह के विलय के बाद इसका नाम 'आर्यभाषा पुस्तकालय' पड़ा।

भावप्रवण रूप : आज की प्रासंगिकता

आज जब हम 21वीं सदी के डिजिटल युग में जी रहे हैं, तो प्रश्न उठता है कि नागरी प्रचारिणी सभा का वह 'शब्द यज्ञ' हमारे लिए क्या मायने रखता है? आज हिंदी वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है, लेकिन इसकी जड़ें उसी मिट्टी में हैं जिसे सभा के मनीषियों ने अपने पसीने से सींचा था।
नागरी प्रचारिणी सभा केवल एक भवन नहीं, वह एक चेतना है। वह प्रतीक है इस बात का कि जब मुट्ठी भर लोग भी सत्य और निष्ठा के साथ अपनी भाषा के लिए खड़े होते हैं, तो इतिहास की धारा बदल जाती है। 

'मीमांसा' का यह संपादकीय उन सभी ऋषियों को नमन करता है जिन्होंने 'नागरी' के मंदिर में अपनी साधना की आहुति दी। हमारा कर्तव्य है कि हम उस शब्द-मशाल को बुझने न दें और हिंदी को केवल संवाद की नहीं, बल्कि संस्कार और शोध की भाषा के रूप में निरंतर पल्लवित करें।

"शब्द मरते नहीं, वे केवल रूप बदलते हैं। नागरी प्रचारिणी सभा ने उन शब्दों को अमरत्व दिया है।

पुस्तकालय की सुलभता, समावेशी विमर्श और सामान्य विद्यार्थी के हितार्थ एक विनम्र आग्रह।

(व्योमेश शुक्ल - प्रधानमंत्री नागरी प्रचारिणी सभा)

काशी की गलियों से उठकर हिंदी को वैश्विक मंच दिलाने वाली 'नागरी प्रचारिणी सभा' मात्र एक संस्था नहीं, बल्कि हिंदी प्रेमियों के लिए एक जीवित तीर्थ है। वर्तमान नेतृत्व में, विशेषकर प्रधानमंत्री श्री व्योमेश शुक्ल के कार्यकाल में, सभा ने अपनी खोई हुई आभा को पुनः प्राप्त किया है। इतिहास की धूल फांकती पांडुलिपियों का जीर्णोद्धार और सभा के स्वरूप को 'हाई-फाई' और आधुनिक बनाना निश्चित रूप से एक सराहनीय 'उत्कर्ष' है। किंतु, इस चमक-धमक के बीच 'मीमांसा' एक बुनियादी प्रश्न खड़ा करना चाहती है यह उत्कर्ष किसके लिए है?

बाजारवाद बनाम बुनियादी सरोकार

आज सभा द्वारा प्रकाशित लग्जरी संस्करण और इंडिया टुडे व थॉमसन जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों की तर्ज पर तैयार की गई पुस्तकें निःसंदेह कलात्मक सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं। प्रबुद्ध वर्ग और संपन्न शोधार्थियों के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है, परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी का औसत छात्र आज भी उसी आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है जहाँ ज्ञानार्जन एक संघर्ष है। जब हिंदी की अपनी 'मातृ-संस्था' के दरवाजे चंद नोटों की चमक और भारी-भरकम 'एक्सेस शुल्क' के कारण किसी निर्धन मेधावी छात्र के लिए बंद होने लगते हैं, तो वह स्थिति 'मोहभंग' की शुरुआत होती है।

विरासत पर सबका अधिकार

नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना का मूल मंत्र ही 'प्रसार' था, 'परिवेश' (Restriction) नहीं। यदि सभा की बहुमूल्य विरासत, दुर्लभ ग्रंथ और शोध सामग्री केवल विलासिता के आवरण में लिपटकर संग्रहालय की वस्तु बन जाएगी, तो नया और स्वतंत्र समावेशी चिंतन कैसे पनपेगा?
पुस्तकालय की सुलभता: महँगी फीस और कठिन प्रक्रियाएँ विद्यार्थियों के मनोबल को तोड़ती हैं। पुस्तकालय को 'राजमहल' बनाने के बजाय उसे 'पाठशाला' बनाए रखना अधिक श्रेयस्कर है।
शुचितापूर्ण विमर्श: जब तक नया छात्र पुरानी विरासतों को सहजता से नहीं छुएगा, तब तक हिंदी साहित्य में मौलिक और स्वतंत्र विमर्श की धारा अवरुद्ध रहेगी।
'मीमांसा' का विनम्र आग्रह
हम मानते हैं कि संस्था के रख-रखाव के लिए संसाधन आवश्यक हैं, किंतु हिंदी की 'मातृ-विरासत' का सानिध्य चंद नोटों की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। 'मीमांसा' पत्रिका सभा के अधिकारियों से यह भावपूर्ण अपील करती है‌ जो निम्नलिखित है : 

छात्र-केंद्रित शुल्क नीति: पुस्तकालय और शोध केंद्रों के शुल्क को न्यूनतम रखा जाए ताकि एक साधारण छात्र भी ज्ञान के इस महासागर में डुबकी लगा सके।

सस्ते विद्यार्थी संस्करण: विलासितापूर्ण संस्करणों के साथ-साथ 'पेपरबैक' या कम कीमत वाले छात्र संस्करण भी निकाले जाएँ।

खुले द्वार की संस्कृति: सभा के द्वार उन नए विचारों और युवा शोधार्थियों के लिए सदैव खुले रहें, जिनके पास प्रतिभा तो है पर जेब में भारी भरकम शुल्क देने का सामर्थ्य नहीं।

आदरणीय व्योमेश जी, आपने सभा को शिखर पर पहुँचाया है, अब इसे 'लोक' तक पहुँचाने की कृपा करें। हिंदी की विरासत पर पहला हक उस छात्र का है जो फटे जूतों में भी आँखों में साहित्य का स्वप्न लेकर काशी आता है। उसे अपनी ही माॅं की गोद (सभा) में बैठने के लिए कीमत न चुकानी पड़े।


शब्द यज्ञ/ विशेषांक 
अमन कुमार होली 
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 
ई-मेल editorwebmimansa@gmail.com

डिस्क्लेमर एवं कॉपीराइट चेतावनी

अस्वीकरण (Disclaimer):

इस विशेषांक "शब्द यज्ञ" में प्रस्तुत विचार संपादक एवं लेखक के निजी और शोध-आधारित चिंतन हैं। इसका उद्देश्य नागरी प्रचारिणी सभा की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करना तथा वर्तमान भाषाई चुनौतियों पर स्वस्थ विमर्श को प्रोत्साहित करना है। लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या पदाधिकारी की प्रतिष्ठा को धूमिल करना नहीं, बल्कि हिंदी भाषा और विद्यार्थी हितों के संरक्षण हेतु एक रचनात्मक ध्यानाकर्षण है।

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© संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा' (अमन कुमार होली)
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