लहू से लिखी अस्मिता: भारतीय थल सेना, साहित्य और शौर्य की परंपरा। शूरवीर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।
इतिहास केवल तारीखों का पुलिंदा नहीं होता, बल्कि वह उन पदचिह्नों का साक्षी है जो लहू से रेत पर उकेरे जाते हैं। जब हम 'मीमांसा' के इस विशेष स्तंभ "शूरवीर" के माध्यम से युद्ध इतिहास और वैश्विक पराक्रम की गाथा का विश्लेषण करते हैं, तो हम पाते हैं कि वीरता केवल शारीरिक बल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चेतना है।
आज का दिन विशेष है यह भारतीय थल सेना के गौरव, त्याग और उस 'अजेय' भावना को समर्पित है, जो हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर थार के तपते रेगिस्तान तक व अरुणाचल प्रदेश से लेकर अहमदाबाद तक कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरब-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं में भारतीय अस्मिता की ढाल बनी हुई है।
भारतीय थल सेना दिवस: क्यों और कैसे?
हर साल 15 जनवरी को मनाया जाने वाला 'भारतीय थल सेना दिवस' (Army Day) महज एक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य इतिहास के भारतीयकरण का प्रतीक है। 15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा (तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल) ने ब्रिटिश जनरल फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान संभाली थी। यह क्षण प्रतीकात्मक था एक संप्रभु राष्ट्र की बागडोर अब उसके अपने बेटों के हाथों में थी। यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा स्वयं करने की सामर्थ्य में निहित है।
वैश्विक पराक्रम का विश्लेषण:
भारतीय सेना का इतिहास केवल रक्षात्मक नहीं रहा है। विश्व युद्धों से लेकर संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों तक, भारतीय सैनिकों ने अपनी रणनीतिक कुशलता और मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में लाखों भारतीय सैनिकों ने विदेशी धरती पर अपनी वीरता का लोहा मनवाया, जिसकी गूंज आज भी यूरोप और अफ्रीका के युद्ध स्मारकों में सुनाई देती है।
देश की अस्मिता और सैनिकों का उत्सर्ग
एक राष्ट्र के रूप में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक अखंडता का रक्षक 'थल सेना' का वह जवान है, जो शून्य से नीचे के तापमान में भी पलक झपकाए बिना सीमा पर डटा रहता है।
अखंडता का रक्षक: 1947,1962, 1965, 1971, 1999, 2020 गालवान संघर्ष तथा ऑपरेशन विजय से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक के युद्धों में सैनिकों ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र की भूमि का एक टुकड़ा भी किसी शत्रु के हाथ में नहीं जाने दिया जाएगा।
मानवीय संवेदना: युद्ध के अतिरिक्त, आतंकवादी हमलों और देश विरोधी ताकते से बचाने तथा प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, भूकंप) के समय 'देवदूत' बनकर उभरे इन सैनिकों ने सिद्ध किया है कि उनका सेवा भाव सीमा के पार भी और सीमा के भीतर भी अटूट है।
अस्मिता का अर्थ: अस्मिता केवल मानचित्र की रेखाएं नहीं हैं; अस्मिता वह विश्वास है जो एक नागरिक रात को चैन की नींद सोते समय महसूस करता है, यह जानते हुए कि सरहद पर 'शूरवीर' जाग रहा है।
साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मैं स्वयं को इस विराट वीरगाथा के संदर्भ को हमारी साहित्यिक चेतना से जोड़े बिना रोक नहीं सका; अतः एक क्षण ठहरकर हम हिंदी साहित्य में निहित वीरगाथात्मक परंपरा का संक्षिप्त किंतु सघन पुनरावलोकन भारतीय सैन्य चेतना के संदर्भ में कर हीं लेते हैं।
भारतीय इतिहास की वीरता को शब्दों में पिरोने का काम हमारे कवियों और लेखकों ने बखूबी किया है। हिंदी साहित्य का प्रारंभ ही 'वीरगाथा काल' (आदिकाल) से माना जाता है।
चारण और भाट परंपरा (आदिकाल):
चंदबरदाई की 'पृथ्वीराज रासो' इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। “चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान” ये पंक्तियां केवल कविता नहीं, बल्कि शब्द-वेधी बाण की मार्गदर्शिका थीं। उस समय का साहित्य युद्धों के सजीव चित्रण और शौर्य के अतिशयोक्तिपूर्ण किंतु ओजस्वी वर्णन से भरा था।
मध्यकाल का भूषण-स्वर:
जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, तब महाकवि भूषण ने शिवाजी और छत्रसाल के शौर्य का गान कर सोई हुई हिंदू जाति को जगाया। उन्होंने लिखा:
"इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज है।
पोन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर, ज्यों सहसवाह पर राम द्विजराज है।
दावा द्रुमदंड पर, चीता मृग अँड पर, 'भूषन' वितुंड पर जैसे मृगराज है।
तेज तिमि अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर, त्यो मलेच्छ बंस पर सेर सिवराज है।"
उनकी कविता में युद्ध की विभीषिका नहीं, बल्कि धर्म और राष्ट्र की रक्षा का संकल्प था।
आधुनिक काल और राष्ट्रीय चेतना:
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर और सुभद्रा कुमारी चौहान ने कलम को तलवार बना लिया। दिनकर की 'रश्मिरथी' और 'कुरुक्षेत्र' युद्ध की विभीषिका और न्याय के संघर्ष का अद्भुत विश्लेषण करती हैं। दिनकर जब लिखते हैं "क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो", तो वे शक्ति संपन्न शांति की वकालत करते हैं, जो आज भी भारतीय सेना का मूल मंत्र है।
युद्ध इतिहास का दर्शन: संहार नहीं, संरक्षण
वैश्विक इतिहास में युद्ध अक्सर साम्राज्य विस्तार के लिए लड़े गए, लेकिन भारतीय युद्ध दर्शन 'धर्म' (कर्तव्य) पर आधारित रहा। महाभारत का युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ शस्त्र उठाने का निर्णय अंतिम विकल्प के रूप में लिया गया।
भारतीय सैनिकों का पराक्रम आज भी उसी 'धर्म' से प्रेरित है। वे शत्रु का नाश इसलिए नहीं करते कि वे उससे घृणा करते हैं, बल्कि वे अपने देश से प्रेम करते हैं। यही वह सूक्ष्म अंतर है जो एक 'आततायी' और एक 'शूरवीर' के बीच होता है।
मीमांसा विशेष: साहित्य, शौर्य और 'नाम-नमक-निशान' का त्रिकोण
जब हम शौर्य की बात करते हैं, तो वह केवल रणभूमि में दिखाई देने वाला रक्तपात नहीं है, बल्कि वह एक 'साहित्यिक सत्य' भी है। 'मीमांसा' के इस विमर्श में यह समझना आवश्यक है कि साहित्य और शौर्य के बीच चोली-दामन का साथ रहा है। यदि तलवार ने भूगोल बदला है, तो कलम ने उस भूगोल को 'राष्ट्र' की गरिमा प्रदान की है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब हिंदी साहित्य के इतिहास का वर्गीकरण किया, तो उन्होंने सबसे पहले 'वीरगाथा काल' को प्रतिष्ठित किया। शुक्ल जी का मानना था कि जिस युग में वीरता की गाथाएं रची जा रही थीं, वह केवल राजाओं की चाटुकारिता नहीं थी, बल्कि वह जनता की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब था। शुक्ल जी के अनुसार, "वीरता का अनुकरण ही राष्ट्रीयता की पहली सीढ़ी है।" उन्होंने रेखांकित किया कि जब समाज संघर्षों से घिरा हो, तब साहित्य का दायित्व है कि वह 'युद्ध की विभीषिका' को 'कर्तव्य के सौंदर्य' में बदल दे।
(कैप्टन सोइबा मनिंगबा रंगनामेई पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हिंसक झड़प के दौरान अदम्य साहस और नेतृत्व दिखाया। चित्र 2020)
साहित्य और शौर्य की यह संगति ही है कि आज भी आल्हा-ऊदल के छंद सुनकर नसें फड़कने लगती हैं और भूषण की कविताएं मृतप्राय समाज में प्राण फूंक देती हैं। शौर्य साहित्य को 'उदात्त' (Sublime) बनाता है, और साहित्य शौर्य को 'अमर' बनाता है।
उसने कहा था : प्रेम की वेदी पर शौर्य का अभिषेक
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में जब हम कालजई विरासत की बात करते हैं, तो पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की अमर रचना 'उसने कहा था' का नाम स्वर्ण अक्षरों में उभरता है। यह कहानी केवल एक सैनिक की वीरगाथा नहीं है, बल्कि यह उस 'नमक', 'नाम' और 'निशान' की त्रिवेणी है, जिस पर भारतीय थल सेना का अस्तित्व टिका है।
लहना सिंह: शौर्य का मानवीय चेहरा
कहानी का नायक लहना सिंह कोई मिथकीय देवता नहीं, बल्कि अमृतसर की गलियों से निकला एक हाड़-मांस का इंसान है। गुलेरी जी ने लहना सिंह के चरित्र के माध्यम से यह सिद्ध किया कि एक सैनिक के भीतर कठोर अनुशासन और कोमल भावनाएं साथ-साथ निवास करती हैं।
किरण कुमार द्वारा अभिनीत टेली फिल्म उसने कहा था
लहना सिंह का वह संवाद "बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही" भारतीय सैन्य दर्शन का सार है। यहाँ लड़ना हिंसा नहीं, बल्कि कर्तव्य की शुद्धि है। प्रथम विश्व युद्ध की उन ठंडी खंदकों में, जहाँ मौत हर क्षण दस्तक दे रही थी, लहना सिंह का डटे रहना उस 'नमक' के प्रति वफादारी थी जो उसने अपनी मिट्टी से खाया था।
व्यक्तिगत प्रेम की तिलांजलि और राष्ट्र का ऋण
रहस्यमयी सत्य यह है कि एक सैनिक जब मोर्चे पर होता है, तो वह केवल एक मशीन नहीं होता। उसके पीछे उसकी स्मृतियाँ, उसका प्रेम और उसके वादे होते हैं। लहना सिंह ने अपने बचपन के प्रेम ('उसने' यानी सूबेदारनी) को दिया हुआ वचन निभाया "मेरे पति और बेटे की रक्षा करना।"
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यहाँ से 'शूरवीर' की परिभाषा बदल जाती है। लहना सिंह ने अपनी जान देकर अपने वरिष्ठ (सूबेदार) के परिवार को बचाया। यह 'नाम' (रेजिमेंट का सम्मान), 'नमक' (स्वामीभक्ति) और 'निशान' (ध्वज की मर्यादा) के लिए दी गई सर्वोच्च आहुति थी।
हिंदी साहित्य ने इस कहानी के माध्यम से आधुनिक काल की उस विरासत को अक्षुण्ण रखा, जो कहती है कि:
नाम: आपकी पहचान आपकी रेजिमेंट और आपके देश से है।
नमक: जिसने आपको जीवन दिया, उस मिट्टी और उस अन्न का ऋण चुकाना ही परम धर्म है।
निशान: वह तिरंगा या वह प्रतीक जिसके लिए प्राण देना भी कम है।
विमर्श: रोटी, नमक और सैनिक का संकल्प
अक्सर वैश्विक युद्ध इतिहास में सैनिकों को केवल 'भाड़े का लड़ाका' (Mercenary) माना गया, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में सैनिक एक 'साधक' है। वह 'रोटी' और 'नमक' देने वाले राष्ट्र का कर्जदार मानकर स्वयं को युद्ध की अग्नि में झोंक देता है।
आचार्य शुक्ल ने वीरगाथात्मक इतिहास का पुनरावलोकन करते हुए जिस 'वीरता' को परिभाषित किया था, लहना सिंह उसी का आधुनिक विस्तार है। जहाँ प्राचीन काल में वीर 'यश' के लिए लड़ते थे, वहीं आधुनिक सैनिक 'कर्तव्य' और 'वचन' के लिए लड़ता है।
साहित्य का यह शौर्य-पक्ष हमें बताता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। युद्ध जीते जाते हैं उस मानसिक सुदृढ़ता से, जो लहना सिंह जैसे पात्रों में कूट-कूट कर भरी होती है। जब वह कहता है "जाकर कह देना, उसने जो कहा था, वह मैंने कर दिया", तो यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय थल सेना के उस संकल्प का जयघोष है जो आज भी सियाचिन से लेकर कच्छ तक गूँज रहा है।
निष्कर्ष: शौर्य की सरस और शाश्वत यात्रा व आने वाली पीढ़ी के लिए पाथेय
आज जब हम तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में हैं, युद्ध के स्वरूप बदल रहे हैं। 'साइबर वॉर' और 'ड्रोन तकनीक' के बीच भी, उस मानवीय साहस और बलिदान का कोई विकल्प नहीं है जो एक सैनिक के सीने में धड़कता है। 'मीमांसा' का यह विमर्श हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या हम एक समाज के रूप में अपने शूरवीरों के प्रति पर्याप्त कृतज्ञ हैं? थल सेना दिवस पर हमारा सबसे बड़ा सम्मान उनके परिवारों के प्रति संवेदना और राष्ट्र निर्माण में उनकी तरह ही अनुशासित योगदान देना होगा।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह विश्लेषण हमें उस बिंदु पर ले जाता है जहाँ युद्ध का कोलाहल शांत हो जाता है और केवल 'बलिदान' की सरस ध्वनि सुनाई देती है। भारतीय थल सेना का प्रत्येक जवान एक 'लहना सिंह' है, जो अपने व्यक्तिगत सुखों, अपने प्रेम और अपनी इच्छाओं की तिलांजलि देकर राष्ट्र की अस्मिता को अभेद्य बनाता है।
साहित्य और शौर्य का यह संगम ही भारत की वह शक्ति है जो हमें दुनिया के अन्य देशों से अलग करती है। हमारी वीरगाथाएं केवल रक्त रंजित पन्नों का संकलन नहीं हैं, बल्कि वे उस 'नैतिक बल' का प्रमाण हैं, जो यह सिखाता है कि राष्ट्र की रक्षा के लिए प्राण देना, मृत्यु नहीं बल्कि 'अमरत्व' की प्राप्ति है। आज थल सेना दिवस पर, आचार्य शुक्ल के विचारों और गुलेरी जी की कालजई रचना के आलोक में, हम उन सभी शूरवीरों को नमन करते हैं जिन्होंने 'नाम, नमक और निशान' की मर्यादा को अपने लहू से सींचा है।
संपादकीय टिप्पणी: यह आलेख उन सभी कलमकारों और तलवार के धनी नायकों को समर्पित है, जिन्होंने शब्द और शस्त्र के संतुलन से भारत की चेतना को जीवित रखा है। शूरवीरों की यह गाथा केवल अतीत का गौरव गान नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प है। ताकि शिराओं में रक्त व कलम में स्याही निरंतर उबाल भरती रहे। मीमांसा मानती है कि भारत की अस्मिता तब तक सुरक्षित है, जब तक वीरता और कलम का यह संगम बना रहेगा।
जय हिंद! जय भारती!
शूरवीर स्तंभ/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
© संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख वेब पत्रिका ‘मीमांसा’ के विशेष स्तंभ “शूरवीर” के अंतर्गत प्रकाशित एक साहित्यिक, ऐतिहासिक एवं वैचारिक विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के स्वतंत्र बौद्धिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं तथा इन्हें किसी भी प्रकार से भारत सरकार, भारतीय थल सेना अथवा किसी अन्य सैन्य/सरकारी संस्था का आधिकारिक वक्तव्य नहीं माना जाना चाहिए।
आलेख में उल्लिखित ऐतिहासिक घटनाएँ, साहित्यिक उद्धरण एवं पात्र संदर्भात्मक एवं विमर्शात्मक उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। किसी व्यक्ति, समुदाय, संस्था या विचारधारा की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई उद्देश्य नहीं है। यदि किसी अंश से अनजाने में कोई आपत्ति उत्पन्न होती है, तो उसे संयोगवश माना जाएगा।
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