वेब पत्रिका 'मीमांसा' पुण्यतिथि विशेषांक संपादकीय आलेख: तार सप्तक के जीवट कवि प्रयोगवाद व नयी कविता के मूर्धन्य साहित्यकार गिरिजा कुमार माथुर

हिंदी साहित्य के आधुनिक इतिहास में गिरिजा कुमार माथुर एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने कविता को केवल भावुकता के धरातल से उठाकर 'प्रयोग' और 'यथार्थ' की ठोस जमीन प्रदान की। 20 वीं सदी के मध्य में जब भारतीय समाज स्वाधीनता के उल्लास और विभाजन की विभीषिका के बीच खड़ा था, तब माथुर जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक नया रागात्मक और बौद्धिक विमर्श खड़ा किया। वे केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक दृष्टि थे जिन्होंने रेडियो और दूरदर्शन के माध्यम से हिंदी भाषा को जन-जन तक पहुँचाने का गुरुतर कार्य किया। आज 10 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि पर, 'मीमांसा' पत्रिका उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व का यह गहन विश्लेषण प्रस्तुत कर रही है।

जीवन वृत्त और साहित्यिक यात्रा

गिरिजा कुमार माथुर का जन्म : 22 अगस्त 1919 मध्य प्रदेश के अशोकनगर में हुआ। उनमें कविता का बीज उनके पिता देवीचरण माथुर से पड़ा, जो स्वयं कवित्त, सवैयाँ और दोहे लिखते थे। माथुर जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जहाँ उनके पिता ने उन्हें इतिहास, भूगोल और अंग्रेजी का ज्ञान दिया। लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. (अंग्रेजी) और वकालत की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक कानून का अभ्यास किया, किंतु उनकी नियति शब्दों और ध्वनियों की दुनिया में थी। उनका निधन: 10 जनवरी 1994 को नई दिल्ली में हुआ।

1941 में प्रकाशित उनके प्रथम काव्य-संग्रह 'मंजीर' की भूमिका स्वयं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने लिखी थी, जो उनके साहित्यिक कद का प्रमाण है। वे माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे कवियों की विद्रोही चेतना से गहराई तक प्रभावित थे।

तार सप्तक में माथुर दंपति 


गिरिजा कुमार माथुर प्रथम 'तार सप्तक' 1943 के उन सात कवियों में से एक थे जिन्होंने हिंदी कविता को पारंपरिक बंधनों से मुक्त कर एक नया रूप दिया।
रोमानी यथार्थवाद: उनकी कविताओं में भावुकता और यथार्थ का सुंदर समन्वय मिलता है। उन्होंने सौंदर्य और प्रेम के साथ-साथ सामाजिक चेतना को भी स्वर दिया।
शिल्पगत नवीनता: उन्होंने कविता की भाषा और प्रतीकों में नवीनता का समावेश किया। 'मंजीर' और 'नाश और निर्माण' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
संगीतात्मकता: माथुर जी की कविताओं में एक आंतरिक लय और संगीत होता है, जो उन्हें अन्य प्रयोगवादी कवियों से अलग करता है।

गिरिजा कुमार माथुर की पत्नी शकुंत माथुर हिंदी साहित्य की एक सशक्त कवयित्री थीं। वे 'दूसरा सप्तक' 1951 की कवयित्री के रूप में पहचानी जाती हैं।
नारी चेतना: उनकी कविताओं में मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष, घरेलू वातावरण और स्त्री मन की सूक्ष्म संवेदनाओं का चित्रण मिलता है।
सहज अभिव्यक्ति: उनकी भाषा अत्यंत सरल, स्वाभाविक और आडंबरहीन है। उन्होंने रोजमर्रा के जीवन के बिम्बों का खूबसूरती से प्रयोग किया है।
स्वतंत्र पहचान: यद्यपि वे एक प्रसिद्ध कवि की पत्नी थीं, लेकिन 'तीसरा सप्तक' में उनकी उपस्थिति ने यह सिद्ध किया कि उनकी काव्य दृष्टि और मौलिकता पूरी तरह स्वतंत्र और प्रभावशाली थी।

गिरिजा कुमार माथुर कृतित्व: प्रयोग और प्रगति का संगम

माथुर जी का कृतित्व हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में शामिल हैं:
मंजीर : शुरुआत जहाँ निराला का आशीर्वाद मिला।
नाश और निर्माण: समय की बदलती करवटों का दस्तावेज।
धूप के धान: प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों की कविता।
शिलापंख चमकीले: प्रयोगवादी शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण।
मैं वक्त के हूँ सामने: परिपक्व दृष्टि और दार्शनिक गहराई।
भीतरी नदी की यात्रा: अंतर्मन के द्वंद्वों का चित्रण।
गीत परंपरा: उनके द्वारा लिखित गीत 'छाया मत छूना मन' हिंदी साहित्य के सबसे चर्चित गीतों में से एक है। वहीं, प्रसिद्ध गीत "We Shall Overcome" का उनका हिंदी भावांतर "हम होंगे कामयाब" भारतीय जनमानस का सामूहिक संकल्प-गीत बन चुका है। इनकी कविता में रंग, रूप, रस, भाव तथा शिल्प के नए-नए प्रयोग हैं।
 मुख्य अन्य काव्य संग्रह हैं, 'जो बंध नहीं सका', 'साक्षी रहे वर्तमान', 'भीतर नदी की यात्रा', 'मैं वक्त के हूँ सामने' तथा 'छाया मत छूना मन' आदि। इन्होंने कहानी, नाटक तथा आलोचनाएं भी लिखी हैं।

रचना शैली की विशिष्टताएँ

माथुर जी की शैली 'इंद्रियबोध' और 'बौद्धिकता' का अनूठा मिश्रण है:
मार्क्सवाद और जन-परंपरा: उन्होंने मार्क्सवाद को भारतीय मिट्टी में रोप कर आत्मसात किया। उनके शब्दों में, "मुक्ति के वही मूल्य मेरी कविता को झंकृत और उद्दीप्त करते रहे हैं।"
वैज्ञानिक और लोक चेतना: उनकी कविताओं में जहाँ एक ओर मालवा का प्राकृतिक वैभव है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि भी मौजूद है।
विविध भारती की संकल्पना: रेडियो और दूरदर्शन में उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने 'विविध भारती' जैसी संकल्पना को जन्म दिया, जिसने हिंदी को एक वैश्विक और लोकप्रिय पहचान दिलाई।

पुरस्कार और सम्मान

गिरिजा कुमार माथुर के साहित्यिक योगदान को राष्ट्र ने सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा:
साहित्य अकादेमी पुरस्कार: कविता-संग्रह "मैं वक्त के हूँ सामने" के लिए 1991 में।
व्यास सम्मान: 1993 में इसी कृति के लिए के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा।
शलाका सम्मान: हिंदी अकादमी दिल्ली का प्रतिष्ठित सम्मान।

युगानुरूप प्रासंगिकता और 'मीमांसा' की दृष्टि

'मीमांसा' की दृष्टि में माथुर जी एक 'सांस्कृतिक वास्तुकार' थे। आज जब समाज सूचनाओं के बोझ तले दबा है, माथुर जी की कविताएँ हमें 'इंद्रियबोध' की ओर वापस ले जाती हैं। वे 'तार सप्तक' के उन कवियों में से थे जिन्होंने यह सिद्ध किया कि प्रयोग केवल भाषा के साथ नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों के साथ होना चाहिए। उनकी रचनाएँ आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं कि वे समय के सम्मुख आँखें मिलाकर खड़े हों।

आगे के लिए राह

हमें माथुर जी की 'प्रगतिवादी' और 'प्रयोगवादी' धाराओं के सामंजस्य को समझना होगा। आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी आत्मकथा 'मुझे और अभी कहना है' एक मार्गदर्शिका की तरह है। डिजिटल युग में उनके गीतों और कविताओं का बहुभाषी अनुवाद समय की मांग है।

पाठकों के लिए एक प्रश्न:

आज के अनिश्चितता भरे दौर में, माथुर जी का गीत 'हम होंगे कामयाब' आपके भीतर किस तरह के विश्वास को जगाता है? क्या आपको लगता है कि आधुनिक कविता ने अपनी 'गेयता' खो दी है?


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