साहित्य, इतिहास और पुरातत्व के त्रिवेणी संगम, महाकौशल के सारस्वत सूर्य - पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय। वबे पत्रिका 'मीमांसा' जयंती विशेषांक संपादकीय आलेख।

प्रस्तावना: काल के कपाल पर अमिट हस्ताक्षर
इतिहास के झरोखों से जब हम छत्तीसगढ़ और मध्य भारत की साहित्यिक धरा को निहारते हैं, तो एक नाम ध्रुव तारे की भाँति अटल और दैदीप्यमान दिखाई देता है पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय। आज उनकी जयंती के पावन अवसर पर वेब पत्रिका 'मीमांसा' न केवल एक साहित्यकार को याद कर रही है, बल्कि उस वत्सल पितृ-पुरुष को नमन कर रही है जिसने अपनी लेखनी से समाज का चरित्र गढ़ा और अपनी पुरातात्विक दृष्टि से मिट्टी में दबे गौरवशाली अतीत को पुनर्जीवित किया।

पंडित जी का जीवन उस युग की कथा है जब साहित्य मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और आत्म-पहचान का एक सशक्त माध्यम था। उन्होंने एक ऐसे समय में अपनी लेखनी उठाई जब भारतीय समाज अपनी जड़ों से कट रहा था और अपनी ऐतिहासिक पहचान खो रहा था।


संस्कारधानी बिलासपुर से विश्वपटल तक

4 जनवरी 1887 को महानदी के तट पर बसे बालपुर (बिलासपुर, छत्तीसगढ़) की माटी में जन्मे लोचन प्रसाद जी को विद्या का संस्कार विरासत में मिला। उनके पिता पंडित चिंतामणि पाण्डेय स्वयं एक प्रकांड विद्वान और विद्याव्यसनी थे। उन्होंने अपने गाँव में शिक्षा के प्रसार के लिए स्वयं की पाठशाला खुलवाई थी। यही वह भूमि थी जहाँ लोचन प्रसाद जी ने अपने सात भाइयों (जिनमें प्रसिद्ध कवि मुकुटधर पाण्डेय भी शामिल थे) के साथ मिलकर साहित्य की दीक्षा ली।

उनकी शिक्षा यात्रा बालपुर से शुरू होकर संबलपुर, कलकत्ता और फिर बनारस तक पहुँची। बनारस प्रवास के दौरान उन्होंने तत्कालीन महान साहित्यकारों और मनीषियों के सानिध्य में अपनी मेधा को तराशा। उन्होंने औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ स्व-अध्ययन से हिन्दी, उड़िया, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी भाषाओं पर ऐसा अधिकार प्राप्त किया जो विरल है।

रचना संसार: नीति, प्रीति और लोक-कल्याण का महाकुंभ

पंडित जी का साहित्य केवल शब्दों का संचयन नहीं, बल्कि लोक-कल्याण का एक अनुष्ठान था। द्विवेदी युग के प्रभाव में उनकी कविताओं में नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक सुधार के स्वर स्पष्ट सुनाई देते हैं। उनका काव्य 'अभिधामूलक' होते हुए भी हृदय को स्पर्श करने की अद्भुत क्षमता रखता था।

1. सामाजिक और वैचारिक गद्य:

1906 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'दो मित्र' समाज-सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। यह कृति पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण के विरुद्ध भारतीय मैत्री और आदर्शों को पुनर्स्थापित करती है। इसी तरह 'साहित्य सेवा' और 'ग्राम्य विवाह' जैसे प्रहसनों के माध्यम से उन्होंने हास्य और व्यंग्य का पुट देकर समाज की विसंगतियों पर करारी चोट की।

2. काव्य संपदा और छायावाद की आहट:

1907 में प्रकाशित उनका काव्य-संग्रह 'प्रवासी' हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। इसमें छायावाद की वे शुरुआती किरणें दिखाई देती हैं जो बाद में उनके अनुज मुकुटधर पाण्डेय के माध्यम से एक पूर्ण आंदोलन बनीं। उनकी कविता 'मृगी दुःखमोचन' पशु-पक्षियों के प्रति उनकी वत्सलता और अगाध करुणा का प्रमाण है। वृक्ष, पशु और प्रकृति के प्रति ऐसी सहृदयता उनके काव्य को 'पारिस्थितिकी चेतना' (Ecological Consciousness) का अग्रदूत बनाती है।

3. बहुभाषी मेधा:

पंडित जी ने केवल हिन्दी में ही नहीं, बल्कि उड़िया में भी 'कविता कुसुम' और 'रोगी रोगन' जैसी कृतियाँ लिखकर दो प्रान्तों के बीच सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। अंग्रेजी में उनकी कृति 'Letters to my Brothers' और 'The Way to be Happy and Gay' उनके वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं।

पुरातत्व के भगीरथ: महाकौशल की अस्मिता के रक्षक
लोचन प्रसाद पाण्डेय केवल कल्पना के कवि नहीं थे, वे तथ्यों के उपासक थे। उनका मानना था कि जिस समाज का इतिहास सुरक्षित नहीं, उसका भविष्य अंधकारमय होता है। 1920 में उन्होंने 'छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली' की स्थापना की, जो बाद में 'महाकौशल इतिहास परिषद' के रूप में जानी गई।

उन्होंने छत्तीसगढ़ के जंगलों, पहाड़ों और गाँवों की खाक छानी। उनके शोध के कारण ही सिरपुर, मल्हार, खरौद और आरंग जैसे ऐतिहासिक स्थलों का महत्व दुनिया के सामने आया। उन्होंने अनेक अप्रकाशित शिलालेखों, ताम्रपत्रों और मूर्तियों की पहचान की। वे सही अर्थों में 'छत्तीसगढ़ के पुरातत्व के पितामह' थे। उनका शोध कार्य केवल अकादमिक नहीं था, बल्कि अपनी लुप्त अस्मिता को खोजने का एक आत्मिक अभियान था।

असाधारण व्यक्तित्व: सादगी और विद्वत्ता का मेल

पंडित जी को 'काव्य विनोद' और 'साहित्य-वाचस्पति' जैसी महान उपाधियाँ प्राप्त हुईं, लेकिन उनका स्वभाव सदैव बालपुर की माटी की तरह सरल बना रहा। वे 'भारतेन्दु साहित्य समिति' के माध्यम से नए रचनाकारों के लिए एक वटवृक्ष की भाँति रहे। उनका व्यवहार आत्मीयतापूर्ण था और वे हर नवागंतुक लेखक को बड़े प्रेम से प्रोत्साहित करते थे।

उनके जीवन का मूल मंत्र था - चरित्रोत्थान। उन्होंने अपनी लेखनी को कभी बाजार की वस्तु नहीं बनने दिया। उनका साहित्य पाठकों में संयम, कर्तव्य और नैतिकता के प्रति रुचि उत्पन्न करने वाला था।

निष्कर्ष: 'मीमांसा' का आह्वान

आज के इस दौर में, जब सूचनाओं का अंबार है लेकिन संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं, पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का जीवन और दर्शन हमारे लिए एक प्रकाश स्तंभ की तरह है। वे हमें सिखाते हैं कि साहित्य केवल शब्दों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि वह समाज के प्रति उत्तरदायित्व का नाम है।

'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक का ध्येय केवल उनके कृतित्व की गणना करना नहीं है, बल्कि उस 'दृष्टि' को पुनः जीवित करना है जिसमें साहित्य समाज का दर्पण भी था और दीपक भी। उन्होंने जिस महाकौशल की गौरव-गाथा लिखी थी, उसे सुरक्षित रखना और उनके द्वारा छोड़े गए शोध कार्यों को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

आइए, हम सब मिलकर इस प्रकांड पंडित, निष्काम साहित्य-साधक और महाकौशल के गौरवशाली सपूत के चरणों में अपनी श्रद्धा निवेदित करें और उनके बताए 'साहित्य-सेवा' के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।


जयंती विशेषांक/ संपादकीय 
अमन कुमार होली 
© संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा'



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