शब्द, शक्ति और स्वाभिमान ओलचिकी आविष्कारक गुरु गोमके रघुनाथ मुर्मू और भाषाई विरासत। जोहार स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। अमन कुमार होली।

विगत कई दशकों से भारतीय साहित्यिक परिदृश्य पर 'मुख्यधारा' का एक ऐसा आधिपत्य रहा है, जिसने हाशिए के समाजों, विशेषकर आदिवासी जीवन और उनकी मेधा को प्रायः विस्मृत या गौण बनाए रखा। किंतु, 'मीमांसा' का 'जोहार' स्तंभ उस सन्नाटे को तोड़ने का एक विनम्र प्रयास है। इस अंक में हमारा विषय प्रवेश एक ऐसे महामानव के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिन्होंने अक्षरों की खोज को अस्मिता की लड़ाई बना दिया पंडित रघुनाथ मुर्मू, जिन्हें दुनिया 'गुरु गोमके' के नाम से पूजती है।

यह आलेख साहित्य और समाज के उस अविभाज्य सह-अस्तित्व को रेखांकित करता है, जहाँ एक लेखक केवल पात्रों का सृजन नहीं करता, बल्कि एक पूरे समुदाय को गौरवमयी भविष्य की दृष्टि देता है। रघुनाथ मुर्मू के साहित्य ने संतालियों को उनके धर्म, दर्शन और इतिहास से पुनः जोड़ा। आज के इस विमर्श में हम न केवल उनके योगदान का पुण्य स्मरण कर रहे हैं, बल्कि यह भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों एक लिपि का होना किसी समाज के अस्तित्व के लिए 'जीवन-मरण' का प्रश्न होता है। आइए, इस वैचारिक यात्रा में शामिल हों और उस महान आविष्कारक को श्रद्धांजलि दें, जिन्होंने कहा था कि लिपि मिटते ही अस्तित्व मिट जाता है।

साहित्य केवल कल्पना की उड़ान नहीं है, बल्कि वह उस समाज का जीवंत दस्तावेज है जिससे वह उपजता है। जब हम मुख्यधारा के साहित्य विमर्श की बात करते हैं, तो अक्सर वे आवाजें हाशिए पर छूट जाती हैं जिन्होंने अपनी जड़ों को सींचने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 'मीमांसा' के 'जोहार' स्तंभ का यह दूसरा अंक एक ऐसे ही युगपुरुष पंडित रघुनाथ मुर्मू को समर्पित है, जिन्होंने संताली समाज को न केवल अक्षर दिए, बल्कि उन्हें अपनी पहचान का आइना भी दिखाया।

लिपि का अभाव और पहचान का संकट

उन्नीसवीं शताब्दी तक संताली भाषा मौखिक परंपरा (Oral Tradition) पर टिकी थी। ज्ञान, लोकगीत और परंपराएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गीतों और कहानियों के माध्यम से पहुँचती थीं। जब यूरोपीय मिशनरियों और शोधकर्ताओं ने इस भाषा को लिपिबद्ध करना चाहा, तो उन्होंने इसे 'रोमन', 'बंगाली' या 'ओडिया' के ढांचे में कसने की कोशिश की।

यहीं से एक सांस्कृतिक संकट का जन्म हुआ। किसी और की लिपि में अपनी भाषा लिखना वैसा ही है जैसे किसी और के घर में अपना सामान सजाना। पंडित मुर्मू ने इसे भांप लिया था। उन्होंने समझा कि जब तक संतालियों के पास अपनी लिपि नहीं होगी, उनका ज्ञान और उनकी संस्कृति हमेशा 'उधार' के तंत्र पर निर्भर रहेगी। 1925 में 'ओलचिकी' का आविष्कार केवल एक वर्णमाला का निर्माण नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक और क्षेत्रीय भाषाई वर्चस्व के विरुद्ध एक मौन क्रांति थी।

साहित्य और समाज का सह-अस्तित्व

समाज और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। समाज साहित्य को कच्चा माल (अनुभव, संघर्ष, भावनाएँ) देता है, और साहित्य उस समाज को एक दिशा और गौरव प्रदान करता है। गुरु गोमके का मानना था:

 "अगर आप अपनी भाषा, संस्कृति, लिपि और धर्म भूल जाएंगे, तो आपका अस्तित्व भी खत्म हो जाएगा!"

यह वाक्य आज के वैश्विक दौर में और भी प्रासंगिक हो जाता है। रघुनाथ मुर्मू ने केवल लिपि नहीं बनाई, बल्कि उसमें 150 से अधिक पुस्तकें लिखकर यह सिद्ध किया कि एक "आदिवासी भाषा" में वह सामर्थ्य है कि वह दर्शन, नाटक, व्याकरण और उपन्यास जैसे जटिल विषयों को समाहित कर सके। उनके नाटक जैसे "बिदु चंदन" और "खेरवाड़ बीर" केवल मनोरंजन के साधन नहीं थे, बल्कि वे संताली समाज के नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान के पाठ थे।

गुरु गोमके: एक दार्शनिक और वैज्ञानिक

जयपाल सिंह मुंडा ने उन्हें 'भाषा वैज्ञानिक' कहा और जूलियस तिग्गा ने 'महान आविष्कारक'। यह देखना सुखद है कि कैसे एक व्यक्ति ने शिक्षक की भूमिका से निकलकर एक पूरे समाज का मार्ग प्रशस्त किया। रांची विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें दी गई 'डी. लिट.' की उपाधि और 'गुरु गोमके' (महान शिक्षक) का संबोधन इस बात का प्रमाण है कि उनका योगदान किसी एक राज्य की सीमा में नहीं बंधा था।

उन्होंने ओडिशा, बंगाल, झारखंड और असम के संतालियों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। 'ओलचिकी' ने उन भौगोलिक सीमाओं को तोड़ दिया जो राजनीतिक नक्शों ने बनाई थीं।

मुख्यधारा के विमर्श की चुनौतियाँ

आज जब हम "मुख्यधारा" के साहित्य की बात करते हैं, तो अक्सर आदिवासी विमर्श को 'लोक' या 'क्षेत्रीय' कहकर सीमित कर दिया जाता है। पंडित रघुनाथ मुर्मू जैसे व्यक्तित्वों को याद करना इस धारणा को चुनौती देना है। उनका साहित्य उतना ही 'शास्त्रीय' है जितना किसी अन्य भाषा का।

समाज और साहित्य के सह-अस्तित्व का अर्थ यही है कि साहित्य समाज की पीड़ा को स्वर दे। मुर्मू जी ने सिदो-कान्हू के संघर्ष को अपने लेखन में जगह दी, उन्होंने संताली समाज के धार्मिक नेतृत्व की बात की। उन्होंने सिखाया कि आधुनिक होने का अर्थ अपनी जड़ों को काटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को एक नई भाषा और लिपि की खाद देकर मजबूत करना है।

निष्कर्ष: भविष्य की ओर एक कदम

'जोहार' स्तंभ के माध्यम से हम आज यह संकल्प लेते हैं कि विस्मृत किए जा रहे नायकों को पुनः विमर्श के केंद्र में लाया जाएगा। गुरु गोमके का जीवन हमें सिखाता है कि "अक्षर" केवल ध्वनि के प्रतीक नहीं होते, वे आत्मसम्मान के हथियार होते हैं।

आज का यह अंक पंडित रघुनाथ मुर्मू की उस दूरदर्शिता को सलाम करता है, जिसने आदिवासी समाज को 'पढ़ने' और 'लिखने' की शक्ति दी। साहित्य और समाज का यह अटूट संबंध ही हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर दुनिया बनाने की प्रेरणा देता है।

जोहार!/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
संपादक, 
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 
ई-मेल editorwebmimansa@gmail.com


संपादकीय नोट: 'जोहार' : अस्मिता की गूँज और साझा भविष्य का संकल्प

'मीमांसा' का मूल मंत्र सदैव से ही ज्ञान के उन अनछुए कोनों को आलोकित करना रहा है, जिन्हें समय की धूल ने ओझल कर दिया है। इसी ध्येय को विस्तार देते हुए, हमारे  संपादक अमन कुमार 'होली' की दूरदर्शी दृष्टि ने "जोहार" स्तंभ की नींव रखी। यह मात्र एक स्तंभ नहीं, बल्कि आदिवासी और मूलवासी अस्तित्व के संघर्ष, उनकी मेधा और उनकी गौरवशाली परंपरा का 'मुखपत्र' है।

संपादक की यह स्पष्ट सोच है कि जब तक आदिवासी समाज की खुशबू मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा नहीं बनेगी, तब तक भारतीय साहित्य का कैनवास अधूरा रहेगा। गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू का स्मरण इसी कड़ी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमन कुमार 'होली' का मानना है कि 'ओलचिकी' जैसी लिपियाँ केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि उस स्वाभिमान की ढाल हैं, जो एक समुदाय को उसकी जड़ों से जोड़े रखती हैं।
आदिवासी रचनाकारों से आह्वान

आज 'मीमांसा' का यह मंच उन सभी कलमकारों, विचारकों और रचनाकारों का आह्वान करता है, जिनके शब्दों में मिट्टी की सोंधी महक और संघर्ष की तपिश है।

सृजन का विस्तार: हम आपको आमंत्रित करते हैं कि आप अपनी लेखनी के माध्यम से उस 'उत्तम साहित्य' को समाज के सम्मुख लाएँ, जो अब तक मौखिक परंपराओं या क्षेत्रीय सीमाओं में कैद रहा है।

अस्तित्व की मुखरता: अपनी कहानियों, कविताओं और शोध आलेखों के जरिए आदिवासी जीवन के दर्शन और उनके प्राकृतिक सह-अस्तित्व की गाथा को 'मीमांसा' के पन्नों पर उकेरें।

सांस्कृतिक सेतु: आइए, हम सब मिलकर इस विनम्र प्रयास का हिस्सा बनें, जहाँ हाशिए की आवाज़ें मुख्यधारा के शोर से अधिक प्रभावशाली और सार्थक सिद्ध हों।

हमारा उद्देश्य स्पष्ट है हमें केवल पाठक नहीं, बल्कि एक सजग समाज बनाना है। 'जोहार' स्तंभ के माध्यम से हम उस खुशबू को वैश्विक पहचान दिलाना चाहते हैं, जो सदियों से जंगलों, पहाड़ों और आदिवासी बस्तियों के लोकगीतों में रची-बसी है।

आइए, 'मीमांसा' के इस वैचारिक महाकुंभ में अपनी आहुति दें और सिद्ध करें कि साहित्य जब समाज के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है, तो वह इतिहास की दिशा बदल देता है।

साझा संघर्ष, साझा सृजन! जय जोहार!

— संपादकीय मंडल, 'मीमांसा'
ई-मेल पता : webmimansa@gmail.com 
साहिबगंज, झारखंड (भारत)

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