समता के अनथक यात्री : भदंत आनंद कौसल्यायन(पालि के मनीषी, धम्म के राही और हिंदी के अनन्य साधक) वेब पत्रिका 'मीमांसा' जयंती विशेषांक संपादकीय आलेख

यह वेब पत्रिका 'मीमांसा' का विशेष प्रस्तुतीकरण है। भदंत आनंद कौसल्यायन की 121वीं जयंती के अवसर पर उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को समर्पित 

प्रस्तावना: "यदि बाबा न होते..." से "अप्प दीपो भव" तक

"यदि बाबा न होते..."यह केवल भदंत आनंद कौसल्यायन की एक चर्चित पुस्तक का शीर्षक नहीं है, बल्कि उस कृतज्ञता की पराकाष्ठा है जो एक प्रबुद्ध मस्तिष्क अपने मार्गदर्शक के प्रति व्यक्त करता है। भदंत जी का जीवन एक ऐसे सेतु के समान था, जिसने प्राचीन पालि साहित्य की समृद्ध विरासत को आधुनिक युग की तार्किक चेतना से जोड़ा। आज जब हम 'मीमांसा' के इस विशेषांक के माध्यम से उन्हें नमन कर रहे हैं, तो हम केवल एक बौद्ध भिक्षु का स्मरण नहीं कर रहे, बल्कि उस 'प्रकाश पुंज' की विवेचना कर रहे हैं जिसने बीसवीं सदी के सामाजिक और भाषाई परिदृश्य को अपनी वैचारिक ऊर्जा से आलोकित किया।

जन्म और बाल्यकाल: हरिनाम से आनंद की ओर

5 जनवरी 1905 को पंजाब के अंबाला जिले (वर्तमान मोहाली) के 'सोहना' गाँव में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया हर्नाम दास। शिक्षक पिता लाला रामशरण दास के संस्कारों ने हर्नाम के भीतर जिज्ञासा के बीज बो दिए थे। लाहौर के नेशनल कॉलेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने वाले इस युवक के भीतर एक बेचैनी थी सत्य को जानने की और समाज को बदलने की।
यह वह दौर था जब भारत स्वाधीनता संग्राम की आग में तप रहा था। हर्नाम दास ने महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; जब तक समाज जाति और पाखंड की जंजीरों में जकड़ा है, तब तक वास्तविक आज़ादी एक स्वप्न ही रहेगी। इसी खोज ने उन्हें बुद्ध की शरण में पहुँचाया, जहाँ वे 'हर्नाम' से 'भदंत आनंद कौसल्यायन' बने।

वैचारिक त्रिवेणी: राहुल, आंबेडकर और भदंत

भदंत आनंद कौसल्यायन का व्यक्तित्व तीन महान धाराओं का संगम था:
महापंडित राहुल सांकृत्यायन: जिनसे उन्होंने घुमक्कड़ी और शोध की दृष्टि सीखी।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर: जिनसे उन्होंने सामाजिक न्याय और समता का संकल्प लिया।
स्वयं की प्रज्ञा: जिससे उन्होंने इन विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की भाषा खोजी।
वे बाबा साहब के उन चुनिंदा करीबियों में से थे, जिन्होंने 1956 की धम्म दीक्षा के बाद नव-बौद्ध आंदोलन को वैचारिक और दार्शनिक आधार प्रदान किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि बौद्ध धर्म कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि एक 'बुद्धिवादी जीवन पद्धति' है।

पालि और प्राचीन साहित्य का पुनरुद्धार
भदंत जी का सबसे महान योगदान पालि भाषा को भारत की मुख्यधारा में पुनः स्थापित करना है। पालि, जो कभी बुद्ध की जनभाषा थी, समय के साथ लुप्तप्राय हो गई थी।
त्रिपिटक और जातक: उन्होंने भिक्षु जगदीश कश्यप और भिक्षु धर्मरक्षित के साथ मिलकर त्रिपिटक के अनुवाद में महती भूमिका निभाई। 'जातक अट्ठकथा' का छह खंडों में उनका अनुवाद भारतीय साहित्य की एक ऐतिहासिक घटना है।
धम्मपद का सरल अनुवाद: उन्होंने क्लिष्ट दर्शन को सामान्य व्यक्ति के लिए सुलभ बनाया।

साहित्यिक सृजन और कलात्मक गरिमा
भदंत जी की लेखनी में जो सरलता थी, वही उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। उनकी कृतियाँ केवल ज्ञान नहीं देतीं, बल्कि पाठक से संवाद करती हैं:
भिक्खु के पत्र: पत्र शैली में लिखे गए ये लेख जीवन के गहरे सत्यों को बड़ी सहजता से उद्घाटित करते हैं।
रेल के टिकट: यह उनके सूक्ष्म निरीक्षण और व्यंग्य का प्रमाण है, जहाँ वे यात्रा के माध्यम से मानवीय स्वभाव का विश्लेषण करते हैं।
तार्किक विमर्श: 'राम की कहानी, राम की जुबानी' और 'मनुस्मृति क्यों जलाई?' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने धार्मिक कट्टरता और सामाजिक विषमता पर तीखे प्रहार किए।

राष्ट्रभाषा प्रचार और वर्धा का दौर

भदंत जी केवल एक भिक्षु नहीं, बल्कि हिंदी के प्रबल संवाहक थे। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने 10 वर्षों तक हिंदी को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने 'भाषा' को कभी सत्ता का औजार नहीं समझा, बल्कि उसे 'संस्कृति का वाहक' माना। श्रीलंका के विद्यालंकार विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की पताका फहराई।

विरासत को सहेजना: अगली पीढ़ी के लिए सीख
भदंत आनंद कौसल्यायन की विरासत को हम कैसे देख सकते हैं? आज के 'पोस्ट-ट्रुथ' युग में उनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है:
तार्किकता (Rationalism): उन्होंने सिखाया कि किसी भी बात को केवल इसलिए न मानें क्योंकि वह प्राचीन है, बल्कि उसे तर्क की कसौटी पर कसें।
घुमक्कड़ी का साहस: वे मानते थे कि बंद कमरों में ज्ञान नहीं मिलता, उसके लिए दुनिया को देखना और सहना पड़ता है।
अनुवाद का पुल: उन्होंने दिखाया कि भाषाओं के बीच संवाद ही संस्कृतियों को जीवित रखता है।

उपसंहार: एक कृतज्ञ नमन

22 जून 1988 को नागपुर के मेयो अस्पताल में इस महाप्राण का भौतिक शरीर शांत हो गया, किंतु उनकी लेखनी आज भी जीवित है। 'मीमांसा' पत्रिका के इस विशेषांक का उद्देश्य केवल उनके जीवन का ब्योरा देना नहीं है, बल्कि उस मशाल को थामना है जिसे उन्होंने जलाया था।
भदंत जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति यदि संकल्प ले, तो वह न केवल अपनी नियति बदल सकता है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन में चेतना का संचार कर सकता है। वे सही अर्थों में 'अप्प दीपो भव' के जीवंत उदाहरण थे।

उनकी जयंती पर वेब पत्रिका 'मीमांसा' उनके योगदान को नमन करती है।


आभार एवं संदर्भ (Acknowledgments)

'मीमांसा' का यह विशेषांक उन सभी ज्ञान-स्रोतों का ऋणी है जिन्होंने भदंत आनंद कौसल्यायन जी के विराट जीवन को संकलित करने में आधार प्रदान किया। हम विशेष रूप से निम्नलिखित के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं:
विकिपीडिया एवं मुक्त ज्ञानकोश: भदंत जी के जीवनक्रम और ऐतिहासिक तिथियों के संदर्भ हेतु।
वाणी प्रकाशन एवं अन्य प्रकाशक: भदंत जी की कालजयी कृतियों और उनके साहित्यिक योगदानों के विवरण हेतु।
अंबेडकरवादी एवं बौद्ध साहित्य के शोधकर्ता: जिनके लेखों और शोध-पत्रों से हमें उनके दार्शनिक पहलुओं को समझने में मदद मिली।
तकनीकी एवं संपादकीय टीम: जिन्होंने अल्प समय में इस शोधपरक सामग्री को सजीव और पठनीय रूप प्रदान किया।
हम उन सभी मनीषियों और डिजिटल प्लेटफार्मों के प्रति भी सादर आभार प्रकट करते हैं, जिनकी सूचनाओं के बिना इस जयंती विशेषांक की पूर्णता संभव नहीं थी।

जयंती विशेषांक/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
 © संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा'


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

इस विशेषांक में प्रकाशित विचार लेखकों के निजी मत हैं। पत्रिका में दी गई ऐतिहासिक जानकारी विकिपीडिया एवं अन्य शोधपरक स्रोतों पर आधारित है। संपादकीय टीम तथ्यों की सटीकता का यथासंभव प्रयास करती है, किंतु किसी भी अनचाही त्रुटि के लिए 'मीमांसा' उत्तरदायी नहीं होगी।

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