हिंदी साहित्य में आधुनिकता के भगीरथ : बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र और युग की देहरी पर खड़ा वह कालजयी व्यक्तित्व। वेब पत्रिका 'मीमांसा'का पुण्यतिथि विशेषांक संपादकीय आलेख।
आज की तिथि केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है, बल्कि हिंदी साहित्य के उस 'महाप्राण' की स्मृति का पवित्र क्षण है, जिसने अपनी अल्पायु की समिधा से आधुनिकता की अखंड ज्योति प्रज्वलित की। आज 6 जनवरी है अंधेरे को चीरकर 'उजाले' की नींव रखने वाले, आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह, बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की पुण्यतिथि।
जब हम भारतेंदु का नाम लेते हैं, तो मन में एक ऐसे 'युग-पुरुष' की छवि उभरती है, जिसने अपनी कलम को केवल विलास का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र के जागरण का अस्त्र बनाया। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें एक ओर ऋषियों की सी दृष्टि थी, तो दूसरी ओर एक माँ सा वात्सल्य, जो अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को सिसकता देख तड़प उठता था।
आधुनिकता और नवजागरण के अग्रदूत
भारतेंदु जी का जन्म 9 सितंबर 1850 और अवसान 6 जनवरी 1885 उस दौर में हुआ जब भारत रीतिकालीन सामंती जकड़न और ब्रिटिश औपनिवेशिकता के दोहरे पाटों के बीच पिस रहा था। मात्र 34 वर्ष की अल्पायु! क्या कोई सोच सकता है कि इतने कम समय में कोई व्यक्ति भाषा का कायाकल्प कर सकता है? भारतेंदु ने किया। उन्होंने रीतिकाल के 'नख-शिख' वर्णन और दरबारी चाटुकारिता के केंचुल को उतार फेंका और साहित्य को 'जन' से जोड़ा।
वे आधुनिकता के पहले रचनाकार थे, जिन्होंने साहित्य को महल की प्राचीरों से निकालकर काशी की गलियों और गांव के चौपालों तक पहुँचाया। उन्होंने देश की गरीबी, पराधीनता और शासकों के अमानवीय शोषण को साहित्य का मुख्य स्वर बनाया।
रचना संसार: विविध विधाओं के जनक
भारतेंदु जी केवल एक लेखक नहीं थे, वे स्वयं में एक 'संस्थान' थे। हिंदी गद्य, नाटक, आलोचना और पत्रकारिता इन सबका आज जो विशाल वटवृक्ष हम देखते हैं, उसका बीज भारतेंदु ने ही बोया था।
नाटक: 'अंधेर नगरी' और 'भारत दुर्दशा' जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने सत्ता की विसंगतियों पर जो तीखा प्रहार किया, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।
व्यंग्य और हास्य (Satire & Humor)
शब्दों के माध्यम से तीखा प्रहार उनके रचना संसार की विशिष्टता है युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए भारतेंदु जी ने 'मुकरियों' और हास्य विधा का प्रयोग किया। उन्होंने पोंगापंथ और भ्रष्टाचार पर जमकर प्रहार किया।
बन्दर सभा: राजनैतिक विडंबनाओं पर कटाक्ष।
बकरी विलाप: सामाजिक कुरीतियों का उपहास।
नये ज़माने की मुकरी: बदलते वक्त और पश्चिमी अंधानुकरण पर प्रहार।
पत्रकारिता: 'कविवचनसुधा', 'हरिश्चंद्र मैगजीन' और नारी शिक्षा हेतु 'बालाबोधिनी' निकालकर उन्होंने समाज को आईना दिखाया।
कविता: जहाँ गद्य में वे 'खड़ी बोली' के पक्षधर थे, वहीं कविता में 'ब्रजभाषा' के माधुर्य को सहेजते रहे। 'प्रेम मालिका', 'प्रेम सरोवर' उनके हृदय की कोमलता के साक्ष्य हैं।
भारतेंदु मंडल: सामूहिकता का सौंदर्य
भारतेंदु की सबसे बड़ी शक्ति उनका 'मंडल' था। उन्होंने अकेले यात्रा नहीं की, बल्कि अपने साथ प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट और बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' जैसे मेधावियों की एक पूरी फौज खड़ी की। यह 'भारतेंदु मंडल' साहित्यिक शुचिता और देशप्रेम का वह केंद्र था, जहाँ विचार विनिमय से नवजागरण की ऊर्जा निकलती थी। यह मंडल एक परिवार की तरह था, जिसमें 'निज भाषा' और 'निज राष्ट्र' के प्रति अटूट समर्पण था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके मंडल के योगदान पर मीमांसा का विश्लेषण हिन्दी साहित्य के इतिहास में।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनका 'भारतेन्दु मंडल' केवल एक कालखंड का नाम नहीं है, बल्कि यह वह संधिकाल है जहाँ से भारतीय मनीषा ने मध्यकालीनता की जकड़न को तोड़कर आधुनिकता की खुली हवा में सांस लेना शुरू किया। अकादमिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह युग 'पुनर्जागरण' (Renaissance) का काल था।
नीचे भारतेन्दु मंडल के योगदान का एक मौलिक और प्रवाहमय विश्लेषण प्रस्तुत है:
भारतेन्दु मंडल: हिन्दी साहित्य का नव-प्रभात
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अपनी प्रतिभा के प्रकाश से जिस मंडल को आलोकित किया, उसने हिन्दी साहित्य को 'रीति-श्रृंगार' की बंद गलियों से निकालकर 'जन-जीवन' के विस्तृत मैदान में खड़ा कर दिया। इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि साहित्य अब राजाओं के दरबार की वस्तु न रहकर जनता के सुख-दुख का दर्पण बन गया। नीचे उनके महत्वपूर्ण कार्यों को बिंदुओं में दिया गया है :
1. आधुनिकता का शंखनाद और खड़ी बोली का परिमार्जन
भारतेन्दु ने यह समझ लिया था कि बदलते समय के साथ भाषा का बदलना अनिवार्य है। जहाँ कविता में ब्रजभाषा का माधुर्य बना रहा, वहीं गद्य के लिए उन्होंने खड़ी बोली को संस्कारित किया। 'दशरथ विलाप' और 'फूलों का गुच्छा' जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया कि खड़ी बोली मात्र संवाद की भाषा नहीं, बल्कि संवेदना व्यक्त करने का सशक्त माध्यम भी है।
2. राष्ट्रीय चेतना और वैचारिक क्रांति
इस मंडल के साहित्यकारों (जैसे प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन') ने केवल साहित्य नहीं रचा, बल्कि राष्ट्र का निर्माण किया। ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषण नीति को उन्होंने बखूबी समझा। भारतेन्दु की पंक्तियाँ
"अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी,
पै धन बिदेश चलि जात इहै अति ख्वारी"
उस दौर के आर्थिक राष्ट्रवाद का सबसे सटीक उदाहरण हैं।
3. सामाजिक सुधार और विद्रोही तेवर
भारतेन्दु मंडल का साहित्य सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध एक मोर्चा था। उन्होंने विधवा विवाह, नारी शिक्षा और छुआछूत जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखा। अंधविश्वास और रूढ़िवादिता पर प्रहार करने के लिए उन्होंने हास्य-व्यंग्य को हथियार बनाया। उनके नाटकों में दिखने वाला तीखापन समाज को आईना दिखाने का काम करता था।
4. विधाओं का विन्यास और पत्रकारिता का उदय
यह युग हिन्दी गद्य की विधाओं के 'शैशव काल' का स्वर्ण युग था।
नाटक: 'भारत दुर्दशा' और 'अंधेर नगरी' जैसे नाटकों के जरिए राजनीतिक चेतना जगाई गई।
पत्रकारिता: 'कविवचनसुधा' और 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' जैसी पत्रिकाओं ने साहित्य को जन-आंदोलन बना दिया। पत्रकारिता यहाँ केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनमत तैयार करने वाली एक 'बौद्धिक कार्यशाला' थी।
5. सामूहिक नेतृत्व की अनूठी मिसाल
भारतेन्दु मंडल की सबसे बड़ी विशेषता 'समूह-चेतना' थी। भारतेन्दु एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे। उन्होंने अपने समकालीन लेखकों को एक मंच पर लाकर एक ऐसा साहित्यिक वातावरण तैयार किया, जिसने आने वाले 'द्विवेदी युग' और 'छायावाद' की नींव रखी।
निष्कर्षतः
भारतेन्दु मंडल ने हिन्दी साहित्य को 'स्व' की पहचान दी। उन्होंने गद्य में आधुनिकता पिरोई, पद्य में राष्ट्रीयता भरी और पत्रकारिता को एक मिशन बनाया। सही मायनों में, भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक भारत के वे पहले स्वप्नद्रष्टा थे, जिन्होंने कलम को तलवार से अधिक प्रभावशाली बनाकर जन-जागरण का महायज्ञ संपन्न किया।
भारतेन्दु की वैचारिक समकालीनता: वर्तमान संकट और समाधान
आज जब विश्व वैश्वीकरण और बाजारवाद के दौर में अपनी सांस्कृतिक जड़ें खो रहा है, तब भारतेन्दु हरिश्चंद्र का 'स्वदेशी' और 'निज भाषा' का आह्वान और भी प्रखर होकर उभरता है। भारतेन्दु ने उन्नीसवीं सदी में ही समझ लिया था कि आर्थिक पराधीनता ही सांस्कृतिक गुलामी की नींव होती है। आज का उपभोक्तावाद हमें उसी मानसिक दासता की ओर धकेल रहा है, जहाँ हमारी कला और साहित्य 'उत्पाद' बनकर रह गए हैं।
साहित्यिक शुचिता और नैतिक पतन के इस दौर में, जहाँ लेखन अक्सर व्यक्तिगत लाभ या सतही लोकप्रियता का माध्यम बन गया है, भारतेन्दु का 'लोक-मंगलकारी' दृष्टिकोण एक आदर्श है। उन्होंने साहित्य को 'ड्राइंग रूम' की विलासिता से निकालकर सड़क की धूल और जन-आकांक्षाओं से जोड़ा था। वर्तमान में जब संकीर्ण राष्ट्रवाद और क्षेत्रवाद की दीवारें ऊंची हो रही हैं, भारतेन्दु का राष्ट्रवाद 'समावेशी' था। उन्होंने विभिन्न मतों और समुदायों को एक सूत्र में पिरोने के लिए 'वैष्णव भक्ति' और 'भारतीयता' का एक व्यापक सांस्कृतिक ढांचा पेश किया, जो नफरत नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का पक्षधर था।
भाषाई विवाद के संदर्भ में भारतेन्दु का सूत्र "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल" आज भी भाषाई अस्मिता की रक्षा का सबसे बड़ा मंत्र है। यह केवल हिन्दी का समर्थन नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा के माध्यम से वैश्विक ज्ञान को आत्मसात करने की प्रेरणा है। आज जब हम अंग्रेजी के वर्चस्व के नीचे अपनी बोलियों को बिसरा रहे हैं, भारतेन्दु हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का साहस देते हैं।
अतः, भारतेन्दु केवल एक इतिहास पुरुष नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक मशाल' हैं। उनकी प्रासंगिकता बाजारवाद के विरुद्ध 'स्व' को बचाने में, क्षेत्रवाद के विरुद्ध 'अखंड भारत' की कल्पना में और नैतिक पतन के विरुद्ध 'साहित्यिक शुचिता' को पुनः स्थापित करने में निहित है। उन्होंने सिखाया था कि आधुनिक होने का अर्थ अपनी मौलिकता खोना नहीं, बल्कि अपनी जमीन पर खड़े होकर आकाश को छूना है।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' और 'मीमांसा मंडल' का संकल्प
वेब पत्रिका 'मीमांसा' भारतेंदु जी को केवल एक ऐतिहासिक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा के रूप में देखती है। आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचनाओं की बाढ़ है पर संवेदनाओं का अकाल, 'मीमांसा' उसी 'भारतेंदु मंडल' की तर्ज पर 'मीमांसा मंडल' का सृजन कर रही है।
हमारा उद्देश्य केवल साहित्य सृजन नहीं, बल्कि साहित्यिक शुचिता और समावेशी भाव को पुनर्स्थापित करना है। हम उस ऋषि-मुनि परंपरा के संवाहक बनना चाहते हैं, जहाँ ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ धर्म था। 'मीमांसा मंडल' आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सेतु है। हम चाहते हैं कि आज का युवा जब कीबोर्ड पर उंगलियां चलाए, तो उसे अपनी मिट्टी की महक और भारतेंदु के उस कालजयी मंत्र की गूँज सुनाई दे:
"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिना निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥"
सांस्कृतिक पुनरुत्थान और हमारा कार्य
भारतेंदु जी ने कहा था - "सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार"। 'मीमांसा' इसी सिद्धांत पर चलते हुए विश्व के आधुनिक ज्ञान को अपनी भाषा में समेटने और अपनी गौरवशाली संस्कृति को वैश्विक मंच पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। हम सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए केवल शब्दों का जाल नहीं बुनते, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार कर रहे हैं जहाँ साहित्य सामाजिक न्याय और राष्ट्रबोध का पर्याय बने।
उपसंहार
बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र का जाना हिंदी साहित्य के एक सूर्य का अस्त होना था, पर उनके द्वारा छोड़ी गई आधुनिकता की किरणों ने जो सवेरा किया, हम उसी की संतानें हैं। 'मीमांसा' परिवार उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह संकल्प लेता है कि हम अपनी भाषा की गरिमा और ऋषि परंपरा की मर्यादा को कभी आंच नहीं आने देंगे।
आइए, हम सब मिलकर भारतेंदु के सपनों का भारत बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाएं, जहाँ भाषा केवल माध्यम न हो, बल्कि हमारे स्वाभिमान की पहचान हो।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' हिंदी साहित्य और सांस्कृतिक नवजागरण में महान योगदान देने के लिए बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र जी को उनके पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करता है।
संपादक
अमन कुमार होली
© वेब पत्रिका 'मीमांसा'
महत्वपूर्ण सूचना (Disclaimer & Copyright)
अस्वीकरण: यह आलेख बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से प्रकाशित एक साहित्यिक एवं शैक्षणिक प्रयास है। आलेख में संकलित तथ्य ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित हैं। 'मीमांसा' पत्रिका का उद्देश्य किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि साहित्यिक पुनरुत्थान और सांस्कृतिक चेतना का प्रसार करना है।
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