काव्यांजलि शब्द-यज्ञ में आज इन्द्र ज्योति राय की कविता "प्रेम करती है स्त्री"
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के 'काव्यांजलि: शब्द-यज्ञ' स्तंभ में आज हम एक ऐसी रचना के साथ उपस्थित हैं, जो स्त्री के मौन समर्पण और उसके निश्छल प्रेम की गहरी परतों को उधेड़ती है।
स्त्री का अस्तित्व सदियों से त्याग और सेवा की आधारशिला पर टिका रहा है। प्रस्तुत कविता "स्त्री का संघर्ष और उसका प्रेम" में रचनाकार इन्द्र ज्योति राय जी ने स्त्री के उस रूप को चित्रित किया है, जहाँ वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक 'ऊर्जा' बनकर पूरे परिवार को सींचती है। जब पुरुष का धैर्य थकने लगता है, तब स्त्री अपनी इच्छाओं का विसर्जन कर 'प्रेम' को एक नए अर्थ देती है।
और उसका प्रेम सबसे अलग है;
संसार के सभी प्रेमों में सर्वोत्तम है।
एक इंतज़ार करता हुआ पुरुष
जब थक जाता है, तो
प्रेम निभाती हुई स्त्री,
अपनी इच्छाओं को विसर्जित कर,
किसी की खुशी के लिए
अपना प्रेम लुटाती है।
एक स्त्री के रूप में
शीत, ग्रीष्म और वर्षा
के मायने उसके लिए होते नहीं।
चिड़ियों के घोंसले छोड़ने के
पहले बिस्तर छोड़ना,
लगाए हुए अलार्म बजने के पहले
नींद आँखों में लिए रसोई में घुसकर,
उनके लिए जीने के बहाने
खोजती है; जिनसे प्रेम करती है।
कभी जली खीर, ज्यादा नमक की दाल,
कच्ची, अधपकी सब्जी परोसकर,
सारे संवाद चुपचाप सुनकर;
आम की भीड़ में, खास दिखती है,
अलग एहसास परोसती है।
चूल्हे में जलती आग पर,
रिश्तों की थाली सजाती है;
इसलिए मूक रहकर,
प्रेम करती है स्त्री।
— इन्द्र ज्योति राय
अनुवाद अधिकारी, पूर्व रेलवे (मालदा मंडल)
अस्वीकरण (Disclaimer)
विचारों की अभिव्यक्ति: इस स्तंभ 'काव्यांजलि: शब्द-यज्ञ' में प्रकाशित कविता "स्त्री का संघर्ष और उसका प्रेम" रचनाकार इन्द्र ज्योति राय जी के निजी विचारों और सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' का उद्देश्य केवल साहित्य और कला को प्रोत्साहन देना है।
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