अक्षर देह की संजीवनी: डिजिटल मरुस्थल में हस्तलेखन का वसंत। माॅं सरस्वती और लेखनी विशेष। विमर्श -स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय।

आज का दिन नियति का एक सुंदर संयोग है। एक ओर वसंत पंचमी का उल्लास है, जहाँ हम माता वागेश्वरी की आराधना कर ज्ञान और सृजन का आशीष माँग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आज 'राष्ट्रीय हस्तलेखन दिवस' (National Handwriting Day) भी है। यह संयोग हमें अपनी जड़ों और अपनी अभिव्यक्ति के सबसे मौलिक माध्यम 'हस्तलेखन' की ओर लौटने का संकेत दे रहा है।
जब हम लेखन की बात करते हैं, तो अनायास ही कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का स्मरण हो आता है। उन्होंने स्वयं को गर्व से 'कलम का मजदूर' और 'कलम का सिपाही' कहा था। उनके लिए कलम मात्र एक उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध एक अस्त्र थी। उनके हाथों की उंगलियों के निशानों से सनी हुई वे पांडुलिपियाँ गवाह हैं कि साहित्य केवल मस्तिष्क से नहीं, बल्कि पसीने और श्रम से उपजा था।
किंतु आज के इस डिजिटल युग में, जहाँ कीबोर्ड और टच-स्क्रीन ही हमारी अभिव्यक्ति का संसार बन गए हैं, हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछना होगा: "आज हम किस तरह के सिपाही हैं?" क्या हम 'कलम के सिपाही' हैं या 'कीबोर्ड के क्लर्क'? क्या हमारी रचनात्मकता अब केवल 'सॉफ्टवेयर' और 'एल्गोरिदम' की मोहताज होकर रह गई है? 

चूंकि आज वसंत पंचमी है। प्रकृति के आँगन में पलाश दहक रहे हैं और अमराइयों में कोयल की कूक ने ऋतुराज के आगमन की सूचना दे दी है। यह पर्व केवल प्रकृति के श्रृंगार का नहीं, बल्कि 'शब्द' और 'शारदा' की वंदना का पर्व है। माता वागेश्वरी, जो वीणा की झंकार से सृष्टि में नाद का संचार करती हैं और जिनके हाथों में 'पुस्तक' ज्ञान का प्रतीक है, उनकी अहैतुक कृपा हम सब पर बनी रहे।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेष विमर्श स्तंभ में, मैं आप सभी सुधि पाठकों का आत्मीय अभिनंदन करता हूँ। आज का हमारा विमर्श उस कला पर केंद्रित है जो मानवीय चेतना की पहली अभिव्यक्ति थी, जिसे हमने मिट्टी पर उकेरा, भोजपत्रों पर उतारा और कागज पर सहेजा अर्थात 'हस्तलेखन' (Handwriting)।

डिजिटल ऑंधी और लुप्त होता 'श्यामपट्ट'

आज का युग सूचना क्रांति का है। हमारी उंगलियाँ अब कलम की जगह की-बोर्ड (Keyboard) और टच-स्क्रीन पर नाचती हैं। चॉक की वह खुरदुरी आवाज और श्यामपट्ट (Blackboard) की वह धवल लिखाई, जो हमारे बचपन के मानस पटल पर अंकित थी, अब 'डिजिटल बोर्ड' की चकाचौंध में कहीं खो गई है। स्मार्टफोन की आभासी दुनिया ने हमें 'टाइप' करना तो सिखा दिया, लेकिन 'लिखना' कहीं पीछे छूट गया।
विमर्श का प्रश्न यह है कि क्या हम केवल तकनीक अपना रहे हैं, या अपनी मौलिक प्रज्ञा (Cognitive Intelligence) को दांव पर लगा रहे हैं? जब हम टाइप करते हैं, तो वह एक यांत्रिक प्रक्रिया होती है। लेकिन जब हम कागज पर कलम चलाते हैं, तो मस्तिष्क, नेत्र और हाथ के बीच एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित होता है। यह केवल अक्षरों का निर्माण नहीं, बल्कि संवेदनाओं का प्रकटीकरण है।

हस्तलेखन क्यों है अपरिहार्य? एक तार्किक विश्लेषण
डिजिटल उपकरणों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता, परंतु हस्तलेखन का विकल्प वे कभी नहीं हो सकते। इसके पीछे ठोस मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक तर्क हैं:

संज्ञानात्मक विकास : न्यूरोसाइंस के शोध बताते हैं कि लिखते समय मस्तिष्क के विशिष्ट हिस्से सक्रिय होते हैं, जो स्मृति और सीखने की क्षमता को बढ़ाते हैं। की-बोर्ड पर 'A' दबाना और कागज पर 'अ' की आकृति उकेरना, दोनों की मानसिक प्रक्रिया में जमीन-आसमान का अंतर है।

एकाग्रता और धैर्य: डिजिटल दुनिया 'कॉपी-पेस्ट' और 'डिलीट' की दुनिया है। यहाँ त्रुटि सुधारना एक क्लिक का काम है। इसके विपरीत, हस्तलेखन धैर्य की मांग करता है। यहाँ हर अक्षर के पीछे विचार की गहराई होती है।

व्यक्तित्व का दर्पण: हस्तलेखन मनुष्य के व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होता है। किसी के लिखे अक्षरों की बनावट, उनका झुकाव और दबाव उसके स्वभाव की कहानी कहते हैं। ग्राफोलॉजी (Graphology) इसी विज्ञान पर आधारित है।

यूरोपीय अनुभव और भारतीय संदर्भ

यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि जिन यूरोपीय देशों ने सबसे पहले पारंपरिक शिक्षा को तकनीक से रिप्लेस किया था, वे अब पुनः 'बैक टू बेसिक्स' (Back to Basics) की ओर मुड़ रहे हैं। स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों में, जहाँ टैबलेट और लैपटॉप प्राथमिक शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बन गए थे, वहाँ अब पुनः हस्तलेखन और शारीरिक पुस्तकों पर जोर दिया जा रहा है। इसका कारण यह है कि उन्होंने अनुभव किया कि अत्यधिक स्क्रीन-टाइम बच्चों की रचनात्मकता और मौलिक चिंतन (Creative Thinking) को कुंद कर रहा है।

भारतीय स्कूलों में आज इसी चेतना की आवश्यकता है। हमारे यहाँ 'अक्षरारंभ' को संस्कार माना गया है। यदि हमारी नई पीढ़ी केवल स्क्रीन पर उंगलियाँ चलाना जानती है और कलम पकड़ना नहीं, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जिसके पास सूचनाएँ तो होंगी, पर 'प्रज्ञा' का अभाव होगा।

साहित्यिक विमर्श: कागज और लेखनी का प्रेम

साहित्य की दृष्टि से देखें तो कलम केवल एक उपकरण नहीं, वह सर्जक की आत्मा का विस्तार है। महादेवी वर्मा की पांडुलिपियों को देखें या प्रेमचंद के कटे-छँटे मसूदे को उनमें एक तड़प और जीवंतता महसूस होती है। कागज पर स्याही का फैलना, किसी शब्द को काटकर पुनः लिखना, यह सब लेखक की मानसिक यात्रा के पड़ाव हैं।
डिजिटल फोंट्स में एकरूपता होती है, पर उनमें वह 'ऊष्मा' (Warmth) नहीं होती जो हाथ से लिखी गई चिट्ठी या डायरी के पन्ने में होती है। अपनी माँ के हाथ से लिखे दो शब्द जो सुख देते हैं, वह व्हाट्सएप का 'इमोजी' कभी नहीं दे सकता।

निष्कर्ष: वसंत का संकल्प

मेरे प्रिय पाठकों, तकनीक हमारी दासी होनी चाहिए, स्वामिनी नहीं। डिजिटल बोर्ड ज्ञान का प्रसार करें, पर श्यामपट्ट की गरिमा और हस्तलेखन की सात्विकता को जीवित रखना हमारा उत्तरदायित्व है। आज वसंत पंचमी के इस पावन अवसर पर, आइए हम संकल्प लें:

 प्रतिदिन कम से कम एक पृष्ठ हाथ से लिखेंगे।
 अपने बच्चों को केवल 'क्लिक' करना नहीं, बल्कि सुंदर 'सुलेख' लिखना सिखाएंगे।
 डायरी और कलम को पुनः अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएंगे।
लेखन कला में परिष्कार केवल व्याकरण का शुद्ध होना नहीं है, बल्कि हृदय के भावों का कागज पर उतरना है। माता शारदा हमें वह दृष्टि दें कि हम इस आभासी चक्रव्यूह से निकलकर अपनी मौलिक मौलिकता को अक्षुण्ण रख सकें।
'मीमांसा' का यह विमर्श केवल एक लेख नहीं, एक आह्वान है अपनी जड़ों की ओर लौटने का।

विमर्श -स्तंभ/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 

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