प्रेमचंद का नारी-संसार: प्रगतिशीलता और आधुनिकता का पुनर्पाठ। वागेश्वरी स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। अमन कुमार होली।
आज राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर यह विमर्श सार्वभौमिकता और साहित्यिक चेतना का नवीन उन्मेष है। साहित्य केवल समाज का दर्पण नहीं होता, बल्कि वह समाज की उन सुप्त चेतनाओं को स्वर देने का माध्यम भी है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के विमर्शों में अनसुना कर दिया जाता है। जब हम हिंदी कथा-साहित्य के शिखर पुरुष मुंशी प्रेमचंद के सृजन-संसार में प्रवेश करते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसा कैनवास खुलता है जहाँ 'नारी' केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक युग-परिवर्तक शक्ति के रूप में उभरती है।
आज 'मीमांसा' के इस अंक में हम प्रेमचंद के उपन्यासों के माध्यम से स्त्री-पात्रों की प्रगतिशीलता, उनकी वैचारिक प्रखरता और स्वतंत्रता की उन अनकही परतों को टटोलने का प्रयास कर रहे हैं, जो आज के आधुनिक दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व: गोदान की धनिया
प्रेमचंद के अंतिम और सबसे महान उपन्यास 'गोदान' की धनिया को अक्सर एक ग्रामीण, अपढ़ और संघर्षशील स्त्री के रूप में देखा जाता है। परंतु, यदि हम सूक्ष्मता से देखें, तो धनिया प्रेमचंद की सबसे प्रखर और आधुनिक पात्र सिद्ध होती है। उसकी आधुनिकता किसी विदेशी जीवन-शैली में नहीं, बल्कि उसके 'अन्याय के प्रति विद्रोह' में निहित है।
जब होरी लोक-लाज और मर्यादा के डर से झुक जाता है, तब धनिया वह स्तंभ है जो समाज के ठेकेदारों और पंचों को ललकारती है। वह 'झुनिया' को आश्रय देकर सामाजिक बहिष्कार का साहस दिखाती है। यह धनिया की वैचारिक स्वतंत्रता ही है कि वह परिवार की रक्षा के लिए धर्म के आडंबरों से टकराने में संकोच नहीं करती।
त्याग की प्रतिमा से चेतना की ओर: सेवासदन की सुमन
'सेवासदन' हिंदी उपन्यास के इतिहास में नारी-विमर्श का प्रस्थान बिंदु है। सुमन का पात्र यह सिद्ध करता है कि एक स्त्री की स्वतंत्रता उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति से गहरे जुड़ी होती है। प्रेमचंद ने सुमन के माध्यम से यह प्रश्न उठाया कि 'पवित्रता' की परिभाषा केवल देह तक सीमित क्यों है?
सुमन का वेश्यावृत्ति के दलदल से निकलकर समाज सेवा की ओर बढ़ना, उसकी प्रगतिशीलता का परिचायक है। वह समाज द्वारा थोपी गई ग्लानि को त्याग कर आत्म-सम्मान की राह चुनती है। यहाँ प्रेमचंद यह संकेत देते हैं कि स्त्री की मुक्ति केवल घर की चहारदीवारी में नहीं, बल्कि उसकी चेतना के जागृत होने में है।
बुद्धि और विवेक की प्रखरता: गबन की जालपा
'गबन' की जालपा को प्रायः आभूषणों की लोभी स्त्री मान लिया जाता है, किंतु उपन्यास के उत्तरार्ध में उसका जो रूप उभरता है, वह अद्भुत है। पति रमानाथ के पलायन के बाद जालपा जिस प्रकार अपने स्वाभिमान को जगाती है और पति के अपराधबोध को कम करने के लिए संघर्ष करती है, वह उसकी चरित्रगत दृढ़ता को दर्शाता है। वह केवल एक भावुक पत्नी नहीं, बल्कि एक तर्कशील नारी है जो विषम परिस्थितियों में नेतृत्व करना जानती है।
राजनीति और राष्ट्रवाद: कर्मभूमि की सुखदा
मुंशी जी के उपन्यासों में स्त्रियाँ केवल घर तक सीमित नहीं रहीं। 'कर्मभूमि' की सुखदा राजनीतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। वह घरेलू सुख-सुविधाओं का त्याग कर सड़कों पर उतरती है और आंदोलन का नेतृत्व करती है। सुखदा का यह स्वरूप आज की 'एक्टिविस्ट' नारी का पूर्व-संकेत है। यहाँ प्रेमचंद स्त्री को राष्ट्र-निर्माण की मुख्यधारा में खड़ा करते हैं, जो उस समय के लिए अत्यंत क्रांतिकारी कदम था।
संपादकीय 'वागेश्वरी' के इस विस्तार में हम प्रेमचंद के उन पात्रों की ओर बढ़ते हैं, जो पारंपरिक सांचे को पूरी तरह तोड़कर आधुनिकता और वैचारिक प्रखरता के नए प्रतिमान स्थापित करते हैं। निर्मला, मिस मालती और सोफिया ये तीनों पात्र प्रेमचंद की विकासशील दृष्टि के तीन अलग-अलग पड़ाव हैं।
नियति से संघर्ष और आत्मबोध: 'निर्मला'
उपन्यास 'निर्मला' को अक्सर एक 'दुखांत' और 'बेमेल विवाह' की कहानी माना जाता है, लेकिन इसकी गहराई में झांकें तो निर्मला का पात्र अपनी प्रखरता से समाज को आईना दिखाता है।
विद्रोही चेतना: निर्मला केवल एक पीड़िता नारी नहीं है। वह उस समाज की विद्रूपता का प्रतीक है जहाँ एक युवा लड़की को वृद्ध के साथ ब्याह दिया जाता है। अपनी किशोरावस्था की मासूमियत को खोकर वह जिस गरिमा के साथ घर की जिम्मेदारियाँ संभालती है और पति के संदेहों का सामना करती है, वह उसकी आंतरिक दृढ़ता का प्रमाण है।
प्रगतिशीलता: निर्मला की प्रगतिशीलता उसके त्याग में है। वह अपनी सौत के बच्चों के प्रति जो मातृत्व भाव रखती है, वह उसे एक संकीर्ण ईर्ष्यालु स्त्री से ऊपर उठाकर एक महान मानवीय पात्र बना देता है। उसका अंत दुःखद है, लेकिन वह समाज के पुरुष-सत्तात्मक ढाँचे पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
पश्चिम और पूर्व का समन्वय: 'गोदान' की मिस मालती
यदि प्रेमचंद के साहित्य में 'आधुनिक स्त्री' का कोई पूर्ण स्वरूप देखना हो, तो वह मिस मालती है। मालती प्रेमचंद की सबसे प्रखर और बौद्धिक पात्र है।
बाह्य आधुनिकता से आंतरिक परिवर्तन: उपन्यास की शुरुआत में मालती एक तितली की तरह चंचल, पाश्चात्य संस्कृति में रंगी और पुरुषों को रिझाने वाली आधुनिक नारी लगती है। लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, वह सेवा, त्याग और ग्रामीण उत्थान की ओर मुड़ती है।
स्वतंत्र व्यक्तित्व: मालती आर्थिक रूप से स्वतंत्र है (वह एक डॉक्टर है)। वह विवाह को जीवन का एकमात्र लक्ष्य नहीं मानती। मेहता के साथ उसके संबंध 'बराबरी' और 'बौद्धिक साझेदारी' पर टिके हैं, न कि किसी सामाजिक बंधन पर। उसकी प्रखरता उसके तर्कों में झलकती है, जहाँ वह मेहता जैसे विद्वान को भी निरुत्तर कर देती है। मालती प्रेमचंद की वह नारी है जो 'मिस' से 'दीदी' बनने की यात्रा में अपनी स्वायत्तता (Autonomy) को नहीं खोती।
वैचारिक गरिमा और धार्मिक उदारता: 'रंगभूमि' की सोफिया
सोफिया प्रेमचंद के उपन्यासों की सबसे 'इंटेलेक्चुअल' और दार्शनिक पात्र कही जा सकती है। वह ईसाई परिवार से है, लेकिन उसके विचार किसी भी संकीर्ण धर्म की सीमाओं में नहीं बँधे हैं।
सत्य की खोज: सोफिया अपनी माँ के कट्टरपंथ का विरोध करती है। उसकी स्वतंत्रता उसकी आत्मा की खोज में है। वह विनय सिंह के प्रेम में पड़ने के बाद भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करती।
नैतिक साहस: सोफिया का चरित्र यह दर्शाता है कि एक स्त्री के लिए उसका विवेक सर्वोपरि है। वह न केवल राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय होती है, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी साहसपूर्ण निर्णय लेती है।
सोफिया के माध्यम से प्रेमचंद ने उस 'विश्व-नागरिक' स्त्री की कल्पना की थी, जो धर्म, जाति और राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता की बात करती है।
जीवन संगिनी शिवरानी की प्रतिच्छवि प्रेमचंद के स्त्री पात्रों में
प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री की यह प्रखरता केवल कल्पना की उपज नहीं थी। इसके मूल में उनकी अपनी जीवनसंगिनी शिवरानी देवी का ओजस्वी व्यक्तित्व था। शिवरानी जी केवल प्रेमचंद की पत्नी नहीं थीं, बल्कि वे स्वयं एक जुझारू स्वतंत्रता सेनानी, लेखिका और प्रखर वैचारिक नारी थीं।
विद्रोही चेतना का प्रतिबिंब: जिस दौर में विधवा-विवाह एक सामाजिक अपराध माना जाता था, उस समय प्रेमचंद ने एक बाल-विधवा (शिवरानी देवी) से विवाह कर अपनी प्रगतिशीलता का परिचय दिया। शिवरानी जी के भीतर जो स्वाभिमान और साहस था, वही हमें 'धनिया' की निर्भीकता और 'जालपा' के आत्मबोध में दिखाई देता है।
सक्रिय राष्ट्रवाद: शिवरानी देवी गांधीवादी आंदोलनों में सक्रिय रहीं और जेल भी गईं। 'कर्मभूमि' की सुखदा जब सड़कों पर उतरकर आंदोलन का नेतृत्व करती है, तो उसके पीछे शिवरानी देवी के उस यथार्थ संघर्ष की छाया साफ़ देखी जा सकती है।
कलम और कदम का साथ: उन्होंने 'प्रेमचंद घर में' जैसी संस्मरणात्मक कृति लिखकर यह सिद्ध किया कि वे एक तटस्थ समीक्षक भी थीं। प्रेमचंद के पात्रों में जो 'स्वतंत्रता' और 'तर्कशीलता' है, वह शिवरानी जी के उस व्यक्तित्व का विस्तार है जिसने प्रेमचंद को घर के भीतर ही एक 'आधुनिक और सशक्त नारी' से संवाद करने का अवसर दिया।
निस्संदेह, यदि शिवरानी देवी का व्यक्तित्व इतना प्रखर न होता, तो शायद प्रेमचंद के स्त्री पात्रों में वह तेज और स्वायत्तता (Autonomy) न आ पाती जो आज भी हमें विस्मित करती है। प्रेमचंद ने शिवरानी जी के संघर्षों को देखा, महसूस किया और फिर उन्हें अमर पात्रों के रूप में साहित्य में ढाल दिया।
तुलनात्मक पुनर्मूल्यांकन: एक आत्मीय दृष्टि
प्रिय पाठकों, जब हम प्रेमचंद के सृजन-संसार की इन नारी-शक्तियों का पुनर्मूल्यांकन करते हैं, तो हमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य को हृदयंगम करना होगा। अक्सर आधुनिक आलोचनात्मक विमर्शों में इन पात्रों को 'पश्चिमी नारीवाद' (Western Feminism) के संकीर्ण चश्मे से देखने की भूल की जाती है। किंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी और भारतीय मिट्टी की सोंधी सुगंध से रची-बसी है।
प्रेमचंद की आधुनिक स्त्री को किसी आयातित विचारधारा के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। उनकी प्रगतिशीलता का स्रोत हमारी अपनी गौरवशाली परंपरा रही है। धनिया का साहस हो या सोफिया की दार्शनिकता इनमें हमें गार्गी की विद्वत्ता, अहिल्याबाई का न्याय, महारानी लक्ष्मीबाई का ओज और लोपामुद्रा के विवेक की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
शक्ति के सामंजस्य व सह-अस्तित्व का सनातन स्वर
प्रेमचंद ने जिस 'नारी चेतना' को गढ़ा है, वह स्त्री-पुरुष के मध्य किसी सत्ता-संघर्ष (Conflict) की उपज नहीं, बल्कि सनातन विवेक और सह-अस्तित्व का मधुर संगीत है। यहाँ 'आधुनिकता' का अर्थ परंपरा का विनाश नहीं, बल्कि उसका परिष्कार है।
संस्कार और सामंजस्य: इन पात्रों में जहाँ सेवा भाव और वात्सल्य की कोमलता है, वहीं अन्याय के विरुद्ध तर्क की प्रखरता भी है।
नैतिकता की थाती: जालपा और निर्मला जैसी स्त्रियाँ यह सिद्ध करती हैं कि स्वायत्तता (Autonomy) का अर्थ स्वच्छंदता नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग निष्ठा है।
वैचारिकी का संतुलन: मिस मालती का रूपांतरण यह दर्शाता है कि पाश्चात्य शिक्षा जब भारतीय संवेदना के संपर्क में आती है, तो वह 'लोक-कल्याण' का माध्यम बन जाती है।
शिवरानी देवी: सृजन की जीवंत प्रेरणा
इस संपूर्ण विमर्श का सबसे प्रखर निष्कर्ष शिवरानी देवी के जीवन-आदर्शों में निहित है। वे प्रेमचंद के साहित्य की केवल मूक गवाह नहीं, बल्कि उसकी चेतना की 'ऊर्जा' थीं। उनके जीवन से हमें तीन मुख्य आदर्श मिलते हैं जो प्रेमचंद के साहित्य का आधार बने:
वैचारिक स्वाधीनता: जिस दौर में घूँघट की मर्यादा ही स्त्री का भाग्य थी, उस दौर में शिवरानी जी ने न केवल कलम थामी, बल्कि स्वाधीनता संग्राम में जेल जाकर यह सिद्ध किया कि स्त्री का असली गहना उसका आत्म-सम्मान और राष्ट्र-प्रेम है।
रूढ़ि-भंजन का साहस: एक बाल-विधवा के रूप में उनके जीवन का संघर्ष और प्रेमचंद के साथ उनका विवाह, भारतीय समाज में 'पुनर्जागरण' का साक्षात उदाहरण था। उन्होंने सिखाया कि परंपराएँ यदि मनुष्यता के आड़े आएँ, तो उन्हें तोड़ना ही धर्म है।
तटस्थ सहगामिनी: 'प्रेमचंद घर में' लिखकर उन्होंने एक पत्नी के पारंपरिक मोह से ऊपर उठकर एक साहित्यकार का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। यह उनके व्यक्तित्व की वह ऊँचाई थी, जो उन्हें प्रेमचंद के समकक्ष खड़ा करती है।
निष्कर्षतः, प्रेमचंद की नायिकाएँ पुरुष के विरुद्ध खड़ी कोई विद्रोही इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे समाज के रथ का वह दूसरा पहिया हैं, जो समान धरातल पर चलकर ही जीवन को गति प्रदान करती हैं। शिवरानी देवी के आदर्शों ने इन पात्रों को वह 'तेज' दिया, जो आज की नारी के लिए भी एक मार्गदर्शक मशाल की तरह है।
धनिया, सुमन, सुखदा जालपा, निर्मला, मालती और सोफिया ये केवल कागज के पात्र नहीं हैं, बल्कि प्रेमचंद द्वारा गढ़े गए वे 'आइडिया' हैं जो बताते हैं कि स्त्री की आधुनिकता उसके वस्त्रों में नहीं, बल्कि उसके विचारों की स्पष्टता में है। जहाँ निर्मला सामाजिक व्यवस्था का दंश झेलकर भी अपनी नैतिकता नहीं खोती, वहीं मालती और सोफिया सक्रिय रूप से समाज को बदलने का बीड़ा उठाती हैं।
प्रेमचंद ने सौ साल पहले इन पात्रों के माध्यम से जो प्रश्न उठाए थे, वे आज भी 'मीमांसा' की मेज पर विचारणीय हैं। क्या हमने वास्तव में मालती जैसी बौद्धिक स्वतंत्रता पा ली है? क्या आज की निर्मलाएँ सुरक्षित हैं?
ये पात्र हमें निरंतर यह याद दिलाते रहेंगे कि स्त्री की प्रगतिशीलता उसकी अपनी पहचान (Identity) को सुरक्षित रखने और अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करने में ही निहित है।
प्रेमचंद की दृष्टि: एक पुनर्पाठ की आवश्यकता
प्रेमचंद ने अपने स्त्री पात्रों को केवल 'आदर्श' की वेदी पर बलि नहीं चढ़ाया, बल्कि उन्हें हाड़-मांस के मनुष्य के रूप में चित्रित किया। उनकी स्त्रियाँ:
प्रखर हैं: वे चुपचाप सहने के बजाय सवाल पूछती हैं।
स्वतंत्र हैं: वे अपने निर्णयों के परिणाम भुगतने का साहस रखती हैं।
आधुनिक हैं: वे रूढ़ियों को तभी मानती हैं जब वे तर्क की कसौटी पर खरी उतरें।
"नारी केवल प्रेम की प्रतिमा नहीं, वह शक्ति का पुंज भी है।" प्रेमचंद का यह दर्शन उनके प्रत्येक उपन्यास में मुखरित होता है।
संपादकीय टिप्पणी : जेंडर का 'गुटनिरपेक्ष' विमर्श और सह-अस्तित्व का नया व्याकरण
आज का समाज वैचारिक रूप से शीत युद्ध के उस दौर में खड़ा नजर आता है, जहाँ या तो आप 'पितृसत्ता' के कट्टर समर्थक हैं या फिर 'उग्र नारीवाद' के ध्वजवाहक। इस टकराव ने स्त्री और पुरुष के बीच के सहज मानवीय संबंधों को एक अदृश्य युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है। 'मीमांसा' का यह अंक इस बाइनरी (दो ध्रुवों) को नकारते हुए एक गुटनिरपेक्ष वैचारिकी का प्रस्ताव रखता है।
ध्रुवीकरण का संकट: शोषक बनाम शोषिता
आज विमर्श की मुख्यधारा ने स्त्री को अनंत 'पीड़िता' और पुरुष को जन्मजात 'अपराधी' या 'शोषक' के रूप में चिन्हित कर दिया है। यह ठीक वैसा ही है जैसे शीत युद्ध के समय राष्ट्रों को अमेरिका या सोवियत संघ में से किसी एक को चुनना अनिवार्य था। किंतु, क्या हम भूल गए हैं कि समाज की इकाई 'सत्ता' नहीं, 'संबंध' है?
प्रेमचंद के पात्र धनिया, मालती या सोफिया किसी पुरुष को पराजित करने के लिए संघर्ष नहीं करतीं, बल्कि वे एक न्यायपूर्ण समाज के लिए संघर्ष करती हैं। जब धनिया होरी से लड़ती है, तो वह होरी 'पुरुष' से नहीं, बल्कि होरी की 'कायरता' और समाज के 'पाखंड' से लड़ती है। यह 'गुटनिरपेक्ष' दृष्टि है, जो व्यक्ति को उसके लिंग से नहीं, उसके विवेक से आंकती है।
कॉलेज की छात्राओं के लिए 'दृष्टि': स्वायत्तता बनाम स्वच्छंदता
आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर कॉलेज की छात्राओं के सामने 'आधुनिकता' के नाम पर कई भ्रामक परिभाषाएँ परोसी जा रही हैं। उनके लिए प्रेमचंद की नायिकाओं के माध्यम से तीन मुख्य बिंदु विचारणीय हैं:
बौद्धिक संप्रभुता: मिस मालती की तरह आपकी आधुनिकता आपके पहनावे से अधिक आपके तर्कों और पेशेवर दक्षता (Professional Excellence) में झलकनी चाहिए। आर्थिक स्वतंत्रता आत्म-सम्मान की पहली सीढ़ी है, लेकिन वह अहंकार का साधन नहीं होनी चाहिए।
अन्याय का प्रतिकार, न कि घृणा: धनिया हमें सिखाती है कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना 'शक्ति' है, लेकिन किसी वर्ग विशेष से घृणा करना 'कमजोरी'। आपका संघर्ष व्यवस्था के विरुद्ध होना चाहिए, सहयात्री के विरुद्ध नहीं।
विवेक का गुटनिरपेक्ष होना: किसी भी विचारधारा (Ism) के पीछे आँख मूँदकर चलने के बजाय, परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन करना सीखें। क्या वह विचार वास्तव में आपको सशक्त बना रहा है या आपको केवल एक नई तरह की 'पहचान की राजनीति' का हिस्सा बना रहा है?
मातृसत्ता बनाम पितृसत्ता: सह-अस्तित्व का विकल्प
इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता का पलड़ा एक तरफ झुका है, शोषण का नया स्वरूप पैदा हुआ है। यदि पितृसत्ता ने दमन किया है, तो उसका उत्तर 'प्रति-दमन' नहीं हो सकता। नेहरू जी की गुटनिरपेक्षता की तरह, हमें 'सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व' (Peaceful Co-existence) के पंचशील सिद्धांतों को घर और समाज के भीतर लागू करना होगा।
प्रेमचंद के यहाँ 'नारी शक्ति' का अर्थ पुरुष का अभाव नहीं है। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। जालपा और रमानाथ का संबंध इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ रमानाथ गिरता है, वहाँ जालपा उसे सहारा देकर उठाती है, न कि उसे गिरा हुआ देखकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करती है। यही वह 'वैचारिकी बोध' है जिसकी वकालत 'मीमांसा' कर रही है।
आधुनिक महिलाओं के लिए मीमांसा का आह्वान
आज की कामकाजी और गृहणी महिलाओं के लिए संदेश स्पष्ट है अपनी 'एजेंसी' (निर्णय लेने की शक्ति) को पहचानें।
शिवरानी देवी का मार्ग: उन्होंने प्रेमचंद के साथ कदम से कदम मिलाकर काम किया, जेल गईं, लिखा और घर भी संभाला। उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक स्त्री एक ही समय में विद्रोही भी हो सकती है और निर्मात्री भी।
संवाद का सेतु: पुरुष सत्ता को 'शत्रु' मानने के बजाय उसे 'संवाद' के लिए बाध्य करें। परिवर्तन अक्सर टकराव से नहीं, बल्कि निरंतर तार्किक संवाद से आता है।
निष्कर्ष: 'मीमांसा' का संकल्प
"मेरा यह विमर्श उन दो महान व्यक्तित्वों को समर्पित है, जिन्होंने मुझे सिखाया कि स्त्री और पुरुष युद्धरत राष्ट्र नहीं, बल्कि एक ही आकाश के नीचे बसे दो ऐसे वृक्ष हैं जो एक-दूसरे की छाँव में फलते-फूलते हैं। मेरे माता-पिता का जीवन ही प्रेमचंद की उस चेतना का वास्तविक अनुवाद है।"
आज जब हम 21 वीं सदी में स्त्री-अधिकारों की बात करते हैं, तो प्रेमचंद के पात्र हमें आधारभूत वैचारिक धरातल प्रदान करते हैं। उनकी प्रगतिशीलता पाश्चात्य अनुकरण नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों के भीतर से उपजी न्यायप्रियता है। 'मीमांसा' का यह प्रयास है कि हम अपने कालजयी साहित्य को वर्तमान संदर्भों में फिर से पढ़ें और समझें कि प्रेमचंद ने जिस 'नारी चेतना' का स्वप्न देखा था, वह आज किस मोड़ पर है।
आशा है कि यह शोधपरक दृष्टि आप सुधि पाठकों को पसंद आएगी और एक नई बौद्धिक बहस को जन्म देगी।
उपरोक्त विमर्श के माध्यम से हम एक ऐसे समाज का स्वप्न देख रहे हैं जहाँ कोई 'मार्जिन' (हाशिये) पर न हो। जहाँ स्त्री का विकास पुरुष के पतन पर आधारित न हो, और पुरुष की गरिमा स्त्री के दमन पर न टिकी हो।
यह 'गुटनिरपेक्ष' प्रयास कठिन है क्योंकि यहाँ आपको दोनों पक्षों के चरमपंथियों से जूझना होगा। लेकिन जिस तरह नेहरू की ज्योति ने गुटनिरपेक्ष देशों को एक नई पहचान दी, वैसे ही यह 'वैचारिकी बोध' समाज को जेंडर-युद्ध से निकालकर 'मानव-विकास' की ओर ले जाएगा।
हमें 'शोषक' और 'शोषित' के ठप्पों से बाहर निकलकर 'सहयात्री' बनना होगा। यही प्रेमचंद के पात्रों का सार है और यही आज की आधुनिकता की सच्ची कसौटी है।
सादर,
वागेश्वरी स्तंभ/ संपादकीय आलेख
अमन कुमार होली
संपादक, मीमांसा
डिस्क्लेमर और वैचारिक स्पष्टीकरण (Disclaimer & Ideological Clarification)
'मीमांसा' के इस अंक में प्रस्तुत विचार मुंशी प्रेमचंद के संपूर्ण कथा-साहित्य (विशेषतः सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि एवं गोदान) के गहन विश्लेषण और संपादक के निजी जीवन-दर्शन पर आधारित हैं।
पाश्चात्य नारीवाद बनाम भारतीय सह-अस्तित्व :-
यह आलेख पाश्चात्य नारीवाद (Western Feminism) की उन धाराओं से वैचारिक असहमति व्यक्त करता है जो स्त्री-पुरुष संबंधों को केवल 'पावर स्ट्रगल' (सत्ता संघर्ष) के रूप में देखती हैं। जैसा कि सिमोन द बोउआर ने अपनी पुस्तक 'The Second Sex' में स्त्री के 'अदर' (Other) होने की व्याख्या की है, या केट मिलेट ने 'Sexual Politics' में पितृसत्ता को एक दमनकारी राजनीति बताया है हमारा विमर्श इन सिद्धांतों को भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में 'गुटनिरपेक्ष' दृष्टि से देखता है। हम बेट्टी फ्राइडन की 'The Feminine Mystique' में वर्णित घरेलू अलगाव को स्वीकारते हुए भी, समाधान के रूप में सह-अस्तित्व को सर्वोपरि मानते हैं।
व्यक्तिगत प्रेरणा का स्रोत :-
इस आलेख में प्रतिपादित 'सह-अस्तित्व' की अवधारणा केवल किताबी नहीं है, बल्कि यह संपादक के माता-पिता के निजी जीवन की जीवंत प्रतिच्छाया है। उनके जीवन में पुरुष का अनुशासन और स्त्री की ममता परस्पर विरोधी ध्रुव नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। यह 'मीमांसा' उसी पारिवारिक संतुलन का विस्तार है, जहाँ अधिकार की लड़ाई नहीं, बल्कि कर्तव्य और सम्मान का साझा बोध है।
शोधपरक दृष्टिकोण :-
पाठकों को सूचित किया जाता है कि यहाँ प्रस्तुत व्याख्या साहित्य के 'पुनर्पाठ' (Rereading) की एक मौलिक प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य किसी भी वर्ग या लिंग की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि नेहरूवादी गुटनिरपेक्षता की तर्ज पर जेंडर-विमर्श को चरमपंथ से बचाकर एक संतुलित मानवीय धरातल प्रदान करना है।
कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा चेतावनी नीति (Copyright & Intellectual Property Policy)
इस आलेख, कविता और संपादकीय सामग्री की समस्त बौद्धिक संपदा संपादक, अमन कुमार होली के पास सुरक्षित है। 'मीमांसा' पत्रिका की लिखित अनुमति के बिना इस सामग्री का किसी भी रूप में उपयोग करने पर निम्नलिखित शर्तें लागू होंगी:
उद्धरण (Citation): यदि कोई शोधार्थी या लेखक इस आलेख के अंशों का उपयोग करना चाहता है, तो उसे उचित 'साइटेशन' (सन्दर्भ) देना अनिवार्य है। (जैसे: होली, अमन कुमार, 'जेंडर का गुटनिरपेक्ष विमर्श', मीमांसा, 2026)।
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