मकर संक्रांति : आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं खगोलीय घटनाओं का सनातन पर्व। विमर्श -स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। स्तंभकार - इन्द्र ज्योति राय।
भारतीय संस्कृति में 'संक्रांति' केवल एक तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष के मिलन का उत्सव है। जब सूर्य देव धनु राशि का परित्याग कर अपने पुत्र शनि की राशि 'मकर' में प्रवेश करते हैं, तो यह संक्रमण काल 'मकर संक्रांति' कहलाता है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है, जो न केवल धार्मिक आस्था को पुष्ट करता है बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह में आने वाले भौतिक परिवर्तनों को भी रेखांकित करता है।
खगोलीय एवं वैज्ञानिक विश्लेषण: प्राचीन एवं आधुनिक दृष्टिकोण
मकर संक्रांति का मूल आधार पृथ्वी की अपनी धुरी पर 23.5^{circ} का झुकाव है। इसी झुकाव के कारण सूर्य की स्थिति में छह-छह माह के अंतराल पर परिवर्तन होता है।
उत्तरायण का विज्ञान: शीत ऋतु में सूर्य दक्षिणी गोलार्ध की ओर झुका होता है। मकर संक्रांति वह बिंदु है जहाँ से सूर्य विषुवत रेखा को पार कर उत्तर की ओर अग्रसर होता है। आधुनिक विज्ञान (NASA और ISRO) इसे 'Winter Solstice' के आसपास की घटना मानता है। हालांकि, पृथ्वी की 'Precession of Equinoxes' (अयन चलन) के कारण वास्तविक उत्तरायण (21-22 दिसंबर) और पारंपरिक मकर संक्रांति (14-15 जनवरी) में वर्तमान में लगभग 23-24 दिनों का अंतर आ गया है।
वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों के प्रमाण: NASA एवं ISRO: आधुनिक सैटेलाइट डेटा और टेलीस्कोपिक गणनाएं पुष्ट करती हैं कि इस समय सूर्य की किरणों का आपतन कोण (Angle of Incidence) बदलने से उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि बढ़नी शुरू होती है।
कॉसमॉस (रूस) एवं चीनी/जापानी मिशन: रूसी अंतरिक्ष केंद्र 'कॉसमॉस' और जापानी 'JAXA' के शोध पत्र बताते हैं कि सौर वायु (Solar Winds) और भू-चुंबकीय ऊर्जा में इस दौरान सूक्ष्म परिवर्तन होते हैं, जो पृथ्वी के वायुमंडल और जैविक चक्र को प्रभावित करते हैं। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने बिना किसी आधुनिक उपकरण के इन खगोलीय गणनाओं को 'मकर संक्रांति' के रूप में सटीक रूप से स्थापित किया था।
ज्योतिषीय एवं पंचांग गणना
हिंदू पंचांग के अनुसार, संक्रांति का निर्धारण सूर्य के गोचर काल पर निर्भर करता है।
समय निर्धारण: यदि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश सूर्यास्त के पश्चात होता है, तो पुण्यकाल अगले दिन मनाया जाता है। पंचांगों में सूक्ष्म गणितीय अंतर (दृक पक्ष बनाम सायन पक्ष) के कारण ही यह पर्व कभी 14 तो कभी 15 जनवरी को पड़ता है।
राशि परिवर्तन: ज्योतिष शास्त्र में इसे 'सौभाग्य के द्वार' का खुलना माना जाता है, जहाँ से देवताओं का दिन (उत्तरायण) आरंभ होता है।
सांस्कृतिक विविधता में एकता
भारत की भौगोलिक और भाषाई विविधता के बावजूद, यह पर्व संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोता है:
| क्षेत्र | पर्व का नाम | मुख्य विशेषता |
| उत्तर भारत | खिचड़ी / लोहड़ी | तिल-गुड़ का सेवन, पवित्र स्नान और अग्नि पूजन। |
| दक्षिण भारत | पोंगल | नई फसल के चावल उबालना और गो-वंश की पूजा। |
| असम (पूर्वोत्तर) | माघ बिहू / भोगाली बिहू | सामुदायिक भोज और पारंपरिक नृत्य। |
| गुजरात/महाराष्ट्र | उत्तरायण / सकरात | आकाश में पतंगबाजी और दान-पुण्य की परंपरा। |
| बंगाल | पौष पार्वण | पीठे-पायस का निर्माण और गंगासागर स्नान। |
आयुर्वेद एवं स्वास्थ्य पक्ष
मकर संक्रांति में प्रयुक्त होने वाले खाद्य पदार्थ (तिल, गुड़, खिचड़ी) केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहन आयुर्वेद पर आधारित हैं। कड़ाके की ठंड में शरीर को ऊष्मा (Energy) प्रदान करने के लिए तिल और गुड़ का सेवन किया जाता है। खिचड़ी का सेवन पाचन तंत्र को सुचारू रखने और नई फसल के सम्मान का प्रतीक है।
निष्कर्ष: 'मीमांसा' का आधुनिक विश्लेषण
'मीमांसा' की दृष्टि से देखें तो मकर संक्रांति केवल एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि 'खगोल विज्ञान' और 'मानव चेतना' के अंतर्संबंधों का प्रकटीकरण है। जहाँ एक ओर आधुनिक अंतरिक्ष एजेंसियां सौर मंडल के रहस्यों को सुलझा रही हैं, वहीं हमारी प्राचीन परंपराएं उन रहस्यों को उत्सव के रूप में सदियों से जी रही हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि हम ब्रह्मांड का हिस्सा हैं और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तालमेल बिठाना ही जीवन की सार्थकता है।
विमर्श -स्तंभ/विशेषांक
© इन्द्र ज्योति राय
अनुवाद अधिकारी,
पूर्व रेलवे (मालदा मंडल)
अस्वीकरण (Disclaimer)
सूचनात्मक उद्देश्य: यह आलेख पूर्णतः सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें मकर संक्रांति के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पहलुओं का विश्लेषण लेखक के निजी शोध और l 'मीमांसा' पत्रिका के वैचारिक दृष्टिकोण पर आधारित है।
वैज्ञानिक संदर्भ: आलेख में ISRO, NASA और अन्य अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियों (जैसे कॉसमॉस, JAXA) का संदर्भ प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान की आधुनिक परिप्रेक्ष्य में तुलना करने के लिए लिया गया है। यह तुलना एक विश्लेषणात्मक अध्ययन है और इसे किसी भी एजेंसी का आधिकारिक प्रमाणीकरण पत्र नहीं माना जाना चाहिए।
धार्मिक आस्था: आलेख में व्यक्त विचार विभिन्न पंचांगों और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास और पंचांग भेद के कारण तिथियों और प्रथाओं में भिन्नता संभव है।
त्रुटि सुधार: यद्यपि व्याकरणिक शुद्धता और तथ्यों की सत्यता का पूर्ण ध्यान रखा गया है, फिर भी किसी भी तकनीकी त्रुटि के लिए प्रकाशक या लेखक उत्तरदायी नहीं होंगे।
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