प्रज्ञा की अलौकिक आभा और ऋषि परंपरा का संकल्प महाभिनिष्क्रमण: काल के कपाल पर अंकित नेताजी का 'द ग्रेट एस्केप' । शूरवीर स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

भारतीय वाङ्मय में 'ऋषि' उसे कहा गया है जो मंत्रद्रष्टा है, जो चर्मचक्षुओं से परे सत्य को साक्षात देख सके। नेताजी सुभाष चंद्र बोस आधुनिक भारत के उसी सनातन ज्ञान परंपरा, प्रदीप्त मेधा और ओजस्विनी प्रज्ञा के अमर ध्वजवाहक थे। 'मीमांसा' के इस 'शूरवीर' स्तंभ में हम उस महामानव का तर्पण कर रहे हैं, जिसने पराधीनता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्न करने के लिए केवल शस्त्र ही नहीं उठाए, बल्कि अपनी विलक्षण बुद्धि और अदम्य साहस से उस 'महाभिनिष्क्रमण' को सिद्ध किया, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें पाताल तक हिला दीं।

यह केवल एक सैन्य पलायन नहीं था; यह तो बुद्ध के उस महाभिनिष्क्रमण की भांति था जहाँ एक राजकुमार निर्वाण के लिए घर छोड़ता है। यहाँ सुभाष बाबू ने अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग भारत माता की मुक्ति के 'निर्वाण' के लिए किया था।

पृष्ठभूमि: नज़रबंदी और कूटनीतिक बिसात

          नेताजी सुभाष का पैतृक घर, कलकत्ता 

वर्ष 1940 का अंत होते-होते द्वितीय विश्वयुद्ध की ज्वाला धधक उठी थी। नेताजी का मानना था कि "ब्रिटेन की विपत्ति, भारत के लिए अवसर है।" उन्हें कोलकाता के उनके आवास (38/2, एल्गिन रोड) में नज़रबंद कर दिया गया था। उनके घर के बाहर 62 खुफ़िया पुलिसकर्मी तैनात थे। लेकिन नेताजी की मेधा ने एक ऐसी योजना बुनी जिसकी कल्पना ब्रिटिश इंटेलिजेंस कभी नहीं कर सकती थी।
उन्होंने 'मौलवी जियाउद्दीन' का छद्म वेश धारण किया लंबी सघन दाढ़ी, गरिमामय शेरवानी, एक गोल टोपी और आँखों में भारत के उज्ज्वल भविष्य का अटल संकल्प। उन्होंने अपने परिवार को विश्वास दिलाया कि वे एकांत साधना (मौन व्रत) पर जा रहे हैं, ताकि उनकी अनुपस्थिति का किसी को आभास न हो।

रात्रि,  सन्नाटा और 'वेंडरर BLA 7169'

वेंडरर BLA 7169 कार जिसे ग्रेट एस्केप में उपयोग किया गया था।

16-17 जनवरी 1941 की वह हिमानी मध्यरात्रि। कोलकाता के एल्गिन रोड स्थित आवास पर एक ऐसा सन्नाटा पसरा था, जिसमें आने वाले तूफ़ान की आहट छिपी थी। इस महायात्रा के सारथी बने उनके अनुज-तुल्य भतीजे शिशिर कुमार बोस।

नेताजी सुभाष के भतीजे शिशिर कुमार बोस युवावस्था और प्रौढ़ावस्था की तस्वीर 

गैरेज में खड़ी थी इतिहास की साक्षी, काले रंग की वेंडरर कार (Wanderer W24), जिसका नंबर BLA 7169 आज भी शौर्य की वर्णमाला जैसा प्रतीत होता है। जब शिशिर बाबू ने इंजन प्रज्वलित किया, तो पुलिस की शंका दूर करने के लिए उन्होंने पहले ही इंजन को कई बार 'स्टार्ट' कर यह आभास दिला दिया था कि गाड़ी की मरम्मत हो रही है। आधी रात को जब गाड़ी घर से निकली, तो वह परतंत्रता की कड़ियों के टूटने की प्रथम ध्वनि थी।

यात्रा के कठिन पड़ाव: कोलकाता से काबुल तक

नेताजी का यह पथ पुष्पों की शय्या नहीं, अपितु बाधाओं की कटीली राहों से निर्मित था। 'मीमांसा' के पाठकों के समक्ष वे शब्द-बिंब किसी अलौकिक चलचित्र की भांति जीवंत हो उठते हैं:
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस गोमो स्टेशन पर लगी उनकी स्मृति प्रतीमा।

कोलकाता से गोमोह: वे धनबाद के समीप 'गोमोह' स्टेशन पहुँचे। यहाँ से उन्होंने 18 जनवरी  1941 को प्लेटफार्म संख्या 2 से 'हावड़ा-कालका फ्रंटियर मेल' पकड़ी। गोमोह स्टेशन को आज 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन' के नाम से जाना जाता है।
पेशावर का संघर्ष: पेशावर में उन्हें मियाँ अकबर शाह और भगत राम तलवार (जो बाद में रहमत खान के नाम से उनके साथ रहे) जैसे क्रांतिकारियों का सहयोग मिला।
काबुल की अग्नि-परीक्षा: यह सबसे दुर्गम भाग था। हाड़ कँपाती ठंड में पहाड़ों को पार करते हुए वे काबुल पहुँचे। यहाँ उन्होंने 'उत्तमचंद मल्होत्रा' की दुकान पर शरण ली। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने गूंगे-बेहरे होने का स्वांग रचा। एक विश्व प्रसिद्ध वक्ता का राष्ट्र के लिए मौन हो जाना, उनकी मेधा की पराकाष्ठा थी।

बर्लिन का मार्ग: 'ओरलैंडो मैत्ज़ोटा' का उदय

ओरलैंडो मैत्ज़ोटा के रूप में इटालियन भेष-भूषा में नेताजी 

काबुल में रूसी दूतावास से मदद न मिलने पर उन्होंने इतालवी और जर्मन दूतावास से संपर्क किया। अंततः, वे 'ओरलैंडो मैत्ज़ोटा' नामक एक इतालवी राजनयिक बनकर काबुल से समरकंद और फिर मास्को होते हुए बर्लिन पहुँचे। यह 90 दिनों की ऐसी यात्रा थी जिसने भूगोल को चुनौती दी और इतिहास को नई दिशा।

ऐतिहासिक तथ्य एवं रोचक जानकारियाँ (Research Section)

इतालवी पासपोर्ट: नेताजी ने जिस पासपोर्ट का उपयोग किया, वह इटली के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किया गया था।
             क्रांतिकारी जासूस भगतराम तलवार 

भगत राम तलवार: वे दुनिया के एकमात्र 'क्विंटुपल एजेंट' (पांच देशों के लिए जासूसी करने वाले) माने जाते हैं, जिन्होंने नेताजी को सीमा पार कराने में मुख्य भूमिका निभाई।
ब्रिटिश विफलता: नेताजी के भागने की खबर ब्रिटिश सरकार को 26 जनवरी 1941 को (पलायन के 10 दिन बाद) लगी, जब वे अदालत की पेशी पर उपस्थित नहीं हुए।

सिनेमाई पर्दे पर 'द ग्रेट एस्केप'

नेताजी के इस अदम्य साहस को भारतीय सिनेमा ने विभिन्न कालखंडों में संजोने का प्रयास किया है:
| फिल्म का नाम | निर्देशक | मुख्य अभिनेता (नेताजी) | विशेष टिप्पणी |

| Netaji Subhas Chandra Bose: The Forgotten Hero (2004) | श्याम बेनेगल | सचिन खेडेकर | इस फिल्म में 'द ग्रेट एस्केप' को बहुत ही बारीकी और ऐतिहासिक सटीकता के साथ दिखाया गया है। |

| Subhas Chandra (1966) | पीयूष बोस | अमर दत्ता | एक क्लासिक बंगाली फिल्म जो उनके प्रारंभिक जीवन और संघर्षों पर आधारित है। |
| Bose: Dead/Alive (Web Series 2017) | पुलकित | राजकुमार राव | यह सीरीज उनके पलायन और उनके पीछे के रहस्यों को आधुनिक शैली में प्रस्तुत करती है। |

| Gumnaami (2019) | सृजित मुखर्जी | प्रसेनजीत चटर्जी | यह फिल्म उनके जीवन के बाद के रहस्यों और मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट पर आधारित है। |

वैचारिक अधिष्ठान: 'चरैवेति चरैवेति'

'मीमांसा' अपनी सनातन चेतना के साथ उद्घोष करती है कि नेताजी की प्रज्ञा में उपनिषदों का वह ओज था जो 'चरैवेति चरैवेति' के मंत्र को चरितार्थ करता था। सुभाष बाबू ने यह सिद्ध कर दिया कि जब विचार 'संकल्प' बन जाते हैं, तो भूगोल की दूरियां और साम्राज्य की दीवारें तुच्छ हो जाती हैं।

उपसंहार: राष्ट्र की मेधा को अक्षत-पुष्प अर्पण

आज जब हम इतिहास के झरोखे से उस BLA 7169 कार के पहियों के निशानों को निहारते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो वे निशान आज भी हमें राष्ट्रभक्ति का मार्ग दिखा रहे हैं। शिशिर चंद्र बोस का वह अपूर्व साहस और नेताजी का वह आत्मोत्सर्ग आज की युवा पीढ़ी के लिए एक चिरंतन प्रकाश स्तंभ है।
आइए, 'शूरवीर' स्तंभ के माध्यम से हम उस 'आजाद' सत्ता को नमन करें, जिसने हमें सिखाया कि स्वतंत्रता याचना का विषय नहीं, बल्कि बुद्धि और शौर्य के पवित्र संगम से अर्जित किया जाने वाला 'अमृत' है।
जय हिन्द!


वैचारिक एवं ऐतिहासिक डिस्क्लेमर (Disclaimer)

तथ्यात्मक सटीकता: इस आलेख में वर्णित ऐतिहासिक घटनाओं, तिथियों और संदर्भों (जैसे 'द ग्रेट एस्केप', वेंडरर कार BLA 7169 आदि) को उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों, साक्ष्यों और संदर्भ ग्रंथों के आधार पर संकलित किया गया है। पत्रिका ने तथ्यों की शुद्धता सुनिश्चित करने का यथासंभव प्रयास किया है।
उद्देश्य: 'शूरवीर' स्तंभ का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय चेतना का प्रसार और ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना है। यह किसी भी प्रकार की राजनीतिक विचारधारा या विवाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं है।
सिनेमाई संदर्भ: आलेख में उल्लिखित फिल्मों और निर्देशकों के नाम केवल सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्य के लिए हैं। इनका उद्देश्य किसी फिल्म का विज्ञापन करना या किसी के कॉपीराइट का उल्लंघन करना नहीं है।
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