ओशो : चेतना के वैश्विक उत्सव प्रणेता व दार्शनिक परंपरा के जीर्णोद्धारक। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। अमन कुमार होली



काल की अनंत यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे आते हैं, जो इतिहास लिखने नहीं, बल्कि इतिहास को नया अर्थ देने आते हैं। 19 जनवरी 1990 को पुणे के आश्रम में जब 'ओशो' के भौतिक शरीर ने अंतिम श्वास ली, तो वह केवल एक दार्शनिक का अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी वैश्विक चेतना का विस्तार था, जिसने मनुष्य को धर्म की जड़ता से मुक्त कर 'धार्मिकता' के आनंद से परिचित कराया। वेब पत्रिका 'मीमांसा' आज उनकी पुण्यतिथि पर, साहित्यिक शुचिता और समावेशी भाव के साथ, उस प्रज्ञा पुरुष को याद कर रही है जिन्होंने उपनिषदों की ऋचाओं को आधुनिक मनुष्य के मनोविज्ञान से जोड़कर एक नया सेतु निर्मित किया।

सनातन ज्ञान परंपरा के आधुनिक ध्वजवाहक

ओशो भारतीय मेधा की उस प्राचीन परंपरा के संवाहक थे, जहाँ ज्ञान केवल सूचना नहीं, बल्कि 'साक्षात्कार' है। उन्होंने बुद्ध, महावीर, कृष्ण, कबीर और पतंजलि की उन शिक्षाओं को पुनर्जीवित किया जो सदियों के कर्मकांडों के नीचे दब गई थीं। ओशो ने सनातन धर्म को किसी संकीर्ण घेरे में नहीं बांधा, बल्कि उसे 'सनातन' (जो शाश्वत है) के वास्तविक अर्थ में प्रस्तुत किया। उन्होंने सिद्ध किया कि ऋषि-मुनियों की प्रज्ञा और आधुनिक विज्ञान की मेधा एक ही सत्य के दो छोर हैं।

शब्द-शिल्प और अलौकिक अभिव्यक्ति

ओशो की भाषा में एक अद्भुत जादुई आकर्षण था। उनकी मृदु शैली और अलौकिक शब्द-बिंब पाठक के भीतर एक दृश्य खड़ा कर देते थे। जब वे बोलते थे, तो लगता था कि शब्द नहीं, बल्कि मौन स्वयं स्वर धारण कर रहा है। उनका शब्द-शिल्प 'पाठक वत्सल' था यानी वे जटिल से जटिल दार्शनिक रहस्यों को एक छोटे बच्चे की कहानी की तरह सुबोध बना देते थे। उनके प्रवचनों में हास्य, व्यंग्य, करुणा और बोध का ऐसा मिश्रण था जो विश्व साहित्य में दुर्लभ है।

ज़ोरबा द बुद्धा: जीवन का समग्र स्वीकार

ओशो के दर्शन का केंद्र बिंदु था 'समग्र मनुष्य'। उन्होंने पश्चिम के 'ज़ोरबा' (भौतिकवादी, जीवन प्रेमी) और पूर्व के 'बुद्ध' (ध्यानस्थ, शांत) का मिलन कराया। उनका स्पष्ट मत था कि जब तक मनुष्य भौतिक रूप से समृद्ध और मानसिक रूप से मुक्त नहीं होगा, वह आध्यात्मिक ऊँचाइयों को नहीं छू सकता। 'मीमांसा' की दृष्टि में, ओशो का यह 'समावेशी भाव' ही आज के खंडित समाज के लिए सबसे बड़ा उपचार है। उन्होंने त्याग को नहीं, बल्कि 'जागरूकता के साथ भोग' को मोक्ष का मार्ग बताया।

ध्यान की क्रांतियाँ: सक्रिय ध्यान से साक्षी भाव तक

परंपरागत ध्यान पद्धतियाँ आधुनिक, तनावग्रस्त मनुष्य के लिए कठिन थीं। ओशो ने 'डायनेमिक मेडिटेशन' (सक्रिय ध्यान) और 'नदब्रह्म' जैसी सौ से अधिक विधियाँ दीं। उनका विश्लेषण था कि जब तक भीतर का दमित कचरा (Catharsis) बाहर नहीं निकलेगा, तब तक शांति संभव नहीं है। उन्होंने ध्यान को मंदिर-मस्जिद से निकालकर चौबीस घंटे के 'साक्षी भाव' (Witnessing) में बदल दिया। उनके लिए 'मृदु संगीत सुनना' या 'सजगता से चलना' भी ध्यान था।

विद्रोह और विवाद: सत्य की कठोर कसौटी

ओशो ने संगठित धर्मों, राजनीतिज्ञों और सामाजिक रूढ़ियों पर जो प्रहार किए, उन्होंने उन्हें दुनिया का सबसे विवादित व्यक्ति बना दिया। उन्होंने गांधीवाद की सीमाओं पर बात की, ईसाइयत के पाखंड को उघाड़ा और हिंदुत्व के जड़ कर्मकांडों की आलोचना की। लेकिन 'मीमांसा' का यह विश्लेषण है कि उनके विद्रोह के पीछे कोई द्वेष नहीं, बल्कि एक 'वैद्य' की वह कठोरता थी जो रोग को जड़ से काटने के लिए कड़वी औषधि देता है। उन्होंने स्वयं को 'अमीर आदमी का गुरु' कहा, क्योंकि उनका मानना था कि गरीबी कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक सामाजिक अपराध है।

वैश्विक विरासत और प्रभाव

आज ओशो के शरीर छोड़ने के दशकों बाद भी उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है। 650 से अधिक पुस्तकें और हज़ारों घंटों के ऑडियो-वीडियो प्रवचन आज विश्व की थाती हैं। उनके विचारों का प्रभाव ओरेगन के रेगिस्तान से लेकर पुणे की गलियों तक और आईबीएम (IBM) जैसी कॉर्पोरेट कंपनियों से लेकर आम आदमी के ड्राइंग रूम तक देखा जा सकता है। उनकी 'टेन कमांडमेंट्स' (दस आज्ञाएं) आज भी जीवन जीने का सबसे सहज सूत्र प्रदान करती हैं "जीवन यहीं और अभी है।"

साहित्यिक शुचिता और मेधा का संगम

ओशो ने केवल प्रवचन नहीं दिए, बल्कि उन्होंने विश्व की श्रेष्ठतम साहित्यिक कृतियों, सूफी गीतों, जैन सूत्रों और हसीद कथाओं का पुनर्सृजन किया। 'मीमांसा' के इस विशेषांक का उद्देश्य उस मेधा को रेखांकित करना है जिसने साहित्य को केवल मनोरंजन से ऊपर उठाकर 'स्व-खोज' का साधन बना दिया। उनके शब्द चित्र ऐसे हैं जो पाठक को सांसारिक द्वंद्वों से उठाकर एक 'निर्वात' (Void) में ले जाते हैं, जहाँ केवल शांति और बोध बचता है।
दूसरा खंड : विवाद, विरोध और विकृतियाँ ओशो के इर्द-गिर्द रचे गए मिथक

काल की विडंबना यह है कि जो व्यक्ति मनुष्य को भीतर की स्वतंत्रता का स्वाद चखाता है, वही समाज के सबसे बड़े भय का कारण बन जाता है। ओशो के साथ भी यही हुआ। उनकी प्रज्ञा जितनी ऊँची थी, उनके चारों ओर रचे गए विवाद उतने ही शोरगुल से भरे। “संभोग के गुरु”, “रोल्स-रॉयस बाबा”, “अमीरों के भगवान”, “लग्ज़री देवता”  ये सभी नाम ओशो के विचारों से अधिक समाज की असहजता और असुरक्षा को उजागर करते हैं। ‘मीमांसा’ की दृष्टि में यह आवश्यक है कि इन विवादों को न तो भक्तिमय अंधत्व से देखा जाए और न ही सनसनीखेज निंदा से, बल्कि विवेकपूर्ण विश्लेषण के साथ समझा जाए।

ओरेगॉन प्रयोग : एक स्वप्न, एक टकराव

1980 से 1985 के बीच अमेरिका के ओरेगॉन राज्य में बना रजनीशपुरम केवल एक आश्रम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग था एक ऐसा प्रयास जहाँ ध्यान, सामुदायिक जीवन और आधुनिक प्रबंधन एक साथ जीए जा सकें। ओशो का सपना था कि मनुष्य ऐसा समाज बनाए जहाँ न धर्म का भय हो, न राजनीति की चालाकी; जहाँ ध्यान व्यक्तिगत हो और व्यवस्था सामूहिक।

परंतु यह स्वप्न अमेरिकी सत्ता-संरचना, चर्च और स्थानीय राजनीति को असहज कर गया। हजारों संन्यासियों का आना, ध्यान के साथ उत्सव, मुक्त प्रेम की स्वीकृति और पारंपरिक नैतिकताओं को चुनौती  यह सब उस समाज के लिए अस्वीकार्य था, जो स्वतंत्रता का दावा तो करता है, पर सीमाओं के भीतर। परिणामस्वरूप, ओरेगॉन प्रयोग विवादों, मुकदमों और अंततः षड्यंत्रों में उलझ गया।

‘मीमांसा’ का मानना है कि ओरेगॉन विवाद ओशो की असफलता नहीं, बल्कि उस समाज की सीमाओं का प्रमाण था, जो “फ्रीडम” को केवल शब्दों में स्वीकार करता है, जीवन में नहीं।

संभोग के गुरु : विकृत दृष्टि या अधूरा पाठ?

ओशो पर लगाया गया सबसे लोकप्रिय और सबसे सतही आरोप था  “संभोग के गुरु”। यह आरोप उनके उन प्रवचनों से उपजा, जहाँ उन्होंने काम (Sex) को पाप नहीं, बल्कि जैविक ऊर्जा के रूप में स्वीकार करने की बात कही। ओशो का तर्क सीधा था  जिस ऊर्जा को दबाया जाएगा, वही विकृति बनकर लौटेगी।

उन्होंने कभी भोग को लक्ष्य नहीं बताया, बल्कि कहा कि दमन से मुक्ति ही ध्यान की पहली सीढ़ी है। ओशो के लिए संभोग एक द्वार था, अंतिम गंतव्य नहीं। लेकिन समाज ने उनके कथनों को संदर्भ से काटकर सनसनी बना दिया। ध्यान की ऊँचाइयों तक पहुँचने से पहले मनुष्य को अपनी जैविक सच्चाई से ईमानदार होना पड़ेगा यह बात सुनने का साहस बहुतों में नहीं था।

‘मीमांसा’ की दृष्टि में, यह आरोप ओशो पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर है जो शरीर को गाली और आत्मा को व्यापार बना चुकी है।

रोल्स-रॉयस बाबा : विलास या प्रतीक?

ओशो के पास 93 रोल्स-रॉयस कारों का होना उनके आलोचकों के लिए सबसे आसान हथियार बन गया। प्रश्न उठाया गया  “जो व्यक्ति संन्यास की बात करता है, वह इतनी लग्ज़री क्यों?” पर ओशो ने कभी स्वयं को त्यागी नहीं कहा। उन्होंने स्पष्ट कहा  “गरीबी कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है।” रोल्स-रॉयस उनके लिए विलास नहीं, बल्कि समाज के पाखंड पर एक व्यंग्य था। वे देखना चाहते थे कि लोग एक साधु को कुटिया में स्वीकार करते हैं, लेकिन एक सजग, आनंदित, समृद्ध संन्यासी को नहीं।

उनकी कारें एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग थीं  समाज के भीतर छिपे ईर्ष्या, नैतिकता और वर्ग-घृणा को उजागर करने का माध्यम। ‘मीमांसा’ के अनुसार, रोल्स-रॉयस विवाद ने ओशो से अधिक समाज के भीतर बैठे “नैतिक पुलिस” को बेनकाब किया।

अमीरों के भगवान : आध्यात्मिकता का वर्ग प्रश्न

ओशो ने स्वयं कहा था “मैं अमीर आदमी का गुरु हूँ।” इस वाक्य को लेकर उन्हें अभिजात्यवादी कहा गया। पर उनका आशय स्पष्ट था  जो व्यक्ति भूख से जूझ रहा है, उसके लिए ध्यान विलास है; पहले रोटी, फिर राम।

ओशो मानते थे कि गरीबी आध्यात्मिकता नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय है। इसलिए वे ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहाँ मनुष्य आर्थिक रूप से सुरक्षित हो, ताकि वह ध्यान और प्रेम की ओर बढ़ सके। यह दृष्टि मार्क्सवाद और अध्यात्म के बीच एक सेतु थी, जिसे दोनों ही ध्रुवों ने अस्वीकार किया।

‘मीमांसा’ का मत है कि ओशो ने अध्यात्म को दरिद्रता के रोमानी जाल से मुक्त करने का साहस किया, जिसकी कीमत उन्हें “अमीरों का भगवान” कहे जाने के रूप में चुकानी पड़ी।

लग्ज़री देवता या सौंदर्य का बोध?

ओशो के वस्त्र, उनकी घड़ियाँ, उनका सौंदर्यबोध  सब कुछ “लग्ज़री” कहलाया। परंतु ओशो का कहना था कि सौंदर्य के प्रति संवेदनशीलता ही ध्यान की भूमि तैयार करती है। उनके लिए कुरूपता कोई पुण्य नहीं थी।

उन्होंने जीवन को उत्सव कहा और उत्सव में रंग, संगीत, सुगंध और सौंदर्य स्वाभाविक हैं। ‘मीमांसा’ मानती है कि ओशो का सौंदर्यबोध भारतीय तपस्वी परंपरा की उस रूखी व्याख्या को तोड़ता है, जिसने आनंद को संदेह की दृष्टि से देखा।

विवादों के पार : एक प्रज्ञा की परीक्षा

ओशो के जीवन के ये सभी विवाद वास्तव में सत्य की कसौटी थे। जो व्यक्ति समाज के जमे हुए ढाँचों को चुनौती देता है, उसे पहले उपहास, फिर विरोध और अंततः निंदा का सामना करना पड़ता है। ओशो इससे अछूते नहीं रहे।

पर आज, जब समय का शोर कुछ थमा है, तब स्पष्ट दिखता है कि विवाद क्षणिक थे और विचार शाश्वत। ओरेगॉन ढह गया, रोल्स-रॉयस बिक गईं, आरोप बिखर गए  पर ओशो का ध्यान, उनकी दृष्टि और उनका प्रेम आज भी जीवित है।

निष्कर्ष : शोर के पार मौन

‘मीमांसा’ के इस दूसरे खंड का उद्देश्य न तो ओशो का बचाव करना है और न ही उन्हें देवता बनाना। उद्देश्य है समझना। क्योंकि ओशो को समझना आसान नहीं; वे सुविधा नहीं, चुनौती हैं।

उनके इर्द-गिर्द रचे गए सभी नाम  “संभोग के गुरु” से लेकर “रोल्स-रॉयस बाबा” तक वास्तव में उस समाज की असहजता की कहानी कहते हैं, जो भीतर से डरता है और बाहर दोष खोजता है।

ओशो स्वयं कहते थे 
“सत्य को बदनाम किया जा सकता है, पर मिटाया नहीं।”
और शायद यही उनके जीवन और विवादों का अंतिम सार है।

ओशो का जाना, एक देह का जाना था; उनके विचारों का विसर्जन कभी संभव नहीं। वे एक 'प्रज्ञा के ध्वजवाहक' के रूप में सदैव प्रासंगिक रहेंगे क्योंकि जब तक मनुष्य दुखी है, जब तक मन में अशांति है, तब तक ओशो के 'ध्यान' और 'प्रेम' के सूत्र संजीवनी का काम करते रहेंगे।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' आज इस महामानव को इन शब्दों के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करती है:

"मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक बड़ी शुरुआत है।"

ओशो ने हमें मरना नहीं, बल्कि 'क्षण-क्षण जीना' सिखाया। उनकी पुण्यतिथि पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपने भीतर के 'बुद्ध' को जगाने का संकल्प लें और इस संसार को एक उत्सव (Celebration) बना दें।

 संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा'
नोट: यह आलेख ओशो के दार्शनिक, साहित्यिक और वैश्विक प्रभाव का एक संक्षिप्त सारांश है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

अस्वीकरण: 'मीमांसा' वेब पत्रिका के इस 'ओशो पुण्यतिथि विशेषांक' में प्रकाशित लेख, विचार और विश्लेषण विद्वान लेखकों और संपादकीय टीम के निजी शोध एवं अनुभूतियों पर आधारित हैं। ओशो (आचार्य रजनीश) एक बहुआयामी और वैश्विक व्यक्तित्व रहे हैं; अतः इस आलेख का उद्देश्य किसी की धार्मिक, सामाजिक या व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि उनकी दार्शनिक मेधा और साहित्यिक योगदान का निष्पक्ष विश्लेषण करना है। पत्रिका किसी भी प्रकार के अंधविश्वास या विवादास्पद दावों का समर्थन नहीं करती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपनी प्रज्ञा और विवेक के आधार पर इन विचारों को ग्रहण करें।

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