भारतीय प्रज्ञा की वैश्विक वातायन का आधुनिक साधना स्थल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल । स्वदेश स्वर। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

आज 15 जनवरी है। कलकत्ता की वह सर्द शाम और साल 1784, जब ज्ञान की एक ऐसी लौ जलाई गई जिसने पूरब और पश्चिम के बीच संवाद का एक नया सेतु निर्मित किया। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के आज के इस विशेष स्तंभ "स्वदेश स्वर" में, हम उस संस्था को नमन कर रहे हैं जिसने धूल धूसरित पांडुलिपियों से भारत का वैभव खोज निकाला।

एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल का भवन 17वीं सदी 

एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल एक ऐसा नाम, जो केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय मेधा और वैश्विक जिज्ञासा के मिलन का प्रतीक है। आज इसके स्थापना दिवस पर, हम उन ऋषितुल्य विद्वानों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी और शोध से 'इंडोलॉजी' (भारतीय विद्या) को विश्व के मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया।

ज्ञान की गंगोत्री: स्थापना और उद्देश्य

प्राच्यविद्या विशारद सर विलियम जोन्स ऑफ कलकत्ता 

18वीं शताब्दी का वह दौर जब भारत राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था, तब सर विलियम जोन्स नामक एक प्राच्यविद् (Philologist) ने एक स्वप्न देखा। 15 जनवरी 1784 को जस्टिस रॉबर्ट चैंबर्स की अध्यक्षता में कलकत्ता के फोर्ट विलियम में 30 ब्रिटिश निवासियों के साथ इस संस्था की नींव पड़ी। जोन्स का दृष्टिकोण स्पष्ट था "एशिया की भौगोलिक सीमाओं के भीतर, मनुष्य द्वारा जो कुछ भी किया गया है या प्रकृति द्वारा जो कुछ भी उत्पन्न किया गया है, उसकी जाॅंच करना।"
यद्यपि इसकी स्थापना के पीछे ब्रिटिश सत्ता की अपनी प्रशासनिक आवश्यकताएं और हित रहे होंगे, किंतु अनजाने में ही सही, उन्होंने उस सोई हुई भारतीय विरासत को जगाने का कार्य किया, जो सदियों के अंधकार में कहीं खो गई थी। यह केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं थी, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक तर्कसंगत कसौटियों पर कसने की पहली व्यवस्थित चेष्टा थी। 

एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल का भवन 17वीं सदी 

प्राच्यविद्या और इंडोलॉजी: भारत को फिर से खोजना

एशियाटिक सोसाइटी ने जिस 'ओरिएंटल रिसर्च' की शुरुआत की, उसने विश्व को बताया कि भारत केवल सपेरों या राजा-महाराजाओं का देश नहीं है, बल्कि यह व्याकरण, खगोल विज्ञान, गणित और दर्शन की जननी है।

विलियम जोन्स संस्कृत विद्वानों से संस्कृत का पाठ लेते हुए। यूनिवर्सिटी कॉलेज चैपल, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (यूके) में लगी हुई भित्तिचित्र।

विलियम जोन्स और संस्कृत का वैभव: जोन्स ने जब संस्कृत का अध्ययन किया, तो वे चकित रह गए। उन्होंने ही पहली बार विश्व को बताया कि संस्कृत, लैटिन और ग्रीक भाषाओं का मूल एक ही है। उनके इस भाषाई शोध ने 'लिंग्विस्टिक सर्वे' और आधुनिक भाषा विज्ञान की नींव रखी।

     मौर्यकालीन लिपि ब्राह्मी में अशोक के शिलालेख 

अभिलेखों का वाचन: जेम्स प्रिंसेप जैसे सदस्यों ने जब अशोक के शिलालेखों की ब्राह्मी लिपि को पढ़ा, तो भारत का वह गौरवशाली मौर्य इतिहास जीवित हो उठा, जो विस्मृत हो चुका था।

        जेम्स प्रिंसेप का मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि नोट

पांडुलिपियों का संरक्षण: सोसाइटी ने पूरे भारत से संस्कृत, अरबी और फारसी की दुर्लभ पांडुलिपियों को एकत्रित किया। 'बिब्लियोथेका इंडिका' (Bibliotheca Indica) के माध्यम से इन अप्रकाशित ग्रंथों को अनुवादित कर दुनिया के सामने लाया गया।

समावेशी विकास: यूरोपीय एकाधिकार से भारतीय सहभागिता तक

                      श्रीयुत एच एच विल्सन 

सोसाइटी का इतिहास केवल यूरोपीय विद्वानों तक सीमित नहीं रहा। 1784 से 1828 तक इसके द्वार केवल यूरोपियों के लिए खुले थे, लेकिन 1829 में एच.एच. विल्सन की पहल पर भारतीय प्रज्ञा का इसमें प्रवेश हुआ। द्वारकानाथ टैगोर, रामकमल सेन और प्रसन्न कुमार टैगोर जैसे दिग्गजों ने इसके कार्यों को भारतीय दृष्टि प्रदान की।
                  श्रीयुत राजेन्द्र लाल मित्रा 

1885 में राजेन्द्रलाल मित्रा का सोसाइटी का प्रथम भारतीय अध्यक्ष बनना इस बात का प्रमाण था कि भारतीय विद्वान अपनी परंपराओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करने में किसी से पीछे नहीं थे। बाद में ब्रजेंद्रनाथ दे और इतिहासकार बरुण दे जैसे मनीषियों ने इस विरासत को आगे बढ़ाया।

ज्ञान का अक्षय कोष: पुस्तकालय और संग्रहालय

      दुर्लभ पांडुलिपियों का अन्वेषण करती छात्राएं 

एशियाटिक सोसाइटी का पुस्तकालय आज भी शोधार्थियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है।

        अभिज्ञान शाकुन्तलम् की  दुर्लभ पांडुलिपि

दुर्लभ संग्रह: यहाँ 1,17,000 पुस्तकें और 79,000 पत्रिकाएं हैं। 26 विभिन्न लिपियों में लगभग 47,000 पांडुलिपियां इस बात की गवाह हैं कि यह संस्था भारतीय ज्ञान की रक्षक रही है।

             शाहजहां के हस्ताक्षर एवं शाही मुहरें 

शाहजहाँ के हस्ताक्षर: यहाँ 'पदशाह नामा' जैसी पांडुलिपियां हैं जिस पर स्वयं सम्राट शाहजहाँ के हस्ताक्षर हैं। कुरान की सचित्र प्रतियां और छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा जारी किए गए सिक्के इसकी ऐतिहासिक संपन्नता को दर्शाते हैं।

        अशोक के शिलालेख को देखती शोध छात्रा 

संग्रहालय: 1814 में नथानिएल वालिच की देखरेख में स्थापित इसका संग्रहालय आज भारतीय संग्रहालय (Indian Museum) की जननी माना जाता है। अशोक के बैराट शिलालेख से लेकर पीटर पॉल रूबेन्स की पेंटिंग्स तक, यहाँ कला और इतिहास का अद्भुत संगम है।

आधुनिक शिक्षा पद्धति और वैश्विक प्रसार

श्रीयुत जेम्स प्रिंसेप अन्नपूर्णा मंदिर, काशी (18वीं सदी)

एशियाटिक सोसाइटी का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उसने भारतीय 'पारंपरिक ज्ञान' को 'आधुनिक शोध' की भाषा में अनूदित किया। आज जो हम आधुनिक शिक्षा पद्धति में भारतीय इतिहास, दर्शन और साहित्य पढ़ते हैं, उसका बहुत बड़ा श्रेय इन विद्वानों के उन प्रयासों को जाता है जिन्होंने मौखिक परंपराओं को लिखित और प्रमाणित इतिहास में बदला।


वैश्विक स्तर पर, इस संस्था ने 'इंडोलॉजी' को एक प्रतिष्ठित विषय बनाया। जर्मनी से लेकर अमेरिका तक के विश्वविद्यालयों में यदि आज उपनिषदों और कालिदास के साहित्य पर चर्चा होती है, तो उसके मूल में एशियाटिक सोसाइटी द्वारा किए गए शुरुआती अनुवाद और शोध पत्र ही हैं। इसकी शोध पत्रिका (Journal of the Asiatic Society) आज भी दुनिया भर के विद्वानों के लिए संदर्भ का सबसे बड़ा स्रोत है।

मानवता के प्रति ऋण और उपसंहार
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के पूर्व सदस्यों चाहे वे अंग्रेज रहे हों या भारतीय को श्रद्धांजलि अर्पित करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने उस समय भारत की बौद्धिक संपदा को सहेजा जब हम स्वयं अपनी विरासत के प्रति उदासीन थे। उन्होंने मानवता को यह सिखाया कि ज्ञान किसी भूगोल या जाति की बपौती नहीं है; यह एक बहती धारा है जो निरंतर परिमार्जित होती रहती है। आज के लेख के लिए सामग्री जुटाने के लिए अध्ययन के क्रम में मुझे एशियाटिक सोसायटी के वेबसाइट पर उल्लिखित विलियम जोन्स का वक्तव्य मिला जो कुछ इस प्रकार है कि 

“It will flourish, if naturalists, chemists, antiquaries, philologers and men of science, in different parts of Asia, will commit their observations to writing, and send them to the Asiatic Society at Calcutta; it will languish, if such communications shall be long intermitted; and it will die away, if they shall entirely cease.”

अर्थात् "यह संस्था तब तक पल्लवित और पुष्पित होती रहेगी, जब तक एशिया के विभिन्न क्षेत्रों के प्रकृतिवादी, रसायन शास्त्री, पुरातत्वविद्, भाषाशास्त्री और वैज्ञानिक अपने अवलोकनों को लिपिबद्ध कर उन्हें कलकत्ता स्थित एशियाटिक सोसाइटी को प्रेषित करते रहेंगे; यदि इन संचारों में दीर्घकाल तक व्यवधान आता है, तो यह संस्था अपनी आभा खोने लगेगी; और यदि ये पूर्णतः बंद हो जाते हैं, तो इसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।"
आज वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस संपादकीय विशेषण के माध्यम से हम आह्वान करते हैं कि हमें अपनी इस समृद्ध परंपरा को केवल अतीत के गौरव तक सीमित नहीं रखना चाहिए। हमें इस ज्ञान को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और सामाजिक सरोकारों से जोड़ना होगा। यही उन विद्वानों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

   एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल अब कलकत्ता में 

एशियाटिक सोसाइटी का यह 241 वर्षों का सफर केवल वर्षों की गिनती नहीं है, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की एक अनवरत यात्रा है। आइए, इस पुनीत कार्य की सराहना करें और भारतीय ज्ञान-विज्ञान की इस मशाल को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रज्वलित करने का संकल्प लें। 

स्वदेश-स्वर स्तंभ/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
© संपादक,
वेब पत्रिका 'मीमांसा' 


 डिस्क्लेमर और कॉपीराइट नीति

अस्वीकरण (Disclaimer):

इस लेख में प्रस्तुत विचार और विश्लेषण 'मीमांसा' पत्रिका के संपादकीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। लेख का उद्देश्य एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के ऐतिहासिक योगदानों को रेखांकित करना और पाठकों को भारतीय विरासत के प्रति जागरूक करना है। इसमें दी गई ऐतिहासिक घटनाएँ, तिथियाँ और संदर्भ उपलब्ध अभिलेखों एवं शोध पर आधारित हैं। यद्यपि सामग्री की शुद्धता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया गया है, तथापि पाठक किसी भी शैक्षणिक संदर्भ के लिए आधिकारिक गजेटियर या संस्था के मूल दस्तावेजों का मिलान अवश्य करें।

कॉपीराइट चेतावनी (Copyright Warning):

इस लेख की सामग्री (पाठ, शैली और शोधपरक प्रस्तुति) 'मीमांसा' की बौद्धिक संपदा है। बिना लिखित अनुमति के इस लेख के किसी भी हिस्से का पुनरुत्पादन, वितरण, या किसी अन्य डिजिटल/प्रिंट प्लेटफॉर्म पर प्रकाशन पूर्णतः वर्जित है। यदि आप इस लेख को साझा करना चाहते हैं, तो कृपया मूल यूआरएल (URL) का उपयोग करें। उद्धरण के मामले में पत्रिका का उचित श्रेय (Citation) देना अनिवार्य है।

© 2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा'। सर्वाधिकार सुरक्षित।


Comments

Popular posts from this blog

भारतीय साहित्यों में नायिका भेद और वर्तमान नारी अस्मिता - वेब पत्रिका 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक।

व्यवस्था की विसंगतियों का दरबारी चितेरा : श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी की शाश्वत गूँज

संपादकीय : साहित्यिक शुचिता की मीमांसा और 'दिनकर' के नाम पर "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" के छद्म प्रसार का सत्य