वेब पत्रिका 'मीमांसा' शब्द यज्ञ विशेषांक संपादकीय: एक कलम, खुला आसमान और शब्दों की पावन मीमांसा
यह अत्यंत सुखद संयोग है कि वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह वैचारिक शंखनाद आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुण्यतिथि के पावन अवसर पर हो रहा है। भारतेंदु जी ने जिस प्रकार 'अंधेर नगरी' और 'निज भाषा उन्नति' के माध्यम से सोए हुए राष्ट्र को जगाया था, आज 'मीमांसा' उसी मशाल को डिजिटल युग में थामने का प्रयास कर रही है।
प्रस्तावना: शब्द-यज्ञ का नूतन शंखनाद
आज जब सूचनाओं का तीव्र संक्रमण साहित्य की संवेदना को निगल रहा है और तकनीक का वेग मानवीय 'विवेक' को पीछे छोड़ रहा है, तब हिंदी साहित्य के आकाश में 'मीमांसा' का उदय मात्र एक घटना नहीं, बल्कि एक वैचारिक प्रतिवाद है। आधुनिक हिंदी साहित्य के भगीरथ, बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए, यह पत्रिका उनके उसी 'नवजागरण' के स्वप्न को पुनर्जीवित करने का संकल्प लेती है।
भारतेंदु जी ने जिस प्रकार 'भारतेंदु मंडल' के माध्यम से एक पूरी पीढ़ी को वैचारिक स्वतंत्रता और लोक-कल्याण के मार्ग पर खड़ा किया था, आज उसी तर्ज पर हम 'मीमांसा मंडल' के गठन की घोषणा करते हैं। यह मंडल उन लेखकों, विचारकों और नवांकुरों का साझा मंच होगा जो पुरस्कारों की चाटुकारिता और मठाधीशों के 'तिलिस्म' से मुक्त होकर केवल 'सत्य' और 'शिव' की साधना करना चाहते हैं।
प्रस्तुत संपादकीय 'एक कलम, खुला आसमान और शब्दों की पावन मीमांसा' हमारे इसी उद्देश्य का घोषणापत्र है। हम साहित्य को बाजार की वस्तु बनाने के विरुद्ध और उसे पुन: 'आत्मा के संगीत' के रूप में स्थापित करने के पक्षधर हैं। 'मीमांसा' का यह मंच ऋषियों की विरासत और आधुनिकता के संगम से उस 'शुचिता' को वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है, जो वर्तमान के कुहासे में ओझल हो गई है। आइए, इस वैचारिक यज्ञ में 'समिधा' बनकर जुड़ें और एक ऐसे समावेशी साहित्य का सृजन करें जो 'सर्वेषां हितम्' की कसौटी पर खरा उतरे और हमारे मीमांसा का दर्शन ही है :
।। सर्वेषां हितम् एव साहित्यम् ।।
साहित्य केवल अक्षरों का विन्यास नहीं, अपितु आत्मा का वह संचित संगीत है जो 'स्व' से 'सर्व' की यात्रा कराता है। हमारे उपनिषदों ने जिस आनंद को 'ब्रह्मानंद सहोदर' कहा, वह शब्दों की इसी पावन कोख से जन्म लेता है। आज जब हम वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस प्रथम सोपान पर खड़े हैं, तो हृदय में वही मातृ-वत्सल भाव है जो एक माँ के मन में अपनी सन्तान की प्रथम किलकारी सुनकर जागता है। हम यहाँ किसी अहंकार के प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि साहित्य की उस शुचिता की पुनर्स्थापना के लिए एकत्र हुए हैं, जो वर्तमान समय के कुहासे में कहीं ओझल हो गई है।
ऋषियों की विरासत और आधुनिकता का संगम
भारत की भूमि ऋषियों और मुनियों की तपोभूमि रही है। हमारे ऋषियों ने जब 'ऋत' (शाश्वत सत्य) की खोज की, तो उन्होंने किसी गुट या मठ की सीमाओं में सत्य को नहीं बांधा। उन्होंने कहा - ''आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:'' (सब ओर से कल्याणकारी विचार हमें प्राप्त हों)। यही वह खुला आसमान है जिसकी छांव में 'मीमांसा' ने अपनी आँखें खोली हैं।
हमारी परंपरा ने सदैव ज्ञान को 'खुला' रखा है। व्यास, वाल्मीकि से लेकर कबीर और निराला तक, साहित्य कभी किसी खास की जागीर नहीं रहा। किंतु विडंबना देखिए, आज के आधुनिक दौर में साहित्य का आंगन 'मठाधीशों' के ऊंचे बुर्जों से घिर गया है। गुटबाजी, पुरस्कारों की चाटुकारिता और 'बाबू-भैया' संस्कृति ने उस सरस्वती के मंदिर में धूल जमा दी है, जिसकी शुचिता कभी धवल चांदनी जैसी थी। 'मीमांसा' इसी धूल को झाड़ने का एक विनम्र, किंतु दृढ़ संकल्प है। हम प्राचीन ऋषि-परंपरा के 'विवेक' को आधुनिक तकनीक के 'वेग' के साथ जोड़ रहे हैं।
मठाधीशों का तिलिस्म और सत्य की गूँज
साहित्य के आकाश में जब गुटबाजी के बादल गहराते हैं, तो सबसे पहले 'मौलिकता' की बलि चढ़ती है। आज के समय में किसी रचना की कसौटी 'लेखन का सत्व' नहीं, बल्कि 'लेखक का नाम' और उसका 'प्रभाव' बन गया है। इस दूषित संस्कृति ने उन असंख्य प्रतिभावान रचनाकारों के कंठ रुंध दिए हैं जो किसी मठाधीश की चौखट पर माथा टेकने के बजाय अपनी साधना में लीन रहना चाहते हैं। 'मीमांसा' घोषणा करती है कि यह किसी भी 'तिलिस्म' को स्वीकार नहीं करेगी। यहाँ कलम किसी के प्रभाव में नहीं, बल्कि केवल और केवल सत्य और लोक-मंगल के दबाव में चलेगी। हमारा उद्देश्य किसी का वर्चस्व स्थापित करना नहीं, बल्कि 'मूल्य-स्थापना' करना है। हम उस तिलिस्म को तोड़ना चाहते हैं जहाँ साहित्य को 'बाजार की वस्तु' बना दिया गया है। हम साहित्य को पुनः उस ऊँचाई पर ले जाना चाहते हैं जहाँ पाठक और लेखक के बीच कोई ईर्ष्या-द्वेष न होकर केवल 'साधारणीकरण' और आनंद हो।
मातृ वत्सलता: संवेदना का आधार
एक माँ जिस प्रकार अपनी संतान के दोषों को परिष्कृत करती है और उसके गुणों को पुष्पित करती है, 'मीमांसा' का दृष्टिकोण भी वैसा ही वात्सल्यपूर्ण होगा। हम उन नवोदित कलमकारों को मातृ-वत्सलता से गले लगाएंगे, जिन्हें मुख्यधारा के 'अभिजात्यवाद' ने हतोत्साहित किया है। साहित्य में 'शुचिता' का अर्थ केवल व्याकरण की शुद्धता नहीं, बल्कि हृदय की वह पवित्रता है जो लोक-हित के लिए तड़पती है।
हमारा मानना है कि जिस साहित्य में करुणा नहीं, जिसमें अभावग्रस्त व्यक्ति के प्रति संवेदना नहीं और जिसमें भविष्य की पीढ़ियों के लिए कोई दिशा नहीं, वह साहित्य निष्प्राण है। 'मीमांसा' उस मातृ-हृदय की भांति कार्य करेगी जो अपनी परंपरा की मर्यादा भी जानती है और आधुनिक युग की चुनौतियों का सामना करना भी। हम प्राचीन ऋषियों के 'सत्य' को आधुनिक समाज की 'तार्किकता' के धरातल पर जाँचेंगे। यही हमारी वास्तविक 'मीमांसा' होगी।
पावन यज्ञ में समिधा बनने का आह्वान
यह पत्रिका केवल एक 'वेब-साइट' नहीं है, यह एक 'वैचारिक यज्ञ' है। और किसी भी यज्ञ की पूर्णता तभी संभव है जब उसमें समाज के हर वर्ग की आहुति पड़े। हम उन बुद्धिजीवियों, विद्वानों, छात्रों और सामान्य पाठकों को आमंत्रित करते हैं जो साहित्य के गिरते स्तर से चिंतित हैं। हम चाहते हैं कि आप इस यज्ञ में अपनी 'समिधा' (रचनात्मकता) अर्पित करें।
याद रहे, 'मीमांसा' किसी खास व्यक्ति, संस्था या विचारधारा की बपौती नहीं है। यह उन सबकी है जो शब्दों की गरिमा में विश्वास रखते हैं। यहाँ 'विमर्श' के द्वार सबके लिए खुले हैं, बशर्ते वह विमर्श 'विवेक' पर आधारित हो, 'विवाद' पर नहीं। हम उत्तर-समकालीन आलोचना के उस दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ 'वादों' के चश्मे उतारकर 'विवेक' की आँखों से सत्य को देखना अनिवार्य हो गया है।
संकल्प का शंखनाद
"जयतु वागेश्वरी, जयतु साहित्यं" केवल एक नारा नहीं, हमारा संकल्प है। हम संख्या बल की होड़ में नहीं हैं, हम 'सत्व' की खोज में हैं। हम विज्ञापन की चमक-धमक में नहीं, हम वैचारिक प्रखरता में विश्वास रखते हैं। हमारा विश्वास है कि यदि हमारी नीयत माँ की ममता जैसी निश्छल और ऋषियों के तपोबल जैसी पवित्र है, तो 'मीमांसा' शीघ्र ही साहित्य जगत की सबसे विश्वसनीय और स्थापित आवाज बनेगी।
आइए, हम सब मिलकर इस खुले आसमान के नीचे अपनी कलम को स्वतंत्र उड़ान दें। मठाधीशों की बेडियाँ काटें और एक ऐसे साहित्य का सृजन करें जो 'सर्वेषां हितम्' (सबके हित) की भावना से ओतप्रोत हो। यह यज्ञ आरंभ हो चुका है, आपकी सहभागिता ही इसकी पूर्णता है।
आइए, इस नूतन प्रकाश की ओर बढ़ें!
सादर,
अमन कुमार होली
© संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा'
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