भारतीय मातृत्व और पाश्चात्य फेमिनिज्म : एक तुलनात्मक विमर्श । वागेश्वरी-स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।

आधुनिकता के चौराहे पर खड़ी नारी के लिए यूं तो अनेकों द्वार खुलें हैं, लेकिन जब हम बात करते हैं भारतीय और पश्चात्य नारीवादी आंदोलन की, तो हम नारी विमर्श के आयातित विमर्श को खरा मानते हैं; जबकि भारतीय नारी वैचारिकी को बिना ज्ञान के नकार देते हैं। आज की आवश्यकता बन गई है कि हम अपनी आयातित वैचारिक जड़ता से मुक्त होकर अपने जड़ से जुड़े। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के वागेश्वरी-स्तंभ विशेषांक संपादकीय आलेख में आज इन्हीं अंतर्विरोधों की पड़ताल हम कर रहे हैं।


आज की 'कॉलेज गर्ल' जब अपने स्मार्टफोन पर 'हैशटैग मीटू' (#MeToo) को ट्रेंड होते देखती हैं या इंस्टाग्राम रील्स पर 'माई चॉइस' के नारों को सुनती हैं, तो उन्हें लगता है कि स्त्री अधिकारों की यह लड़ाई शायद अभी दो-चार दशकों पहले ही शुरू हुई है। पेरिस की सड़कों से लेकर न्यूयॉर्क के कैफे तक जो विमर्श उपजा, उसे ही हमने 'मुक्ति' का एकमात्र पैमाना मान लिया। लेकिन क्या सचमुच स्त्री की परिभाषा केवल 'अधिकारों के संघर्ष' तक सीमित है? इस पर मेरी बहन ऑंचल जी से अक्सर विमर्श वैचारिक युद्ध का रूप ले लेता है मैंने यह लेख उन्हीं के उत्तर के रूप में लिखा है जो आज व्यक्तिगत से ऊपर उठकर सार्वभौमिक विमर्श बन गया है। 

एक उदाहरण देखिए आज की एक कॉर्पोरेट लीडर जब अपनी मातृत्व की छुट्टी (Maternity Leave) के बाद काम पर लौटती है, तो वह अक्सर एक अंतर्द्वंद्व से गुजरती हैं। पाश्चात्य फेमिनिज्म उसे सिखाता है कि घर और बच्चा उसकी प्रगति में 'बाधा' है, जबकि उसकी भारतीय जड़ें उसे बताती हैं कि 'सृजन' ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यही वह बिंदु है जहाँ पाश्चात्य 'अधिकारवाद' और भारतीय 'कर्तव्य-बोध' का टकराव होता है।

प्राचीन भारत की बौद्धिक आभा: गार्गी से मैत्रेयी तक

जब हम 'नारी विमर्श' की बात करते हैं, तो हमें यूनान या रोम अथवा ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका की ओर देखने से पहले अपने ऋग्वेद के पन्नों को पलटना होगा। भारत में स्त्री कभी 'अबला' नहीं थी, बल्कि वह 'ब्रह्मवादिनी' थी।
गार्गी वाचक्नवी का उदाहरण लीजिए। जनक की राजसभा में जब बड़े-बड़े विद्वान निरुत्तर हो रहे थे, तब गार्गी ने उठकर ऋषि याज्ञवल्क्य को चुनौती दी थी। उनका प्रश्न पूछना केवल तर्क नहीं था, बल्कि वह बौद्धिक संप्रभुता का प्रमाण था। क्या आज की कोई नारीवादी इस बात की कल्पना कर सकती है कि हजारों साल पहले एक स्त्री ब्रह्मांड के केंद्र पर शास्त्रार्थ कर रही थी?

वहीं मैत्रेयी का प्रसंग देखिए। जब याज्ञवल्क्य ने संपत्ति का बंटवारा करना चाहा, तो मैत्रेयी ने दोटूक कहा  "येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्?" (जिससे मुझे अमरत्व न मिले, मैं उस धन का क्या करूँगी?) यह भौतिकवाद के विरुद्ध वह सर्वोच्च दार्शनिक चेतना थी, जिसे आज का पाश्चात्य फेमिनिज्म समझने में शायद चूक गया।
लोपामुद्रा, घोषा और अपाला जैसी ऋषिकाओं ने वेदों के मंत्र रचे। उन्होंने प्रकृति, प्रेम और अस्तित्व को शब्दों में बांधा। वे 'विक्टिम कार्ड' नहीं खेल रही थीं, वे 'सृजनकर्ता' की भूमिका में थीं।

पाश्चात्य फेमिनिज्म: सफरेज से 'मीटू' तक का सफर

पश्चिमी नारीवाद का उदय एक 'प्रतिक्रिया' के रूप में हुआ। वहां स्त्री को 'संपत्ति' (Property) माना जाता था। 19वीं और 20वीं सदी में सफरेज (Suffrage) आंदोलन शुरू हुआ, जिसकी प्रणेता एम्मेलिन पैंकहर्स्ट और एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन जैसी महिलाएं थीं। उनका संघर्ष बुनियादी था- वोट देने का अधिकार।

इसके बाद सिमोन द बोउआर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द सेकंड सेक्स' में कहा  "स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।" यहीं से जेंडर और सेक्स का अंतर शुरू हुआ। पश्चिमी नारीवाद की तीन लहरें आईं:

पहली लहर: कानूनी और राजनैतिक अधिकार (वोट)।
दूसरी लहर: कार्यस्थल पर समानता और यौनिक स्वतंत्रता (बेट्टी फ्रीडन की 'द फेमिनिन मिस्टीक')।
तीसरी लहर और मीटू: यह लहर पहचान और यौन हिंसा के विरुद्ध मुखर हुई। 'मीटू' आंदोलन ने सत्ता संरचनाओं को हिला दिया, लेकिन इसने स्त्री-पुरुष संबंधों में एक गहरी 'अविश्वास की खाई' भी पैदा कर दी।

भारतीय मातृत्व: शक्ति या बेड़ी?

पाश्चात्य विचारक अक्सर भारतीय मातृत्व को 'पिछड़ापन' या 'घरेलू गुलामी' करार देते हैं। लेकिन भारतीय दृष्टि में 'माता' केवल एक जैविक भूमिका नहीं, बल्कि एक संस्था है।

अहिल्याबाई होल्कर को याद कीजिए। वे एक विधवा थीं, लेकिन उन्होंने न केवल राजकाज संभाला, बल्कि पूरे भारत में मंदिरों और जनसुविधाओं का जीर्णोद्धार किया। उनका मातृत्व अपनी प्रजा के प्रति था। वे 'शक्ति' का वह स्वरूप थीं, जिसमें करुणा और शासन का अद्भुत मेल था।
भारतीय मातृत्व का अर्थ यह कतई नहीं है कि स्त्री केवल रसोई तक सीमित रहे। इसका अर्थ है  पोषण की शक्ति। पाश्चात्य फेमिनिज्म 'प्रतियोगिता' (Competition) पर आधारित है, जबकि भारतीय दृष्टिकोण 'पूरकता' (Complementarity) पर।

तुलनात्मक विमर्श: अधिकार बनाम अस्तित्व

आज की पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि पाश्चात्य फेमिनिज्म जहाँ 'व्यक्तिवाद' (Individualism) पर जोर देता है, वहीं भारतीय विमर्श 'परिवार और समाज' के संतुलन की बात करता है।

पाश्चात्य दृष्टि: "मेरा शरीर, मेरी मर्जी।" (यह स्वायत्तता तो देता है, पर अक्सर एकाकीपन की ओर ले जाता है।)
भारतीय दृष्टि: "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" (यह सम्मान की बात तो करता है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर कई बार रूढ़ियों में फंस जाता है।)

आज की युवा लड़की को गार्गी की मेधा और अहिल्या बाई के साहस को अपने भीतर आत्मसात करना होगा, न कि केवल उधार लिए गए पश्चिमी नारों के पीछे भागना होगा। 'मीटू' जैसे आंदोलनों की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि समाज अपनी प्राचीन 'मातृवत परदारेषु' (पराई स्त्री माता के समान) वाली दृष्टि खो चुका है।

हमें एक ऐसे 'फेमिनिज्म' की जरूरत है जो गार्गी की तरह सवाल पूछे, मैत्रेयी की तरह सत्य की खोज करे, अहिल्याबाई की तरह शासन करे और साथ ही अपनी 'मातृत्व की ऊर्जा' को न त्यागे। मातृत्व का अर्थ कमजोर होना नहीं, बल्कि इस सृष्टि की निरंतरता का आधार होना है। पाश्चात्य नारीवाद ने हमें अधिकार दिए, इसके लिए हमें उसका आभारी होना चाहिए। लेकिन उन अधिकारों का प्रयोग हम अपनी 'जड़ों' को काटकर न करें।


आधुनिक होने का अर्थ पाश्चात्य होना नहीं है। जब एक भारतीय लड़की अपनी संस्कृति के गौरव और आधुनिक शिक्षा के साथ आगे बढ़ती है, तब वह सही मायने में 'वागेश्वरी' बनती है।

'मीमांसा' के 'वागेश्वरी' स्तंभ के इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए, अब हम उस पावन धरती और इतिहास के उन पन्नों की ओर मुड़ते हैं जहाँ भारतीय नारी ने न केवल शास्त्रों से, बल्कि शस्त्रों और संकल्पों से सत्ता की परिभाषा बदली।

सत्ता का संरक्षण और रणचंडी का अवतार: लक्ष्मीबाई से रानी गैडिनल्यू तक

अक्सर पाश्चात्य फेमिनिज्म में 'पावर' (Power) का अर्थ पुरुषों के समान पद पाना माना जाता है। लेकिन भारतीय इतिहास में नारी के लिए सत्ता का अर्थ 'भोग' नहीं, बल्कि 'संरक्षण' रहा है।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम आते ही एक ऐसी छवि कौंधती है जो मातृत्व और नेतृत्व का विस्मयकारी संगम है। पीठ पर दत्तक पुत्र को बांधकर घोड़े पर सवार वह वीरांगना केवल एक राज्य बचाने नहीं निकली थी, वह उस 'अधिकार बोध' का प्रतीक थी जो यह कहता है कि यदि न्याय की रक्षा के लिए युद्ध अनिवार्य हो, तो शस्त्र उठाना ही सबसे बड़ा धर्म है। आज की युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि लक्ष्मीबाई का संघर्ष किसी 'जेंडर वॉर' का हिस्सा नहीं था, बल्कि वह राष्ट्र की अस्मिता का संरक्षण था।

ठीक इसी तरह, पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से गूँजती रानी गैडिनल्यू की हुंकार को देखिए। मात्र 13 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाने वाली इस 'नागा आध्यात्मिक गुरु' को नेहरू जी ने 'पहाड़ों की बेटी' कहा था। उन्होंने जेल की कालकोठरी में जवानी खपा दी, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान और सत्ता के स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। पाश्चात्य नारीवाद जहाँ अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Freedom) की परिधि में घूमता है, वहीं गैडिनल्यू जैसी महिलाएं 'सामुदायिक स्वतंत्रता' के लिए अपना सर्वस्व होम कर देती हैं।

हुल और जन-क्रांति: फूलों-झानो का विस्मृत बलिदान

इतिहास की किताबों ने अक्सर संथाल विद्रोह (हुल आंदोलन) में सिदो-कान्हू का नाम तो स्वर्ण अक्षरों में लिखा, लेकिन उनकी बहनों फूलों और झानो मुर्मू के बलिदान को हाशिये पर रखा। 1855 के उस दौर में, जब ब्रिटेन में महिलाएं वोट देने के अधिकार के लिए तरस रही थीं, ये दो आदिवासी बहनें 21 ब्रिटिश सैनिकों को अपनी कुल्हाड़ी से ढेर कर रही थीं।
यह 'ग्रासरूट फेमिनिज्म' का वह रूप है जिसे पाश्चात्य सिद्धांतकार समझ ही नहीं पाए। फूलों-झानो का विद्रोह सत्ता के विरुद्ध था, शोषण के विरुद्ध था। वे केवल अपने भाइयों की सहायिका नहीं थीं, वे रणनीतिकार थीं। उन्होंने दिखाया कि भारतीय मातृत्व और नारीत्व केवल मंदिर की मूर्तियों में नहीं, बल्कि रणभूमि की गर्जना में भी बसता है।

प्रकृति का आलिंगन: चिपको और इको-फेमिनिज्म की असली जड़ें

         चिपको आंदोलन में शामिल बुजुर्ग महिलाएं 

जब 1970 के दशक में पश्चिम में 'इको-फेमिनिज्म' (Eco-feminism) की चर्चा शुरू हुई, तब उत्तराखंड की पहाड़ियों में अनपढ़ मानी जाने वाली माताएं और बहनें पेड़ों से चिपक कर खड़ी थीं। गौरा देवी के नेतृत्व में जब महिलाएं लाठियों और बंदूकों के सामने अड़ गईं, तो वह किसी किताबी सिद्धांत का परिणाम नहीं था। वह उस सनातन संस्कार की अभिव्यक्ति थी जो प्रकृति को 'संसाधन' (Resource) नहीं, बल्कि 'माता' मानता है।
चिपको आंदोलन की उन माताओं ने दुनिया को सिखाया कि "क्या हैं जंगल के उपकार? मिट्टी, पानी और बयार।" पाश्चात्य नारीवाद अक्सर 'कंजम्पशन' (उपभोग) की बात करता है, जबकि भारतीय नारी ने 'कंजर्वेशन' (संरक्षण) को अपनी जीवनशैली बनाया। यह उन कॉलेज की लड़कियों के लिए एक बड़ा सबक है जो क्लाइमेट चेंज पर वैश्विक रैलियाँ तो देखती हैं, पर अपनी मिट्टी की उन दादियों-नानियों के संघर्ष को भूल जाती हैं जिन्होंने जंगल बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी।

आजाद हिंद और कैप्टन लक्ष्मी सहगल

            (इमेज़ साभार आजाद हिंद फौज रिसर्च ब्यूरो)

स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ी कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जिक्र किए बिना यह विमर्श अधूरा है। सुभाष चंद्र बोस की 'झांसी की रानी रेजिमेंट' की कमान संभालते हुए उन्होंने साबित किया कि आधुनिक भारतीय नारी 'प्रोफेशनल' भी है और 'देशभक्त' भी। एक डॉक्टर के रूप में सेवा और एक सिपाही के रूप में वीरता सहगल ने उन तमाम रूढ़ियों को ध्वस्त कर दिया जो कहती थीं कि स्त्रियाँ युद्ध के लिए नहीं बनीं।

तुलनात्मक विश्लेषण: आज के दौर के लिए संदेश

आज का 'मीटू' आंदोलन जहाँ व्यवस्था के भीतर की गंदगी को साफ करने का प्रयास है, वहीं हमारे ये भारतीय संदर्भ हमें सिखाते हैं कि 'सफाई' के साथ-साथ सृजन और संघर्ष की भी आवश्यकता है।


स्कूलों, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की एक छात्रा जब आज अपनी लाइब्रेरी में बैठकर 'सिमोन द बोउआर' को पढ़ती है, तो उसे जरूर पढ़ना चाहिए, लेकिन उसे फूलों-झानो की कुल्हाड़ी की चमक और गौरा देवी के पेड़ों के प्रति प्रेम को भी महसूस करना चाहिए। भारतीय मातृत्व केवल 'बच्चे पालना' नहीं है; यह वह 'सत्ता' है जो अन्याय होने पर काली बनती है, ज्ञान की जरूरत होने पर सरस्वती और संरक्षण की जरूरत होने पर लक्ष्मीबाई।

यही 'वागेश्वरी' स्तंभ का मूल स्वर है अपनी जड़ों को पहचानना और अपनी उड़ान को भारतीयता के पंख देना।

'मीमांसा' के 'वागेश्वरी' स्तंभ के इस विमर्श को अब हम शिखर की उन ऊंचाइयों और समंदर की उन गहराइयों तक ले चलते हैं, जहाँ भारतीय नारी ने 'शक्ति' के नए प्रतिमान गढ़े हैं। यह केवल राजनीतिक उत्कर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस अदम्य इच्छाशक्ति का 'विश्वरूप' है जो अंतरिक्ष से लेकर युद्ध के मैदान तक फैला हुआ है।

आसमान की सरहदें और अंतहीन विस्तार: कल्पना से बछेंद्री तक

जब हम कल्पना चावला को याद करते हैं, तो वह केवल एक अंतरिक्ष यात्री नहीं, बल्कि उन करोड़ों भारतीय लड़कियों के सपनों की 'लॉन्च पैड' बन जाती हैं। करनाल की गलियों से नासा के 'कोलंबिया' यान तक का उनका सफर यह बताता है कि भारतीय नारी के लिए 'क्षितिज' (Horizon) कोई सीमा नहीं है। कल्पना का वह संदेश आज भी गूँजता है "सपनों से सफलता तक का रास्ता मौजूद है, बस आपके पास उसे ढूंढने की दृष्टि और उस पर चलने का साहस होना चाहिए।"

    (इमेज़ साभार हिमालयन माउंटेनियरिंग अकादमी)

वहीं, बछेंद्री पाल ने जब एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया, तो वह केवल एक पर्वतारोहण नहीं था। वह सदियों से समाज द्वारा स्त्रियों के पैरों में डाली गई 'अदृश्य बेड़ियों' को शिखर से नीचे फेंक देने जैसा था। वे पहाड़ की उन बेटियों की प्रतिनिधि बनीं जिन्होंने दुर्गम रास्तों को सुगम बनाया।

लहरों को चीरती और सीमाओं को लांघती: आरती साहा से सोफिया कुरैशी तक

                             (इमेज़ साभार Homegrown)

शक्ति का एक रूप जल में भी दिखता है। आरती साहा ने जब इंग्लिश चैनल पार किया, तो उन्होंने साबित किया कि भारतीय नारी की 'धैर्य की शक्ति' समंदर के तूफानों से भी बड़ी है। वह 'एक्वा-फेमिनिज्म' का वह भारतीय चेहरा थीं, जहाँ शरीर की थकान से ज्यादा मन का संकल्प मायने रखता था।
       (इमेज़ साभार ADGPI in the Indian Army)

आज के दौर में जब हम सोफिया कुरैशी को देखते हैं, जो भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी बनीं जिन्होंने मल्टी-नेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज (ASEAN Plus) में एक टुकड़ी का नेतृत्व किया, तो हमें अहसास होता है कि 'नेतृत्व' (Leadership) अब पुरुषों की जागीर नहीं है। सोफिया का नेतृत्व किसी पाश्चात्य फेमिनिस्ट थ्योरी से नहीं, बल्कि उस 'वीरांगना' परंपरा से आता है जहाँ राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि है।

सुरक्षा और साहस का नया अध्याय: ऑपरेशन सिंदूर और व्योमिका सिंह
                     (इमेज़ साभार प्रेस इनफॉरमेशन ब्यरो)

हाल के वर्षों में 'ऑपरेशन सिंदूर' और वायुसेना की व्योमिका सिंह जैसे नाम भारतीय नारी के उस स्वरूप को परिभाषित कर रहे हैं, जो संकट के समय 'रक्षक' की भूमिका में होती हैं। युद्ध के मोर्चे हों या आपदा प्रबंधन, ये महिलाएं यह सिद्ध कर रही हैं कि वे केवल 'सुरक्षित रखी जाने वाली वस्तु' नहीं हैं, बल्कि वे खुद 'सुरक्षा का कवच' हैं।
व्योमिका सिंह जैसी बेटियां जब लड़ाकू विमानों के कॉकपिट में बैठती हैं, तो वे पाश्चात्य जगत के उस भ्रम को तोड़ती हैं कि भारतीय स्त्रियाँ केवल परंपराओं में जकड़ी हैं। वे परंपरा को भी निभा रही हैं और आधुनिकता के आकाश में गर्जना भी कर रही हैं।

पाश्चात्य बनाम भारतीय: एक गहरा विमर्श

                                     ( इमेज़ द हिन्दू से साभार)

पाश्चात्य नारीवाद अक्सर 'जेंडर न्यूट्रल' (Gender Neutral) होने की बात करता है, यानी स्त्री को पुरुष जैसा बनना चाहिए। लेकिन भारतीय विमर्श 'जेंडर यूनिक' (Gender Unique) होने की बात करता है।

कल्पना चावला ने अपनी भारतीयता नहीं छोड़ी, उन्होंने अंतरिक्ष में भी अपने मूल्यों को सहेजा।
बछेंद्री पाल ने प्रकृति को 'जीतने' की नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एकाकार होने की बात की।
यही वह बुनियादी फर्क है। पश्चिमी फेमिनिज्म में 'इक्वालिटी' (Equality) अक्सर 'कंपटीशन' बन जाती है, जबकि भारतीय संदर्भ में इन महिलाओं का उत्कर्ष 'इंस्पिरेशन' (Inspiration) और 'सेवा' पर आधारित है।

निष्कर्ष: कॉलेज की युवा पीढ़ी के लिए 'वागेश्वरी' का संदेश

आज की कॉलेज गर्ल, जो हाथ में कॉफी का मग लिए 'ग्लोबल विलेज' का हिस्सा है, उसे यह समझना होगा कि आरती साहा की लहरें, व्योमिका सिंह का विमान और फूलों-झानो की कुल्हाड़ी ये सब एक ही सूत्र में बंधे हैं। यह सूत्र है 'स्वावलंबन और आत्म-गौरव'।
हमें पाश्चात्य जगत से 'समानता' के कानूनी अधिकार जरूर लेने चाहिए, लेकिन हमें अपनी 'आध्यात्मिक और साहसिक विरासत' को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। भारतीय नारी का आदर्श केवल 'मुक्ति' नहीं है, बल्कि 'शक्ति' और 'युक्ति' का समन्वय है। वे शोभा की देवी नहीं बल्कि राज विमल हैं। हम कल्पना के सपने भी हैं, और गौरा देवी का संकल्प भी। 

हमारी बेटियों, बहनों, माताओं को यह समझना होगा कि 

 "हम गार्गी की मेधा भी हैं और लक्ष्मीबाई की तलवार भी।
हम भारतीय नारी हैं सृजन का आधार और क्रांति का विस्तार भी।"

संपादक की विशेष अपील: नारी शक्ति को सादर नमन

प्रिय पाठकों और विशेष रूप से राष्ट्र की आधारशक्ति नारी जगत,

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" के पावन उद्घोष को आत्मसात करने वाली इस धरा पर, 'मीमांसा' का यह 'वागेश्वरी' स्तंभ केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आपके भीतर छिपी उस अनंत चेतना को एक वंदन है।
आज जब हम आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी पहचान के नए अर्थ तलाश रहे हैं, तब मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि अपनी 'शक्ति' को किसी उधार के तराजू में न तोलें। आप गार्गी का ज्ञान हैं, आप अहिल्या की न्यायप्रियता हैं और आप लक्ष्मीबाई का साहस भी हैं।
पाश्चात्य जगत ने हमें अधिकार दिए, हम उनके प्रति कृतज्ञ हैं, परंतु भारतीय संस्कृति ने हमें वह 'अस्तित्व' दिया है जो प्रकृति और पुरुष के साथ 'प्रतियोगिता' में नहीं, बल्कि 'पूरकता' में विश्वास रखता है।
मेरी बहन ऑंचल जी और देश की समस्त बेटियों से मेरा यही आग्रह है कि आप केवल 'उपभोक्ता' न बनें, बल्कि उस महान 'विरासत की संरक्षिका' बनें जहाँ मातृत्व कमज़ोरी नहीं, बल्कि सृष्टि का सबसे बड़ा गौरव है। अपनी जड़ों से जुड़ी हुई नारी ही एक समर्थ समाज और समर्थ राष्ट्र का निर्माण कर सकती है।
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसी आधुनिकता का स्वागत करें जिसकी नींव हमारे संस्कारों में हो और जिसकी उड़ान आसमान के पार। आप पूजनीय हैं, आप वंदनीय हैं और आप ही इस जगत की वागेश्वरी हैं।

सादर एवं सस्नेह,

वागेश्वरी स्तंभ/ संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा'




डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत अध्ययन, शोध और वैचारिक विमर्श पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी संस्कृति, विचारधारा या आंदोलन का अपमान करना नहीं, बल्कि भारतीय नारीवाद के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरातल को पुनः रेखांकित करना है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' वैचारिक विविधता का सम्मान करती है और इस आलेख का मूल उद्देश्य पाठकों में अपनी जड़ों के प्रति गौरव और तार्किक चेतना जागृत करना है।

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