बहुआयामी कृतित्व और व्यक्तित्व के धनी हिंदी साहित्य यथार्थ के चितेरे और मध्यवर्ग के प्रवक्ता – उपेन्द्रनाथ का कालजयी स्मरण। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख। अमन कुमार होली

आज 19 जनवरी है। हिंदी और उर्दू साहित्य के उस दैदीप्यमान नक्षत्र की पुण्यतिथि, जिसने अपनी लेखनी से भारतीय मध्यवर्ग की धड़कनों, उनकी कुंठाओं, उनके संघर्षों और उनकी छोटी-छोटी खुशियों को अमर कर दिया। उपेन्द्रनाथ अश्क केवल एक नाम नहीं, बल्कि आधुनिक कथा साहित्य का एक पूरा युग हैं। 'मीमांसा' पत्रिका, जो अपनी सनातन ज्ञान परंपरा, मेधा और प्रज्ञा के लिए प्रतिबद्ध है, आज इस पुण्यतिथि विशेषांक के माध्यम से उस ऋषि-तुल्य साहित्यकार को नमन करती है जिसने साहित्य की शुचिता और ईमानदारी से कभी समझौता नहीं किया।

जन्म और प्रारंभिक संस्कार: पंजाब की मिट्टी का प्रभाव

14 दिसंबर 1910 को पंजाब के जालंधर में जन्मे अश्क जी के व्यक्तित्व में पंजाब की वह अल्हड़ता, जुझारूपन और स्पष्टवादिता अंत तक बनी रही। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में जब बालक अपनी दुनिया में व्यस्त रहते हैं, अश्क जी पंजाबी में तुकबंदियाँ कर रहे थे। शिक्षा के प्रति उनका रुझान और विधि (Law) की परीक्षा में विशेष योग्यता प्राप्त करना यह दर्शाता है कि उनकी मेधा केवल सृजनात्मक ही नहीं, बल्कि तार्किक भी थी।

उर्दू से हिंदी का संक्रमण: प्रेमचंद का मार्गदर्शन

अश्क जी ने अपने साहित्यिक सफर का आगाज़ उर्दू से किया था। उस समय उर्दू अदब में उनका नाम काफी सम्मान से लिया जाने लगा था। किंतु, 1932 में भारतीय कथा साहित्य के शिखर पुरुष मुंशी प्रेमचंद की एक सलाह ने न केवल अश्क जी का जीवन बदल दिया, बल्कि हिंदी साहित्य का भी भाग्य बदल दिया। प्रेमचंद ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित किया। 1933 में जब अश्क जी का कहानी संग्रह 'औरत की फितरत' प्रकाशित हुआ और प्रेमचंद ने उसकी भूमिका लिखी, तो हिंदी जगत को अहसास हो गया कि एक ऐसा कथाकार आ चुका है जो भविष्य में 'प्रेमचंदोत्तर युग' की कमान संभालेगा।

बहुआयामी रचनाकार: हर विधा में एक नया कीर्तिमान

अश्क जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे साहित्य की किसी एक विधा के बंधक नहीं बने। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, कविता, संस्मरण और आलोचना इन सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और हर जगह अपनी एक विशिष्ट शैली छोड़ी।
क. उपन्यासों का महासागर
अश्क जी के उपन्यास केवल कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि वे एक कालखंड के दस्तावेज हैं।

'गिरती दीवारें': यह उपन्यास हिंदी साहित्य की एक क्लासिक कृति मानी जाती है। इसमें उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों और एक युवक 'चेतन' के माध्यम से समाज की जकड़न को दिखाया है।
'शहर में घूमता आईना' और 'गर्म राख': इन कृतियों में अश्क जी ने पात्रों के मानसिक चित्रण और परिवेश के वर्णन की जो सूक्ष्मता दिखाई है, वह विरल है। उनकी वर्णन-शैली ऐसी है कि पाठक स्वयं को उस शहर की गलियों में घूमता हुआ महसूस करता है।
नाटक और एकांकी: मंच की नई परिभाषा
नाटककार के रूप में अश्क जी ने हिंदी रंगमंच को परिपक्वता प्रदान की।
'अंजो दीदी': यह नाटक आज भी प्रासंगिक है। अनुशासन की अति और यांत्रिक जीवनशैली कैसे मानवीय संवेदनाओं का गला घोंट देती है, इसका सजीव चित्रण 'अंजो दीदी' में मिलता है।
एकांकी: 'तौलिए', 'चरवाहे' और 'अंधी गली' जैसी एकांकियों के माध्यम से उन्होंने समाज के पाखंड और छद्म को बेनकाब किया। उन्होंने एकांकी को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक विसंगतियों पर चोट करने का हथियार बनाया।

संस्मरण और आलोचना: निर्भीकता का परिचय

अश्क जी अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे। उनका संस्मरण 'मण्टो मेरा दुश्मन' हिंदी साहित्य के सबसे चर्चित और ईमानदार संस्मरणों में से एक है। इसमें उन्होंने सआदत हसन मंटो के साथ अपने खट्टे-मीठे संबंधों को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। यह उनकी सत्यनिष्ठा का ही प्रमाण है कि वे अपने मित्रों की कमियों और अपनी ईर्ष्याओं को भी कागज पर उतारने से नहीं हिचके।

बम्बई प्रवास और फिल्मी जीवन

एक समय अश्क जी ने बम्बई (मुंबई) का रुख किया। फिल्मों की कहानियाँ, पटकथा और संवाद लिखे। उन्होंने तीन फिल्मों में अभिनय भी किया। किंतु, जिस रचनाकार के भीतर एक ऋषि जैसी वैचारिक शुचिता हो, उसे फिल्मी दुनिया की चकाचौंध और बनावटीपन अधिक समय तक रास नहीं आना था। वे पुनः साहित्य की अपनी मूल धारा में लौट आए, क्योंकि उनके लिए सृजन व्यावसायिकता से ऊपर था।

शैली और भाषा: शब्द शिल्प का जादू

'मीमांसा' की मेधा के अनुकूल यदि हम अश्क जी की भाषा पर विचार करें, तो हम पाते हैं कि उनकी भाषा में एक अलौकिक शब्द-बिंब खींचने की क्षमता है। उनकी शैली मृदु है, किंतु जहाँ प्रहार करना हो, वहाँ उनके शब्द बिजली की तरह कड़कते हैं। उन्होंने अरबी-फ़ारसी के सहज शब्दों और देशज शब्दों का ऐसा समन्वय किया कि भाषा आम आदमी की संवेदना से जुड़ गई।

वैचारिक दर्शन: समाजवादी यथार्थवाद

अश्क जी के साहित्य में समाजवादी परंपरा का एक अनूठा रूप देखने को मिलता है। वे किसी राजनीतिक विचारधारा के पिछलग्गू नहीं थे, बल्कि उनकी समाजवादिता उनके चरित्रों के संघर्ष से पैदा होती थी। उन्होंने अपने पात्रों को 'शिल्पी की बारीक दृष्टि' से तराशा। उनके पात्र हारते नहीं हैं, वे गिरते हैं, संभलते हैं और फिर से दीवारें फांदने की कोशिश करते हैं।

प्रकाशक की भूमिका: स्वाभिमान की मिसाल

हिंदी साहित्य के इतिहास में अश्क जी एक दुर्लभ उदाहरण हैं जिन्होंने अपनी पुस्तकें स्वयं प्रकाशित करने का साहसी निर्णय लिया। 'नीलाभ प्रकाशन' के माध्यम से उन्होंने लेखकों के शोषण के विरुद्ध एक मूक विद्रोह किया और यह सिद्ध किया कि एक रचनाकार अपनी शर्तों पर भी जीवित रह सकता है।

उपसंहार: अश्क जी की प्रासंगिकता

19 जनवरी 1996 को अश्क जी चिरनिद्रा में लीन हो गए, लेकिन वे अपने पीछे शब्दों का एक ऐसा साम्राज्य छोड़ गए जो आज भी पाठकों का मार्गदर्शन कर रहा है। आज के इस 'इंस्टेंट' और 'डिजिटल' युग में, जहाँ संवेदनाएं सिमट रही हैं, अश्क जी का साहित्य हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।
'मीमांसा' वेब पत्रिका उनके साहित्यिक अवदान, उनकी वैचारिक प्रज्ञा और उनके ऋषि-तुल्य जीवन को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

संपादकीय टिप्पणी:

अश्क जी का लेखन हमें सिखाता है कि सत्य कठिन हो सकता है, लेकिन वह सुंदर भी होता है। उनकी स्मृति हमारे शब्द-संसार को सदैव आलोकित करती रहेगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

अस्वीकरण: 'मीमांसा' वेब पत्रिका के इस विशेषांक में प्रकाशित आलेख 'यथार्थ के चितेरे और मध्यवर्ग के प्रवक्ता उपेन्द्रनाथ 'अश्क' का उद्देश्य दिवंगत साहित्यकार के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना और उनके साहित्यिक योगदान पर चर्चा करना है।
तथ्यात्मक जानकारी: आलेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तिथियाँ, घटनाओं का विवरण और सन्दर्भ उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों, साहित्यिक अभिलेखों और विकिपीडिया जैसे ज्ञान-कोशों पर आधारित हैं। संपादक मंडल ने तथ्यों की सटीकता सुनिश्चित करने का यथासंभव प्रयास किया है, फिर भी किसी अनजाने विसंगति के लिए पत्रिका उत्तरदायी नहीं होगी।
व्यक्तिगत विचार: आलेख में व्यक्त विचार लेखक/संपादक के निजी विश्लेषण हैं, जो साहित्य की विभिन्न व्याख्याओं पर आधारित हो सकते हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय की भावनाओं को आहत करना नहीं है।
तकनीकी त्रुटि: किसी भी प्रकार की वर्तनीगत या मुद्रण संबंधी त्रुटि के सुधार हेतु पाठक हमें सूचित कर सकते हैं।

कॉपीराइट चेतावनी नीति (Copyright Warning Policy)

इस आलेख और पत्रिका की सामग्री 'बौद्धिक संपदा अधिकार' (Intellectual Property Rights) के अंतर्गत सुरक्षित है। पाठकों और अन्य प्रकाशकों से अनुरोध है कि वे निम्नलिखित नीतियों का कड़ाई से पालन करें:
अनाधिकृत उपयोग निषेध: इस आलेख के किसी भी अंश, चित्र या पूरे पाठ को संपादक की लिखित अनुमति के बिना किसी अन्य वेबसाइट, ब्लॉग, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, समाचार पत्र या पुस्तक में पुनः प्रकाशित करना, कॉपी करना या वितरित करना कानूनी रूप से वर्जित है। साहित्यिक शुचिता बनाए रखने में हमारा सहयोग करें। मौलिकता का सम्मान करें।
उद्धरण की अनुमति: शैक्षणिक या आलोचनात्मक उद्देश्यों के लिए आलेख के संक्षिप्त अंशों का उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते कि 'मीमांसा' वेब पत्रिका और लेखक को उचित 'क्रेडिट' (Credit) दिया जाए और मूल आलेख का लिंक (URL) साझा किया जाए।
उपयोग: इस सामग्री का किसी भी प्रकार का व्यावसायिक उपयोग (Commercial Use) पूर्णतः प्रतिबंधित है।
उल्लंघन पर कार्यवाही: कॉपीराइट नीति का उल्लंघन पाए जाने पर 'भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, १९५७' और डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट (DMCA) के प्रावधानों के तहत उचित कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।


© 2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा' । सर्वाधिकार सुरक्षित।


Comments

Popular posts from this blog

भारतीय साहित्यों में नायिका भेद और वर्तमान नारी अस्मिता - वेब पत्रिका 'मीमांसा' का वागेश्वरी स्तंभ विशेषांक।

व्यवस्था की विसंगतियों का दरबारी चितेरा : श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी की शाश्वत गूँज

संपादकीय : साहित्यिक शुचिता की मीमांसा और 'दिनकर' के नाम पर "ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं" के छद्म प्रसार का सत्य