ज्योति-पुंज लुई ब्रेल: अक्षरों के स्पर्श से 'सर्वेषां हितम्' की सिद्धि, वेब पत्रिका 'मीमांसा' विश्व-क्षितिज स्तंभ विशेषांक
प्रिय पाठकों, आज के विश्व-क्षितिज स्तंभ विशेषांक में विश्व ब्रेल लिपि दिवस के उपलक्ष में आपके बीच वैश्विक ज्ञान संपदा को परिष्कृत रूप में प्रस्तुत करने का पुनीत लक्ष्य है। वेब पत्रिका 'मीमांसा' शुचितापूर्ण समावेशी साहित्य के विकास में निरंतर कृत संकल्पित है।
प्रस्तावना:
साहित्य केवल कागजों पर उकेरी गई काली रेखाएं नहीं हैं, बल्कि वह चेतना है जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मबोध के प्रकाश की ओर ले जाती है।
जब हम 4 जनवरी को 'विश्व ब्रेल लिपि दिवस' मनाते हैं, तो हम केवल एक लिपि या एक आविष्कारक का स्मरण नहीं करते, बल्कि हम उस 'मीमांसा' (गहन अन्वेषण) का उत्सव मनाते हैं, जिसने दृष्टिबाधितों के शून्य संसार में ज्ञान का ब्रह्मांड रच दिया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की शोध-परंपरा और विद्या की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती की अनुकंपा से प्रेरित यह आलेख, लुई ब्रेल के संघर्ष को मीमांसा दर्शन के प्रकाश में देखने का एक विनम्र प्रयास है।
नियति का वज्रपात और प्रज्ञा का उदय
फ्रांस की राजधानी पेरिस से कुछ मील दूर कुपवरे के एक साधारण परिवार में 4 जनवरी 1809 को एक बालक का जन्म हुआ, लुई ब्रेल। पिता साइमन-रेने ब्रेल चमड़े के कुशल शिल्पी थे। नियति का खेल देखिए, जिस कार्यशाला में पिता जीवन की साज-सज्जा रचते थे, वहीं तीन वर्ष के लुई के साथ एक ऐसी दुर्घटना घटी जिसने पूरे विश्व के इतिहास की दिशा बदल दी। एक नुकीली सूई (Awl) बालक की आँख में जा धंसी। संक्रमण फैला और देखते ही देखते लुई की दोनों आँखों की रोशनी चली गई।
उस दौर के यूरोप में दृष्टिहीनता का अर्थ था - सामाजिक बहिष्कार और उपेक्षा। किंतु लुई के माता-पिता और स्थानीय पादरी ने उनमें छिपी उस ईश्वरीय ज्योति को पहचाना, जो भौतिक आँखों की मोहताज नहीं थी।
भारतीय दर्शन कहता है कि 'चक्षु' केवल मांस-पेशियों का नाम नहीं है, वास्तविक चक्षु तो 'ज्ञान' है। लुई ने सुनकर सीखना शुरू किया। उनकी मेधा इतनी प्रखर थी कि वे सामान्य बच्चों के साथ बैठकर केवल सुनकर ही कक्षा में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए। यह उनके जीवन की पहली 'मीमांसा' थी; यह सिद्ध करना कि शरीर की सीमाएं आत्मा की असीमित क्षमताओं को नहीं रोक सकतीं।
पेरिस का संघर्ष: जहाँ शब्द मूक थे
10 वर्ष की आयु में लुई पेरिस के 'रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ' पहुँचे। संस्थान की स्थिति दयनीय थी, सीलन भरे कमरे और संसाधनों का अभाव। उस समय 'वैलेंटिन हाय' द्वारा विकसित एक लिपि प्रचलित थी, जिसमें अक्षरों को कागज पर उभारा जाता था। किंतु वे अक्षर इतने बड़े और बोझिल थे कि एक वाक्य पढ़ने में घंटों लग जाते थे। लिखने का तो कोई साधन ही नहीं था।
दृष्टिबाधित समाज के लिए साहित्य उस समय एक 'बंद द्वार' की तरह था। वे सुन सकते थे, पर स्वयं की अभिव्यक्ति को अक्षरों का रूप नहीं दे सकते थे। लुई ब्रेल का मन तड़प उठा। वे जानते थे कि बिना साक्षरता के स्वावलंबन असंभव है। यहीं से उनके भीतर उस 'शुचितापूर्ण विमर्श' ने जन्म लिया, जो आज हम 'मीमांसा' के माध्यम से प्रचारित करना चाहते हैं कि ज्ञान पर सबका समान अधिकार होना चाहिए।
'नाइट राइटिंग' से 'दिव्य लिपि' की ओर
1821 में फ्रांसीसी सेना के कप्तान चार्ल्स बार्बियर ने संस्थान का दौरा किया। उन्होंने सैनिकों के लिए 'नाइट राइटिंग' नामक एक प्रणाली विकसित की थी, जिसमें 12 बिंदुओं के माध्यम से अंधेरे में संदेश पढ़े जा सकते थे। यह जटिल थी और इसमें व्याकरण की अशुद्धियां थीं।
12 वर्षीय बालक लुई ने इसमें संभावना देखी। उन्होंने तीन वर्षों तक कठोर साधना की। दिन भर स्कूल की पढ़ाई और रात भर माता पिता के साथ मिलकर सुई से कागजों पर छेद करना, यह लुई की वह तपस्या थी जैसे हमारे प्राचीन ऋषि किसी मंत्र की सिद्धि के लिए करते थे। अंततः, 1824 में मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने 6 बिंदुओं की वह क्रांतिकारी लिपि तैयार की, जिसे आज पूरी दुनिया 'ब्रेल लिपि' के नाम से जानती है।
इन 6 बिंदुओं में लुई ने संपूर्ण ब्रह्मांड को समेट दिया। गणित, संगीत, विज्ञान और साहित्य इन बिंदुओं के स्पर्श से सब कुछ सुलभ हो गया। यह केवल तकनीकी आविष्कार नहीं था, यह दृष्टिबाधितों का 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' था।
मीमांसा दर्शन और ब्रेल: एक वैचारिक संश्लेषण
महर्षि जैमिनी के सूत्रों में 'धर्म' उसे कहा गया है जो समाज को धारण करे और सबका उत्कर्ष (अभ्युदय) करे। "सर्वेषां हितम् एव साहित्यम्" के ध्येय के साथ जब हम ब्रेल लिपि का विश्लेषण करते हैं, तो निम्नलिखित सूत्र उभरते हैं:
ज्ञान की शुचिता और पहुॅंच: मीमांसा मानती है कि ज्ञान (वेद) नित्य है, पर उसे प्राप्त करने का अधिकार सबको है। ब्रेल लिपि ने ज्ञान की शुचिता को बनाए रखते हुए उसे स्पर्श के माध्यम से सुलभ बनाया।
अद्वैत संवेदना: ब्रेल लिपि ने यह सिद्ध किया कि 'देखने' और 'महसूस करने' के बीच जो द्वैत है, वह माया है। असली ज्ञान वह है जो हृदय के पट खोल दे।
साहित्यिक शुचिता: वह साहित्य जो किसी को उसकी शारीरिक अक्षमता के कारण ज्ञान से वंचित कर दे, वह 'अशुद्ध' है। लुई ब्रेल ने साहित्य को 'शुद्ध' किया क्योंकि उन्होंने उसे 'समावेशी' बनाया।
मानवीय मूल्य और बहुआयामी व्यक्तित्व
लुई ब्रेल केवल एक आविष्कारक नहीं थे, वे एक महान संगीतज्ञ और शिक्षक भी थे। वे पेरिस के चर्चों में ऑर्गन (एक वाद्य यंत्र) बजाते थे। उनकी संगीत के प्रति दीवानगी इतनी थी कि उन्होंने ब्रेल लिपि में संगीत के सुरों (Musical Notations) को भी लिपिबद्ध किया।
उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र और करुणामयी था। संस्थान के शिक्षक उनके आविष्कार से ईर्ष्या करते थे, क्योंकि उन्हें डर था कि यदि दृष्टिबाधित बच्चे आत्मनिर्भर हो गए, तो शिक्षकों की सत्ता समाप्त हो जाएगी। लेकिन लुई ने कभी प्रतिकार नहीं किया। वे चुपचाप अपने छात्रों को पढ़ाते रहे। उन्होंने सिखाया कि 'सत्य' को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, वह स्वयं प्रकाशित होता है।
1852 में, उनके निधन के दो वर्ष बाद, फ्रांस सरकार ने आधिकारिक रूप से उनकी लिपि को मान्यता दी। यह उनके धैर्य और 'शुचिता' की विजय थी।
वैश्विक प्रभाव: आंकड़ों के आइने में कल्याण
ब्रेल लिपि ने केवल अक्षर नहीं दिए, बल्कि रोजगार और सम्मान दिया। आधुनिक शोध बताते हैं कि:
जो दृष्टिबाधित व्यक्ति ब्रेल में निपुण हैं, उनकी रोजगार दर 90% से अधिक है।
यह लिपि मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करती है जो सामान्यतः देखने वाले व्यक्तियों में सक्रिय होते हैं, जिससे संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) तीव्र होता है।
भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ करोड़ों लोग दृष्टि-बाधित हैं, ब्रेल लिपि उनके लिए 'ब्रह्म-विद्या' के समान है। भारत सरकार ने भी वर्ष 2009 में लुई ब्रेल जैसे अंतरराष्ट्रीय मनीषी की ख्याति और उनके योगदान को देखते हुए डाक टिकट जारी किया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे संस्थान आज दृष्टि बाधित छत्रों के लिए समावेशी शिक्षा पर बल दे रहे हैं, जो लुई ब्रेल के सपनों का ही विस्तार है।
आधुनिक युग, AI और भविष्य की चुनौतियां
आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में हैं। तकनीक ने 'रिफ्रेशेबल ब्रेल डिस्प्ले' और 'टॉकिंग सॉफ्टवेयर' दिए हैं। परंतु, तकनीक कभी भी 'स्पर्श' का स्थान नहीं ले सकती। जैसे किसी हस्तलिखित पत्र की शुचिता ईमेल में नहीं मिल सकती, वैसे ही ब्रेल के बिंदुओं को उंगलियों से महसूस करने में जो आत्मीयता है, वह मशीन की आवाज में नहीं।
हैरानी की बात है कि आज भी कई स्कूलों में ब्रेल संसाधनों का अभाव है। 'मीमांसा' वेब पत्रिका के माध्यम से हमारा आह्वान है कि सरकार और समाज मिलकर डिजिटल लिटरेसी के साथ-साथ 'ब्रेल लिटरेसी' को भी अनिवार्य बनाएं। यही वास्तविक 'मानव हितैषी चरित्रों' का उद्घाटन होगा।
उपसंहार: माॅं सरस्वती की अनुकंपा और हमारा दायित्व
लुई ब्रेल का जीवन हमें सिखाता है कि "अंधकार को कोसने से बेहतर है एक दीपक जलाना।" उन्होंने स्वयं अंधकार में रहकर पूरी दुनिया को प्रकाश दिया। उनका जीवन 'मीमांसा' दर्शन का एक व्यावहारिक अध्याय है।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस 'विश्व-क्षितिज विशेषांक' का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर उस करुणा और बोध को जागृत करना है, जिससे हम दिव्यांगजन को 'दया' की दृष्टि से नहीं, बल्कि 'सम्मान' की दृष्टि से देखें।
अंत में, विद्या की देवी माँ सरस्वती से यही प्रार्थना है कि वे हमें ऐसी दृष्टि दें जिससे हम उन 'अदृश्य' संघर्षों को देख सकें और एक ऐसे साहित्य की रचना कर सकें जो वास्तव में 'सर्वेषां हितम्' के संकल्प को पूरा करे। लुई ब्रेल के ६ बिंदु केवल लिपि नहीं हैं, वे मानवता के ६ बुनियादी स्तंभ हैं समानता, गरिमा, स्वावलंबन, करुणा, ज्ञान और शुचिता।
विश्व-क्षितिज/ स्तंभ विशेषांक
© स्तंभकार: अभिषेक यादव (पूर्व छात्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय) ई-मेल ay893835@gmail.com
परिष्कार एवं संपादन: संपादक व सहायक संपादक, 'मीमांसा'
वैधानिक सूचना एवं कॉपीराइट नीति©2026, वेब पत्रिका 'मीमांसा'
Comments
Post a Comment