क्रांति का सह-अस्तित्व ज्योति-सावित्री और सत्यशोधक समाज (संपादकीय आलेख, जयंती विशेषांक)

प्रिय पाठकों,

शब्द जब केवल अक्षर न रहकर 'हथियार' बन जाते हैं, तब वे समाज की जड़ता पर प्रहार करते हैं। वेब पत्रिका 'मीमांसा' आज अपने इसी वैचारिक और सांस्कृतिक शुचिता के संकल्प के साथ आपके सम्मुख उपस्थित है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उस 'विवेक' को जाग्रत करना है जो सत्ता, समाज और परंपरा के भीतर छिपे सत्य को देख सके। 'मीमांसा' के इस विशेष संस्करण में हम उस युगल को नमन कर रहे हैं, जिन्होंने आधुनिक भारत में 'ज्ञान के लोकतंत्र' की नींव रखी। वेब पत्रिका 'मीमांसा' के विशिष्ट वैचारिक धरातल पर ज्ञान मनीषा परम् विदुषी सावित्रीबाई फुले जयंती 3 जनवरी को उनके जीवनसाथी क्रांतिसूर्य महात्मा ज्योतिराव फुले के जीवन पर 'मीमांसा' प्रस्तुत है। 


भारतीय पुनर्जागरण के इतिहास में 'फुले दंपति' का नाम केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो महान विचारों का 'महामिलन' है। जिस दौर में शूद्रों और स्त्रियों के लिए शिक्षा के द्वार पर वज्रपात जैसी पाबंदियाँ थीं, उस दौर में ज्योतिबा ने सावित्री को पढ़ाकर समाज के उस अंधकार को चुनौती दी, जिसे 'दैवीय विधान' माना जाता था।

सत्यशोधक समाज: तर्क की नई परिभाषा

24 सितंबर 1873 को "गुलामगिरी" नामक पुस्तक के रचयिता ज्योतिबा फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक आंदोलन था सत्य की खोज का। 'मीमांसा' इसी सत्यशोधक दृष्टि को आत्मसात करती है। ज्योतिबा का तर्क स्पष्ट था कि मध्यस्थों (पुरोहितों) के बिना भी ईश्वर और सत्य से सीधा साक्षात्कार संभव है। सावित्रीबाई ने इस वैचारिक क्रांति को धरातल पर उतारा। जब वे पुणे की गलियों में पढ़ाने निकलती थीं, तो उन पर फेंका गया कीचड़ दरअसल उस समय की सड़ी-गली मानसिकता का प्रतीक था। लेकिन सावित्रीबाई के थैले में रखी दूसरी साड़ी इस बात का प्रमाण थी कि "प्रतिरोध ही सौंदर्य है।"

(सत्यशोधक समाज द्वारा जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए सार्वजनिक रैली का आयोजन। पुणे, महाराष्ट्र )

स्त्री शिक्षा और वर्तमान: एक आलोचकीय मूल्यांकन

आज जब हम डिजिटल युग में स्त्री शिक्षा की बात करते हैं, तो हमें सावित्रीबाई के उस विजन को याद करना होगा जो केवल 'साक्षरता' नहीं बल्कि 'सशक्तीकरण' की बात करता था। वर्तमान परिदृश्य में भारत ने संख्यात्मक रूप से बड़ी छलांग लगाई है। हमारी बेटियाँ आज लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष की यात्रा कर रही हैं और कॉर्पोरेट जगत का नेतृत्व कर रही हैं।
किंतु, 'मीमांसा' के वैचारिक चश्मे से देखें तो एक प्रश्न आज भी अनुत्तरित है क्या शिक्षा ने स्त्रियों को 'स्वतंत्र' किया है या केवल 'कुशल श्रमिक' बनाया है? सावित्रीबाई फुले का लेखन, विशेषकर उनका काव्य संग्रह 'काव्य फुले', तर्क देता है कि शिक्षा वही है जो मनुष्य को गुलामी की बेड़ियों का अहसास करा सके। आज का शिक्षा तंत्र अक्सर 'डिग्री' तो देता है, लेकिन 'दृष्टिकोण' देने में चूक जाता है। पितृसत्ता ने शिक्षा के बावजूद नए रूप अख्तियार कर लिए हैं। आज भी ग्रामीण अंचलों में 'डिजिटल डिवाइड' है, जहाँ लड़कों के पास तकनीक सुलभ है और लड़कियाँ आज भी संघर्षरत हैं। सत्यशोधक समाज का सपना तब तक अधूरा है, जब तक शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना रहेगा, चेतना जगाना नहीं।

श्रद्धांजलि : युगपुरुष और युगस्त्री के चरणों में
अंततः, आज सावित्रीबाई फुले की जयंती पर वेब पत्रिका 'मीमांसा' उस अदम्य साहस को अश्रुपूरित और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है, जिसने पत्थरों की मार सहकर भी हमारे लिए फूलों का रास्ता बनाया।

सावित्री और ज्योतिबा केवल इतिहास के पन्ने नहीं हैं; वे हर उस शिक्षिका के भीतर जीवित हैं जो आज भी अभावों में पढ़ा रही है, वे हर उस छात्र के भीतर जीवित हैं जो अपनी जाति और लिंग की सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ रहा है। आप दोनों ने हमें सिखाया कि प्रेम और क्रांति अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। 'मीमांसा' परिवार आपके द्वारा जलाए गए इस ज्ञान-दीप को सांस्कृतिक शुचिता के साथ अक्षुण्ण रखने हेतु संकल्पबद्ध है। शत-शत नमन।

आभार ज्ञापन :

वेब पत्रिका 'मीमांसा' इस आलेख की तैयारी में सहयोग हेतु 'महाराष्ट्र राज्य साहित्य और संस्कृति मंडल', 'महात्मा फुले समग्र वाङ्मय' के शोधकर्ताओं तथा विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखागारों के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता ज्ञापित करती है। हम उन सभी स्वतंत्र पत्रकारों और समाजशास्त्रियों के भी आभारी हैं जिनके विमर्श ने इस आलेख को वैचारिक गहराई प्रदान की।

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इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और 'मीमांसा' पत्रिका का उद्देश्य किसी भी धर्म, जाति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह सामग्री ऐतिहासिक तथ्यों और वैचारिक विश्लेषण पर आधारित है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे अकादमिक और सामाजिक चेतना के परिप्रेक्ष्य में ग्रहण करें।

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