हिन्दी गद्य के दैदीप्यमान नक्षत्र बाबू गुलाब राय जयंती विशेषांक वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।


समय की अनंत यात्रा में कुछ ऐसे व्यक्तित्व अवतरित होते हैं, जो अपनी मेधा और सृजन से पूरे युग को आलोकित कर देते हैं। हिन्दी साहित्य के आकाश में बाबू गुलाबराय एक ऐसे ही जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी कलम से न केवल गद्य की नई परिभाषाएं गढ़ीं, बल्कि आलोचना और निबंध के क्षेत्र में वह प्रतिमान स्थापित किए, जो आज भी शोधार्थियों के लिए पाथेय हैं। आज उनकी जयंती के पावन अवसर पर, 'मीमांसा' का यह विशेषांक उस महान मनीषी को सादर शब्दांजलि अर्पित करता है।

दर्शन और साहित्य का अद्भुत संगम

17 जनवरी 1888 को इटावा की पावन धरा पर जन्मे बाबू गुलाबराय के व्यक्तित्व में दर्शन की गंभीरता और साहित्य की तरलता का अनूठा समन्वय था। आगरा कॉलेज से दर्शनशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने और छतरपुर रियासत में 'दीवान' व 'चीफ़ जज' जैसे उच्च पदों को सुशोभित करने के बाद भी, उनका हृदय सदैव माँ सरस्वती के चरणों में ही रमा रहा। उन्होंने हिन्दी को तब दर्शन का उपहार दिया जब इस विषय का नितांत अभाव था। 'कर्तव्य शास्त्र' और 'तर्क शास्त्र' जैसी कृतियाँ उनके गंभीर चिंतन की परिचायक हैं।


कृतियाँ

शांति धर्म - 1913
मैत्री धर्म - 1913
कर्तव्य शास्त्र - 1915
तर्क शाास्त्र - 1916
पाश्चात्य दर्शनों का इतिहास - 1917
फिर निराशा क्यों - 1918
नवरस - 1933
प्रबंध प्रभाकर - 1933
निबंध रत्नाकर - 1934
विज्ञान विनोद - 1937

हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास - 1940
हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास - 1943
मेरी असफलताएँ - 1946
सिद्धांत और अध्ययन - 1946
काव्य के रूप - 1947
हिंदी काव्य विमर्श - 1947
साहित्य समीक्षा - 1947
हिंदी नाट्य विमर्श - 1947
भारतीय संस्कृति की रूप रेखा - 1952
गांधीय मार्ग - 1953

मन की बाते - 1954
अभिनव भारत के प्रकाश स्तम्भ - 1955
सत्य और स्वतंत्रता के उपासक - 1955
कुछ उथले कुछ गहरे - 1955
मेरे निबंध - 1955
जीवन पथ - 1954
अध्ययन और अस्वाद - 1956
विद्यार्थी जीवन - 1956
हिंदी कविता और रहस्यवाद - 1956

मृदु शैली और वैचारिक गरिमा

बाबू जी की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'मृदुता' थी। वे जटिल से जटिल दार्शनिक सिद्धांतों को भी इतनी सहजता से कह जाते थे कि पाठक बोझिलता के बजाय रसास्वादन करने लगता। उनकी गद्य शैली में जहाँ एक ओर 'नवरस' और 'सिद्धान्त और अध्ययन' जैसी कृतियों में शास्त्रीय प्रौढ़ता दिखती है, वहीं 'ठलुआ क्लब' और 'मेरी असफलताएँ' में उनका विनोदी और आत्मपरक रूप निखर कर सामने आता है। उन्होंने स्वयं लिखा था कि वे गंभीर विषयों में भी हास्य का पुट इसलिए देते हैं ताकि नीरसता दूर हो सके यही एक सच्चे शिक्षक और लोक-लेखक की पहचान है।

आलोचना के प्रतिमान

हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में बाबू गुलाबराय का योगदान अप्रतिम है। 'हिन्दी काव्य विमर्श' और 'साहित्य समीक्षा' के माध्यम से उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र के मध्य एक सेतु का निर्माण किया। उनकी आलोचना केवल छिद्रान्वेषण नहीं थी, बल्कि वह कृति के मूल तत्व को पहचानने की एक रचनात्मक प्रक्रिया थी। आगरा विश्वविद्यालय द्वारा 'डी.लिट' की मानद उपाधि और भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया जाना उनकी महत्ता का भौतिक प्रमाण है, किंतु उनकी वास्तविक विरासत वह 'साहित्यिक चेतना' है जो आज भी हर हिन्दी प्रेमी के हृदय में जीवित है।
        भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी डाक टिकट 


हमारी श्रद्धांजलि

बाबू गुलाबराय केवल एक लेखक नहीं थे, वे एक संस्थान थे। उन्होंने आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में विभागाध्यक्ष रहते हुए पीढ़ियों को संस्कारित किया। 13 अप्रैल 1963 को भले ही वे भौतिक रूप से हमसे विदा हो गए, किंतु अपनी कृतियों 'प्रबंध प्रभाकर', 'कुछ उथले कुछ गहरे' और 'मन की बातें' के माध्यम से वे सदैव अमर रहेंगे।

'मीमांसा' के इस विशेषांक के माध्यम से हम उस महान आत्मा का स्मरण करते हुए संकल्प लेते हैं कि उनके द्वारा स्थापित साहित्यिक मर्यादाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखेंगे। बाबू जी के शब्दों में कहें तो "विचार हमारी दशा का निदर्शन कर सकते हैं, किंतु कार्य संपादन की प्रेरणा भावों में ही निहित होती है।" आइए, उन्हीं प्रेरणादायी भावों के साथ हम इस अंक का स्वागत करें।


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