वेब पत्रिका 'मीमांसा' संपादकीय जयंती विशेषांक : कालजयी कथाशिल्पी कमलेश्वर आधुनिकता के ऋषि साहित्य व सिनेमा जगत के कमल
अथ श्री कमलेश्वर गाथा...
प्राचीन आर्यावर्त की ज्ञान परंपरा में ऋषि उसे कहा गया जिसने 'ऋत' (सत्य) को देखा और उसे मंत्रों में ढाल दिया। यदि हम आधुनिक हिंदी साहित्य के फलक पर दृष्टि डालें, तो कमलेश्वर एक ऐसे ही 'आधुनिक ऋषि' प्रतीत होते हैं, जिन्होंने महानगरों की कोलाहलपूर्ण गलियों से लेकर सरहद की रक्तरंजित लकीरों तक फैले सत्य का साक्षात्कार किया।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' का यह जयंती विशेषांक आज उस मनीषी को समर्पित है, जिसने न केवल कहानी के शिल्प को बदला, बल्कि समाज की चेतना को भी झकझोरा। कमलेश्वर केवल एक नाम नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के उस 'स्वर्ण युग' का उद्घोष हैं, जहाँ 'नई कहानी' आंदोलन ने जन्म लिया और साहित्य महलों की चहारदीवारी से निकलकर आम आदमी की फटी हुई कमीज और खाली जेब तक जा पहुँचा।
ज्ञान परंपरा और कमलेश्वर: एक सेतु
हमारे उपनिषदों में कहा गया है- 'चरैवेति, चरैवेति' (चलते रहो, चलते रहो)। कमलेश्वर का जीवन और लेखन इसी गतिशीलता का प्रमाण है। प्राचीन ऋषि जिस प्रकार समाज को दिशा देने के लिए तपस्या करते थे, कमलेश्वर ने शब्दों के माध्यम से वह तप किया। उनकी लेखनी में वह 'निर्भयता' थी जो याज्ञवल्क्य के तर्कों में मिलती है और वह 'करुणा' थी जो बुद्ध के प्रवचनों में।
उन्होंने जब 'कितने पाकिस्तान' लिखा, तो वह केवल एक उपन्यास नहीं था, बल्कि इतिहास की अदालत में मानवता का पक्ष रख रहे एक ऋषि का 'महासूत्र' था। उन्होंने समय की उस कालिख को साफ करने का प्रयास किया जिसने इंसानी रिश्तों के बीच मजहब और मुल्कों की दीवारें खड़ी कर दी थीं।
कथा जगत में नया आयाम: नई कहानी के पुरोधा
कमलेश्वर ने कहानी को मात्र मनोरंजन के साधन से ऊपर उठाकर उसे 'अनुभव की प्रामाणिकता' से जोड़ा।
उनकी कहानियों में :
राजा निरबंसिया जैसी रचनाओं ने लोककथा और आधुनिक त्रासदी के संगम से एक नया शिल्प गढ़ा।
"खोए हुए शहर" और "मांस का दरिया" जैसी कहानियों के माध्यम से उन्होंने शहरी जीवन के अकेलेपन, अजनबीपन और टूटते हुए मध्यमवर्गीय मूल्यों को स्वर दिया।
जैसे प्राचीन काल में व्यास ने महाभारत के माध्यम से जटिल मानवीय संबंधों की व्याख्या की थी, कमलेश्वर ने अपनी कहानियों के माध्यम से आधुनिक भारत के अंतर्विरोधों की 'मीमांसा' की। उन्होंने बताया कि कहानी केवल काल्पनिक पात्रों का समूह नहीं, बल्कि जीवित समाज का धड़कता हुआ दस्तावेज़ है।
सिनेमा जगत: रूपहले पर्दे पर साहित्य का अभिषेक
कमलेश्वर उन विरले साहित्यकारों में से थे जिन्होंने 'कलम' और 'कैमरे' के बीच के फासले को मिटा दिया। उनका सिनेमाई योगदान केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि वह सामाजिक उत्थान का एक सशक्त माध्यम बना।
गुलज़ार के साथ जुगलबंदी: 'आंधी' और 'मौसम' जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने राजनीति और व्यक्तिगत संबंधों की जटिलताओं को परदे पर उतारा।
समानांतर सिनेमा की नींव: 'सारा आकाश' और 'रजनीगंधा' जैसी फिल्मों की पटकथा लिखकर उन्होंने मध्यम वर्ग के सपनों और संघर्षों को फिल्मी ग्लैमराइज़ेशन से दूर एक नई पहचान दी।
संवादों की शक्ति: उनके संवादों में वह धार थी जो दर्शक के भीतर एक मंथन पैदा करती थी।
उन्होंने सिद्ध किया कि यदि लेखक की दृष्टि स्पष्ट हो, तो बाजार की ताकतें भी श्रेष्ठ साहित्य को आत्मसात करने को विवश हो जाती हैं। सिनेमा उनके लिए 'लोक शिक्षण' का एक आधुनिक मंच था।
समाज का उत्थान और पत्रकारिता का धर्म
कमलेश्वर केवल कथाकार नहीं थे, वे एक सजग संपादक और पत्रकार भी थे। 'सारिका' और 'जागरण' जैसे संस्थानों के माध्यम से उन्होंने नए लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। उन्होंने 'परिवर्तन' को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि दूरदर्शन के चर्चित कार्यक्रम 'परिक्रमा' के माध्यम से देश के सुदूर हिस्सों की समस्याओं को मुख्यधारा की चर्चा में लाया।
उनका मानना था कि लेखक समाज से कटा हुआ कोई जीव नहीं है, बल्कि वह समाज का 'विवेक' है। जैसे प्राचीन काल में ऋषि राजाओं को उनके धर्म का बोध कराते थे, कमलेश्वर ने अपनी लेखनी से सत्ता और समाज को उनके उत्तरदायित्वों का बोध कराया।
मीमांसा की श्रद्धांजलि: एक संकल्प
आज जब हम कमलेश्वर की जयंती मना रहे हैं, तो वेब पत्रिका 'मीमांसा' उन्हें केवल शब्दों के पुष्प अर्पित नहीं कर रही, बल्कि उनके छोड़े हुए अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प ले रही है। कमलेश्वर ने जिस 'कितने पाकिस्तान' की चिंता की थी, आज वह वैचारिक दरारें और गहरी होती जा रही हैं। ऐसे में उनकी रचनाएँ हमें फिर से 'इंसानियत' के धर्म की ओर लौटने का मार्ग दिखाती हैं।
"इतिहास गवाह है कि जब-जब शब्द खामोश हुए हैं, अंधेरे जीते हैं। कमलेश्वर वह मशाल थे जिन्होंने शब्दों को खामोश नहीं होने दिया।"
उनका कथात्मक शिल्प आज के युवा रचनाकारों के लिए एक पाठशाला है। वे सिखाते हैं कि कैसे अपनी जड़ों (प्राचीन ज्ञान परंपरा) से जुड़े रहकर आधुनिक विश्व की चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।
वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस वैचारिक मंच पर, हम कमलेश्वर की तीन कालजयी कृतियों;
'कितने पाकिस्तान', 'राजा निरबंसिया' और '
जॉर्ज पंचम की नाक' के अंतर्संबंधों और उनकी समकालीन प्रासंगिकता का विश्लेषण करेंगे।
ये तीनों रचनाएँ अलग-अलग कालखंडों और विधाओं (उपन्यास, कहानी, व्यंग्य) की प्रतिनिधि हैं, किंतु इनके भीतर बहती 'चेतना की अंतर्धारा' एक ही है मनुष्यता की खोज और व्यवस्था का विद्रूप चेहरा।
त्रयी मीमांसा: सत्ता, अस्मिता और इतिहास का द्वंद्व
कितने पाकिस्तान: इतिहास की अदालत और बँटवारे की अंतहीन शृंखला
कमलेश्वर का यह कालजयी उपन्यास केवल भारत-पाक विभाजन की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह 'विभाजन की मानसिकता' पर किया गया सबसे बड़ा प्रहार है।
समकालीनता: आज जब विश्व 'ध्रुवीकरण'
(Polarization) के दौर से गुजर रहा है, तब 'कितने पाकिस्तान' की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। यह उपन्यास सवाल करता है कि क्या लकीरें खींच देने से समस्या का समाधान होता है?
दार्शनिक पक्ष: प्राचीन ऋषियों ने 'वसुधैव कुटुंबकम्' की बात की थी। कमलेश्वर इस उपन्यास में इतिहास के पात्रों को बुलाकर उनसे जवाब मांगते हैं। वे बताते हैं कि 'पाकिस्तान' केवल एक भौगोलिक देश नहीं, बल्कि वह नफरत का वह बीज है जो हर उस मन में उगता है जहाँ कट्टरता जन्म लेती है। आज के दौर में बढ़ती सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद की संकीर्ण परिभाषाओं के बीच यह उपन्यास एक 'चेतावनी' की तरह खड़ा है।
2. राजा निरबंसिया: परंपरा और आधुनिकता का त्रासद संगम
यह कहानी हिंदी कथा साहित्य के 'शिल्प' का मील का पत्थर है। इसमें कमलेश्वर ने एक प्राचीन लोककथा और एक आधुनिक मध्यवर्गीय जीवन को समानांतर चलाया है।
समकालीनता: आज के दौर में भी 'पुरुष सत्तात्मक समाज' और 'स्त्री की पवित्रता' को लेकर जो दोहरे मापदंड हैं, 'राजा निरबंसिया' उन्हीं पर चोट करती है। जगपति का चरित्र आज के उस आधुनिक मानव का प्रतीक है जो आर्थिक रूप से टूट चुका है और अपनी कुंठाओं का शिकार अपनी अस्मिता को बनाता है।
मीमांसा: कहानी का लोककथात्मक पक्ष (राजा-रानी) जहाँ एक आदर्श की बात करता है, वहीं यथार्थवादी पक्ष (जगपति-चंदा) उस आदर्श के ढहने की कथा है। आज के उपभोक्तावादी समाज में जब आर्थिक तंगी रिश्तों पर भारी पड़ रही है, तब 'राजा निरबंसिया' की चंदा हर उस स्त्री का चेहरा बन जाती है जो व्यवस्था और विवशता के बीच पिस रही है।
3. जॉर्ज पंचम की नाक: औपनिवेशिक मानसिकता पर तीखा व्यंग्य
यह कहानी एक श्रेष्ठ राजनीतिक व्यंग्य है, जो सत्ता के चाटुकार चरित्र और हमारी 'मानसिक गुलामी' को उजागर करती है।
समकालीनता: भारत को स्वतंत्र हुए दशकों बीत गए, लेकिन 'नाक' (प्रतिष्ठा) बचाने का जो खेल सत्ता के गलियारों में चलता है, वह आज भी वैसा ही है। जॉर्ज पंचम की नाक लगाने के लिए पूरे देश के महापुरुषों की मूर्तियों की नाक टटोलना यह दर्शाता है कि हम आज भी विदेशी मुहर या विदेशी स्वीकृति के लिए कितने लालायित रहते हैं।
विमर्श: यह कहानी आज के 'सेल्फ-रेस्पेक्ट' बनाम 'ग्लोबल इमेज' के द्वंद्व को दर्शाती है। कमलेश्वर ने बहुत पहले देख लिया था कि आज़ाद भारत के हुक्मरान अपनी जनता की 'जिंदा नाक' काटकर विदेशी सत्ता की 'पत्थर की नाक' बचाने में ज्यादा रुचि रखते हैं। यह व्यंग्य आज की नौकरशाही और मीडिया की चाटुकारिता पर भी उतना ही सटीक बैठता है।
संश्लेषण: क्या है इन तीनों का साझा संदेश?
यदि हम इन तीनों रचनाओं को एक धागे में पिरोएं, तो हमें 'मानवीय गरिमा' का एक अखंड दर्शन मिलता है।
कितने पाकिस्तान में इतिहास और सांप्रदायिकता तथा नफरत की लकीरें मिटाने की आवश्यकता पर बल देती है
राजा निरबंसिया में मध्यवर्गीय नैतिकता और आर्थिक दबाव व टूटते रिश्तों और पुरुष कुंठा का यथार्थ दिखाता है
जॉर्ज पंचम की नाक में चाटुकारिता और औपनिवेशिक दासता के साथ स्व-अस्मिता और राष्ट्रीय गौरव की रक्षा की बात कही गई है।
निष्कर्ष
कमलेश्वर ने अपनी लेखनी से जिस 'समय' को पकड़ा था, वह आज और भी जटिल हो गया है। 'कितने पाकिस्तान' का फैलाव आज सोशल मीडिया की दीवारों तक पहुँच गया है, 'राजा निरबंसिया' की विवशता आज की बेरोजगारी में दिखती है और 'जॉर्ज पंचम की नाक' बचाने की कवायद आज के डिप्लोमैटिक पाखंडों में जीवंत है।
प्राचीन ऋषि परंपरा के उस सूत्र 'तप' को कमलेश्वर ने अपने साहित्य कर्म में ढाला। उन्होंने सत्य कहने का जो साहस दिखाया, वही आज के रचनाकारों के लिए पाथेय है। 'मीमांसा' का यह संपादकीय विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कमलेश्वर को पढ़ना, दरअसल अपने समय के कुरूप चेहरों को आईने में देखना है।
उपसंहार
कमलेश्वर जी का महाप्रस्थान केवल एक देह का अंत था, उनके विचार, उनकी कहानियाँ और उनका वैचारिक संघर्ष आज भी हमारे बीच जीवित है। वे शब्दों के 'अश्वत्थामा' हैं अजर, अमर और अविनाशी।
'मीमांसा' परिवार इस महान मनीषी को कोटि-कोटि नमन करता है। उनकी स्मृति में यह विशेषांक एक विनम्र आहुति है उस महायज्ञ में, जिसका नाम 'साहित्य' है।
जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख
©संपादक, वेब पत्रिका 'मीमांसा'
इस विशेषांक को तैयार करने में एडिटोरियल टीम ने भी अपनी भूमिका निभाई है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
यह आलेख साहित्यकार कमलेश्वर के योगदान पर आधारित एक शोधपरक विश्लेषण है। जिसे केवल साहित्यिक और विश्वविद्यालयों में अकादमिक समझ के लिए इसे तैयार करने में विकिपीडिया, ई-पीजी पाठशाला और एआई (AI) जैसे डिजिटल स्रोतों की सहायता ली गई है। साथ हीं एडिटोरियल बोर्ड के गंभीर शोध का परिणाम है , यह विशेषांक पूर्णतः साहित्यिक विमर्श के उद्देश्य से हैं और इनका लक्ष्य किसी भी व्यक्ति या समुदाय की भावनाओं को प्रभावित करना नहीं है। तथ्यों की सटीकता हेतु पाठक मूल संदर्भों का अवलोकन कर सकते हैं।
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