भारतीय चित्त के अनन्य चितेरे: पंडित विद्यानिवास मिश्र संपादकीय। संपादकीय आलेख। वेब पत्रिका 'मीमांसा' (जयंती विशेषांक)


आज जब समय की गति अत्यंत तीव्र है और हमारी संवेदनाएँ यांत्रिक होती जा रही हैं, तब स्मृति के झरोखे से एक ऐसी विभूति का स्मरण अनायास ही मन को शीतलता प्रदान करता है, जिसने अपनी लेखनी से भारतीय संस्कृति की जड़ों को सींचा। आज 28 जनवरी है भारतीय मनीषा के देदीप्यमान नक्षत्र, ललित निबंधों के शिखर पुरुष और 'भ्रमरानंद' के नाम से अपनी सुगंध बिखेरने वाले पंडित विद्यानिवास मिश्र की जन्म-जयंती। 'मीमांसा' का यह विशेष अंक उसी पावन स्मृति को समर्पित है, जिसने 'छितवन की छाँह' में हमें बैठना सिखाया और 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' कहकर हमारी सामूहिक पीड़ा को स्वर दिया।
लोक और शास्त्र का अद्भुत समन्वय

डॉ. विद्यानिवास मिश्र केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्था थे। गोरखपुर के पकड़डीहा गाँव की माटी से निकलकर वाशिंगटन और बर्कले के विश्वविद्यालयों तक की उनकी यात्रा, वास्तव में भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक यात्रा थी। उनके व्यक्तित्व में जहाँ एक ओर पाणिनीय व्याकरण की शास्त्रीय कठोरता थी, वहीं दूसरी ओर लोक-जीवन की वह तरलता भी थी, जो केवल एक सहृदय कवि या निबंधकार में ही संभव है।

मिश्र जी ने शास्त्र को कभी बोझ नहीं बनने दिया। उनके निबंधों में उपनिषदों की ऋचाएँ और कबीर-तुलसी की साखियाँ इस प्रकार घुल-मिल जाती हैं, जैसे दूध में चीनी। वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, परंतु वे उस आधुनिकता के प्रति सावधान अवश्य थे, जो अपनी जड़ों से कटकर आती है। उनके लिए परंपरा कोई जड़ वस्तु नहीं थी, बल्कि एक निरंतर बहने वाली धारा थी, जिसमें स्नान करके हर पीढ़ी नई ऊर्जा प्राप्त करती है। जैसा कि उन्होंने स्वयं सिद्ध किया 'परंपरा बंधन नहीं' है, बल्कि वह तो मुक्ति का मार्ग है।

ललित निबंध: स्मृतियों का आत्मीय संसार

हिन्दी साहित्य में ललित निबंध की जो त्रयी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय और विद्यानिवास मिश्र से बनती है, उसमें मिश्र जी का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने निबंध को केवल सूचनाओं का पुलिंदा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे 'व्यक्ति-व्यंजना' का माध्यम बनाया। जब वे लिखते हैं "वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं", तो वे केवल एक ऋतु परिवर्तन की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि आधुनिक मनुष्य के भीतर मरती हुई संवेदनाओं पर चोट कर रहे होते हैं।

उनके निबंधों में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह एक सक्रिय पात्र है। 'कदम की फूली डाल' हो या 'हल्दी धूप', उनकी शब्दावली में एक ऐसी जादुई मिठास है जो पाठक को सीधे अपनी माटी की गंध से जोड़ देती है। उनकी भाषा शैली प्रवाहपूर्ण, सरस और मृदु है बिल्कुल वैसी ही, जैसी एक दादा अपने पोते को लोक-कथाएँ सुनाते समय अपनाता है।

भ्रमरानंद का 'पचड़ा' और सम्पादकीय गरिमा

मिश्र जी ने 'भ्रमरानंद' छद्म नाम से जो कुछ भी लिखा, वह सामाजिक विसंगतियों पर एक मीठा कटाक्ष था। वे एक कुशल संपादक भी थे। 'नवभारत टाइम्स' जैसे प्रतिष्ठित पत्र के संपादक के रूप में उन्होंने पत्रकारिता को भाषाई मर्यादा और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़े रखा। उनके संपादन में एक गरिमा थी, एक उत्तरदायित्व था। वे मानते थे कि शब्द ब्रह्म है और उसका प्रयोग अत्यंत पवित्रता के साथ किया जाना चाहिए।

राज्यसभा सदस्य के रूप में उनकी भूमिका हो या भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी के रूप में, उन्होंने सदैव हिन्दी और भारतीय भाषाओं के उत्थान की ही चिंता की। उन्हें पद्म भूषण, मूर्तिदेवी पुरस्कार और साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता मिलना केवल उनके व्यक्तिगत गौरव की बात नहीं थी, बल्कि यह उस विचार का सम्मान था, जो 'स्व' को पहचानने पर जोर देता है।

आज के समय में उनकी प्रासंगिकता

आज जब हम 'डिजिटल' युग के कोलाहल में खोए हुए हैं, मिश्र जी के निबंध हमें रुकने और सोचने पर मजबूर करते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि 'आँगन का पंछी' और 'बंजारा मन' ही हमारी असली पूँजी है। वे जल संकट पर 'रहिमन पानी राखिए' लिखकर हमें पर्यावरण के प्रति सचेत करते हैं, तो 'महाभारत का कव्यार्थ' समझाकर हमें हमारे महाकाव्यों की दार्शनिक गहराई से परिचित कराते हैं।

'मीमांसा' के इस अंक के माध्यम से हमारा प्रयास है कि नई पीढ़ी उस 'भ्रमरानंद' से परिचित हो सके, जिसने हिन्दी गद्य को एक नई कोमलता और ऊँचाई प्रदान की। उनका जाना साहित्य जगत के लिए एक ऐसा शून्य है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता, परंतु उनकी कृतियाँ 'अग्निरथ' की भाँति हमारा पथ प्रशस्त करती रहेंगी।

उपसंहार

पंडित विद्यानिवास मिश्र का साहित्य हमारे राष्ट्रीय चित्त की पहचान है। उनके शब्दों में जो लोक-तत्व, बौद्धिकता और सर्जनात्मकता का अंतर्ग्रंथन है, वह दुर्लभ है। आज उनकी जयंती पर हम उन्हें नमन करते हुए यही संकल्प ले सकते हैं कि हम अपनी जड़ों को पहचानें और उस 'मुकुट' को भीगने से बचाएँ, जो हमारी मर्यादा और संस्कृति का प्रतीक है।
उनकी स्मृतियों की 'छितवन' हम पर सदैव बनी रहे।

जयंती विशेषांक/संपादकीय आलेख 
अमन कुमार होली 
— संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'

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