शब्दों का राजहंस, गीत का पर्याय तथा संवेदना का हिमालय : नीरज और उनकी कालजयी काव्य-यात्रा जयंती विशेषांक वेब पत्रिका 'मीमांसा' संपादकीय आलेख।
आज एक ऐसे व्यक्तित्व पर केंद्रित विशेषांक लेकर उपस्थित है, जिनके बिना हिंदी गीत की परिभाषा अधूरी है। हम बात कर रहे हैं शब्दों के अमर साधक, पद्म भूषण गोपालदास 'नीरज' की। नीरज केवल एक कवि या गीतकार नहीं थे; वे हिंदी साहित्य के वह 'मंच' थे जहाँ संवेदनाएँ नृत्य करती थीं और दर्शन आम आदमी की भाषा में गाता था। आज की तारीख ४ जनवरी केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह उस संकल्प का उत्सव है जिसने एक अभावग्रस्त बालक को विश्वपटल पर 'गीत ऋषि' के रूप में स्थापित कर दिया।
सर्वेषां हितम् एव साहित्यम् के पावन संकल्प को आत्मसात किए हुए 'मीमांसा' का यह अंक उस महाप्राण गीतकार कवि को समर्पित है, जिसकी लेखनी ने न केवल शब्दों को संगीत दिया, बल्कि शून्य में सोए हुए भावों को "ब्रह्मानंद सहोदर" रस से आप्लावित कर दिया। ४ जनवरी १९२५ को पुरावली की मिट्टी से उपजा वह स्फुलिंग, जिसे दुनिया ने गोपालदास 'नीरज' के नाम से जाना, आज भी हिंदी साहित्य और सिनेमा के आकाश में ध्रुवतारे की भाँति देदीप्यमान है।
संघर्ष की भट्टी में तपा कुंदन
नीरज का जीवन किसी तिलिस्म से कम नहीं था। मात्र ६ वर्ष की अल्पायु में पिता के साये से वंचित हो जाना और अभावों की पगडंडियों पर चलना, उनके व्यक्तित्व की वह नींव थी जिसने उन्हें 'दर्द' का चितेरा बनाया। इटावा की कचहरी में टाइपराइटर की खट-खट और सिनेमाघर की छोटी सी नौकरी के बीच, एक कवि का हृदय उस मर्म को खोज रहा था, जो आगे चलकर "कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे" जैसी अमर पंक्तियों में परिणत हुआ।
उनका शैक्षिक सफर उनकी जिजीविषा का प्रमाण है। १९४२ में हाईस्कूल से लेकर १९५३ में हिंदी साहित्य में एम.ए. तक की यात्रा, प्राइवेट परीक्षाओं और क्लर्की के बीच तय हुई। यह संघर्ष ही था जिसने उनके गीतों में वह 'खुरदरापन' और 'अनुभूति की सघनता' पैदा की, जो केवल किताबी ज्ञान से संभव नहीं।
साहित्य साधना : अंतर्ध्वनि से आसावरी तक
नीरज केवल गीतकार नहीं, अपितु शब्दों के जादूगर थे। १९४४ में उनके प्रथम संग्रह 'संघर्ष' ने हिंदी जगत को यह संकेत दे दिया था कि छायावाद के बाद गीत की एक नई धारा प्रवाहित होने वाली है। उनके प्रमुख संग्रहों की श्रृंखला विभावरी, प्राणगीत, दर्द दिया है, बादर बरस गयो, गीत भी अगीत भी, और आसावरी हिंदी कविता के उस स्वर्ण युग की गवाह हैं जहाँ कविता मंचों पर केवल सुनी नहीं जाती थी, बल्कि जी जाती थी।
नीरज के काव्य में एक अनूठा अंतर्विरोध था। जहाँ एक ओर उनमें सूफियाना बेपरवाही थी, वहीं दूसरी ओर जीवन के प्रति एक गहरा अनुराग। उन्होंने मृत्यु को 'महबूबा' की तरह देखा और जीवन को 'मधुशाला' की तरह। उनके शब्द रसवादी परंपरा के उस शिखर को छूते हैं जहाँ पाठक और श्रोता एक ही भाव-भूमि पर खड़े होकर उस अलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं, जिसे काव्यशास्त्र में ब्रह्मानंद सहोदर कहा गया है।
सिनेमा और संगीत : मंच से रुपहले पर्दे तक
जब नीरज ने बंबई की ओर रुख किया, तो फिल्म जगत को वह शब्द मिले जो बाजारू चकाचौंध के बीच भी अपनी मौलिकता और साहित्यिक गरिमा बनाए रख सके। 'नई उमर की नई फसल' से शुरू हुआ यह सफर 'मेरा नाम जोकर', 'शर्मीली' और 'प्रेम पुजारी' तक पहुँचा।
"ए भाई! ज़रा देख के चलो", "बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ" और "काल का पहिया घूमे रे भइया" जैसे गीतों ने उन्हें लगातार तीन बार फिल्मफेयर नामांकन और १९७० में पुरस्कार दिलाया।
किंतु, नीरज का स्वाभिमान और अलीगढ़ की गलियों के प्रति उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि वे चकाचौंध को त्यागकर पुनः अपनी माटी की ओर लौट आए। यह पलायन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर वापसी थी, जिसने सिद्ध किया कि एक सच्चा कलाकार अपनी आत्मा को विज्ञापनों की भेंट नहीं चढ़ा सकता।
पुरस्कार और पदविकाएँ : एक अद्वितीय कीर्तिमान
भारत सरकार ने नीरज की प्रतिभा को नमन करते हुए उन्हें १९९१ में पद्म श्री और २००७ में पद्म भूषण से अलंकृत किया। वे शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में दो बार सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले संभवतः पहले ऐसे व्यक्ति बने। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें भाषा संस्थान का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया, जो उनकी प्रशासनिक और भाषाई पकड़ का सम्मान था।
नीरज को पढ़ना, स्वयं को पढ़ना है
अक्सर आलोचक साहित्य को 'क्लिष्ट' और 'सरल' के खानों में बाँट देते हैं, लेकिन नीरज ने इस विभाजन को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने दिखाया कि गंभीर से गंभीर जीवन दर्शन चाहे वह मृत्यु की अनिवार्यता हो या प्रेम की निश्छलता उसे उस भाषा में पिरोया जा सकता है जिसे एक रिक्शा खींचने वाला भी गुनगुना सके और एक विद्वान भी उस पर मीमांसा कर सके। जब वे कहते हैं, "इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में..." तो वे केवल अपनी बात नहीं कह रहे होते, बल्कि वे समाज के उस हर व्यक्ति की पीड़ा को स्वर दे रहे होते हैं जो अपनी मौलिकता के कारण हाशिए पर धकेला गया।
नई पीढ़ी के लिए पाथेय
आज की पीढ़ी, जो त्वरित ख्याति और कृत्रिम शब्दों के मोहजाल में फंसी है, उसके लिए नीरज एक जीवंत पाठशाला हैं। उनका जीवन सिखाता है कि:
१. मौलिकता ही अमरता है: उधार के भावों से साहित्य सृजन संभव नहीं।
२. भाषा की सरलता: क्लिष्टता पांडित्य हो सकती है, संवेदना नहीं।
३. साहस: व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होने और सच कहने का साहस ही कवि को 'लोक-कवि' बनाता है।
नीरज जी ने कहा था "इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।" आज उनकी जयंती पर 'मीमांसा' यह उद्घोष करती है कि सदियाँ बीत जाएँगी, पर नीरज का 'गीत' हर विरही के कंठ में, हर प्रेमी की धड़कन में और हर दार्शनिक की सोच में जीवित रहेगा।
मीमांसा ऐसे महान, विराट हृदय साहित्य और संगीत की सेवा करने वाले माता वागेश्वरी के शाश्वत पुत्र नीरज जी को और उनके साहित्य साधना को नमन करती है।
जयंती विशेषांक/ संपादकीय
अमन कुमार होली
© संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'
महत्वपूर्ण सूचना एवं डिस्क्लेमर
प्रकाशक की ओर से घोषणा :
उपरोक्त आलेख वेब पत्रिका 'मीमांसा' के जयंती विशेषांक हेतु गहन और गंभीर शोध के साथ विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत तथ्य विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों (हिंदी साहित्यकार सन्दर्भ कोश, रेख़्ता, विकिपीडिया , प्रसार भारती टी वी इंटरव्यू, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के सरकारी अभिकरण) एवं नीरज जी के जीवन चरित पर आधारित हैं। लेख का उद्देश्य साहित्यिक विमर्श और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है।
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