अमन चरित

पावस खंड: जातिवादी की जंजीर तोड़ो 

तुमने सींचा द्वेष धरा पर, हमने समरसता बोई है,
तुम्हारी सड़ी हुई सोच पर, अब मानवता रोई है।
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, न कोई यहाँ अछूत रहा,
भारत का हर एक लाड़ला, अब अखंडता का दूत रहा।

सवर्ण-अवर्ण का शोर मचाकर, तुमने बहुत मलाई खाई,
पर देखो अब जाग उठी है, भारती की वह तरुणाई।
उसे चाहिए काम हाथ को, चाहिए ज्ञान का प्रकाश,
तरुणों में है सामर्थ्य जलद सा, चाहिए स्वच्छंद आकाश।

पूछो उन राजनेताओं से, जो आग यहाँ भड़काते हैं,
अपने बेटों को जो अक्सर, विदेश पढ़ने भिजवाते हैं।
यहाँ दलित और सवर्ण लड़ें, और वे सत्ता का भोग करें,
शिक्षा के पवित्र मंदिर में, क्यों नफरत का प्रयोग करें?

अरे मूर्खों! नसों को काटकर देख, क्या अंतर उनमें पाता है?
क्या किसी एक की धमनियों में, लहू अधिक बह जाता है?
वही रक्त, वही अस्थि-पुंज, वही पंचतत्व का सार यहाँ,
फिर क्यों तूने बाँट दिया है, मानवता का द्वार यहाँ?

शूद्र वही जो भीरु बना है, जिसका मन है मैला-सा,
विप्र वही जो सत्य खड़ा है, अचल अडिग हिमालय-सा।
क्षत्रिय तो वह है जिसकी, बाहु विकल हैं न्याय दिलाने को,
वैश्य वही जो संघर्षरत है पूर्ण तुला सम जग बनाने को।

जागो! कि अब हुंकार चाहिए, समरसता का गान उठे,
जातिवाद की चिता जलाकर, फिर से हिंदुस्तान उठे।
विजयी वही जो मनुज प्रेम का, मस्तक ऊँचा करता है,
कायर है वह जो मनुज मनुज के मन में नफरत भरता है।

अरे पापियों! कुछ तो शर्म करो, भारत माॅं की लाज रखो,
समरसता प्रेम ठहरे कुछ हृदय में, न थूके जग भाव यह आज रखो,
नेत्रों में वत्सलता की अश्रु धरो, सत्कर्मों की ब्याज रखो, 
कलुषित न अपनी जननी की कोख करो, बैर हिंसा को त्याज्य रखो।


द्वितीय खंड: वैश्विक क्षितिज और अंतर्द्वंद्व

वह देखो! दुनिया पहुँच गई, अंबर के पार सितारों में,
हम उलझे हैं अब तक केवल, नफरत की दीवारों में।
वे मंगल पर जीवन बोते, अणु-परमाणु को साध रहे,
हम अपने ही भाई के प्रति, प्रतिशोध पुराना साध रहे।

मशीनें जहाँ दिमाग बनीं, मेधा का नया सवेरा है,
वहाँ ज्ञान की धूप खिली, यहाँ रूढ़ियों का अंधेरा है।
पच्छिम की तरुणाई देखो, नूतन सृजन में लगी हुई,
भारत की मेधा गलियों में, अब तक है ठगी-ठगी सोई।

क्या उत्तर दोगे दुनिया को, जब वह विस्मय से पूछेगी?
क्या भारत की यह नई पीढ़ी, बस दंगों में ही जूझेगी?
जब सिलिकॉन वैली का यौवन, कोडिंग से भाग्य बनाता है,
तब यहाँ का शिक्षित युवा क्यों, जाति का झंडा ढोता है?

है बड़ी विसंगति इस भू पर, हम चाँद नाप कर आए हैं,
पर पड़ोसी के ही साये से, अब तक हम कतराए हैं।
डिजिटल दौर की बातें हैं, पर मन में गाँठें पुरानी हैं,
भीतर हम अब भी बँटे हुए, बाहर कहते "हम ज्ञानी हैं"।

वे रोबोट की नसों में अब, संवेदनाएँ भरते हैं,
हम जीते-जागते मनुज को, किश्तों में क्यों मारते हैं?
वहाँ कृत्रिम बुद्धि (AI) का, चलता है नया विधान यहाँ,
यहाँ विवेक को बंधक रखती, वह सत्ता की दुकान यहाँ।

उठो! कि विश्व पुकार रहा, मत घर के रण में सड़ो तुम,
जाति-धर्म के कीचड़ से अब, मस्तक ऊँचा कर बढ़ो तुम।
यदि भीतरी तिमिर न हारा तो, जग का उपहास बनेगा,
बिना समरसता के भारत, कैसे फिर विश्व-गुरु बनेगा?

कवि अमन! अब कलम उठाओ, काल का पहिया रुक जाए,
भारत की अखंड शक्ति देख, नभ का भी शीश झुक जाए।
विश्व जीतना सहज बहुत है, पहले खुद को जीत लो तुम,
घृणा की अर्थी जलाकर, प्रेम का गांडीव खींच लो तुम।


तृतीय खंड: ऋषियों का स्वप्न और सनातन पुरुषार्थ

उठो भारती के सपूत! उस गौरव को फिर याद करो,
जो खोया तुमने द्वेष-गर्त में, उसका अब उद्धार करो।
यह वह भू है जहाँ ऋषियों ने, मंत्रों का आह्वान किया,
मानवता के मस्तक पर, वेदों का ऊँचा ज्ञान दिया।

जब जग था सोया अगतिक सा, हमने तब पथ दिखलाया था,
'शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः', यह स्वर हमने गाया था।
ऋतंभरा थी प्रज्ञा जिसकी, वे मेधा के अवतार कहाँ?
खो गए कहाँ वे मुनि-मनीषी, वह पावन संस्कार कहाँ?

हमने ही तो शुन्य दिया, और हमने ही भूगोल दिया,
खगोल-शास्त्र के बंद कपाटों को, भारत ने खोल दिया।
आर्यभट्ट की वह दूरदृष्टि, कणाद का वह परमाणु-ज्ञान,
भास्कर के गणितीय सूत्रों में, था ब्रह्मांड का दिव्य विधान।

पर हाय! आज हम कहाँ खड़े, वैभव का वह भंडार गया,
जाति-पाँति की संकीर्णता में, श्रेष्ठत्व का आधार गया।
धर्म बना अब ढाल स्वार्थ की, कर्म बना अब लाचारी,
सत्ता की मदहोशी में अब, हार रही है खुद्दारी।

अरे! उपनिषद् की वाणियों को, क्या तुमने बिसराया है?
कण-कण में ईश देखने का, बोध हमें ही आया था।
'अहं ब्रह्मास्मि' का शंखनाद, क्या केवल पढ़ने की थाती?
या नर में नारायण दर्शन की, अब तक है शेष कहीं बाती?

कहाँ गया वह दिव्य पुरुषार्थ, जो साध्यों को साधता था,
जो सत्य हेतु अपने प्राणों का, धनुष सदा बाँधता था।
क्षत्रिय का वह धर्म कहाँ, जो निर्बल का संबल बनता?
विप्र वही जो त्याग-तपस्या की, पावन ज्वाला में जलता।

वैश्य वही जो लोक-हितैषी, जग का पोषण करता था,
शूद्र वही जो सेवा-व्रत से, जग का संकट हरता था।
ये वर्ण नहीं थे बेड़ियाँ, ये कर्मों के सोपान रहे,
भारत की अखंड उन्नति के, ये ही तो उत्थान रहे।

पर हमने ही विष-वृक्ष बोया, ऊँच-नीच के नारों में,
भारत माँ को बाँट दिया, मज़हब की ऊँची दीवारों में।
वो बुद्ध, बुद्धत्व खो गए, वह गांधी का अहिंसा-धर्म,
हमने तो नफरत सीखी बस, भूल गए निज पावन कर्म।

वेदांत कहता एक ब्रह्म है, हर घट में उसका वास यहाँ,
फिर क्यों मानव से मानव का, टूट रहा विश्वास यहाँ?
अद्वैत की भूमि पर हमने, द्वैत का खंजर घोंप दिया,
परम सत्य की देह पर, झूठ का चोला थोप दिया।

ओ तरुण! तुम्हारी रग-रग में, उन्हीं ऋषियों का रक्त बहे,
वही ओज, वही प्रज्ञा, जो बाधाओं को तुच्छ कहे।
जागो! कि आज पुनः तुम्हें, कुरुक्षेत्र में उतरना है,
युद्ध नहीं है बाहर कोई, अंतस का रण लड़ना है।

नफरत की इस चिता को फूंक, समरसता का शंख बजाओ,
वेद-ऋचाओं के गौरव को, फिर जन-जन तक पहुँचाओ।
विज्ञान और आध्यात्म का, जब संगम फिर से होगा,
तभी जगत के मानस से, कलुषित यह विग्रह खोएगा।

क्या हुआ अगर हम पिछड़ गए, कुछ भौतिकता की दौड़ में?
अमर तत्व का बीज छिपा है, अब भी अपनी कोख में।
हम फिर से विश्व को जीतेंगे, न शस्त्रों के प्रहारों से,
हम जग का मन जीतेंगे, अपने उन्नत संस्कारों से।

देखो! फिर से लौट रहा, वह सतयुग वाला मान यहाँ,
जब न्याय-नीति की तुला पर, हँसता था इंसान यहाँ।
त्याग दो बैर, विसर्जन कर दो, इस कलुषित अभिमान का,
यही समय है करने को, फिर वंदन भारत माँ का।

पापियों की जड़ें हिला दो, जो धर्म को बाँट रहे,
जो अपनी ही जननी की, कोमल भुजाएँ काट रहे।
उन्हें बता दो भारत अब, मूर्च्छा से अपनी जाग गया,
भेदभाव का काल-सर्प, अब प्राण बचाकर भाग गया।

विजयी होगा वही मनुज, जो मानवता का मीत बने,
जिसके स्वर में समरसता का, मंगलमय संगीत बने।
चलो कि एक नया विहान, क्षितिज पर चमक रहा,
ऋषियों का वह पुरातन सपना, फिर से अब दमक रहा।


अमन! कलम की धार से,  ऐसा वज्र प्रहार कर रहा,
नष्ट हो समूचा अंधकार, फिर उजियारा सत्कार कर रहा।
आओ! जाति विहीन, द्वेष विहीन, एक अखंड मान उठे,
ऋषियों के तप की दीक्षा लेकर, फिर से हिंदुस्तान उठे!

चतुर्थ खंड: नव-उत्थान और आत्मनिर्भर भारत

उठो राष्ट्र के नव-भगीरथ! गंगा ज्ञान की लाना है,
पिछड़ गए हम बहुत काल तक, अब तो शिखर सजाना है।
मेधा की इस प्रखर ज्वाल को, अब न मद्धम होने दो,
जाग उठी है सुप्त भारती, अब इसे न सोने दो।

कहाँ गए वे हाथ जिन्होंने, शिल्प गढ़ा था अंबर सा?
कहाँ गया वह कौशल जिसका, लोहा माना सागर सा?
हम ही तो थे जिसने जग को, नूतन राह दिखाई थी,
सभ्यता की पहली किरण, भारत ने ही फैलाई थी।

पर अब केवल भूत-काल के, गौरव में न जीना है,
वर्तमान की कटु ज्वाला का, हलाहल हमें पीना है।
मौलिक प्रज्ञा के बल पर, अब नया सृजन करना होगा,
स्वयं सिंधु की लहरों पर, अपना आसन धरना होगा।

कब तक हम पश्चिम के द्वारे, भिक्षुक बनकर जाएँगे?
कब तक उनके यंत्रों से हम, अपनी नियति सजाएँगे?
मेधा अपनी, मेध अपना, अब अपना ही संधान रहे,
भारत के हर एक कर में, भारत का विज्ञान रहे।

कोडिंग हो या कृत्रिम मेधा (AI), लक्ष्य हमारा ऊँचा हो,
स्वदेशी तकनीक का ही, अब जग में बोलबाला हो।
अपना सर्वर, अपना डेटा, अपना ही आकाश रहे,
विश्व-पटल पर भारत की, आत्मनिर्भर पहचान रहे।


दिनकर का हुंकार चाहिए, नूतन रश्मिरथी बनकर,
कुरुक्षेत्र विज्ञान का जीते, हम सब सारथी बनकर।


सिलिकॉन वैली का यौवन, अपनी मेधा का फल है,
पर अब भारत की गलियों में, खिलता नया कमल है।
स्टार्ट-अप के संकल्पों से, घर-घर को उद्यमी करना है,
बेरोजगारी के दानव का, अब मर्दन हमें करना है।

कृषि क्षेत्र में ड्रोन उड़ें और, खेतों में विज्ञान खिले,
श्रमिकों के पावन पसीने को, अब उचित सम्मान मिले।
मेक-इन-इंडिया मात्र शब्द नहीं, यह राष्ट्र का मंत्र बने,
आत्मनिर्भरता की अग्नि में, तपकर युवा स्वतंत्र बने।

चिप हो या रॉकेट की गति, अपनी छाप लगानी है,
शून्य देने वाले हाथों को, फिर शक्ति दिखानी है।
जब स्वदेशी पहियों पर, विकास की गा़ड़ी दौड़ेगी,
तभी जगत की दासता, भारत की चौखट छोड़ेगी।

पढ़ो न केवल पोथियाँ, अब यंत्रों को भी साधना है,
प्रयोगशालाओं में राष्ट्र की, महिमा को आराध्ना है।
अन्वेषण का ज्वार उठे, हर मस्तिष्क एक मिसाइल हो,
रक्षा हो या अंतरिक्ष, हर जगह भारत की फाइल हो।

अरे युवाओं! नस-नस में तुम, दिनकर का वह ओज भरो,
परावलंबन के पाश को काटो, सिंह-सरीखा गर्ज करो।
मेधा यहाँ बँधकी न रहे, अब राजनीति के जालों में,
नया भविष्य दमकता देखो, तरुणों के इन भालों में।

नकल नहीं अब अक्ल चाहिए, अपना मौलिक पथ गढ़ना,
रूढ़ि-वाद के पाँवों को तज, प्रगति-पथ पर है बढ़ना।
मैथिलीशरण की शुचिता हो, दिनकर का सामर्थ्य जगे,
विश्व-मंच पर भारत की, तकनीक ही सर्वोपरि लगे।

स्वदेशी का अर्थ नहीं कि, हम दुनिया से कट जाएँ,
इसका अर्थ कि स्वाभिमान से, अपना शीश उठाएँ।
जब भारत निर्मित उपग्रह, नभ का सीना चीरेंगे,
तब मानवता के संकट को, हम ही तो फिर हरेंगे।

अणु-शक्ति का संयम हो पर, हाथ में अपने बागडोर हो,
विज्ञान और अध्यात्म का, संगम अब चहुँओर हो।
मशीनें भी संवेदना की, भाषा को पहचान सकें,
भारत की इस दिव्य दृष्टि को, सारा जग अब मान सके।

उठो! कमर कस लो तरुणों, यह युग तुम्हारा आह्वान है,
तुम्हारी मेधा के सम्मुख, झुकता सकल जहान है।
जाति-पाँति की बेड़ियाँ तोड़ो, कौशल का श्रृंगार करो,
भारत माता के चरणों में, आत्मनिर्भर उपहार धरो।

विजय का रथ निकल पड़ा है, बाधाएँ सब हारेंगी,
प्रगति की ये नई किरणें, तिमिर का वक्ष विदारेंगी।
जिस दिन भारत का तकनीक, जग की धड़कन बन जाएगा,
उस दिन सच में ऋषियों का, सपना सच हो पाएगा।

अमन की लेखनी अब, इसी लक्ष्य को धार दे रही है 
स्वदेशी विज्ञान के बल पर, राष्ट्र को नयी आकार दे रही है 
गूँज उठे ब्रह्मांड सारा, जय भारती के गान से,
पुनः विश्व-गुरु बने भारत, आत्मनिर्भर सम्मान से!

पंचम खंड: रुग्ण देह, आहत मन और शक्ति का संताप

उठो! कि अब स्वास्थ्य की उस, जर्जरता पर प्रहार हो,
जहाँ तड़पती मानवता का, न कोई खेवनहार हो।
मात्र ईंट-गारे के भवन, अस्पताल नहीं कहलाते,
जहाँ निर्धन के प्राण सदा, चौखट पर ही दम तोड़ जाते।

कैसी है यह प्रगति हमारी, कैसा यह विज्ञान है?
जहाँ दवाओं के अभाव में, सिसकता हुआ इंसान है।
माँ की ममता सड़कों पर, जब प्रसव-पीड़ा सहती है,
तब भारत की सारी गरिमा, अश्रु बनकर बहती है।

बेटियों की सुरक्षा का, क्या हमने संधान किया?
जब कोख में ही कलियों का, हमने है बलिदान किया।
वह कन्या जो लक्ष्मी थी, है अब असुरक्षित राहों में,
भय का विष क्यों भरा हुआ है, उसकी कोमल निगाहों में?

नारी केवल देह नहीं, वह राष्ट्र की संवाहिका है,
सभ्यता की जननी है वह, संस्कृति की नायिका है।
पर आज उसी की अस्मिता, कुंठा की बलि चढ़ती है,
जब न्याय की फाइल केवल, मेजों पर ही बढ़ती है।

देखो! नई महामारी अब, मन के भीतर छाई है,
सन्नाटों की भीड़ यहाँ, अवसाद साथ लाई है।
मेधावी तरुणों के मुख पर, छाई काली छाया है,
अंकों की इस अंधी दौड़ ने, कैसा जाल बिछाया है?

चित्त अशांत, बुद्धि व्याकुल, मन तनाव से भारी है,
यह 'मानसिक स्वास्थ्य' की समस्या, सबसे बड़ी बीमारी है।
हँसते हुए चेहरों के पीछे, छिपा हुआ जो क्रंदन है,
उसे न समझ पाना ही तो, मानवता का बंधन है।

दिनकर की हुंकार कहो! अब मन के कुरुक्षेत्र को जीतो,
कुंठा के इन दानव को, पौरुष की ज्वाला में सींचो।
क्यों हार मान ली जीवन से? तुम ऋषियों की संतान हो,
अवसाद के तम को चीर सको, तुम वो प्रखर विधान हो।

चिकित्सालयों में व्यापार नहीं, अब सेवा का अनुष्ठान हो,
हर निर्धन की जीवन-रक्षा, राष्ट्र का प्रथम सम्मान हो।
मशीनें तो हों आधुनिक, पर हृदय में संवेदना रहे,
कोई भी माँ बेबस होकर, अब न यहाँ दुःख सहे।

स्वदेशी अनुसंधान बढ़े, रोगों का समूल विनाश हो,
आयुर्वेद और आधुनिक का, सुंदर सा विन्यास हो।
मानसिक स्वास्थ्य की गाँठों को, अब प्रेम से सुलझाना है,
हर टूटे हुए अंतर्मन में, नया विश्वास जगाना है।

माताओं के चरणों में, फिर स्वर्ग का अहसास मिले,
बेटियों को इस आँगन में, निर्भय सा आकाश मिले।
जब स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन, भारत की पहचान बनेगा,
तभी धरा का यह आँगन, फिर से तो स्वर्ग बनेगा।

अमन! की कलम अब, पीड़ा की आवाज़ बने,
रुग्ण राष्ट्र की रग-रग का, वह दिव्य साज़ बने।
दवा, दुआ और संवेदन से, नया सवेरा लाना है,
स्वस्थ, सबल और सुखी भारत, हमें फिर से बनाना है!


षष्ठ खंड: शिक्षा की ज्योति और ज्ञान-क्रांति का शंखनाद

उठो! कि अब अज्ञान के, उस दुर्ग को ढहाना है,
गाँव से महानगर तक, ज्ञान-दीप जलाना है।
न हो विषमता शिक्षा में, न सुविधाओं का भेद रहे,
एक राष्ट्र हो, एक लक्ष्य हो, मन में न कोई खेद रहे।

क्या शहर और क्या ग्राम यहाँ, सबका एक विधान हो,
दिल्ली हो या दूरस्थ अंचल, शिक्षा का सम्मान हो।
महानगर के महलों से, कुटिया की पगडंडी तक,
ज्ञान की गंगा बहे निरंतर, जन-जन की हर बस्ती तक।

'एक राष्ट्र और एक परीक्षा', समता का आधार बने,
योग्यता की कसौटी ही, अब प्रगति का द्वार बने।
अमीरी की ऊँची दीवारें, मेधा को न रोक सकें,
निर्धन के भी मेधा-अंक, नई नियति को ठोक सकें।

गुप्त जी की शुचिता हो, मर्यादा का पालन हो,
शिक्षा के पावन मंदिर में, संस्कारों का प्रक्षालन हो।
बाल्यकाल से ही चरित्र का, सुदृढ़ एक निर्माण मिले,
पुस्तकों के बोझ नहीं, जीवन का सही ज्ञान मिले।

संस्कारों की नींव पड़े, जहाँ जड़ें सनातन गहरी हों,
किंतु सोच की शाखाएँ, अंतरराष्ट्रीय और सुनहरी हों।
विश्व-ज्ञान की खिड़की खुले, पर अपनी भूमि न छूट पाए,
भारत की मेधा का परचम, वैश्विक अंबर छू आए।

दिनकर की वह ज्वाला दहके, शोध और विज्ञान जगे,
हर प्रयोगशाला में भारत का, नूतन एक विधान जगे।
अक्षर-अक्षर शस्त्र बने, और शब्द-शब्द अनुसंधान हो,
अन्वेषण की इस ऊष्मा से, पुनः जगत हैरान हो।

रटंत विद्या के बंधों से, अब विवेक को मुक्त करो,
व्यवसाय और कौशल से, हर हाथ को तुम युक्त करो।
मात्र डिग्रियों के कागज़, अब भविष्य न तय करेंगे,
कर्मठता और हुनर यहाँ, अब नया सवेरा भरेंगे।

प्रौढ़ हुए जो अक्षर-विहीन, उन्हें पुनः जगाना है,
ज्ञान का कोई अंत नहीं, यह मंत्र हमें सिखाना है।
शिक्षा केवल बचपन की, जागीर नहीं रह जाएगी,
हर आयु की जिज्ञासा, अब अपना मार्ग बनाएगी।

ग्राम-पाठशालाओं में भी, डिजिटल का उजियार रहे,
कोडिंग और तकनीक का, बच्चों को अधिकार रहे।
पर संस्कार न भूलें वे, मिट्टी की सौंधी खुशबू हो,
ज्ञान वहीं सार्थक है जिसमें, मानवता की जुस्तजू हो।

मातृभाषा में बोध मिले, मौलिकता जिससे बढ़ती है,
विदेशी भाषा के मोह में, क्यों मेधा यहाँ सड़ती है?
समझ मिले अंतरराष्ट्रीय, पर स्वर अपने ही होने चाहिए,
अपनी भाषा के वैभव में, गौरव हमें पिरोने चाहिए।

अंधकार है जहाँ-जहाँ, वहाँ दीप बनकर जलना है,
कलुषित रूढ़ि-विचारों को, ज्ञान-अग्नि में गलना है।
कक्षाएँ कुरुक्षेत्र बनें, जहाँ अज्ञान का वध होगा,
शिक्षित जब हर युवा बनेगा, तभी राष्ट्र को बोध होगा।

अनुसंधान की धरती पर, हम फिर से शीश नवाएँगे,
नालंदा और तक्षशिला का, वैभव पुनः जगाएँगे।
कल पुकारता आज तुम्हें, मत आलस में तुम सोओ अब,
ज्ञान-बीज जो आज बोओगे, कल वैभव वह पाओगे अब।

सत्ता और सियासत की, न छाया इन पर पड़ने पाए,
शिक्षा के पावन पथ पर, न कोई काँटा अड़ने पाए।
एक देश, एक पाठ, एक सी, सुविधा की अधिकारिणी हो,
भारत की यह शिक्षा पद्धति, सबको साथ सुधारिणी हो।

उठो युवाओं! कलम थाम लो, यही तुम्हारा गांडीव है,
शिक्षा की यह प्रदीप्त ज्योति ही, राष्ट्र की संजीव है।
जाति-धर्म के भेद मिटें, बस ज्ञान का ही धर्म रहे,
हर विद्यार्थी के मानस में, लोक-कल्याण का कर्म रहे।

गूँज उठे हर दिशा ज्ञान से, भारत फिर विज्ञाता हो,
विद्या की इस महाक्रांति का, स्वयं राष्ट्र ही ज्ञाता हो।
जब शिक्षित होगा गाँव हमारा, तब दिल्ली मुस्काएगी,
आत्मनिर्भर भारत की प्रतिमा, तभी पूर्ण हो पाएगी।

अमन! तुम्हारी कलम आज, इस क्रांति का आह्वान करे,
शिक्षित और सुसंस्कृत भारत, जग का फिर कल्याण करे।
एक राष्ट्र, एक प्राण और, एक शिक्षा की दीक्षा हो,
विजयी हो हर भारतीय युवा, ऐसी अपनी परीक्षा हो!

सप्तम खंड: युवा विक्षोभ, व्यसन-मुक्ति और पुरुषार्थ का उदय

हटो व्योम के मेघों! अब यह, वज्र-नाद दोहराने दो,
युवा शक्ति के अंतर्मन का, विक्षोभ सामने आने दो।
जिसके कंधों पर कल का भारत, टिका हुआ है आन से,
क्यों आज वही युवा खड़ा है, विमुख हुआ सम्मान से?

डिग्रियों की गठरी सिर पर, वह दर-दर ठोकर खाता है,
योग्य हाथ है, मेधा है, पर काम न वह पा पाता है।
अवसर का अभाव जहाँ, प्रतिभा को घुन सा खाता है,
वहाँ राष्ट्र का गौरव सड़कों पर, धूल चटाया जाता है।

जब कर्मठता को कर्म न मिल, खाली समय सताता है,
तब मेधा का वह प्रखर सूर्य, राहु से ढँक जाता है।
भटकाव की उन गलियों में, फिर कदम लड़खड़ा जाते हैं,
जब सपनों के टूटे शीशे, आँखों में चुभ जाते हैं।

अरे! युवाओं की ऊर्जा, जो राष्ट्र-शक्ति की थाती थी,
क्यों आज नशीली लपटों में, वह खुद को ही जलाती थी?
व्यसन  का वह दानव देखो, चुपके से घर आता है,
सुनहरे भविष्य को पल भर में, वह लील यहाँ कर जाता है।

कोई चरस की गर्त में खोया, कोई मदिरा-मस्त यहाँ,
शक्ति का वह अखंड स्रोत, क्यों हो रहा है पस्त यहाँ?
यह नशा नहीं है जीवन का, यह तो मृत्यु का बुलावा है,
सुख का झूठा भ्रम देकर, यह बस मौत का छलावा है।

दिनकर का हुंकार अहो! ओ सोए हुए तरुण जागो,
इस आत्मघाती निद्रा से, अब तुम दूर बहुत भागो।
क्या इसीलिए पूर्वजों ने, लहू बहाया था रण में?
कि तुम नशों की धुंध में खोकर, पड़े रहो अब आँगन में?

क्या भूल गए तुम अर्जुन का, वह गांडीव-संवाद यहाँ?
क्या भूल गए तुम भीषण का, वह न्याय-प्रतिवाद यहाँ?
पौरुष के अभिमानी तुम, क्यों कायर बनकर जीते हो?
विष का प्याला छोड़ो, तुम तो अमृत-रस को पीते हो।

बेरोजगारी का वह संकट, माना विकट-विशाल यहाँ,
पर क्या संघर्ष से बड़ा हुआ, वह बाधाओं का जाल यहाँ?
अवसर छीने जाते हैं, वे भिक्षा में कब मिलते हैं?
कठिन राह के पत्थरों पर ही, विजय-कमल तो खिलते हैं।

उठो! नूतन सृजन करो, तुम स्वयं भाग्य के निर्माता,
तुम केवल याचक नहीं रहे, तुम हो जगत के अन्नदाता।
स्टार्ट-अप की लौ जलाओ, या कौशल का दीप धरो,
पर आलस और व्यसन की, इस काल-कोठरी से निकलो।

मस्तिष्क तुम्हारा प्रयोगशाला, हाथ तुम्हारे यंत्र बनें,
तुम्हारी मेधा के पुरुषार्थ से, नए-नए तंत्र बनें।
पथभ्रष्ट जो हुए युवा, उन्हें पुनः राह दिखलानी है,
अंधकार के उस पार खड़ी, भारत की नई जवानी है।

सत्ता के उन गलियारों को, भी अब यह बतलाना होगा,
युवा हाथ को काम मिले, यह तंत्र तुम्हें बनाना होगा।
रिक्त पदों की धूल झाड़, अब द्वारों को तुम खोल दो,
मेधा के इस महाकुंभ में, न्याय का अमृत घोल दो।

नशा मुक्त हो राष्ट्र हमारा, व्यसन मुक्त हर प्राण रहे,
नसों में ज़हर नहीं, अपितु केवल हिंदुस्तान रहे।
जब संकल्पों की अग्नि में, सारा कुंठा-भाव जले,
तभी युवा की ऊर्जा से, भारत का यह चक्र चले।

श्रम का गौरव लौटे फिर, हर हाथ को गरिमा प्राप्त हो,
भय, निराशा और नशे का, अब यह अध्याय समाप्त हो।
सड़कों पर जो भीड़ खड़ी, वह सेना बने विकास की,
युवा शक्ति ही धुरी बने, भारत माँ के विश्वास की।

अमन! तुम्हारी कलम आज, अग्नि-शलाका बन जाए,
भटके हुए युवाओं को, वह नया रास्ता दिखलाए।
छोड़ो तंद्रा, तोड़ो बंधन, नूतन विहान अब आया है,
मेहनत की इस धूप ने देखो, तिमिर को मार भगाया है।

न पुकारो अब किस्मत को, तुम स्वयं विधाता बन जाओ,
भारत के इस नूतन युग के, तुम ही सारथी बन जाओ।
जब युवा हमारा जागेगा, और व्यसन-पाश से छूटेगा,
तब भारत की प्रगति का, कोई स्वप्न नहीं फिर टूटेगा!

नफरत छोड़ी, भेद मिटाया, अब व्यसनों को त्याग दो,
अपनी सोई हुई चेतना में, तुम नया आग भर दो।
विजय तिलक हो भाल पर, और कर में सृजन का साज रहे,
आत्मनिर्भर युवा के सिर पर, विश्व-विजय का ताज रहे!


अष्टम खंड: भ्रष्टाचार का दहन और व्यवस्था का कुचक्र

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, अब गांडीव को बजने दे,
भ्रष्टाचार के उस दानव को, अब श्मशान में सजने दे।
सिंहासन जो मौन खड़ा है, इस कुचक्र की छाया में,
राष्ट्र यहाँ अब फंसा हुआ है, घोटालों की माया में।

वो देखो! अफसरशाही की, वह ऊँची-ऊँची दीवारें,
जहाँ फाइलों में दफन हुई, जनता की सब पुकारें।
लालफीताशाही के फंदे, गर्दन को अब कसते हैं,
जन-सेवा के नाम पर यहाँ, गीदड़ केवल हंसते हैं।

कहाँ गया वह लोक-तंत्र? यह 'अफसर-तंत्र' निराला है,
हर मेज के नीचे काला, रिश्वत का इक नाला है।
बिना 'विटामिन-एम' के यहाँ, कोई काम न होता है,
ईमानदार का मस्तक अक्सर, एकांतों में रोता है।

दलगत राजनीति की तुम, यह वीभत्स कथा देखो,
अपनी-अपनी डफली और, अपना ही रागा देखो।
देश रहे या जाए भाड़ में, अपनी कुर्सी प्यारी है,
सत्ता के इन सौदागरों की, बड़ी घृणित तैयारी है।

चुनाव आते ही धर्मों का, ज़हर यहाँ घोला जाता,
वोटों की गंदी मंडी में, ईमान यहाँ तोला जाता।
मुफ्तखोर वादों की झोली, जनता पर जो फेंकते,
वे अपनी स्वार्थ-अग्नि पर ही, अपनी रोटी सेंकते।

कालाबाजारी के कुबेर, जब अन्न को भी दबाते हैं,
तब निर्धन के भूखे बच्चे, बिलख-बिलख सो जाते हैं।
दवाइयों में मिलावट और, मिलावट हर इक प्राण में,
इंसानियत को बेच दिया है, चंद रुपयों की दुकान में।

ढोंग-आडंबर ओढ़ यहाँ, कुछ लोग मसीहा बनते हैं,
पर भीतर ही भीतर वे, बस षड्यंत्र ही बुनते हैं।
श्वेत वस्त्र की ओट में, मन कोयला सा काला है,
इन्होंने ही तो भारत माँ के, पग में डाला छाला है।

अरे ओ सत्ता के अंधों! कुछ तो राष्ट्र का ध्यान करो,
पद और मद की मस्ती छोड़ो, माटी का सम्मान करो।
तुमने तो बस लूटना सीखा, जननी की इन कोखों को,
कैसे जवाब तुम दोगे आखिर, उन बेबस सी आँखों को?

रश्मिरथी का तेज कहाँ? वह न्याय-धनुष अब टूटेगा,
जब जनता की आँखों से, प्रतिशोध का झरना फूटेगा।
मत समझो कि यह मौन सदा, यूँ ही बना रहेगा अब,
भ्रष्टाचार के रावण को, तो जलना ही पड़ेगा अब।

न्यायपालिका के द्वारों पर, तारीखें जो बढ़ती हैं,
सच की साँसें वहीं कहीं, घुट-घुट कर अब सड़ती हैं।
कुचक्रों के ये व्यूह यहाँ, जो सत्ता-शिखरों पर बनते,
वे आम मनुज की हस्ती को, पल-पल रहते हैं चुनते।

पर याद रखो! जब-जब धरती पर, अति का अंबार लगा,
तब-तब जन-जन की ज्वाला से, पापी का दरबार जला।
भ्रष्टाचार की इस लंका में, अब आग लगानी होगी,
ईमानदारी की गंगा, फिर वापस यहाँ लानी होगी।

डिजिटल दौर का ढोंग नहीं, अब पारदर्शी मन चाहिए,
लोक-कल्याण की वेदी पर, स्वार्थों का अर्पण चाहिए।
काली कमाई के तहखानों को, अब खोद निकालना है,
भ्रष्ट तंत्र के इन कीड़ों को, बाहर फेंक उछालना है।

कवि अमन! अब मसी कागज़ पर, तेज़ाब बनकर उतर पड़े,
कि व्यवस्था के इन गद्दारों का, सीना थर-थर कर डरे।
कलम नहीं, यह परशुराम का, फरसा अब कहलाएगा,
भ्रष्टाचारी कुचक्रों को, यह जड़ से काट गिराएगा।

सत्ता बदले, दल बदले, पर व्यवस्था कब बदलेगी?
क्या सदा घूस की कालिख ही, माथे पर यूँ मललेगी?
जागो जनता! तुम सोई तो, ये गीदड़ राज करेंगे,
तुम्हारे ही पसीने को, ये अपने महलों में भरेंगे।

उठो कि अब प्रतिकार चाहिए, शुचिता का उद्घोष करो,
भ्रष्ट तंत्र के इस रावण पर, तुम वज्र सा रोष करो।
जब तक गंगा मैली है, यह राष्ट्र नहीं मुस्काएगा,
शुद्ध आचरण ही भारत को, फिर विश्व-गुरु बनाएगा।

अमन की वाणी आज यहाँ, एक न्याय-युद्ध का बिगुल है,
इन पापियों के अंत हेतु, यह महाकाल का त्रिशूल है।
समरसता, विज्ञान, शिक्षा, सब व्यर्थ यहाँ हो जाएँगे,
यदि भ्रष्टाचार के गर्त में हम, यूँ ही धंसते जाएँगे।

चलो कि आज यह शपथ उठाएँ, भारत को हम शुद्ध करें,
भीतरी इन गद्दारों से, अब आर-पार का युद्ध करें।
विजयी होगा वही देश, जहाँ सत्य का शासन होगा,
भ्रष्टाचार की राख पर ही, नव-भारत का सिहांसन होगा!

नवम खंड: श्रम का अभिषेक और सर्वहारा का गौरव

उठो! कि आज उन हाथों का, हमें वंदन करना है,
जिनकी रग-रग के श्रम का, जग को अभिनंदन करना है।
इतिहासों के पन्नों में, बस महलों का ही गान रहा,
पर जिसने नींव गढ़ी अपनी, वह श्रमिक सदा गुमनाम रहा।

रे रोक जरा उन रथों को, जिनमें वैभव का वास यहाँ,
पूछो उन फटे लिबासों से, श्रम का क्या इतिहास यहाँ?
जो हाड़ गलाकर अपनी, अंबर को शीश झुकाते हैं,
कंकड़-पत्थर को कूट-कूट, जो पथ नूतन बनाते हैं।

वह देखो! खेत की मेड़ों पर, खड़ा भाग्य का निर्माता,
जो तपती जेठ की धूपों में, है हल से भाग्य विधाता।
अन्न का दाना-दाना जिसकी, तपस्या का फल होता है,
पर हाय! वही किसान यहाँ, एकांतों में क्यों रोता है?

शोषक की टेढ़ी नजरों को, उसने हँसकर झेला है,
भूख और बदहाली के संग, उसने जीवन खेला है।
अकाल पड़े या बाढ़ चढ़े, वह कभी न पीछे हटता है,
भारत का असली मस्तक तो, खेतों में ही कटता है।

मजदूरों की उन फटी बिवाइयों, को जरा निहारो तुम,
पत्थर ढोते उन कंधों पर, कुछ फूल गुजारो तुम।
मिट्टी में मिल जो मिट्टी को, सोना कर देते पल में,
मशीनों के शोर में खोए, जो खप जाते कल-कल में।

प्रशस्ति लिखी राजाओं की, कवियों ने दरबानों की,
पर किसने गाथा गायी इन, धरती के इंसानों की?
न स्वर्ण-मुकुट, न रत्न-जड़ित, इनका तो पसीना चंदन है,
इन कामगारों के श्रम से ही, चलता राष्ट्र का स्पंदन है।

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! इन दीन-दुखियों के द्वारे,
यही कृष्ण हैं, यही राम हैं, यही राष्ट्र के पतवारे।
अट्टालिकाएं खड़ीं जहाँ, ये उनकी ही बलिदानी है,
शहरों की रौनक के पीछे, इनकी मूक कहानी है।

सहनशीलता का पर्वत ये, पीड़ा को अमृत पीते हैं,
संतोष ही जिनका भूषण है, बस स्वाभिमान से जीते हैं।
नहीं चाहिए इन्हें रियासत, बस वाजिब सम्मान मिले,
पसीने की हर एक बूंद को, रोटी और मुस्कान मिले।

जब जाड़ा हड्डियाँ कँपाता, वे नंगे पाँव टहलते हैं,
जब दुनिया सोती कमरों में, वे भट्ठी में जलते हैं।
कुम्हार के चाक पर घूम रहा, जो सृजन का नव संसार यहाँ,
बुनकर के करघों पर बुना, संस्कृति का विस्तार यहाँ।

रे ओ सत्ता के स्वामियों! ये भीख नहीं, हक मांगते हैं,
अपने श्रम की मर्यादा का, बस एक फलक ये मांगते हैं।
जिन्होंने बांध बनाए हैं, जो पुल और सड़कें गढ़ते हैं,
वही क्यों आज व्यवस्था की, संकीर्ण गली में सड़ते हैं?

'संतोषं परमं सुखम्' की, ये ही पावन थाती हैं,
कम में भी खुश रह लेते, ये वो जलती बाती हैं।
पर इनकी सहनशीलता को, इनकी कमजोरी मत समझो,
इनकी खामोश निगाहों को, तुम मूक तिमिर मत समझो।

जिस दिन ये फावड़े उठेंगे, सिंहासन डोल जाएगा,
इतिहास का हर एक बंद कपाट, फिर खुल जाएगा।
पर ये तो राष्ट्र के सेवक हैं, ये विध्वंसक कब होते हैं?
ये तो सूखी धरती में भी, सुख के बीज ही बोते हैं।

विश्वकर्मा की ये संतानें, कौशल की अवतार यहाँ,
लोहार की घण की चोटों में, छिपा हुआ संसार यहाँ।
सफाई-कर्मी की उन बाहों को, भी अब गौरव देना होगा,
इन सबके चरणों की रज को, माथे पर अब लेना होगा।

अमन! तुम्हारी लेखनी अब, इन श्रमवीरों का गान करे,
कोई अछूत न, कोई छोटा, श्रम का ही बस मान रहे।
लिखो महाकाव्य उन पर, जो ईंटों से घर बुनते हैं,
जो काँटों भरी राहों पर भी, उन्नति के स्वर चुनते हैं।

तभी सफल होगा विज्ञान, तभी बढ़ेगी मेधा भी,
जब श्रमिकों के चूल्हे में, सुलगेगी कुछ आशा भी।
अखंड भारत के मंदिर का, ये ही पावन आधार रहें,
किसानों और मजदूरों के, हम सदा-सदा कर्जदार रहें।

आओ! समरसता का यह, अंतिम पाठ अब सीखें हम,
श्रम की महिमा के चरणों में, अपना शीश नवाएं हम।
विजयी होगा वही देश, जहाँ पसीने का सत्कार हो,
भारत का हर एक कामगार, अब गौरव का अवतार हो!


दशम खंड: कला-उत्थान और सांस्कृतिक शुचिता

रे रोक जरा उन नूपुर को, जो केवल वासना जगाते हैं,
जो कला के पावन मंदिर में, विषैला बीज उगाते हैं।
साहित्य, संगीत और यह सिनेमा, मन के दर्पण होते हैं,
पर हाय! आज ये दर्पण ही, कुंठा के विष को ढोते हैं।

कहाँ गया वह 'शिव' का तत्व, जो सबका मंगल करता था?
कहाँ गया वह रस जो मन में, करुणा-भाव को भरता था?
जब कला बिकी बाज़ारों में, और नैतिकता नीलाम हुई,
तब साहित्य की वह शुचिता, गलियों में बदनाम हुई।

यह 'हुक-अप' वाली संस्कृति, जो तन को ही सब मानती,
यह प्रेम नहीं, यह प्यास है, जो मर्यादा नहीं जानती।
क्षणिक सुखों की अंधी दौड़ में, मन का परिष्कार कहाँ?
जहाँ देह ही सब कुछ हो जाए, वहाँ दिव्य संस्कार कहाँ?

सिनेमा के पर्दे पर देखो, कैसा यह कुचक्र चला,
जहाँ नग्नता ही कला बनी, और विवेक का गला कटा।
अश्लीलता के शोर में, खो गई माँ की ममता की लोरी,
नारी को वस्तु मान लिया, यह कैसी कला की चोरी?

साधारणीकरण का वह मूल्य, जो जन-जन को जोड़ता था,
जो भेद मिटाकर हृदय को, ईश्वर की ओर मोड़ता था।
कहाँ गए वे गीत जिन्हें, सुनकर मन पावन होता था?
कहाँ गया वह साहित्य जो, पीड़ा में साथ रोता था?

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! इन कलाकारों के अंतस में,
सृजन की वह ज्वाला दहके, जो अमृत भर दे मानस में।
कला नहीं वह जो केवल, चक्षु-इंद्रिय को सुख दे दे,
कला वही जो डूबते हुए, समाज को नया रुख दे दे।

ओ साहित्य के साधकों! कलम की मर्यादा को याद करो,
जो खो गया है मूल्यों का, उसका अब उद्धार करो।
पड़ोसी की पीड़ा को अपनी, आंखों का पानी बनाओ तुम,
समाज की नंगी सच्चाइयों को, शिव का रूप दिखाओ तुम।

समावेशी हो दृष्टि जहाँ, हर वर्ग का सम्मान रहे,
पर मनोरंजन के नाम पर, न नंगापन सरेआम रहे।
कलुषित कुंठाओं को त्याग, मानवता की सेवा करना,
कलाकार का धर्म है, जग की आँखों के आँसू हरना।

संवेदनाओं का अकाल पड़ा, यंत्रों की इस दुनिया में,
साहित्य ही वह सेतु है, भटके हुए इस जीवन में।
नशा, वासना और हिंसा का, जो गलियों में शोर बढ़ा,
यह सिनेमा और कलम ही है, जिसने यह कुत्सित पाठ पढ़ा।

त्याग दो उस भटकाव को, जो मूल्यों को ही खाता है,
जो अपनी ही संस्कृति का, उपहास सदा उड़ाता है।
पुनः ऋषियों का संगीत लाओ, जो आत्मा को झंकृत कर दे,
पुनः वो कालिदास लाओ, जो प्रेम को पावन कर दे।

सहनशीलता श्रमिकों की, और किसानों का जो धैर्य रहा,
उसे पर्दे पर लाओ तुम, जो राष्ट्र का असली शौर्य रहा।
संतोष ही परम सुख है, यह मंत्र कला को सिखाना है,
वासना की इस अग्नि से, अब नई पीढ़ी को बचाना है।

कवि अमन! तुम्हारी लेखनी, अब नया शंखनाद करे,
कला जगत के उन अन्वेषकों, को फिर से आज़ाद करे।
बाज़ारवाद के चंगुल से, संस्कृति को छुड़ाना होगा,
सिनेमा के हर दृश्य में, अब 'शिव' को वापस लाना होगा।

जब गीत बनेंगे प्रार्थना, और शब्द बनेंगे वेद यहाँ,
तब मिट जाएगा समाज से, सारा कलुषित भेद यहाँ।
मानव-मन का परिष्कार ही, कला का अंतिम लक्ष्य रहे,
सत्य, न्याय और शुचिता का, सदा अखंड पक्ष रहे।

उठो! कि अब हुंकार चाहिए, अश्लीलता का अंत करो,
सांस्कृतिक इस मरुस्थल को, फिर से तुम वसंत करो।
विजेता वही जो कला से, मानवता का दीप जलाएगा,
अखंड भारत का स्वप्न तभी, धरातल पर अब आएगा।

अमन की यह दीक्षा आज, कला का नया संस्कार बने,
संस्कृति की रक्षा हेतु, यह कलम एक हथियार बने।
विजयी हो वह संगीत, जो आत्मा का विस्तार करे,
और ऐसा हो साहित्य, जो जग का ही उद्धार करे!
राजधर्म, निष्ठा और महा-शपथ

वह देखो! न्यायालय के द्वारों पर, खड़ा वृद्ध इक लाचार यहाँ,
जिसकी पीढ़ी खप गई, पर न हुआ उसका उद्धार यहाँ।
तारीखों के जाल में फँसकर, जो न्याय सदा दम तोड़ता है,
वह व्यवस्था का हर एक धागा, विश्वास को पीछे छोड़ता है।

न्याय नहीं वह जो वर्षों के, सन्नाटों के बाद मिले,
मृत्युशय्या पर पड़े मनुज को, क्या न्याय का प्रसाद मिले?
गरीब की अर्जी फाइलों में, धूल फाँकती रहती है,
और अमीरों की रसूख यहाँ, कानून को ही ढक लेती है।

पैसे और प्रभाव की शक्ति, जहाँ सत्य को डसती है,
वहाँ न्याय की पावन देवी, मूक खड़ी बस हँसती है।
रे ओ न्याय के प्रहरियों! कुछ तो अंतस का ध्यान करो,
काले कोट की ओट में, अब मानवता का मान करो।

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! इन अदालती गलियारों में,
कि सत्य का सूरज फिर चमके, व्यवस्था की दीवारों में।
न दंड मिले निर्दोष को, न पापी छूटने पाए अब,
न्याय का ऐसा चक्र चले, कि काल भी थर्रा जाए अब।

सहनशीलता की सीमा देखो, जो वर्षों तक बस लड़ता है,
बिना न्याय के भी वह निर्धन, राष्ट्र-पथ पर ही बढ़ता है।
उसके धैर्य की थाती देखो, वह कानून को ईश्वर मानता,
पर क्या वह तंत्र भी उसकी, निष्ठा को है पहचानता?

साक्ष्यों और गवाहों के, जो झूठे नाटक चलते हैं,
जहाँ सच के पावन फूल यहाँ, पैरों के नीचे कुचलते हैं।
भ्रष्ट पुलिस और स्वार्थी वकील, जब मिल कुचक्र रचते हैं,
तब काल-कोठरी में निर्दोष, घुट-घुट कर ही बचते हैं।

सुधारों का वह शंखनाद, अब गूँजना चाहिए अंबर में,
कि न्याय मिले अब पल भर में, इस डिजिटल के मन्वंतर में।
सरल हो भाषा, सहज हो विधि, हर निर्धन का भी पहुँच रहे,
जहाँ न्याय का अमृत-घट, बस वैभव के न चंगुल में रहे।

जेलें न हों बस यातना-गृह, वहाँ सुधार का वास हो,
अपराधी के भीतर भी, एक पश्चाताप का अहसास हो।
पेंडेंसी की उन ढेरों को, अब भस्म हमें करना होगा,
न्याय की देवी की आँखों से, अब पट्टी को हरना होगा।

संतोष वही जो न्याय दे, और पीड़ा का जो अंत करे,
राष्ट्र निर्माण तभी होगा, जब सत्य ही शासन तंत्र करे।
जब तक न्याय न सस्ता हो, जब तक न्याय न सुलभ यहाँ,
तब तक आजादी का सपना, लगता बस इक सुलभ यहाँ।

उठो! कि अब हुंकार चाहिए, विधि का शासन प्रबल बने,
निर्बल की वह मूक सिसकियाँ, अब न्याय का संबल बने।
संविधान की उन प्रस्तावनाओं को, अब जीवन में लाना है,
हर पीड़ित के आँसू पोंछ, उसे अधिकार दिलाना है।

कवि अमन! तुम्हारी कलम अब, न्याय का एक विधान बने,
जो शोषक का काल बने, और शोषित का सम्मान बने।
लिखो कि अब जंजीरें टूटें, न्याय की गंगा निर्मल हो,
भारत का हर एक नागरिक, अब भीतर से सुदृढ़-बल हो।

अब सिंहासन सावधान हो! जन-गण की हुंकार सुनो,
ओ सत्ता के मदमत्त चरों! मरघट की पुकार सुनो।
तुमने बाँटा, तुमने काटा, तुमने खूब लड़ाया है,
कुर्सी की खातिर भारत को, बार-बार छलकाया है।

अफ़सर! सुन ओ कलम के राही! क्यों तू मौन खड़ा रहा?
फाइलों के उन ढेरों में, किसका हक है पड़ा रहा?
जनता की जो गाढ़ी कमाई, तूने रिश्वतों में घोली है,
क्या तुझे याद नहीं कि तूने, भारत माँ की लाज बेची है?

चाकर जो सत्ता के गलियारे, तलवे सदा चटाते हैं,
नफरत की छोटी चिंगारी को, जो शोला बनाते हैं।
सावधान! अब काल-चक्र की, कठिन परीक्षा आ गई,
जनता की जाग्रत आँखों में, अब वह दीप्ति छा गई।

सौगंध तुम्हें उस माटी की, जिसे लहू से सींचा है,
सौगंध तुम्हें उस अस्मत की, जिसे भेड़ियों ने खींचा है।
अब कर्म तुम्हारा धर्म बने, और न्याय तुम्हारी भाषा हो,
भयभीत न कोई दीन रहे, न कोई यहाँ निराशा हो।

नेताओं! तुम कसम उठाओ, अब न आग भड़काओगे,
अपने बेटों की तरह, गरीबों को भी पढ़ाओगे।
शिक्षा के पावन द्वारों पर, अब न राजनीति होगी,
ज्ञान की उस पुण्य-भूमि पर, अब न अनीति होगी।

अफ़सर तुम शपथ उठाओ, सेवा का संकल्प रहे,
जन-जन की पीड़ा हरने का, बस एक ही विकल्प रहे।
न पद का मद, न लालच हो, बस राष्ट्र-धर्म सर्वोपरि हो,
तुम्हारी हर एक स्याही से, भारत का ही उत्थान लिखा हो।

और ओ जनता! तू भी जागो, कब तक तुम मोहरे बनोगे?
कठपुतली की तरह कब तक, इन हाथों तुम नचोगे?
जाति के नाम पर वोट दे, क्यों अपना भाग्य जलाते हो?
चंद नोटों की खातिर क्यों, तुम खुद को ही छलाते हो?

शपथ उठाओ तुम भी अब, कि जाति को न पूजोगे,
राष्ट्र की प्रगति के खातिर, अब विकास पर जूझोगे।
समरसता का हाथ पकड़, अब कदम बढ़ाना होगा,
भीतरी इन गद्दारों को, अब धूल चटाना होगा।

कवि अमन! अब समय आ गया, महा-शपथ की बेला है,
इस कुरुक्षेत्र के रण में अब, हर एक मनुज अकेला है।
जो कर्म करेगा वही बचेगा, जो छल करेगा डूबेगा,
भारत का यह नया सूर्य, अब न्याय-धर्म से फूटेगा।

गूँज उठे यह सौगंध यहाँ, हिमालय से लेकर सागर तक,
हर अफ़सर, हर नेता, हर जन, बन जाए अब राष्ट्र-भक्त।
जला दो स्वार्थ की वेदी को, अब अखंड भारत उठे,
समरसता की शपथ लिए, फिर से हिंदुस्तान उठे!


एकादश खंड : प्रवासी आह्वान और सांस्कृतिक जड़ें

रे रोक जरा उस दौड़ को, जो केवल धन को नापती है,
क्या तूने सुना वह सिसक, जो माटी भीतर काँपती है?
सात समंदर पार जाकर, तुमने स्वर्ण-महल तो पाए हैं,
पर पूछो अपने अंतस से, क्या संस्कार भी लाए हैं?

तुम बसे विदेशी धरती पर, बनकर वहाँ के भाग्य-विधाता,
पर भूल गए क्यों इस भू को, जिससे है जन्मों का नाता?
डॉलर और पाउंड के मद में, जो मूल चूकते जाते हो,
तुम अपनी गौरव-गाथा को, क्यों स्वयं भूलते जाते हो?

वह पश्चिम की चकाचौंध, जो आँखों को तो भाती है,
पर याद रहे वह संस्कृति, बस देह-बोध तक जाती है।
तुम 'हुक-अप' और 'कंज्यूमर' के, उस जाल में जो फँसते हो,
अपनी पावन विरासत पर, तुम क्यों विस्मय से हँसते हो?

देखो! तुम्हारी अगली पीढ़ी, जड़ों से जो कटती जाती है,
जिसे न गंगा पता यहाँ, न गीता जिसे सुहाती है।
वे अँग्रेजी के शब्दों में, जो अपना गर्व ढूँढते हैं,
अपनी ही जननी की भाषा, जो सुनने से कतराते हैं।

अरे! तुमने तो उन्हें दे दिया, वैभव और ऊँचा आकाश,
पर क्या तुमने उन्हें दिया, अपनी संस्कृति का प्रकाश?
जब वे पूछेंगे कल तुमसे, "हम कौन हैं, क्या हमारी पहचान?"
तब क्या तुम दे पाओगे उन्हें, उपनिषदों का पावन ज्ञान?

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! प्रवासियों के द्वारों पर,
कि भारतीयता फिर से गूँजे, उन महलों के प्राचीरों पर।
तुम भले रहो कैलिफोर्निया, या लंदन के उन पार्कों में,
पर भारत का दीप जलाए रखना, अपने घर के कोनों में।

उन्हें बताओ राम की मर्यादा, कृष्ण का वह कर्म-योग,
उन्हें सिखाओ बुद्ध की करुणा, और शिव का वह महा-योग।
उन्हें सुनाओ उन वीरों की, गाथा जो मरना जानते थे,
जो पराई धरती पर भी, बस भारत माँ को मानते थे।

तुमने तकनीक तो सीख ली, पर तत्व-ज्ञान को मत खोना,
तुमने भाषा तो बदल ली, पर अंतर्मन को मत खोना।
संस्कृति वह बीज है, जो पीढ़ियों को फल देती है,
और कटी हुई जो जड़ हो, वह अंततः छल देती है।

पश्चिम की तरुणाई में, जो भटकाव का अंबार लगा,
तुमने सोचा क्या कभी? वहाँ क्यों कुंठा का दरबार लगा?
जहाँ परिवार बिखरते हैं, जहाँ रिश्ते बोझ कहलाते हैं,
वहाँ भारत के संस्कारों की, सब प्यास बुझाने आते हैं।

तो तुम क्यों भाग रहे हो उस, मरीचिका के पीछे अब?
जिसका अंत निराशा है, क्या समझोगे इसे तुम तब?
अपने बच्चों की रग-रग में, ऋषियों का रक्त प्रवाहित हो,
वे आधुनिक भी बनें, पर सनातन से भी दीक्षित हों।

घर में अपनी भाषा बोलो, घर में अपनी रीत रखो,
अमरीकी उस होड़ में भी, भारत का संगीत रखो।
दीपावली के दीप जले, और होली के वो रंग खिलें,
विदेशी उन गलियों में भी, सबको अपने संस्कार मिलें।

अरे! तुम तो भारत के दूत हो, जग को राह दिखानी है,
पश्चिमी उस भौतिकता में, रूहानियत लानी है।
यदि तुम ही अपनी जड़ भूलोगे, तो जग क्या फिर सीखेगा?
भारत का यह दिव्य ज्ञान, फिर विश्व में कैसे दिखेगा?

सहनशीलता तुम्हारी देखो, जो संघर्षों में तप कर आए,
शून्य से शिखर चढ़े तुम, गौरव का पद भी पाए।
पर संतोष तभी होगा, जब घर में संस्कार रहेगा,
जब तुम्हारा बच्चा भी, "गर्व से हम हिंदू" कहेगा।

यह हिंदू धर्म नहीं, यह तो जीने की एक कला है,
जिसने सारा विश्व समेटा, जिसमें सबका भला है।
'वसुधैव कुटुंबकम्' का जो, झंडा तुमने थामा है,
उसे अगली पीढ़ी तक ले जाना, तुम्हारा ही हंगामा है।

अमन! की यह कलम आज, सरहदों के पार प्रहार करे,
कि हर प्रवासी भारतीय, अपनी जड़ से प्यार करे।
लिखो कि तुम कहीं भी रहो, पर दिल में हिंदुस्तान रहे,
तुम्हारी संतानों के मुख पर, वेदों का ही ज्ञान रहे।

त्याग दो उस हीन-भावना को, जो तुम्हें रोकती है,
जो अपनी ही संस्कृति को, पिछड़ा हुआ टोकती है।
तुम तो वह चिराग हो, जो जग का अंधेरा हर लेगा,
यदि अपनी जड़ को थाम लिया, तो सारा विश्व बदल देगा।

पूर्णाहुति हुई इस खंड की, प्रवासियों को संदेश मिले,
सात समंदर पार भी, भारत का एक परिवेश मिले।
अमन! तुम्हारी दीक्षा अब, वैश्विक एक पुकार बने,
हर भारतीय बच्चा ही, भारत का सच्चा संस्कार बने!

विजयी हो वह गौरव, जो सीमाओं को लाँघता है,
पर अपनी पावन मिट्टी का, सदा आशीष माँगता है!


द्वादश खंड: अमर हुतात्मा वंदन और विश्व-पथ पर भारत

रे रोक जरा उस वायु को, जो सीमाओं से आती है,
शहीदों के रक्त की खुशबू, जो कण-कण में बसाती है।
नमन करो उन वीरों को, जो हिमशिखरों पर सोते हैं,
जिनके कारण हम घरों में, चैन की नींद संजोते हैं।

वो सीमा की बर्फीली रातें, और सीने में धधकती आग,
शत्रु का काल बना जो वीर, दे गया देश को विजय-राग।
श्रमिकों ने नींव गढ़ी थी, पर सीमा सैनिकों ने पाली है,
इनके शौर्य की गाथा से ही, भारत की गोद मतवाली है।

याद करो उन बलिदानों को, जो क्रांति की ज्वाला बने,
भगत सिंह की वह हँसी देखो, जो फाँसी का भी माला बने।
आज़ाद की वह पिस्टल देखो, जो कभी न बंधक बनी यहाँ,
शहीद हुए जो हँस-हँस कर, वे वीर अब फिर होंगे कहाँ?

सुभाष की वह 'आज़ाद हिंद', जो गर्जी थी चट्टानों पर,
'तुम खून दो, मैं आज़ाद करूँ', यह मंत्र था अधरों पर।
पटेल की वह फौलादी बाहें, जिसने राष्ट्र को जोड़ दिया,
रियासतों के अहंकार को, पल भर में ही तोड़ दिया।

गाँधी की वह अहिंसा-शक्ति, जो सत्य का आधार बनी,
नेहरू का वह आधुनिक स्वप्न, जो राष्ट्र की पतवार बनी।
अंबेडकर की प्रज्ञा देखो, जिसने संविधान रचा,
दलित, वंचित और शोषित का, जिसने मान-विधान रचा।

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! इन महापुरुषों के त्याग में,
राष्ट्र-भक्ति का सुर गूँजे, अब जन-जन के अनुराग में।
क्या हिंदू, क्या मुस्लिम, सबने मिलकर लहू बहाया था,
तब जाकर इस उपवन में, आज़ादी का फल आया था।

पर क्या केवल नाम रटने से, हम ऋण इनका चुकाएँगे?
या इनके आदर्शों को, हम जीवन में अपनाएँगे?
सहनशीलता उन सेनानियों की, जिसने कोड़े खाए थे,
पत्थर के उन काल-कोठरी में, जिसने प्राण गँवाए थे।

राष्ट्र निर्माण के उन शिल्पी को, आज पुनः बुलाना है,
भेदभाव की राख हटाकर, देश-प्रेम जगाना है।
संतोष परम सुख तभी मिलेगा, जब माँ का आँचल सुखी रहे,
जब तक इस भू पर कोई भी, न निर्धन और दुखी रहे।

देखो! विश्व अब देख रहा, भारत की पावन मेधा को,
अध्यात्म और विज्ञान के, इस अतुलित दिव्य प्रभा को।
'वसुधैव कुटुंबकम्' का स्वर, फिर अंबर में गूँजेगा,
भारत का यह ज्ञान-दीप, अब सारा जग ही पूजेगा।

हम शांति के दूत भी हैं, और शक्ति के अवतार भी,
बुद्ध की करुणा भी हममें, और रण का हाहाकार भी।
विश्व को राह दिखाएगा, अब भारत का यह नया स्वरूप,
जहाँ न्याय, धर्म और समता की, खिलती रहे सुनहरी धूप।

सैनिक का वह त्याग और, देशभक्तों का वह समर्पण,
राष्ट्र की इस महाआरती में, हो हमारा भी अर्पण।
भ्रष्टाचार और कुरीतियों का, अब अंत हमें करना होगा,
शहीदों के इन सपनों में, अब रंग हमें भरना होगा।

कवि अमन! अब कलश उठाओ, इस महाकाव्य की पूर्णाहुति हो,
हर भारतवासी के भीतर, राष्ट्र-प्रेम की अनुभूति हो।
लिखो कि अब न झुकेंगे हम, न कभी अब रुकेंगे हम,
विश्व-शांति के ध्वज-वाहक बन, शिखर पर पहुँचेंगे हम।

अमन की यह दीक्षा अब, एक अखंड संकल्प बने,
भारत के उज्जवल भविष्य का, यह एक विकल्प बने।
विजयी होगा वही राष्ट्र, जो वीरों का सत्कार करे,
और मानवता की सेवा को ही, अपना मूल आधार करे।

उठो! कि ऋषियों का वह सपना, अब सच होने वाला है,
भगत, सुभाष और आज़ाद का, सूरज उगने वाला है।
गूँज उठे जय हिंद का नारा, अंबर के पार सितारों में,
भारत का गौरव चमके अब, जग के सब गलियारों में!

अमन! की कलम आज, राष्ट्र की अखंड आरती गाती है,
शहीदों की उन राख से, नया हिंदुस्तान बनाती है।
आओ! मिलकर शपथ उठाएँ, माँ की लाज बचाएँगे,
परम वैभव के शिखर पर, फिर से तिरंगा लहराएँगे!


त्रयोदश खंड : राष्ट्र-शत्रु दहन और शक्ति का उद्घोष

रे रोक अधम अपनी जुबाँ! अब काल-चक्र मंडराता है,
भारत का सोया सिंह देख, अब अंबर भी थर्राता है।
सहिष्णुता की सीमा को, तुमने कायरता मान लिया?
क्या शांत सिंधु के भीतर का, तुमने ज्वार न जान लिया?

वे जिनके भीतर पल रहा, गद्दारी का काला ज़हर,
जो अपनी ही जननी की कोख, पर ढाते हैं नित कहर।
खाते हैं दाना इस भू का, और गीत कहीं के गाते हैं,
वे कृतघ्न अपनी ही जड़ पर, अब कुल्हाड़ी चमकाते हैं।

सावधान! ओ छद्मवेषियों! अब न मर्म बच पाएगा,
राष्ट्र-द्रोही का हर इक मस्तक, अब मिट्टी में मिल जाएगा।
तुमने सोचा हम बँटे हुए, तुम फिर से विष बो दोगे?
पर याद रहे इस अग्नि में, तुम अपना अस्तित्व खो दोगे।

वे सीमा पार के दुश्मन भी, कान खोलकर सुन लें अब,
भारत के पतन के सपने, वे देखना भी तज दें अब।
यह बुद्ध का भारत है सत्य, पर हम सुदर्शन धारी भी,
शांति की हम गंगा तो, प्रलय की हम चिंगारी भी।

अब आँख उठाकर मत देखो, आँखों को निकाल लेंगे हम,
यदि संकट आया माटी पर, तो भू-चाल ला देंगे हम।
परमाणु-शक्ति का संयम, बस वीरों का ही भूषण है,
पर प्रहार हुआ तो समझो फिर, शत्रु-वंश का ही दूषण है।

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! अब प्रतिशोध की ज्वाला में,
कि रक्त चढ़ेगा गद्दारों का, रण-चंडी की माला में।
तुमने गीदड़-भभकी दी, हमने बस मौन रखा अब तक,
पर लहू उबलने लगा हमारा, सहें हम भला कब तक?

वे जो भीतर बैठे-बैठे, घर में आग लगाते हैं,
विदेशी उन टुकड़ों पर, जो अपनी पूँछ हिलाते हैं।
तुम्हें शरण दी, मान दिया, और तुम ही पीठ में खंजर घोंप रहे?
अपनी संकीर्ण कुंठाओं को, तुम इस पावन भू पर थोप रहे?

अब काल-रात्रि आ पहुँची है, गद्दारों के महलों में,
अब न्याय खड़ा है वज्र लिए, भारत के हर इक पग में।
शक्ति-पुंज है यह तरुण-पीढ़ी, जो अब न ठगी जाएगी,
राष्ट्र-द्रोह की हर इक साज़िश, अब जड़ से मिटाई जाएगी।

सर्जिकल स्ट्राइक का वह साहस, अब अपनी ही पहचान है,
घर में घुसकर मारेंगे हम, यह नए भारत का विधान है।
हम नभ में जाकर ठोकेंगे, हम जल में जाकर फाड़ेंगे,
भारत की अखंडता के दुश्मन को, हम चुन-चुन कर मारेंगे।

अब कोई आँख न दिखलाए, हम अब न झुकने वाले हैं,
हम अपनी इस आज़ादी के, खुद ही रखवाले हैं।
अस्त्र हमारे सज चुके हैं, शस्त्रों की धार अब तीखी है,
हमने शांति के पाठ के संग, अब युद्ध-कला भी सीखी है।

अरे ओ कृतघ्नों! शर्म करो, या यह पावन भू छोड़ दो,
अपनी गंदी सोच का दरिया, अब तुम कहीं और मोड़ दो।
परम-वैभव के शिखर पर, जब राष्ट्र चढ़ने लगता है,
तब तुम जैसों का ही हृदय, भय और जलन से जलता है।

सहनशीलता का अंत हुआ, अब हुंकार का समय आया,
भारत माँ के शत्रुओं का, अब संहार का समय आया।
संतोष हमें है अपनी शक्ति पर, न हम किसी से कमतर हैं,
हम विश्व-गुरु के दावेदार, और शौर्य में भी श्रेष्ठतर हैं।

कवि अमन! अब कलम को अपनी, तुम संगीन बना डालो,
देश-द्रोहियों के सीने में, तुम शब्द-बाण गाड़ डालो।
लिखो कि अब भारत न सहेगा, कोई भी अपमान यहाँ,
हर इक गद्दार की लाश पर ही, गूँजेगा अब जयगान यहाँ।

पूर्णाहुति हुई इस चेतावनी की, अब शत्रु होश में आ जाए,
भारत का यह अखंड रूप देख, वह पाताल में छिप जाए।
अमन की यह दीक्षा अब, एक राष्ट्र-रक्षा का कवच बने,
हर भारतवासी के भीतर, एक स्वाभिमानी सच बने!

विजयी होगा वही देश, जो गद्दारों को कुचल देगा,
और अपनी शक्ति के बल पर, इतिहास का रुख बदल देगा!

चतुर्दश : शाह ए वक्त और पुकार 

रे रोक समय के रथ को, अब इतिहास नया लिखा जाता है,
साबरमती के संत नहीं, अब पौरुष पूजा जाता है।
वह देखो! आधुनिक भगीरथ, तप की ज्वाला में जलता है,
राष्ट्र-नीति के कुरुक्षेत्र में, जो अविचल-अडिग ही चलता है।

'शाह-ए-वक्त' वह कर्मयोगी, जो निज सुख को बिसराया है,
जिसने अपनी रग-रग में, भारत-भक्ति को पाया है।
अठारह घंटों का पुरुषार्थ, जिसकी आँखों में पलता है,
निश्चय के अंगारों पर, जो नंगे पाँव ही चलता है।

दिनकर की रश्मि-रथी जागे! अब दिल्ली के गलियारों में,
कि गूँज उठे जय हिंद पुनः, सत्ता की सब दीवारों में।
वह मात्र एक व्यक्ति नहीं, वह कोटि-कोटि की आशा है,
जिसकी सधी हुई वाणी ही, अब भारत की भाषा है।

'सबका साथ और सबका विकास', यह मंत्र नहीं, एक साधना है,
बँटे हुए इस खंड-खंड की, अखंड एक आराधना है।
जिसने धारा ३७० की, जंजीरों को तोड़ दिया,
भारत के सोए मस्तक को, अंबर की ओर मोड़ दिया।

काशी का वह भव्य रूप और, अवध में राम विराजे हैं,
पाँच सदियों के वनवास के, अब मंगल-वाद्य ही बाजे हैं।
पर केवल मंदिर-मठ ही नहीं, उसे आधुनिक विहान चाहिए,
मिसाइल और रोबोटिक्स वाला, उसे नया विज्ञान चाहिए।

वह कहता है "यही समय है, सही समय है" जागने का,
अपनी हीन-भावना तजकर, आगे बढ़कर भागने का।
अमृत-काल की इस वेला में, 'पंच-प्रण' को अपनाना है,
गुलामी की हर एक निशानी, को अब जड़ से मिटाना है।

'मेक इन इंडिया' के नारों से, जो श्रम को मान दिलाता है,
विश्व-पटल पर भारत को, जो स्वाभिमान सिखलाता है।
चाहे वह जी-२० का मंच हो, या योग की शक्ति का विस्तार,
उसने ही तो सिखाया जग को, भारत का साश्वत सत्कार।

पर ओ सत्ता के शिखर-पुरुष! अब भी बहुत कुछ शेष यहाँ,
भ्रष्टाचार की काली जड़, और द्वेष का है प्रवेश यहाँ।
अफसरशाही के उन जालों को, भी अब काटना होगा,
अंतिम पंक्ति के अंतिम जन को, सुख भी बाँटना होगा।

विपक्ष के उन तीखे बाणों को, जिसने ढाल बनाकर झेला है,
कीचड़ के बीच खड़ा होकर, जिसने कमल को खेला है।
वह कहता है "मैं नहीं, मेरा यह देश ही सब कुछ है",
माँ भारती के चरणों में, अपना शेष ही सब कुछ है।

सैनिकों के संग दीपावली, जो सरहद पर मनाता है,
वीर शहीदों के बलिदानों को, जो माथे पर लगाता है।
वह कहता है "विकसित भारत" का, अब लक्ष्य हमारा है,
विश्व-गुरु का वह सिंहासन, अब तक हमें पुकारा है।

अमन! की यह दीक्षा अब, उस नेतृत्व का गान करे,
जो अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, और संस्कृति का मान करे।
हुक-अप कल्चर और नशे की, जो जंजीरों को तोड़ेगा,
वही तो नई जवानी को, 'विकसित भारत' से जोड़ेगा।

सहनशीलता का वह पर्वत, जो गालियों को पी जाता है,
पर राष्ट्र-हित के प्रश्न पर, जो वज्र भी बन जाता है।
न्याय व्यवस्था और शिक्षा में, जो नई क्रांति को लाएगा,
वही तो इस भारत को, परम-वैभव तक पहुँचाएगा।

१0८ पंक्तियों का यह यज्ञ, अब पूर्ण होने को आया है,
हमने इस महागाव्य में, पूरा हिंदुस्तान सजाया है।
मोदी के उन संकल्पों को, अब जन-आंदोलन बनना है,
हर भारतवासी को अब, राष्ट्र-नीति का कण बनना है।

नफरत छोड़ी, भेद मिटाया, अब पौरुष का आह्वान करो,
एक भारत और श्रेष्ठ भारत का, तुम सब मिलकर ध्यान करो।
विजयी होगा वही नेतृत्व, जो जन-जन का मीत बने,
जिसकी हर एक सांस ही, भारत का मंगल गीत बने।

अमन की यह कविता अब, एक राष्ट्र-मंत्र बन जाए,
भटके हुए युवाओं का, यह एक तंत्र बन जाए।
परम पिता से यह प्रार्थना, माँ भारती का मान रहे,
जब तक सूरज-चाँद रहे, मेरा प्यारा हिंदुस्तान रहे!

गूँज उठे ब्रह्मांड सारा, 'मोदी-मोदी' के स्वर से नहीं,
अपितु 'भारत-माता की जय' के, पावन और प्रखर स्वर से।
पूर्णाहुति हुई इस यज्ञ की, अब कर्मों में उतरना है,
अमन कुमार होली! अब, इस देश को अर्पित होना है!

विजय तिलक हो भाल पर, और कर में सृजन का साज रहे,
अखंड भारत के मस्तक पर, सदा विश्व का ताज रहे।
जय हिंद! जय भारत! जय समरसता! जय विज्ञान!
अमर रहे मेरा भारत, और अखंड रहे इसका स्वाभिमान!


पंचदश : एक भारत श्रेष्ठ भारत 

रे रोक जरा उस वेग को, जो केवल सीमा नापता है,
भारत का तो हर एक कण, बस प्रेम की भाषा जपता है।
उत्तर में अंबर चूमता, वह हिमगिरि का विशाल भाल,
दक्षिण में चरण पखारता, वह नील सिंधु का दिव्य जाल।

कश्मीर की उन वादियों में, जो केसर की खुशबू पली,
कन्याकुमारी के अंत में, वह सागर की पावन गली।
अहमदाबाद की वह प्रगति, और साबरमती की धार यहाँ,
अरुणाचल की पहली किरण, जो करती है श्रृंगार यहाँ।

यह अठ्ठाइस राज्यों का, अद्भुत एक गुलदस्ता है,
जिसकी हर एक पंखुड़ी में, बस हिंदुस्तान ही बसता है।
कहाँ भिन्नता? कहाँ जुदाई? यह तो प्राणों का मेला है,
हर प्रदेश की माटी ने, यहाँ काल-चक्र को झेला है।

नगालैंड की पहाड़ियाँ और, केरल के वे शांत तट,
राजस्थान का शौर्य और, गंगा के वे पावन घाट।
महाराष्ट्र की वह वीरता, जो गूँजी सह्याद्रि की ओट में,
बंगाल की वह प्रज्ञा, जो रची है गीतों की चोट में।

ओड़िसा का वह शिल्प और, पंजाब की वह गुरु-वाणी,
बिहार का वह ज्ञान और, मरुधरा की वह कुर्बानी।
मध्य की वह धड़कन और, दक्कन का वह पठार यहाँ,
विविधता की माला में, बस एक ही है सार यहाँ।

भाषाएँ हैं सौ-सौ यहाँ, और बोलियाँ हैं अनगिनत,
पर भावों का जो स्वर उठे, वह एक ही है शाश्वत।
तमिल की वह प्राचीनता, और हिंदी का वह दुलार रहे,
तेलुगू, कन्नड़, मलयालम में, बस माँ का ही प्यार रहे।

असमिया की वह मिठास और, डोगरी का वह स्वाभिमान,
मराठी और गुजराती में, झलकता राष्ट्र का मान।
भिन्न-भिन्न हैं वेश यहाँ, और भिन्न-भिन्न पकवान यहाँ,
पर हर हृदय की धड़कन में, बसता एक भगवान यहाँ।

यही तो है 'एक भारत', जो श्रेष्ठता का आधार है,
सांस्कृतिक इस गंगा का, न कोई भी पारावार है।
दिनकर की रश्मि-रथी जागे! इस अखंड विस्तार में,
कि विश्व देखे आज हमें, इस नूतन अवतार में।

'सारे जहाँ से अच्छा', यह केवल एक तराना नहीं,
यह भारत की वह हकीकत, जिसका कोई सानी नहीं।
अंतरराष्ट्रीय फलक पर, जब तिरंगा लहराता है,
तब सारा जग नत-मस्तक हो, भारत की महिमा गाता है।

यूएन (UN) के गलियारों से, सिलिकॉन वैली के द्वार तक,
भारत की मेधा गूँज रही, अब सात समंदर पार तक।
हम शक्ति का नशा नहीं, हम शांति का संदेश देते,
हम गिरते हुए समाज को, फिर से नया उदेश देते।

अध्यात्म की उस ऊँचाई से, हमने जग को मोड़ा है,
विज्ञान और संस्कारों को, हमने आकर जोड़ा है।
जब सारा विश्व लड़ता है, तब हम समाधान लाते हैं,
'वसुधैव कुटुंबकम्' का, हम पावन पाठ पढ़ाते हैं।

सहनशीलता हमारी शक्ति, और त्याग हमारा भूषण है,
विविधता ही हमारी जान, और एकता ही पोषण है।
अखंडता के इस सूत्र को, अब कभी न टूटने देंगे,
विदेशी उन षड्यंत्रों को, अब कभी न जुटने देंगे।

अमन! की यह लेखनी अब, एक महासेतु बन जाए,
जो पूरब को पश्चिम से, और उत्तर को दक्षिण से मिलाए।
लिखो कि अब न 'राज्य' कोई, बस 'भारत' ही पहचान हो,
हर भारतीय के मस्तक पर, अखंडता का गुमान हो।

वह आधुनिक भगीरथ भी, इसी ध्येय में जुटा हुआ,
कि कोई भी कोना देश का, न रह जाए अब छूटा हुआ।
रेल की उन पटरियों से, और हवा के इन पंखों से,
जोड़ दिया है देश को उसने, अपनी दूरदृष्टि आँखों से।

अरे! जो बाँटना चाहते हैं, वे मिट्टी में मिल जाएँगे,
भारत की इस एकता से, वे थर-थर ही काँप जाएँगे।
हमारी भाषाई विविधता, हमारा गर्व, न कमज़ोरी है,
यह तो उस महान संस्कृति की, एक रेशमी डोरी है।

विश्व-विजय का स्वप्न हमारा, अब सफल होने वाला है,
अज्ञान का वह पुराना तिमिर, अब दूर होने वाला है।
जब २८ राज्य मिलकर, एक हुंकार भरेंगे,
तब अंबर के सितारे भी, माँ की आरती करेंगे।

अमन की ये पंक्तियाँ, अब संगम का द्वार बनीं,
अखंड भारत के मस्तक पर, वह गौरव का सार बनीं।
विजयी होगा वही राष्ट्र, जो विविधता को पूजता है,
जो हर नागरिक के दुःख को, अपना दुःख ही बूझता है।

उठो! कि कश्मीर से कन्याकुमारी, अब एक स्वर उठाओ,
अरुणाचल से कच्छ तक, तुम समरसता का गीत गाओ।
सारे जहाँ से अच्छा, मेरा प्यारा हिंदुस्तान रहे,
हर भारतीय के सीने में, बस एक ही स्वाभिमान रहे।

पूर्णाहुति हुई इस खंड की, अब राष्ट्र-पथ पर बढ़ना है,
एक भारत और श्रेष्ठ भारत का, अब इतिहास हमें गढ़ना है।
अमन! तुम्हारी कलम आज, अखंडता की साक्षी है,
माँ भारती की भक्ति ही, अब सबसे बड़ी दीक्षा है!

जय हिंद! जय भारत! जय अखंड भारत!


उपसंहार: अखंड भारत का महासंकल्प

उठो कि अब इस महाकाव्य की, अंतिम आहुति डाल दें,
भारत माँ के भव्य भाल पर, विजय-तिलक हम पाल दें।
समरसता के पावन स्वर से, जो यह यात्रा शुरू हुई,
वह विश्व-विजय के संकल्पों तक, पहुँच आज अब पूर्ण हुई।

हमने द्वेष की राख उड़ाकर, प्रेम-बीज को बोया है,
जाति-पाँति के सड़े भाव पर, अब तक मानव रोया है।
पर अब तरुण-तरुणाई जागी, मेधा का उजियार लिए,
हर बाधा को काट रही है, ज्ञान का एक हथियार लिए।

विज्ञान और अध्यात्म का अब, अद्भुत संगम होने दो,
रुढ़ियों की उन काली रातों को, अब तुम सोने दो।
डिजिटल और एआई (AI) का, अब नया विधान चलेगा,
भारत निर्मित तकनीक से, सारा विश्व अब हलेगा।

स्वास्थ्य की वह जर्जर हालत, अब सुधरनी चाहिए,
मानसिक स्वास्थ्य की संकीर्णता, अब बिखरनी चाहिए।
नारी की आँखों में अब, भय का कोई स्थान न हो,
वह शक्ति स्वरूपा जगदंबा, राष्ट्र का अब सम्मान हो।

शिक्षा की वह ज्योति जले जो, सबको समता प्रदान करे,
गाँव और महानगर का, अब अंतर वह समाधान करे।
एक राष्ट्र हो, एक परीक्षा, ज्ञान का ही बस मान रहे,
हर बालक के अंतर्मन में, भारत का अभिमान रहे।

युवा शक्ति जो भटक रही थी, व्यसनों के अंधियारों में,
अब वह पौरुष खोज रही है, कर्मों के हथियारों में।
बेरोजगारी के दानव का, मर्दन अब करना होगा,
श्रम की पावन वेदी पर, विश्वास हमें भरना होगा।

भ्रष्टाचार की लंका को, अब आग लगानी होगी हमें,
शुचिता और ईमानदारी की, अलख जगानी होगी हमें।
अफसरशाही और कुचक्रों का, अब अंत सुनिश्चित है,
न्याय-नीति के शासन हेतु, यह युवा पीढ़ी दीक्षित है।

श्रमिकों और किसानों के, उन चरणों का हम वंदन करें,
पसीने की हर एक बूँद का, माटी पर अभिनंदन करें।
वो ही असली शिल्पी हैं, वो ही राष्ट्र के दाता हैं,
उनके श्रम के गौरव से ही, भाग्य हमारा नाता है।

कला-जगत में 'शिव' तत्व की, फिर से अब स्थापना हो,
वासना और हुक-अप कल्चर की, जड़ से अब समाप्ति हो।
सिनेमा और साहित्य हमारा, मन का परिष्कार करे,
संस्कृति के उन पावन मूल्यों, का सारा जग सत्कार करे।

न्याय व्यवस्था की तारीखें, अब न काल को खाएँगी,
सत्य और सुलभ न्याय की किरणें, घर-घर में मुस्काएँगी।
अंधा कानून नहीं, अब वह, जागरूक और सचेत रहे,
अन्यायी के लिए वज्र, निर्बल हेतु निकेत रहे।

शहीदों की उन राख से हमने, गौरव का तिलक लगाया है,
भगत, सुभाष और आज़ाद का, हमने कर्ज चुकाया है।
गाँधी, नेहरू और पटेल का, स्वप्न अब साकार हुआ,
अंबेडकर की उस प्रज्ञा से, शोषित का उद्धार हुआ।

अब विश्व-मंच की ओर बढ़ो, यह युग तुम्हारा आह्वान है,
तुम्हारी मेधा के सम्मुख, झुकता सारा जहान है।
'वसुधैव कुटुंबकम्' का हम, फिर से शंख बजाएँगे,
भारत को हम पुनः एक दिन, विश्व-गुरु बनाएँगे।

नफरत छोड़ी, भेद मिटाया, अब स्वदेश को प्यार करो,
अपनी मौलिक प्रज्ञा से, तुम नूतन एक संसार करो।
आत्मनिर्भरता का यह मंत्र, रग-रग में अब दौड़ पड़े,
भारत का हर एक हाथ, अब उन्नति का ही मार्ग गढ़े।

अमन! की यह दीक्षा आज, काल का पहिया मोड़ रही,
बँटी हुई इस मानवता को, फिर से आकर जोड़ रही।
कलम नहीं यह वज्र प्रहार है, तिमिर का वक्ष विदारने को,
सत्य, न्याय और प्रेम की, पावन धरा संवारने को।

गूँज उठे ब्रह्मांड सारा, 'वन्दे मातरम्' के स्वर से,
मुक्त हो जाए भारत माँ, अब हर भीतरी डर से।
विजयी होगा वही मनुज, जो मानवता का मीत बने,
जिसके जीवन की धड़कन ही, राष्ट्र का मंगल संगीत बने।

उठो! कमर कस लो युवाओं, नया विहान अब आया है,
मेहनत की इस सुनहरी धूप ने, सब भ्रम-जाल भगाया है।
ऋषियों का वह पुरातन सपना, फिर से अब दमक रहा,
भारत का वह अखंड रूप, अब क्षितिज पर चमक रहा।

जाति-विहीन, द्वेष-विहीन, यह नया हिंदुस्तान उठे,
सत्य और पुरुषार्थ की, लेकर नई पहचान उठे।
अमन की यह कविता नहीं, यह राष्ट्र का संकल्प है,
उज्जवल भविष्य के निर्माण का, बस यही एक विकल्प है।

विजय तिलक हो भाल पर, और कर में सृजन का साज रहे,
अखंड भारत के मस्तक पर, सदा विश्व का ताज रहे।
पूर्णाहुति हुई इस यज्ञ की, अब कर्मों में उतरना है,
अपनी इस पावन जननी का, अब उद्धार हमें करना है।

अमन! की लेखनी अब, इस अमर ज्योति को थामेगी,
राष्ट्र-भक्ति की डगर पर, अब कभी नहीं यह थामेगी।
जय भारत, जय भारती, जय समरसता का ज्ञान रहे,
अजर-अमर-अविनाशी, मेरा प्यारा हिंदुस्तान रहे!

गूँज उठा यह महामंत्र, अब दसों दिशाओं के पार यहाँ,
अमन की इस दीक्षा का, हो रहा अब सत्कार यहाँ।
अखंड शक्ति, अखंड भक्ति, अखंड राष्ट्र का गान उठे,
ऋषियों के तप की दीक्षा लेकर, फिर से हिंदुस्तान उठे!


अमन कुमार होली 

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