भारतेन्दु युगीन कविता में राष्ट्रवाद: नवजागरण और जन-चेतना के स्वर
अमन कुमार होली
हिंदी शोधार्थी, हिंदी भवन, विश्व भारती शांतिनिकेतन
भारतेन्दु युगीन कविता में राष्ट्रवाद: नवजागरण और जन-चेतना के स्वर
शोध सार
प्रस्तुत शोध-पत्र भारतेन्दु युगीन कविता में निहित राष्ट्रवाद और नवजागरण के अंतर्संबंधों का विश्लेषण करता है। उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध भारतीय इतिहास में मध्यकालीन जकड़न से मुक्ति और आधुनिक चेतना के उदय का काल था। भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनके मंडल के कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल औपनिवेशिक शोषण को उजागर किया, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध 'लोक' को जगाने का कार्य भी किया। यह लेख विवेचना करता है कि कैसे इस युग की कविता राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति के द्वंद्व से गुजरते हुए अंततः पूर्ण राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर हुई।
प्रस्तावना
हिन्दी साहित्य में 'भारतेन्दु युग' (1850-1900) चेतना के संक्रमण का युग है। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, "भारतेन्दु युग का साहित्य जनवादी इस अर्थ में है कि वह भारतीय समाज के पुराने ढाँचे से संतुष्ट न होकर उसमें सुधार चाहता है।"1 इस काल की कविता केवल श्रृंगार या भक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह गली-मोहल्लों और चौपालों की आवाज़ बन गई। यहाँ राष्ट्रवाद केवल भौगोलिक सीमा प्रेम नहीं था, बल्कि वह आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुक्ति का स्वप्न था। हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध मात्र एक कालखंड नहीं, बल्कि एक महान सांस्कृतिक और वैचारिक संक्रांति का युग है। सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता ने जहाँ एक ओर भारतीय मानस को हताशा से भर दिया था, वहीं दूसरी ओर औपनिवेशिक सत्ता के क्रूर और शोषक स्वरूप को पूरी तरह नग्न कर दिया था। इस संक्रमण काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नेतृत्व में साहित्यकारों का एक ऐसा वर्ग उभरा, जिसने कविता को मध्यकालीन विलासिता, दरबारी श्रृंगार और रीतिकालीन रूढ़ियों के दलदल से बाहर निकालकर ‘राष्ट्र-बोध’ के धरातल पर खड़ा किया। भारतेन्दु युग की कविता का मूल स्वर ‘नवजागरण’ है। यह नवजागरण यूरोपीय ‘रेनेसां’ की नकल मात्र नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए भविष्य के निर्माण की एक भारतीय प्रक्रिया थी। इस युग के कवियों ने अनुभव किया कि गुलामी केवल राजनीतिक नहीं होती, वह मानसिक, आर्थिक और भाषाई भी होती है। अतः इस दौर की राष्ट्रभक्ति बहुआयामी है। यहाँ एक ओर ‘स्वत्व’ की पहचान का संकट है, तो दूसरी ओर एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण की छटपटाहट।
इस काल की कविता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ‘व्यापक सामाजिकता’ है। भक्ति काल में जो कविता परलोक सुधार की ओर उन्मुख थी और रीति काल में जो केवल राजाओं के मनोरंजन का साधन थी, भारतेन्दु युग में वही कविता ‘जन-गण-मन’ की व्याधि और उपचार का विमर्श बन गई। भारतेन्दु मंडल के कवियों ने कविता के ‘पवित्र’ घेरे को तोड़कर उसमें मंहगाई, टैक्स, अकाल, छुआछूत, स्वदेशी और भाषाई अस्मिता जैसे गम्भीर विषयों को स्थान दिया।
प्रस्तुत शोध-पत्र इस तथ्य का अन्वेषण करता है कि कैसे इस काल के कवियों ने एक ओर तो साम्राज्यवादी सत्ता के प्रति कूटनीतिक राजभक्ति का आवरण ओढ़ा, और दूसरी ओर उसी आवरण के भीतर से जन-चेतना की ऐसी अग्नि प्रज्वलित की जिसने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मशाल का काम किया। यह अध्ययन भारतेन्दु युगीन राष्ट्रवाद के उन आर्थिक, सामाजिक और भाषाई पक्षों को रेखांकित करता है, जिन्होंने भारतीय प्रजा को एक संगठित ‘राष्ट्र’ के रूप में परिवर्तित होने के लिए प्रेरित किया।
औपनिवेशिक शोषण और आर्थिक राष्ट्रवाद
भारतेन्दु युग के बारे में हिन्दी के महान आलोचकों के मतों को संक्षेप में देखना समीचीन है। रामचन्द्र शुक्ल के हवाले से विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है “भारतेन्दु ने हिन्दी साहित्य को एक नए मार्ग पर खड़ा किया। वे हिन्दी साहित्य के नए युग के प्रवर्तक हुए। यद्यपि देश में नए-नए विचारों और भावनाओं का संचार हो गया था, पर हिन्दी उनसे दूर थी।”2 भारतेन्दु युगीन राष्ट्रवाद का सबसे प्रखर रूप आर्थिक चेतना में दिखाई देता है। कवियों ने यह समझ लिया था कि ब्रिटिश शासन भारत की संपन्नता को दीमक की तरह चाट रहा है। भारतेन्दु की प्रसिद्ध पंक्तियाँ इस सत्य को उद्घाटित करती हैं:
"अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी,
पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी।"
भारतेन्दु ने ‘भारत दुर्दशा’ में स्पष्ट रूप से ‘टैक्स’ और ‘महँगाई’ को औपनिवेशिक लूट का हथियार बताया। वे लिखते हैं:
“सब धन जात विदेसहुं ही कर हाहाकारी।
ताहु पै अब बढ़ि टैक्स की दुख भारी।।“
यहाँ कवि केवल विदेशी राज का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि वह उस ‘टैक्स’ प्रणाली पर चोट कर रहा है जो आम जनता की कमर तोड़ रही थी। यह आर्थिक राष्ट्रवाद का वह प्राथमिक स्वर था जिसने आगे चलकर ‘स्वराज’ के आंदोलन को आधार प्रदान किया। गॉधी जी के चरखे और स्वदेशी आंदोलन से दशकों पहले भारतेन्दु मंडल के कवियों ने विदेशी वस्त्रों के मोह को भारत की दरिद्रता का मुख्य कारण माना था। बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ अपनी कविताओं में विलायती वस्तुओं के प्रति बढ़ते आकर्षण को ‘राष्ट्रीय लज्जा’ के रूप में देखते थे। उन्होंने विदेशी वस्त्रों के प्रयोग पर क्षोभ प्रकट करते हुए लिखा कि भारतीय अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत ने भयंकर अकालों का सामना किया। एक ओर जनता भूख से मर रही थी और दूसरी ओर दिल्ली दरबार जैसे भव्य आयोजन हो रहे थे। भारतेन्दु ने अपनी कविताओं में इस विरोधाभास को अत्यंत तीक्ष्णता से उकेरा। उन्होंने ब्रिटिश न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक अधिकारियों को ‘कवि-वचन-सुधा’ के माध्यम से लगातार घेरा।
आर्थिक राष्ट्रवाद का एक पक्ष ‘किसानों की दुर्दशा’ भी था। कवियों ने नील की खेती करने वाले किसानों और लगान के बोझ तले दबे ग्रामीणों की पीड़ा को स्वर दिया। अम्बिकादत्त व्यास की रचनाओं में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विनाश का मार्मिक चित्रण मिलता है।
प्रतापनारायण मिश्र ने तो यहाँ तक आह्वान किया कि यदि हम अपने देश का भला चाहते हैं, तो हमें मोटे-झोटे स्वदेशी वस्त्रों को ही अपनाना चाहिए:
“मुँह तौ अनपढ़ सो रह्यौ, मन तौ गयौ विदेस।
भेष बदलि कै करि लियौ, अब तौ औरे भेस।।“
इन कवियों का मानना था कि जब तक भारत का पैसा भारत के भीतर नहीं रहेगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। प्रतापनारायण मिश्र और बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने भी स्वदेशी के महत्व को प्रतिपादित किया। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का जो आह्वान गांधी युग में प्रबल हुआ, उसके बीज इसी युग की कविता में बो दिए गए थे। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने भारत के हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। भारतेन्दु युग के कवियों ने इस ‘मशीनी युग’ के खतरे को भाँप लिया था। वे जानते थे कि विदेशी मशीनों से बना सामान सस्ता तो हो सकता है, लेकिन वह देश की आत्मनिर्भरता को खत्म कर रहा है। भारतेन्दु ने ‘मुकरियों’ के माध्यम से सूक्ष्म कटाक्ष किए:
“भीतर-भीतर सब रस चूसै, हँसि-हँसि के तन-मन-धन मूसै।“
यहाँ ‘सब रस चूसना’ भारत के संसाधनों के योजनाबद्ध दोहन का प्रतीक है। यह आर्थिक चेतना ही थी जिसने शिक्षित मध्यवर्ग को यह सोचने पर मजबूर किया कि ‘सभ्यता’ और ‘विकास’ के नाम पर भारत का शोषण हो रहा है। “भारतेन्दु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य सन्तों की कुटिया से निकलकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुँच गया था, उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मन्दाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ उसे दरबारीपन से निकालकर लोकजीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया।” 5
नवजागरण और सामाजिक सुधार
भारतेन्दु युगीन राष्ट्रवाद केवल 'सत्ता परिवर्तन' की मांग नहीं था, बल्कि 'समाज परिवर्तन' की छटपटाहट भी था। कवियों ने अनुभव किया कि जब तक समाज भीतर से मजबूत नहीं होगा, राष्ट्र स्वतंत्र नहीं हो सकता।
• छुआछूत और जातिवाद का विरोध: कवियों ने संकीर्णता को त्यागने की बात कही।
• स्त्री शिक्षा: "पढ़ि कोऊ नारि न बिगरिहै" जैसी पंक्तियों के माध्यम से नारी अस्मिता पर बल दिया गया।
• अतीत का गौरव गान: खोए हुए आत्मविश्वास को जगाने के लिए पूर्वजों के पराक्रम को याद किया गया।
राजभक्ति बनाम राष्ट्रभक्ति का द्वंद्व
कूटनीतिक सामंजस्य और वैचारिक संघर्ष
भारतेन्दु युग के कवियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक दमनकारी औपनिवेशिक सत्ता के बीच अपनी बात कहना था। यह वह समय था जब 1857 की क्रांति विफल हो चुकी थी और ब्रिटिश क्राउन का सीधा शासन स्थापित हो गया था। ऐसे में कवियों ने 'सत्य' कहने के लिए एक विशेष आवरण ओढ़ा।
'छद्म राजभक्ति' का सुरक्षा कवच
इस युग के कवियों की राजभक्ति अक्सर एक 'सुरक्षा कवच' (Safety Valve) की तरह थी। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार प्रेस और साहित्य पर कड़ी नजर रख रही थी। भारतेन्दु ने 'लार्ड रिपन' की प्रशंसा में कविताएँ लिखीं, लेकिन उनका उद्देश्य व्यक्ति-विशेष की चापलूसी करना नहीं, बल्कि उदारवादी प्रशासनिक नीतियों का समर्थन करना था ताकि भारतीय समाज को सांस लेने की जगह मिल सके। यह राजभक्ति 'निष्ठा' से अधिक 'रणनीति' का हिस्सा थी।
अधिकारों की मांग और 'प्रजा' का बोध
भारतेन्दु युग की कविता में प्रजा अब केवल 'रैयत' नहीं रही, वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने लगी थी। कवियों ने यह तर्क देना शुरू किया कि यदि हम कर (Tax) देते हैं और महारानी के प्रति निष्ठावान हैं, तो हमें न्याय भी मिलना चाहिए। बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की रचनाओं में यह स्पष्ट झलकता है कि वे राजभक्ति की शर्त 'प्रजा का सुख' मानते थे। जब ब्रिटिश सरकार ने वादे पूरे नहीं किए, तो वही राजभक्ति तीखे व्यंग्य और आक्रोश में बदलने लगी।
'राजभक्ति' की आड़ में नौकरशाही पर प्रहार
इन कवियों ने एक चतुर विभाजन किया—वे शीर्ष सत्ता (महारानी) को दयालु बताते थे, लेकिन स्थानीय ब्रिटिश नौकरशाही और भारतीय चाटुकारों को 'देशद्रोही' और 'शोषक' करार देते थे। प्रताप नारायण मिश्र ने 'तृप्यन्ताम्' जैसी कविताओं में इन स्वार्थी तत्वों पर करारी चोट की। यह एक प्रकार का 'बौद्धिक राष्ट्रवाद' था, जहाँ सीधे सम्राट पर हमला न करके प्रशासन के अंगों को बेनकाब किया गया।
द्वंद्व का आधार: मध्यकालीन संस्कार बनाम आधुनिक दृष्टि
इस द्वंद्व का एक कारण मनोवैज्ञानिक भी था। भारत सदियों से 'राजतंत्रीय' व्यवस्था में रहा था, जहाँ राजा को ईश्वर का अंश माना जाता था। भारतेन्दु युगीन कवियों के भीतर यह मध्यकालीन संस्कार शेष था, लेकिन उनके विचार आधुनिक लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे थे। इसीलिए वे एक ओर महारानी को 'भारत राजेश्वरी' कहकर संबोधित करते हैं, तो दूसरी ओर 'देश की दुर्दशा' के लिए उन्हीं की व्यवस्था को जिम्मेदार भी ठहराते हैं। यह 'भक्ति' और 'तर्क' के बीच का संक्रमण काल था।
राष्ट्रभक्ति का क्रमिक विकास
जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन के वास्तविक इरादे (जैसे- वर्नाकुलर प्रेस एक्ट और शस्त्र अधिनियम) सामने आए, वैसे-वैसे राजभक्ति का मुखौटा उतरने लगा। ठाकुर जगमोहन सिंह और राधाकृष्ण दास की कविताओं में देशप्रेम अब राजभक्ति से स्वतंत्र होकर उभरने लगा। 'भारत-धर्म' जैसी कविताओं में अब याचना नहीं, बल्कि धिक्कार का स्वर था। राष्ट्रभक्ति अब 'अतीत के गौरव' और 'वर्तमान की गुलामी' के बीच एक पुल बन गई थी।
व्यंग्य: विरोध का नया औजार
जब सीधे तौर पर विरोध करना संभव नहीं था, तब इन कवियों ने 'व्यंग्य' (Satire) को राष्ट्रभक्ति का हथियार बनाया। भारतेन्दु की 'मुकरियाँ' और 'पैहेलियाँ' इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने 'अंग्रेजों' को 'मधुकर' (भँवरा) कहकर संबोधित किया, जो केवल रस (धन) चूसना जानते थे। राजभक्ति यहाँ केवल एक औपचारिकता रह गई थी, जबकि कविता का अंतर्निहित स्वर पूर्णतः विद्रोही और राष्ट्रवादी था।
भारतेन्दु युगीन कविता का यह द्वंद्व दरअसल भारतीय मध्यवर्ग की छटपटाहट का प्रतिबिंब है। यह एक ऐसी राष्ट्रभक्ति थी जो राजभक्ति की कोख से पैदा हुई, लेकिन समय के साथ उसने अपनी जननी का परित्याग कर पूर्ण स्वाधीनता और लोक-सत्ता का मार्ग चुना। डॉ. नामवर सिंह के अनुसार, "यह राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति का मिलन नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति द्वारा राजभक्ति का उपयोग था।" इस युग की कविता में एक विचित्र अंतर्विरोध दिखाई देता है। एक ओर कवि महारानी विक्टोरिया की प्रशंसा करते हैं, तो दूसरी ओर नौकरशाही की आलोचना। वास्तव में, यह उनकी रणनीति थी। वे सीधे दमन से बचते हुए जनता को शिक्षित करना चाहते थे। धीरे-धीरे यह राजभक्ति पूर्णतः राष्ट्रभक्ति में विलीन हो गई, जिसका चरमोत्कर्ष हमें 'भारत दुर्दशा' जैसे नाटकों और कविताओं में मिलता है:
"रोअहु सब मिलि कै आवहु भारत भाई,
हा! हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।"
जन-चेतना और जन-भाषा
भारतेन्दु युग वह काल था जहाँ कविता ने पहली बार 'जनता की समस्याओं' को अपनी विषय-वस्तु बनाया। यहाँ जन-भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का एक सांस्कृतिक हथियार बनकर उभरी।
'निज भाषा' के माध्यम से राष्ट्रीय एकता का सूत्रपात
भारतेन्दु ने यह स्पष्ट रूप से पहचाना था कि जब तक राष्ट्र की अपनी एक समर्थ भाषा नहीं होगी, तब तक जन-चेतना का प्रसार संभव नहीं है। "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल" की अवधारणा के पीछे गहरा राजनीतिक दर्शन था। उनका मानना था कि विदेशी भाषा (अंग्रेजी) या शासक की भाषा (फारसी मिश्रित उर्दू) आम भारतीय के मानसिक दासत्व का कारण है। हिन्दी को 'जन-भाषा' के रूप में प्रतिष्ठित करने का आंदोलन वास्तव में आम आदमी को शासन की प्रक्रिया से जोड़ने और उसे जागरूक करने का प्रयास था।
खड़ी बोली और ब्रजभाषा का द्वंद्व एवं समन्वय
जन-चेतना के लिए इस युग में भाषा के स्तर पर एक बड़ा प्रयोग हुआ। जहाँ भक्ति और श्रृंगार के लिए ब्रजभाषा का माधुर्य था, वहीं समकालीन यथार्थ और तीखी प्रतिक्रिया के लिए कवियों ने धीरे-धीरे खड़ी बोली की ओर कदम बढ़ाए। प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट जैसे रचनाकारों ने गद्य और पद्य के बीच जो सेतु बनाया, उसने साहित्य को जन-साधारण के बोलचाल के स्तर पर ला खड़ा किया। यह भाषाई संक्रमण वास्तव में मध्यकाल के 'अभिजात्य' से आधुनिक काल के 'लोकतंत्र' की ओर बढ़ने की प्रक्रिया थी।
पत्रकारिता और कविता का अंतर्संबंध
इस युग की जन-चेतना को दिशा देने में पत्र-पत्रिकाओं (जैसे- कवि-वचन-सुधा, हिन्दी प्रदीप, ब्राह्मण) का बड़ा योगदान रहा। कविताएँ अब केवल पुस्तकों में बंद नहीं रहीं, वे अखबारों के माध्यम से रोज जनता के बीच पहुँचने लगीं। इससे कविता में 'समसामयिकता' (Topicality) आई। जब भी सरकार कोई नया कानून लाती या कहीं अकाल पड़ता, कवि तुरंत उस पर अपनी रचना लिखते। इस "तात्कालिकता" ने जनता के भीतर राजनीतिक विश्लेषण की क्षमता पैदा की।
धार्मिक रूढ़ियों का विरोध और 'मानववाद'
जन-चेतना का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार था। भारतेन्दु मंडल के कवियों ने धर्म के नाम पर फैले पाखंड, अंधविश्वास और कट्टरता को राष्ट्रीय प्रगति में बाधक माना। उन्होंने ईश्वर की भक्ति को 'देश-भक्ति' और 'मानव-सेवा' से जोड़कर पेश किया। अब 'राम' और 'कृष्ण' केवल अलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और वीरता के प्रतीक बनकर उभरे, ताकि निराश जनता में आत्मविश्वास भरा जा सके।
स्त्री-चेतना और शिक्षा का प्रसार
जन-चेतना तब तक अधूरी थी जब तक आधी आबादी (स्त्रियाँ) हाशिए पर रहतीं। भारतेन्दु ने 'बालबोधिनी' पत्रिका के माध्यम से और अपनी कविताओं के जरिए स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह के पक्ष में जनमत तैयार किया। उन्होंने सामाजिक जड़ता को तोड़ने के लिए लोक-संस्कृति के उन गीतों का सहारा लिया जो महिलाएँ घर-आंगन में गाती थीं, और उनमें सुधारवादी संदेश भर दिए।
'प्रजा' का 'नागरिक' में रूपांतरण
इस युग की कविता ने भारतीय मानस को यह समझाया कि वे केवल किसी राजा की 'प्रजा' नहीं हैं, बल्कि एक 'देश' के 'नागरिक' हैं। अधिकारों के प्रति यह सजगता ही जन-चेतना का आधार बनी। बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की कविताओं में हमें वह 'नागरिक बोध' मिलता है जो सरकार से जवाबदेही की मांग करता है।
भारतेन्दु युगीन जन-भाषा ने साहित्य के 'पवित्र' और 'अभिजात्य' ढाँचे को तोड़कर उसे धूल-धूसरित आम आदमी से जोड़ा। यह भाषा की लोकतांत्रिक शक्ति ही थी जिसने आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम को एक व्यापक आधार प्रदान किया।
भारतेन्दु मंडल के कवियों ने कविता को 'दरबार' से निकालकर 'जनता' तक पहुँचाया। उन्होंने लोक-शैलियों जैसे लावणी, कजली, मुकरी और पैलियाँ अपनाईं ताकि अनपढ़ जनता भी राष्ट्रवाद के संदेश को समझ सके। 'भारत-जननी' और 'देश-दशा' जैसी रचनाएं इसी जन-चेतना का प्रमाण हैं।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, भारतेन्दु युगीन कविता आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की नींव है। इसमें नवजागरण के वे तमाम तत्व मौजूद हैं—स्वतंत्रता, समता, और बंधुत्व। इन कवियों ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर उसे राष्ट्र निर्माण का हथियार बनाया। उन्होंने भाषा, धर्म और समाज के स्तर पर जो चेतना जगाई, उसी की परिणति आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम के महान आंदोलन के रूप में हुई।
सहायक ग्रंथ सूची
सन्दर्भ सूची:
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4.दास, ब्रजरत्न. (सं.). (1953). भारतेन्दु ग्रन्थावली (पहला खंड). नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी.
5.वार्ष्णेय, लक्ष्मीसागर. (1954). आधुनिक हिन्दी साहित्य की भूमिका. हिन्दी परिषद्, प्रयाग विश्वविद्यालय.
6.सिंह, नामवर. (1989). दूसरी परम्परा की खोज. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
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9.चौधरी 'प्रेमघन', बद्रीनारायण. (1998). प्रेमघन सर्वस्व. (सं. दिनेश नारायण सिंह). राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
1. भारतेन्दु हरिश्चंद्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ - डॉ. रामविलास शर्मा।
2. हिन्दी साहित्य का इतिहास - आचार्य रामचंद्र शुक्ल।
3. आधुनिक हिन्दी साहित्य की भूमिका - डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय।
4. भारतेन्दु ग्रन्थावली - सं. ब्रजरत्न दास।
5. हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठ- 72 आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
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