संस्कृत की शास्त्रीयता और हिन्दी की तरलता के संगम से निर्मित नक्षत्र : जानकी वल्लभ शास्त्री । जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।
हिन्दी साहित्य के आकाश में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी आभा संस्कृत की शास्त्रीयता और हिन्दी की तरलता के संगम से निर्मित हुई है। आज 5 फरवरी, उनकी जयंती के पावन अवसर पर, भारतकोश और वेब पत्रिका 'मीमांसा' उन्हें सादर नमन करते हैं। शास्त्री जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय मेधा और ऋषि-परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि थे।
जन्म, बाल्यकाल एवं शिक्षा: प्रतिभा का उदय
जानकी वल्लभ शास्त्री का जन्म 5 फरवरी 1916 को बिहार के गया जिले के 'मैगरा' गाँव में हुआ था। उनके पिता पंडित रामानुग्रह शर्मा एक सात्विक और पशु-प्रेमी व्यक्ति थे, जिनका प्रभाव शास्त्री जी के व्यक्तित्व पर गहरा पड़ा।
असाधारण मेधा: उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रथम श्रेणी में संस्कृत की परीक्षा उत्तीर्ण की।
काशी का सानिध्य: 16 वर्ष की आयु में 'शास्त्री' की उपाधि प्राप्त कर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए, जहाँ 1932 से 1938 तक उन्होंने अपनी शैक्षणिक जड़ें मज़बूत कीं।
बहुभाषी विद्वान: यद्यपि उनकी औपचारिक शिक्षा संस्कृत में हुई, किंतु उन्होंने स्वाध्याय से अंग्रेज़ी और बांग्ला पर अद्भुत अधिकार प्राप्त किया। वे रवींद्रनाथ टैगोर के गीतों के मुरीद थे।
साहित्यिक यात्रा: निराला से प्रेरणा और छायावाद का विस्तार
शास्त्री जी के साहित्यिक जीवन में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रारंभ में वे केवल संस्कृत में काव्य रचना करते थे।
'अभिनव जयदेव' से छायावादी कवि तक
1930 के आसपास जब उनका संस्कृत काव्य संग्रह 'काकली' प्रकाशित हुआ, तो इसकी माधुर्य प्रधान शैली देखकर विद्वानों ने उन्हें 'अभिनव जयदेव' की उपाधि दी। निराला जी 'काकली' से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शास्त्री जी को 'प्रिय बाल पिक' कहकर संबोधित किया और उन्हें हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित किया।
छायावाद के पाँचवें स्तंभ
प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नलिन विलोचन शर्मा ने उन्हें प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के बाद 'पाँचवां छायावादी कवि' माना। हालाँकि, शास्त्री जी की विशेषता यह थी कि वे छायावाद की दुरूहता से मुक्त रहकर सहज और गेय गीत लिखते थे।
प्रमुख रचनाएँ: एक विशाल वांग्मय
आचार्य शास्त्री की लेखनी ने साहित्य की लगभग हर विधा को छुआ। उनका पहला गीत 'किसने बांसुरी बजाई' अपार लोकप्रिय हुआ।
काव्यगत विशेषताएँ एवं दर्शन
शास्त्री जी का काव्य "कला कला के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए" का जीवंत उदाहरण है।
संगीत और लय: उनके गीत केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि गाए जाते हैं। राग केदार उनका प्रिय राग था।
प्रकृति और पशु प्रेम: निराला निकेतन (मुजफ्फरपुर) स्थित उनके आवास पर दर्जनों गायें और अन्य पशु थे। उनका यह जीव-प्रेम उनकी रचनाओं में भी झलकता है।
दार्शनिकता: उनके गीतों में भागदौड़ भरी दुनिया के बजाय 'आत्म-बोध' और 'शांति' की खोज मिलती है। उनकी पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं:
"ध्रुव लक्ष्य किसी को है न मिला, सबके पथ में है शिला शिला..."
सम्मान, पुरस्कार और स्वाभिमान
साहित्य के प्रति उनके समर्पण के लिए उन्हें अनेक गौरवपूर्ण सम्मानों से अलंकृत किया गया:
भारत भारती पुरस्कार (उत्तर प्रदेश सरकार का सर्वोच्च सम्मान)
राजेंद्र शिखर पुरस्कार
शिव सहाय पूजन पुरस्कार
स्वाभिमान का परिचय: भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' देने की घोषणा की थी, किंतु अपनी विरक्त प्रकृति और कुछ वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने इसे सप्रेम लौटा दिया, जो उनके फकीराना अंदाज़ को दर्शाता है।
अंतिम समय और विरासत
7 अप्रैल 2011 को 96 वर्ष की आयु में मुजफ्फरपुर के 'निराला निकेतन' में इस महान विभूति का प्राणांत हुआ। वे अपने पीछे गीतों की एक ऐसी विरासत छोड़ गए जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेम, दर्शन और सरलता का पाठ पढ़ाती रहेगी।
निष्कर्ष
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री हिन्दी साहित्य के वह सेतु थे जिन्होंने प्राचीन संस्कृत पांडित्य और आधुनिक हिन्दी गीति-परंपरा को जोड़ा। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
सूचनात्मक उद्देश्य: यह आलेख आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने और पाठकों को उनके जीवन व साहित्यिक योगदान से परिचित कराने के उद्देश्य से संकलित किया गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, साक्षात्कारों और उपलब्ध साहित्यिक दस्तावेजों पर आधारित है।
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